इस पेशे में हर शख्स बीमार सा | Tehelka Hindi

पत्रकारिता विशेषांक A- A+

इस पेशे में हर शख्स बीमार सा

पत्रकारिता का क्षेत्र दूर से जितना आकर्षक लगता है, उसकी हकीकत उतनी ही स्याह है. शिफ्टों में काम करना, फील्ड की भागदौड़, बेहतर करने का तनाव पत्रकारों के शारीरिक के साथ मानसिक स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचा रहा है

Cअनिश्चित दिनचर्या और खाने-पीने का कोई सही समय न हो पाने की वजह से पत्रकारों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है. कुछ साल पहले मीडिया स्टडीज ग्रुप की ओर से देश में कार्यरत मीडियाकर्मियों की कार्यस्थिति और जीवन-स्तर का अंदाजा लगाने के उद्देश्य से एक सर्वेक्षण किया गया. 13 जुलाई, 2008 से 13 जून, 2009 तक चले इस सर्वेक्षण के दौरान 150 मीडियाकर्मियों ने अपनी राय दी थी. आम तौर पर मीडियाकर्मियों के स्वास्थ्य को लेकर बहुत ही कम सर्वे किए जाते हैं. यह अपनी तरह का अनूठा सर्वे था, जो मीडियाकर्मियों की बुरी हालत की झलक दिखाता है. इसे नजीर के तौर पर देखें तो आज कई सालों बाद मीडिया में लोगों के काम करने की स्थितियां कमोबेश वैसी ही हैं जैसी सर्वे होने के समय थीं.

इस सर्वेक्षण में शामिल मीडियाकर्मियों में से 83.67 फीसदी पुरुष और 16.33 फीसदी महिलाएं हैं. इनमें से 34.48 फीसदी लोगों का आयु-वर्ग 21 से 27 वर्ष तक था. 31.72 फीसदी लोग 28 से 35 के आयु-वर्ग के थे. 36 वर्ष से अधिक आयु-वर्ग के 33.79 फीसदी मीडियाकर्मी थे. सर्वेक्षण में दस वर्ष से अधिक का मीडिया में अनुभव रखने वाले 43.15 फीसदी कर्मचारियों ने भाग लिया. 15.07 फीसदी लोग ऐसे हैं, जो पांच से दस साल तक का अनुभव रखते हैं. तीन से पांच साल तक के अनुभवी मीडियाकर्मियों का प्रतिशत भी 15.07 ही है. इसके अलावा 6.85 फीसदी मीडियाकर्मी एक से तीन साल और 19.86 फीसदी मीडियाकर्मी एक साल से भी कम समय का अनुभव रखते हैं. 54.14 फीसदी प्रिंट मीडिया से, 24.31 फीसदी टेलीविजन, 9.39 फीसदी वेब मीडिया, 6.63 फीसदी एजेंसी से और 5.52 फीसदी लोग रेडियो से संबद्ध थे. इनमें से 69.44 फीसदी मीडियाकर्मी मुख्यालय में कार्यरत थे. 24.31 फीसदी क्षेत्रीय कार्यालय और 6.25 फीसदी मीडियाकर्मी जिला कार्यालय में अपनी सेवाएं दे रहे थे. इसके अलावा 54.11 फीसदी डेस्क पर और 46.89 फीसदी फील्ड में कार्यरत थे. सर्वेक्षण में भाग लेने वालों में 34.46 फीसदी वरिष्ठ मीडियाकर्मी थे, 40.56 फीसदी मध्य-स्तर के पदों पर आसीन थे और 20.98 फीसदी कनिष्ठ.

सर्वेक्षण का निष्कर्ष

  • 65.51 फीसदी मीडियाकर्मियों को प्रतिदिन आठ घंटे से अधिक काम करना पड़ता था. 23.65 फीसदी लोगों ने स्वीकार किया कि उनसे आठ घंटों तक ही काम लिया जाता था. जबकि 12.84 फीसदी ने यह भी माना कि उन्हें आठ घंटों से भी कम काम करना पड़ता था.
  • 71.53 फीसदी मीडियाकर्मियों को एक दिन का साप्ताहिक अवकाश मिलता था. 17.36 फीसदी लोगों को दो दिनों का साप्ताहिक अवकाश मिलता था. जबकि 11.11 फीसदी लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें कोई साप्ताहिक अवकाश नहीं मिलता था.
  • 13.50 फीसदी मीडियाकर्मी हृदय एवं रक्तचाप संबंधी रोगों से पीड़ित थे. 13.81 फीसदी मीडियाकर्मी मधुमेह से परेशान थे. दांत के रोग से पीड़ित मीडियाकर्मियों का प्रतिशत 11.39 था. 13.08 फीसदी लोगों ने खुद को पेट संबंधी रोगों से पीड़ित बताया. 10.97 फीसदी लोगों ने स्वीकार किया है कि वे मानसिक दबाव और अवसाद से पीडि़त हैं. 14.34 फीसदी मीडियाकर्मियों ने हड्डी एवं रीढ़ की तकलीफों से खुद को परेशान बताया. 11.81 फीसदी लोगों को आंख से संबंधी बीमारी पाई गई. बस 2.10 फीसदी लोगों ने कमजोरी, थकान और सिरदर्द से खुद को पीड़ित बताया.
  • 48.06 फीसदी मीडियाकर्मी का दुख ये था कि उन्हें इलाज के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता, लेकिन, 51.94 फीसदी मीडियाकर्मियों के लिए यह संभव नहीं हो पाता.
  • 61.27 फीसदी मीडियाकर्मियों के खाने-पीने का कोई निर्धारित समय नहीं था. जबकि 17.61 फीसदी मीडियाकर्मियों ने अपने भोजन का समय निर्धारित कर रखा था. 21.13 फीसदी मीडियाकर्मी यह कहते हैं कि कभी उनके भोजन का समय निर्धारित रहता है और कभी नहीं.
  • कार्य-संस्कृति के सवाल पर 33.57 फीसदी मीडियाकर्मियों का मानना था कि उनके संगठन में बेहतर कार्य-संस्कृति है. 54.55 फीसदी मीडियाकर्मियों ने अपने कार्य-स्थल की कार्य-संस्कृति को औसत ही माना. जबकि 11.89 फीसदी लोग ऐसे भी थे, जिन्हें उनके संस्थान की कार्य-संस्कृति बुरी लगती थी.
  • 45.52 फीसदी मीडियाकर्मी अपने सहकर्मियों के आपसी व्यावसायिक संबंध को बेहतर मानते थे. 49.66 फीसदी लोग सहकर्मियों के बीच व्यावसायिक संबंध को औसत मानते थे, जबकि 4.83 फीसदी लोगों का अनुभव है कि उनके सहकर्मियों से बीच अच्छे व्यावसायिक संबंध नहीं थे.
  • 54.17 फीसदी मीडियाकर्मी अपनी नौकरी के लिए असुरक्षा महसूस करते थे, लेकिन 45.82 फीसदी ने अपनी नौकरी को सुरक्षित माना.
  • 12.59 फीसदी मीडियाकर्मियों ने 6 या उससे अधिक जगहों पर अपनी सेवाएं दी थी. 66.43 फीसदी ऐसे थे जो दो से पांच नौकरियां बदल चुके थे. एक ही संस्थान/संगठन में काम करने वालों का प्रतिशत 28.98 था.
  • 56.25 फीसदी मीडियाकर्मी दस किलोमीटर या उससे अधिक दूरी तय कर अपने कार्य-स्थल तक पहुंचते थे. 21.53 फीसदी को इसके लिए 5 से 10 किलोमीटर तक की दूरी तय करनी पड़ती थी. 1 से 5 किलोमीटर तक दूरी तय करने वाले लोगों का प्रतिशत 10.06 था. 1 से भी कम किलोमीटर की दूरी से आने वाले सिर्फ 4.17 प्रतिशत हैं.
  • 52.35 फीसदी मीडियाकर्मी दिन की पाली में और 76 फीसदी लोग शाम की पाली में काम कर रहे थे. 14.71 फीसदी मीडियाकर्मियों का रात के समय काम करना निश्चित होता है. 11.18 फीसदी लोग सुबह की पाली में काम करते थे.
  • मीडिया में उनका पसंदीदा क्षेत्र के बारे में पूछने पर 61.63 फीसदी प्रिंट माध्यम में और 22.09 फीसदी मीडियाकर्मी इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों में काम करना चाहते थे. 4.65 फीसदी की पसंद रेडियो थी और 6.98 फीसदी वेब मीडिया से जुड़े रहना चाहते थे. 4.65 फीसदी मीडियाकर्मी समाचार एजेंसी में काम करने का इच्छुक बताया. 15. 54.55 फीसदी मीडियाकर्मी अपने काम से संतुष्ट थे, जबकि 45.45 फीसदी मीडियाकर्मी असंतुष्ट.

(संजय कुमार बलौदिया के सहयोग से)

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