बहादुर बच्चे | Tehelka Hindi

बहादुर बच्चे

ये कहानी है बहादुरी की नई इबारत लिखने वाले बच्चों की जोे अपने साहस, संयम और सूझ-बूझ के दम पर तमाम जिंदगियां बचाने में कामयाब हुए. बीते गणतंत्र दिवस पर राजधानी दिल्ली में हुए समारोह में इन बच्चों को राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से नवाजा गया

प्रशांत वर्मा 2016-02-15 , Issue 3 Volume 8
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Photo- PIB

हर साल भारत सरकार और भारतीय बाल कल्याण परिषद की ओर से राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार दिए जाते हैं. इसके लिए देशभर से उन बच्चों को चुना जाता है, जो अपने साहस और बहादुरी से दूसरों के लिए नजीर बन जाते हैं. इस साल गणतंत्र दिवस पर देशभर के 25 बच्चों को साल 2015 के राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इनमें से दो बहादुर बच्चों को ये सम्मान मरणोपरांत दिया गया. इन 25 बच्चों में से 3 लड़कियां और 22 लड़के हैं.

इस बार सबसे ज्यादा वीरता पुरस्कार हासिल करने वाला राज्य केरल बना. इस राज्य के छह बच्चों को ये सम्मान मिला. इसके बाद महाराष्ट्र और उत्तर पूर्व के चार बच्चों के नाम ये पुरस्कार रहे. उत्तर पूर्व के राज्यों में मणिपुर से दो और मिजोरम व मेघालय से एक-एक बच्चों के गले में वीरता पुरस्कार के मेडल सजे. इसके अलावा उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और गुजरात के दो-दो और उत्तराखंड, हरियाणा, ओडिशा से एक-एक बच्चे राष्ट्रीय वीरता पुरस्कारों की सूची में शुमार रहे.

बहादुर बच्चों को राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित करने का सिलसिला 1957 में शुरू हुआ. 1957 में गांधी जयंती पर दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित एक कार्यक्रम में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू शामिल हुए थे. कार्यक्रम शुरू होने के बाद अचानक शामियाने में आग लग गई और तकरीबन 100 लोग उसमें फंस गए. तब 14 साल के स्काउट बच्चे हरिशचंद्र मेहरा ने समझदारी का परिचय देते हुए शामियाने का एक हिस्सा अपने चाकू से काट दिया, जिससे पांडाल से लोगों के निकलने का रास्ता बन गया. हरिशचंद्र की बहादुरी से प्रेरित होकर पंडित नेहरू ने उनकी तरह के दूसरे बहादुर बच्चों को राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार देने की घोषणा की. चार फरवरी 1958 को पहला आधिकारिक वीरता पुरस्कार हरिशचंद्र और एक अन्य बच्चे को दिया गया. छह से अठारह साल की उम्र तक के बच्चों को मिलने वाला ये पुरस्कार उन्हें किसी परिस्थिति या किसी दुर्घटना के समय अदम्य साहस दिखाने के लिए मिलता है. वीरता पुरस्कार पांच श्रेणियों में दिए जाते हैं. पहला सामान्य राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार होता है, जिसकी शुरुआत 1958 में हुई. इसके बाद 1978 में संजय चोपड़ा सम्मान और गीता चोपड़ा सम्मान देने की शुरुआत हुई. इसके बाद 1987 में भारत सम्मान और 1988 में बापू गैधानी सम्मान देने का सिलसिला शुरू हुआ.

इन पुरस्कारों में मेडल, सर्टिफिकेट और नकद पुरस्कार शामिल होते हैं. भारत सम्मान जीतने वाले को गोल्ड मेडल और अन्य को सिल्वर मेडल दिए जाते हैं. इसके अलावा सरकार की ओर से हर बच्चे की पढ़ाई में मदद दी जाती है. भारतीय बाल कल्याण परिषद के मुताबिक अब तक 920 बहादुर बच्चों को राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है, जिनमें 656 लड़के और 264 लड़कियां शामिल हैं.

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