साइमन उरांव : जल, जंगल और जमीन का सर्जक | Tehelka Hindi

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साइमन उरांव : जल, जंगल और जमीन का सर्जक

पर्यावरणविद साइमन उरांव को साइमन बाबा के नाम से जाना जाता है. झारखंड में जल, जंगल और जमीन बचाने में लगे इस शख्स के बारे में लोगों ने तब जाना जब उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया

निराला March 28, 2016, Issue 4 Volume 8

Simon-Oraon

गणतंत्र दिवस के ठीक पहले की बात है. हर बार की तरह इस बार भी रस्मअदायगी अंदाज में पद्म सम्मानों को लेकर घमासानी वाकयुद्ध छिड़ा हुआ था. फलाना को क्यों मिला, फलाना पर नजर क्यों नहीं गई, फलाना तो सेटिंग-गेटिंग कर पद्म सम्मान लेने में सफल रहे. ऐसी ही बातें एक-दूसरे से राष्ट्रीय स्तर पर टकरा रही थी. उस वक्त झारखंड में सिर्फ एक नाम पर बार-बार चर्चा हो रही थी. संभावनाओं के आधार पर तीरंदाज दीपिका कुमारी का नाम उछाला गया था. इस बीच एक नाम सामने आया कि झारखंड से तीरंदाज दीपिका को तो पद्मश्री सम्मान मिलेगा ही साथ ही साइमन उरांव को भी इससे नवाजा जाएगा.

साइमन उरांव का जब नाम आया तो देश के बड़े हिस्से ने ध्यान ही नहीं दिया. देश को छोड़ दें तो झारखंड के ही एक बड़े हिस्से के लिए यह नाम लोगों के लिए चौंकाने वाला था. इस अजनबी नाम के बारे में राजधानी रांची में भी लोग एक-दूसरे से पूछ रहे थे. हालांकि रांची से महज 30 किलोमीटर की दूरी पर बसे बेड़ो बाजार में जब यह खबर पहुंची कि साइमन उरांव को पद्म सम्मान मिलने वाला है तो बेड़ो के आसपास गांवों में खुशी की लहर दौड़ गई. यह खबर जंगल की आग की तरह फैली. आधे से अधिक लोग यह भी नहीं जानते कि यह पद्म सम्मान होता क्या है? उनके लिए बस ये जानना ही काफी था कि उनके साइमन बाबा को कोई सम्मान मिल रहा है.

बेड़ो इलाके में खुशी की ये लहर यूं ही नहीं दौड़ी थी. साइमन उरांव को इस नाम से उनके बेड़ो इलाके में नहीं बुलाया जाता. इलाके वाले या तो उन्हें ‘साइमन बाबा’ कहते हैं या ‘राजा बाबा.’ राजा बाबा इसलिए, क्योंकि वे पारंपरिक तौर पर आदिवासियों में कायम शासन व्यवस्था के तहत 1967 से ‘पहड़ा राजा’ हैं. और नई पीढ़ी राजा बाबा इसलिए कहती है क्योंकि पिछले कई दशकों से उन्होंने अपना पूरा जीवन लोगों के लिए समर्पित कर दिया है.

साइमन बेड़ो के हरिहरपुर गांव के रहने वाले हैं. उन्हें यह सम्मान 81 साल की उम्र में मिला है. जिस काम के लिए उन्हें यह सम्मान मिला है, उस काम को वे देश को आजादी मिलने के बाद से ही अपने इलाके में कर रहे हैं. फिलहाल वह अपने इलाके के 51 गांवों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं. वह अब तक छह बांध बना या बनवा चुके हैं. पांच तालाबों के सृजनकर्ता हैं और इलाके में छोटी नहरों और कुंओं का भी भरपूर निर्माण कराया है. अगर उनके इलाके के जंगल को देखें तो पुराने जंगल तो बचे हुए है ही, नए जंगलों के सर्जक भी वे हैं और उनकी प्रेरणा से हजारों पेड़ लहलहा रहे हैं. ये सब जानकर किसी को भी लग सकता है कि ऐसे काम तो कई लोग देश में कर रहे हैं. लेकिन यह कहना आसान है, पर उनकी यात्रा को जानने के बाद लगेगा कि उनका काम आंकड़ों में समेट कर आंकने वाला मामला नहीं है.

साइमन उरांव अब तक छह बांध बना या बनवा चुके हैं. वह पांच तालाबों के सृजनकर्ता हैं और इलाके में छोटी नहरों और कुंओं का भी भरपूर निर्माण कराया है

साइमन अपनी बात को बहुत सहजता से बताते हैं. कहते हैं, ‘बहुत मुश्किलों से गुजरना पड़ा. अभी नहीं, जिस दिन सोचा कि जंगल को कटने नहीं देंगे, खेती को बचाएंगे और लोगों को बताएंगे कि जो बरखा है, पानी है, जंगल है, हरियाली है, पहाड़ है, वह कुदरत की देन है, उस पर सिर्फ भगवान का अधिकार है, किसी और का नहीं, उसी दिन से परेशानी शुरू हुई.’ वह कहते हैं कि 1952 के करीब उन्होंने पहली बार गांव के लोगों को प्रेरित कर यह तय किया कि जंगल कटने शुरू हुए हैं, इसे रोकना है. जब वे इस अभियान में लगे तो उन्हें जेल भेज दिया गया. साइमन हंसते हुए बताते हैं, ‘जब काम शुरू किए तब दु-दु बार जेल भी भेज दिए गए थे, बाद में कोर्ट ने छोड़ दिया, यह कहके कि हम सामाजिक आदमी हैं.’ साइमन जेल गए तो उन्हें लग गया कि जंगल को बचाना इतना आसान नहीं और अगर अभी ही नहीं बचाया गया तो उनका इलाका वीरान हो जाएगा. साइमन ने अपने गांव के ही दूसरे टोले खकसीटोली, जामटोली, बैरटोली आदि के लोगों को जुटाया. उन सबकी मदद से एक टीम बनाई. सभी गांवों से दस-दस लोगों की टीम थी और जो इसमें शामिल हुए उनके पारिश्रमिक के लिए 20-20 पइला (अनाज मापने वाला पात्र) चावल देने का निर्णय लिया गया. चावल भी गांव से ही चंदे में लिया जाने लगा. इस तरह जंगल बचाने का अभियान शुरू हुआ. नतीजा यह हुआ कि बाहर वाले जंगल की ओर नजर डालने से तो रहे, जो स्थानीय जंगल में लकड़ी काटने जाते थे उनकी जरूरत के हिसाब से उनके लिए भी शुल्क निर्धारित कर दिया गया. जलावन, घर आदि बनाने के लिए लकड़ी लाने पर 50 पैसे का शुल्क निर्धारित हुआ जो बाद में बढ़कर दो रुपये हो गया. जंगल बचाने की सिर्फ यही तरकीब साइमन ने नहीं निकाली, बल्कि जो पेड़ काटते थे उन्हें भी इसके लिए प्रेरित करते रहे कि एक पेड़ काटने से पहले पांच से दस पेड़ लगाओ. साइमन काम कर साबित कर रहे थे इसलिए उनकी बातों का असर भी होता रहा. लोग उनकी बात मानते भी रहे और आज नतीजा यह दिखता है कि बेड़ो के जिस इलाके में साइमन का गांव है, उसके आसपास हरियाली ही हरियाली नजर आती है.

जंगल बचाने और जंगल बढ़ाने का काम तो साइमन का रहा ही लेकिन उन्होंने जो दूसरा काम पानी के लिए किया, वह तो देशभर के लिए एक नजीर है. जैसे पूरा बिहार हर साल सूखे की चपेट में आता था वैसे ही साइमन का इलाका भी आता था. साइमन ने सबसे पहले अपनी जमीन पर अपने श्रम से कुंए खोदे. कुंआ खोदने के बाद लोगों को तालाब खोदने के लिए प्रेरित किया. साइमन ने जब ये काम शुरू किया और बिना किसी सरकारी सहयोग के लोगों से इससे जुड़ने को कहा तो लोग उनकी बातों को समझ नहीं पाते थे, लेकिन धीरे-धीरे 500 लोग साइमन के इस अभियान से जुड़ गए. साइमन कहते हैं, ‘हम सरकार को बताना ही नहीं चाहते थे कि हम ऐसा कर रहे हैं. सरकार को बताते तो फिर कभी वन विभाग की जमीन बताकर कुंआ-तालाब खोदने से मना किया जाता तो कभी कुछ और पेंच फंसाया जाता.’ साइमन अपने इलाके में लोगों को जोड़कर काम में लगे रहे, देखते ही देखते तकरीबन 5500 लोग एक समुदाय की तरह जुड़ गए. साइमन ने कुंआ-तालाब के बाद छोटी-छोटी नहरों और बांधों का निर्माण शुरू किया. साइमन पढ़े-लिखे नहीं थे, बस नाम मात्र की स्कूली शिक्षा ली है, इतनी शिक्षा कि अब भी कुछ पढ़ नहीं पाते, लिख नहीं पाते सो वे बांध आदि के विज्ञान और गणित को समझ नहीं पा रहे थे. बांध का प्रयोग असफल होता जा रहा था लेकिन उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर आखिरकार तय किया कि अगर बांध 45 फीट ऊंचा रहेगा और उसकी गहराई दस फीट रहेगी तो फिर बरसात का पानी भी इसका कुछ नहीं कर पाएगा. अनुभव से उपजा यह प्रयोग सफल रहा. पहला बांध उन्होंने नरपतरा नाम के गांव में बनाया, दूसरा अंतबलु और तीसरा खरवागढ़ा में. फिर तो साइमन की बताई राह पर चल लोग खुद ही इस दिशा में पहल करने लगे. साइमन कहते हैं, ‘हमारे यहां इन चीजों का असर यह हुआ कि जो जमीनें हर साल पानी के बिना खाली रहती थीं, अब उन पर साल भर फसलें लगी रहती हैं, तीन-तीन फसल किसान काटते हैं और 1967 में भी जब भीषण सूखा पड़ा तो भी हमारा इलाका बचा रह गया था.

साइमन बुजुर्ग हो चले हैं, लेकिन जब वे बात करते हैं तो ऊर्जा से भरे रहते हैं. राज-समाज-देश को बचाने के लिए, बढ़ाने के लिए जब योजनाओं पर बात करते हैं तो इतने आशावादी नजरिये से बात करते हैं, जैसे वे अभी भी युवा हों. साइमन कहते हैं, ‘हम पढ़े-लिखे नहीं हैं लेकिन कुछ चीजों को ही जीवन का मूल मंत्र मानते हैं और जानते हैं कि अगर इन मंत्रों को समाज अपना ले तो हर काम के लिए सरकार की ओर नहीं देखना होगा. ये मंत्र है- देखो, सीखो, करो, खाओ और दूसरों को भी खाने दो.’ यह पूछने पर कि सरकार से अगर सहायता चाहिए तो क्या कहेंगे आप? साइमन का जवाब एक लाइन में होता है, ‘तरह-तरह की फैक्ट्रियां रोज खुल रही हैं, रोज बताया जा रहा है कि फलाना फैक्ट्री खुलने से फलाना विकास होगा, भविष्य सुरक्षित रहेगा लेकिन यह हर कोई याद रखे कि चाहे हम कितने भी विकसित हो जाएं, कितनी भी फैक्ट्रियां खोल लें, कितना भी धन अर्जित कर लें लेकिन खाना तो अन्न ही होगा, इसलिए इस देश में अधिक से अधिक अन्न का कारखाना तैयार करना होगा.’ अन्न के कारखाने का मतलब भी वह समझाते हैं. कहते हैं, इसका मतलब यह हुआ कि खेतों में जो क्षमता है, उसका उपयोग हो, किसान उसका लाभ ले सकें और समाज को दे सकें, इसके बारे में सोचना होगा.

साइमन अपने बारे में ज्यादा बात नहीं करते. उनके पास हर पल कुछ नया काम होता है. वे उसी धुन में लगे रहते हैं. वे हर सप्ताह पूरे इलाके के लोगों के साथ बैठते हैं. उस बैठक में जल-जंगल-जमीन पर बात होती है, बड़ी-बड़ी बातें नहीं, लच्छेदार भाषण भी नहीं. साइमन के पास साधारण लोग पहुंचते हैं, साधारण बातें करते हैं. साइमन उन साधारण बातों के छोर को पकड़कर ही काम करते हैं. जो करते हैं, वह बड़ा हो जाता है. हम उनसे यह भी पूछते हैं कि आप तो खुद पढ़े नहीं लेकिन आप पर तो कैंब्रिज और नॉटिंघम जैसे दुनिया के ख्यात विश्वविद्यालय में हुए शोध कार्यों पर बात होती है. वे कहते हैं, ‘वह सब तो चलता रहता है. हर कोई अपने काम में लगा हुआ है. हम भी अपने काम में लगे हुए हैं.’ आखिरी में यह पूछने पर किसी बात का दुख, कोई ख्वाहिश? तो साइमन कहते हैं, ‘अभी कुछ दिनों पहले जब पद्म सम्मान मिलने की बात हुई तो पता नहीं किसने अफवाह उड़ा दी कि मैं पद्म सम्मान लेना ही नहीं चाहता. यह तो अपने मन में से उड़ा दी गई बात हुई. यह सम्मान मुझे नहीं मिल रहा है, यह हमारे गांव-जवार के लोगों के प्रयास को मिला सम्मान है. इसमें गांव-जवार की खुशी है तो कैसे ठुकराया जा सकता है. इस तरह की अफवाह नहीं फैलानी चाहिए.’ ख्वाहिश पूछने पर कहते हैं, ‘ख्वाहिश जैसा तो नहीं लेकिन इच्छा है कि जल्द ही एक बार प्रधानमंत्री से मिलूं और मेरे जेहन में जो बातें हैं- खेती-बारी, जल-जंगल-जमीन को लेकर उनसे साझा कर दूं. जो भी थोड़ा बहुत अनुभव है, उसे उन्हें जाहिर कर दूं ताकि देश का भला हो.’

(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 8 Issue 4, Dated March 28, 2016)

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