इन नदियों का उद्गम भी ‘गोमुख’ होता…

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स्वर्णरेखा नदी के उदगम स्रोत के पास एक प्रवेश द्वार और एक शिलापट्ट भी दिखता है लेकिन कोयल नदी के उद्गम स्रोत के पास तो पहचान बताने की कोई कवायद तक नहीं दिखती, जिससे यह पता चले कि झारखंड की एक अहम नदी यहीं से निकलती है. हमारे मन में यह सवाल आता है कि आखिर इतनी महत्वपूर्ण जगह की इस तरह उपेक्षा क्यों? रंथू कहते हैं कि स्वर्णरेखा नगड़ी बाजार से सटा हुआ इलाका है, इसलिए वहां के लोगों ने एक मंदिर बनाकर, हर साल संक्रांति में मेला लगाना शुरू किया. राजनीतिक दलों को इसमें एक अवसर भी नजर आया और एक गेट बनवा दिया गया लेकिन कोयल नदी तो बिलकुल एक गांव से निकलती है, जहां कोई सालाना आयोजन नहीं होता. रंथू कहते हैं कि यहां से कुछ ही किलोमीटर आगे जाने पर झारखंड की तीसरी महत्वपूर्ण नदी कारो भी निकलती है. बकौल रंथू, ‘आप स्वर्णरेखा का उद्गम देखने के बाद कोयल के उद्गम तो आ भी गईं लेकिन कारो नदी कहां से निकलती है, यह देखने भी कोई नहीं जाता, क्योंकि कई सालों से इस इलाके को नक्सलियों का गढ़ माना जाता है, जहां डर से कोई देखने भी जाना नहीं चाहता.’

कोयल झारखंड की दूसरी अहम और पलामू इलाके की जीवन रेखा मानी जाने वाली नदी है, लेकिन सरकारी और राजनीतिक उपेक्षा के चलते इसका महत्व न के बराबर है

रंथू की बात के बीच में ही संजय उरांव कहते हैं, ‘ऐसा इलाका किसी दूसरी जगह होता तो आज उसकी महत्ता देश भर में जानी जाती लेकिन अबतक तो यह इलाका झारखंड में ही पहचान नहीं बना सका है. आगे भविष्य में यह इलाका किस रूप में विकसित होगा, इसका कोई ठोस खाका तैयार नहीं हो पाया है. इस बाबत नदियों के विशेषज्ञ दिनेश मिश्र कहते हैं कि अमरकंटक (म.प्र.) से सोन, नर्मदा, और महानदी तथा मानसरोवर से गंगा, ब्रह्मपुत्र, घाघरा और सतलज जैसी नदियां निकलती हैं और उनका विशेष महत्व है पर यह सब सरकारी व राजनीतिक उपेक्षा का ही परिणाम है. हालांकि गांव के लोगों को छोटी से छोटी कवायदों में भी बड़ी उम्मीद  दिखती है. स्वर्णरेखा क्षेत्र विकास मंच के प्रमख तपेश्वर केसरी कहते हैं कि अभी झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण परिषद के अध्यक्ष मणिशंकर ने कहा है कि स्वर्णरेखा उद्गम क्षेत्र का महत्व फिर से स्थापित हो, इसके लिए पहले 20 एकड़ जमीन में वृक्षारोपण का काम होगा. केसरी कहते हैं कि कुछ तो हो, वरना 2004 में ही इसे विकसित किए जाने का प्रस्ताव आया था, 2006 में घोषणा भी हुई थी, उसके बाद सौंदर्यीकरण के नाम पर एक तालाब बनवा दिया गया, एक द्वार बन गया और उसके बाद इसे भूला दिया गया. विधानसभा में पूर्व विधायक सरयू राय ने इसके विकास के संदर्भ में विधान सभा में सवाल भी उठाए लेकिन कुछ भी परिणाम नहीं निकला. जबकि यदि इस इलाके को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाए तो यह झारखंड के लिए गंगोत्री के समान ही महत्वपूर्ण होगा और आमदनी के नए स्रोत भी खुलेंगे.

स्वर्णरेखा उद्गम स्थल के नाम पर एक तालाब व एक द्वारा बनाकर किसी तरह खानापूर्ति की गई है.
स्वर्णरेखा उद्गम स्थल के नाम पर एक तालाब व एक द्वारा बनाकर किसी तरह खानापूर्ति की गई है.

पिछले कुछ सालों से झारखंड की दो महत्वपूर्ण नदियों पर काम करने वाले पूर्व विधायक सरयू राय कहते हैं कि स्वर्णरेखा हो या दामोदर, दोनों नदियों का संपूर्णता में अस्तित्व ही दांव पर लगा हुआ है तो उद्गम की बात क्या की जाए. झारखंड में औद्योगिक घरानों और पढ़े-लिखे लोगों ने मिलकर किस्तों में नदियों को खत्म होने के मुहाने पर पहुंचाया है. बात जहां तक स्वर्णरेखा नदी के उद्गम स्थल रानीचुआं की है तो वहां तो हमलोगों ने वैज्ञानियों से अध्ययन भी कराया है, जिसका निष्कर्ष था कि रानीचुआं से निकलने वाला जल क्षारीय है जबकि उसके पास से ही अम्लीय जल निकलता है और पास में ही दोनों मिलते हैं और उसके बाद जो धार निकलती है, उस पानी का पीएच वैल्यू सात होता है, यानी शुद्ध पानी. उस स्थल को सरकार कभी पर्यटन स्थल बनाने की बात करती है तो कभी कुछ और, जबकि ऐसा कुछ भी करने की जरूरत नहीं है. वहां पेड़ लगाए जाएं और उसे अविरल बहने दिया जाए, तभी नदी का उद्गम स्रोत बचा रह सकता है, वरना स्रोत ही सूख जाएगा तो आगे तो नदी कचरे और गंदगी का ढेर ढोने को अभिशप्त हो ही गई है.

कभी नदी उद्गम स्थल का विकास होगा, लोगों को विश्वास है भी और नहीं भी लेकिन अपनी ओर से सबने कोशिशें जारी रखी हैं. कोयल और कारो के उद्गम का तो हाल बेहाल है लेकिन बड़ी नदी स्वर्णरेखा का उद्गम स्थल रानीचुआं अपनी पहचान बनाए रखे, उसकी महता कायम रहे, इसके लिए वहां छोटी-छोटी कई कोशिशें दिखती हैं. वहां पास में बने एक मंदिर में राजेंद्र साधु बाबा दिन-रात लगे रहते हैं ताकि वह मंदिर स्वर्णरेखा महादेव के तौर पर स्थापित हो. राजकुमार केसरी जैसे लोग रोज अहले सुबह रानीचुआं में नहाकर पूजा-पाठ करने पहुंचते हैं और फिर अपने धंधे में लग जाते हैं. यह जलस्रोत बना रहे, इसके लिए किसी ने रानीचुआं के पास छोटा-सा शिवलिंग भी रख दिया है. गांधी के अनुयायी टाना भगतों ने जनेऊ के धागों को बांधने के साथ रानीचुआं के आसपास सफेद झंडा भी लगा दिया है.

देखना है कि निजी तौर पर अंजाम दी जा रही ये छोटी-मोटी कोशिशें रंग लाती हैं या अपने उद्गम से जुड़े किस्सों की तरह ये नदियां भी मिथक में बदली जाएंगी.

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