लहर के बाद

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समाजवादी पार्टी
जितनी बड़ी दुर्गति बसपा की हुई लगभग उतनी ही बड़ी हार का मुंह सत्ताधारी समाजवादी पार्टी को भी देखना पड़ा है. पार्टी के सिर्फ पांच सांसद जीते हैं और उनमें भी सब मुलायम सिंह के अपने परिवार के लोग हैं. पिछले दो सालों में जिस तरह से सपा की सरकार चली है उसने जनता के प्रचंड जनादेश को ठेंगा दिखाने का काम किया है. आज हालत यह है कि प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था चरमरायी हुई लग रही है और राज्य का राजनीतिक नेतृत्व खुद को भ्रम की हालत में पा रहा है. भ्रम की दशा में पार्टी जो कदम उठा रही है जानकारों की मानें तो वे आने वाले समय में पार्टी को उलटे पड़ने वाले हैं. मंत्रिमंडल में फेरबदल करते हुए पार्टी ने कई मंत्रियों के विभाग बदले हैं. कइयों का कद छोटा हुआ है और एक मंत्री को पद से बर्खास्त किया गया है. भ्रम का वातावरण नीतिगत स्तर पर भी देखने को मिल रहा है. मसलन पूरे चुनाव में पार्टी जिन नीतियों और उलब्धियों का ढिंढोरा पीट रही थी हाल ही में पेश किए गए बजट में उन सभी योजनाओं को एक झटके में बंद कर दिया गया है. मुफ्त लैपटॉप, बेरोजगारी भत्ता और हमारी बेटी उसका कल जैसी योजनाएं इस दायरे में आती हैं. हालांकि इसका दूसरा और उजला पहलू यह है कि इस बार के बजट में पहली बार उत्तर प्रदेश सरकार ने किसी भी लोकलुभावन योजना से खुद को दूर रखते हुए बजट का अस्सी फीसदी हिस्सा ढांचागत विकास के लिए रखा है. लेकिन इसके परिणामों के बारे में फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता. सारा दारोमदार इन योजनाओं के लागू होने पर है.

‘सपा सरकार को पांच साल में एक दूरी तय करनी थी. आधी दूरी दौड़ने के बाद  वह नए सिरे से चलने की बात कर रही है. लिहाजा अब उसे आधे समय में वह दूरी तय करनी होगी. यह असंभव लक्ष्य है’

पांच की संख्या ने सपा को ऊपर से नीचे तक झकझोर कर रख दिया है. पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव इससे बुरी तरह खीजे हुए हैं. तीन दिनों तक लगातार हुई समीक्षा बैठक के बाद पार्टी ने एक के बाद एक कई कार्रवाइयां की हैं. रेवड़ियों की तरह बांटे गए दर्जा प्राप्त राज्यमंत्रियों में से 36 को बर्खास्त कर दिया गया. लेकिन अब खबर है कि इनमें से कुछ की बहाली कर दी गई है. पार्टी ने एक और बड़ा कदम उठाया. मंत्रिमंडल में सबसे कम उम्र के मंत्री का दर्जा रखने वाले तेज नरायण पांडे उर्फ पवन पांडे को बर्खास्त कर दिया गया. इसके अलावा विजय मिश्रा, ब्रह्मा शंकर त्रिपाठी, मनोज पांडे के विभागों को बदल कर उन्हें कम महत्व के विभागों में भेजा गया है. इस बदलाव पर नजर डालें तो हम पाते हैं कि पार्टी ब्राह्मणों को इस हार के लिए जिम्मेदार मान रही है. जानकारों के मुताबिक इस कार्रवाई के नतीजे सपा के लिए सुखद नहीं होंगे. पार्टी की सोच चाहे जो हो लेकिन एक सच यह भी है कि सपा का मूल आधार यादव भी इस बार बड़ी संख्या में पार्टी से छिटक कर भाजपा के साथ जुड़ गया है.

सपा की दुविधा कई स्तरों पर दिख रही है. दो साल तक पार्टी ने जिन नीतियों और कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया था अब अचानक से उन सभी को बंद कर दिया गया है. हेमंत तिवारी के शब्दों में, ‘पहले ये भ्रमित थे, अब महाभ्रमित हैं. सरकार को पांच साल में एक दूरी तय करनी थी. आधी दूरी दौड़ने के बाद सरकार ने अपने ही कामकाज से खुद को अलग कर लिया है. अब वह नए सिरे से चलने की बात कर रही है. लिहाजा अब उसे आधे समय में वह दूरी तय करनी होगी. यह असंभव लक्ष्य है.’ तिवारी के मुताबिक सपा शुरुआत में ही फिसल गई. उसने मायावती के कुशासन और एंटी इंकंबेंसी के खिलाफ मिले जनादेश को अपने चुनावी घोषणापत्र के वादों को मिली सफलता मान लिया. पार्टी दो साल तक लगातार लोकलुभावन वादों को आधा-अधूरा पूरा करने में लगी रही. नतीजा यह रहा कि प्रशासन के जरूरी कामकाज पर उसकी न तो कोई पकड़ बन पाई न ही कोई दूरगामी कामकाज इस दौरान देखने को मिला. बची-खुची लुटिया एक से अधिक सत्ता केंद्रों ने मिलकर डुबा दी.

स्थिति यह है कि अकेले मुख्यमंत्री के पास दर्जन भर से ज्यादा मंत्रालय हैं. वरिष्ठ पत्रकार गोविंद पंत राजू कहते हैं, ‘अखिलेश यादव को अपने सभी विभागों के सचिवों के नाम भी नहीं पता होंगे. ऐसी हालत में वे उन अधिकारियों से काम कैसे करवा पाएंगे?’ इन सब चीजों ने मिलकर दो साल के अंदर यह स्थिति पैदा कर दी कि आज प्रदेश का पूरा प्रशासनिक ढांचा ही चरमराया हुआ दिख रहा है. बलात्कार, हत्या और राहजनी की खबरें मीडिया में छाई हुई हंै. भाजपा के नेताओं पर जानलेवा हमले हो रहे हैं. जाहिर है हालात अचानक से इतने बेकाबू नहीं हुए हैं. पिछले दो सालों से कमोबेश ऐसी ही स्थितियां बनी हुई थीं. जाहिर है उकताई हुई जनता ने पहला मौका मिलते ही अपना गुस्सा जाहिर कर दिया है. इस दुर्दशा के पीछे प्रशासनिक अक्षमता बड़ी वजह है. हेमंत तिवारी कहते हैं, ‘प्रदेश के थानों में 60 फीसदी यादव थानेदार तैनात हैं. ज्यादातर को सपा का वरदहस्त प्राप्त है. आलम यह है कि जिले के कप्तान में भी इन पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं है. तो कानून व्यवस्था की स्थिति पर काबू कौन करेगा?’

लोकसभा के नतीजे कह रहे हैं कि पिछले कुछ सालों के दौरान जतन से खड़ा किया गया मुलायम सिंह का यादव-ठाकुर-मुसलिम गठजोड़ छिन्न भिन्न हो गया है. जिस दौर में बसपा ब्राह्मणों के साथ सर्वजन का फार्मूला तैयार कर रही थी उसी दौर में राज्य की एक दूसरी प्रभावशाली सवर्ण बिरादरी राजपूतों ने सपा के झंडे तले राजनीतिक शरण ढूंढ़ ली. मई, 2002 में भाजपा और बसपा की मिली-जुली सरकार बनी. यह छह-छह महीने का प्रयोग था जिसमें पहले मायावती मुख्यमंत्री बनी थीं. उस सरकार को राजा भैया भी समर्थन दे रहे थे क्योंकि वे भाजपा के सहयोग से विधानसभा में थे. जल्द ही राजा भैया का मायावती सरकार से मोहभंग होने लगा. वे अमर सिंह के साथ रिश्ते बढ़ाने लगे. उनका यह कदम सरकार विरोधी गतिविधि के दायरे में आता था. यह बात मायावती को नागवार गुजरी क्योंकि उनकी सरकार के लिए यह खतरे की घंटी थी. 2003 में राजा भैया को धमकी के एक मामले में गिरफ्तार कर लिया गया. कुंडा स्थित उनके पैतृक महल में पुलिस ने छापा मारकर तमाम हथियारों के साथ दो एके-47 रायफलों की बरामदगी दिखाई. राजा भैया, उनके पिता उदय प्रताप सिंह और चचेरे भाई अक्षय प्रताप सिंह को पोटा के तहत गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया. राजा भैया के खिलाफ चार्जशीट दाखिल होने से पहले ही मायावती सरकार गिर गई थी. इस घटना ने राजा भैया को ठाकुरों के बड़े नेता के तौर पर स्थापित कर दिया. इसी दौरान भाजपा का राजनीतिक आधार सिकुड़ने लगा था. सपा ने अमर सिंह के माध्यम से राजा भैया को अपने साथ जोड़ लिया. इन दोनों पार्टियों की लड़ाई में 10-15 साल के दौरान ठाकुर सपा की ओर झुकते गए. लेकिन 2014 में स्थितियां बिल्कुल अलग हैं. राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में ठाकुरों के पास राजनाथ सिंह के रूप एक बड़ा और राष्ट्रीय कद का नेता था, मोदी के रूप में एक जबर्दस्त चुनावी अभियान चलाने वाला रणनीतिकार था. लिहाजा ठाकुरों का भी सपा से मोहभंग होना स्वाभाविक ही था.

मुसलमानों का मामला और भी असहज करने वाला है. यह बात जाहिर है कि इस बार सपा को मुसलमानों का वैसा समर्थन नहीं मिला है जैसा अतीत में उसे मिलता रहा है. इसकी बड़ी वजह एक से ज्यादा सेक्युलर विकल्पों को बताया जा रहा है. उस पर सपा की जो छवि बनी वह थी हद से ज्यादा मुसलमानों को रिझाने में लगी पार्टी. जाहिर है इसने बाकी हिस्सों को भाजपा के पक्ष में गोलबंद करने में बड़ी भूमिका निभाई.

दरअसल इस बार मुस्लिम मतदाता बुरी तरह से भ्रम की हालत में था. मुसलमानों की दूरी से पार्टी के भीतर के सत्ता समीकरण भी बदल गए हैं. जिस दिन मंत्रियों के विभागों में फेरबदल किया गया उस दिन सुबह हुई बैठक की एक घटना पार्टी की अंदरूनी स्थितियों पर कुछ रोशनी डाल सकती है. पार्टी सूत्रों के मुताबिक बैठक में शामिल होने के लिए मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव, शिवपाल यादव और राम गोपाल यादव समेत प्रदेश मंत्रिमंडल के तमाम मंत्री पार्टी कार्यालय में इकट्ठा हुए थे. लेकिन सबसे पहले मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव शिवपाल यादव और राम गोपाल यादव ने आपस में अकेले एक घंटे तक मंत्रणा की. इस दौरान तमाम मंत्रियों के साथ आजम खान भी बाहर इंतजार करते रहे. परिवार के सदस्यों की मीटिंग समाप्त होने के बाद जब सभी मंत्रियों को मीटिंग में बुलाया गया तभी आजम खान भी मीटिंग में शामिल हुए. सपा के एक नेता बताते हैं, ‘फिलहाल आजम खान प्रशासन में अड़ंगा डालने वाली आदत से बाज आ गए हैं.’ यह घटना चुनाव के बाद उत्पन्न स्थितियों के चलते सपा में आजम खान की हैसियत और मुसलिम राजनीति को लेकर पैदा हुई उहापोह पर रोशनी डालती है.

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लखनऊ में सपा सरकार के खिलाफ भाजपाइयों का विरोध प्रदर्शन. फोटो: प्रमोद अधिकारी

भारतीय जनता पार्टी
लोकसभा के नतीजों ने एक दशक से मरणसन्न पड़ी उत्तर प्रदेश भाजपा में नई जान फूंक दी है. इस चमत्कारिक जीत का थोड़ा बारीकी से मुआयना करें तो हम पाते हैं कि पार्टी ने तीन स्तरों पर बेहद सुनियोजित रणनीति के साथ उत्तर प्रदेश और बिहार के किलों को फतह किया है. पहला, मोदी की विकास पुरुष की छवि. दूसरा, मोदी की हिंदुत्ववादी नेता की छवि. तीसरा, मोदी की ओबीसी नेता की छवि. यह तीनों रणनीतियां मिलकर भाजपा के लिए चुनाव जिताऊ फार्मूला बन गईं. अलग-अलग स्थानों पर हालात के हिसाब से भाजपा ने इन तीनों ही छवियों का इस्तेमाल किया. तीसरी वाली छवि उत्तर प्रदेश के लिहाज से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं. भाजपा ने इस चुनाव में कुल 27 पिछड़े उम्मीदवारों को टिकट दिया था. ये सभी इस समय लोकसभा मंे विराजमान हैं. यह समाजवादी पार्टी के लिए खतरे की घंटी है. पहली बार प्रदेश की जनता ने मुलायम सिंह के पिछड़ों को नकार कर मोदी के पिछड़ों में विश्वास दिखाया है. भाजपा की रणनीति आने वाले तीन सालों में मोदी की इस पिछड़ा छवि को और मजबूत करने और उसे जमकर भुनाने की है. जानकारों के मुताबिक उत्तर प्रदेश और बिहार के विधानसभा चुनाव में इसका जबर्दस्त विस्तार देखने को मिलेगा. इन दोनों ही राज्यों में मोदी के मुख्य विरोधी पिछड़े नेता (मुलायम सिंह, लालू यादव, नीतीश कुमार) हैं. हालांकि इसका दूसरा पहलू यह भी है कि इस दौरान भाजपा के भीतर के टकराव भी सतह पर आएंगे. सुरेंद्र राजपूत कहते हैं, ‘उत्तर प्रदेश में नेतृत्व का मसला भाजपा के गले की हड्डी बन सकता है. इसके अलावा संघ जिस नीयत से पिछले 66 सालों से भाजपा को पोस रहा था उसे पूरा करने का अवसर उसे पहली बार मिला है. इन स्थितियों से निपटना भाजपा के लिए बड़ा मुश्किल होगा.’

इसके अलावा जिस पैमाने पर विकास पुरुष के रूप में मोदी का अभियान चुनावों के दौरान चला उसका असर यूपी-बिहार जैसे बीमारू, पिछड़े किंतु महत्वाकांक्षी सूबे के ऊपर पड़ना ही था क्योंकि यहां का पुराना नेतृत्व लोगों के भीतर किसी भी तरह की उम्मीद या भरोसा पैदा कर पाने में पूरी तरह से असफल  हो चुका था. इसके अलावा अपनी सुनियोजित प्रचार रणनीति के जरिए भाजपा ने सपा-बपसा की अवसरवादी और जातिवादी राजनीति को भी पूरी सफलता के साथ उजागर किया. विधानसभा चुनावों के मद्देनजर सबसे स्पष्ट दिशा में भाजपा ही आगे बढ़ रही है. लोकसभा की जिन सात सीटों पर प्रदेश में भाजपा हारी है उन सभी पर एक मंत्री और एक सांसद को प्रभारी बनाकर समीक्षा रिपोर्ट मांगी गई है. यह रिपोर्ट अमित शाह को भेजी जाएगी.

भाजपा की रणनीति आने वाले तीन सालों में मोदी की पिछड़ा छवि को और मजबूत करने और उसे भुनाने की है. हालांकि उत्तर प्रदेश में नेतृत्व का मसला उसके गले की हड्डी बन सकता है

भाजपा के विपरीत सपा और बसपा के नजरिए से देखें तो हम पाते हैं कि जातिगत राजनीति की सफलता ने इन दलों को इस हद तक अंधा कर दिया था कि वे लोगों के भीतर चल रही उथल-पुथल और बदलाव को  भांप ही नहीं सके. हाल के सालों में यहां बेरोजगारी भयंकर रूप से बढ़ी है. उदारवादी व्यवस्था के प्रभाव में आने के बाद पूरे देश की तरह यहां भी जो बदलाव या विकास हो रहा है वह उस मात्रा में रोजगार पैदा नहीं कर रहा है. सार्वजनिक और सरकारी क्षेत्र लगातार सिकुड़ता जा रहा है लिहाजा आरक्षण भी अप्रासंगिक होता जा रहा है. दूसरी तरफ सूचना की गति बहुत तेज हो गई है जिसने लोगों में उम्मीदों को जबर्दस्त तरीके से बढ़ाया है. आज जातिगत भेदभाव की वैसी आग शेष नहीं है जैसी दो या तीन पीढ़ी पहले तक हुआ करती थी. ऐसे तमाम उदाहरण हैं जहां लोग बिना किसी दिक्कत के ऊंची जातियों के साथ दोस्ताना और सामाजिक रिश्ते कायम कर रहे हैं. जाहिर है कि मूल समस्याओं से उबर चुकी पीढ़ी से जब कोई विकास की बात करेगा तो यह उन्हें अपनी तरफ जरूर खींचेगा. उदारवादी संस्कृति में आई भौतिक समृद्धि से दलित या पिछड़े बचे नहीं हैं. अपने निरंतर और आक्रामक अभियानों के जरिए भाजपा ने इन परिस्थितियों का पूरी कुशलता से इस्तेमाल किया जबकि बसपा और सपा अपनी पुरानी जातिगत और अवसरवादी उलझनों में उलझे रहे.

हालांकि ये नतीजे भाजपा के लिए भी दोधारी तलवार पर चलने जैसे हैं. जिस तेजी से यहां लोगों ने विकल्प की तलाश में पुराने विकल्पों को ठेंगा दिखाया है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि फिलहाल भले ही ऐसा लगता हो कि उत्तर प्रदेश जातिवाद के चंगुल से मुक्त होता दिख रहा है, लेकिन इस लड़ाई का अंतिम राउंड 2017 के विधानसभा चुनाव होंगे. तभी फैसला होगा कि भाजपा को 2014 में मिली सफलता स्थायी थी या लहर थी.

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