‘लालू ऊपरी वार करते हैं, जबकि नीतीश...’ | Tehelka Hindi

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‘लालू ऊपरी वार करते हैं, जबकि नीतीश…’

बिहार की राजनीति में समाजवादी धारा के एक प्रमुख नेता शिवानंद तिवारी ने चुनावी राजनीति से संन्यास ले लया है. वे रिटायर भले हो गए हैं, लेकिन सियासी सरगर्मी उनके यहां अभी भी कायम है. फिलहाल वे अपनी आत्मकथा लिखने में लगे व्यस्त हैं. इसे लेकर अभी से बिहार में उत्सुकता है क्योंकि तिवारी लालू और नीतीश के समान रूप से नजदीकी रह चुके हैं. उनके अपने राजनीतिक अनुभव, जदयू और राजद के विलय की अटकलों और बिहार की राजनीति पर निराला के साथ उनकी बातचीत के अंश
निराला 2015-01-31 , Issue 2 Volume 7
फोटोः प्रशांत रवि

फोटोः प्रशांत रवि

अच्छी खासी राजनीति कर रहे थे आप, फिर अचानक से संन्यास क्यों ले लिया?
संन्यास जैसा कुछ नहीं कह सकते इसको. मैंने कहा कि चुनाव नहीं लड़ूंगा अब. राजनीति तो रग-रग में है, वह तो करता ही रहूंगा. मैं इधर-उधर आदर्श की बातें नहीं करूंगा. साफ-साफ बताता हूं. अभी लोकसभा चुनाव तो होगा नहीं. मेरी उम्र 72 की हो चुकी है. इस साल विधानसभा चुनाव होनेवाला है बिहार में और मेरी इच्छा कहीं से नहीं कि मैं अब एसेंबली का चुनाव लड़ूं. पांच साल बाद जब लोकसभा चुनाव होगा, तब तक मेरी उम्र 77 की हो जाएगी. उस उम्र में किससे टिकट मांगूंगा मैं. पिछले साल लोकसभा चुनाव में जरूर इच्छा थी कि लड़ूं. हार या जीत तो अपनी जगह. जब नीतीश कुमार की पार्टी से दरकिनार किया गया तो लालू प्रसाद से इच्छा जाहिर की कि बक्सर या बेतिया से लड़ना चाहता हूं. लालू प्रसाद टिकट बांट चुके थे. उन्होंने बेतिया में रघुनाथ झा को टिकट दे दिया था. बाद में लालू प्रसाद ने कहा कि बाबा आइए और पार्टी की कमान थामिए, तो मैं क्यों उनकी पार्टी की कमान थामने जाता.

लोकसभा नहीं लड़े. राज्यसभा के लिए तो संभावनाएं बची हुई थीं. लोग कब्र में पांव लटकने तक संन्यास नहीं लेते.
नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी में सभी को दो-दो बार मौका दिया. राज्य के विधानपरिषद के सदस्यों को भी देख लीजिए, लेकिन इस बार उन्होंने ठान लिया था कि मुझे दोबारा नहीं भेजना है. इस फेर में उन्होंने मेरे साथ एनके सिंह और साबिर अली को भी नहीं भेजा. जब तक राज्यसभा में था, जितना अनुभव और क्षमता थी, उसके आधार पर मैंने जदयू का पक्ष रखा, समाजवादी राजनीति और लोहिया-जेपी की धारा को आगे बढ़ाया. यहां तक कि शरद और नीतीश के टकराव में नीतीश का पक्ष लिया. संसद में महिला आरक्षण बिल पर दोनों के बीच मतभेद हुआ, नीतीश महिला आरक्षण के समर्थक थे, जबकि शरद आरक्षण में भी आरक्षण के. ऐसे में मैंने पार्टी की ओर से राज्यसभा में नीतीश की बातों को मजबूती से रखा. नीतीश उस दिन मीडियावालों से मुस्कुराते हुए कह रहे थे कि शिवानंद भाई ने जो आज कहा है, वही हमारी पार्टी की लाइन है. दो दिनों बाद पटना में एक बड़ा आयोजन हुआ. वहां भी नीतीश कुमार मुक्तकंठ से मेरी प्रशंसा करते रहे, लेकिन तब शायद वे शरद यादव के परास्त होने से खुश थे, क्योंकि राजगीर सम्मेलन के बाद वही शिवानंद तिवारी उनके लिए सबसे बड़ा कांटा हो गए.

मैंने राजगीर सम्मेलन में कोई गलत बात नहीं कही थी. पार्टी के सम्मेलन में वास्तविक स्थिति सबके सामने रखी थी कि नरेंद्र मोदी को हल्के में न लें. सामाजिक आंदोलन के नाम पर सिर्फ पिछड़ा-पिछड़ा कहकर उन्हें नहीं घेरा जा सकता, क्योंकि मोदी भी पिछड़ा ही हैं. आज खुद नीतीश हर जगह उसी बात को मानते हैं. मैंने लोकसभा चुनाव के पहले हर विधानसभा में कार्यकर्ताओं के साथ मीटिंग की थी, उसके आधार पर कहा था कि संगठन की हालत खस्ता है. कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटा हुआ है, वे बिखरे हुए हैं. सच कह दिया, तो उसकी सजा मिल गई.

तो सिर्फ राजगीर सम्मेलन में दिए गए बयान की वजह से आपके साथ ऐसा व्यवहार हुआ?
दूसरी कोई वजह ही नहीं. सबसे ज्यादा बात यह चुभी कि मैंने कार्यकर्ताओं वाली बात उठाई. कहा कि सरकार के जो भी महादलित विकास से लेकर दूसरे लोकप्रिय कार्यक्रम चल रहे हैं, वह सीधे-सीधे प्रशासनिक तंत्रों के सहारे चल रहे हैं, यह ठीक नहीं है. प्रशासन के लोग यथास्थितिवाद के पोषक होते हैं. वे साथ नहीं देंगे. अंत में जरूरत कार्यकर्ताओं से ही पड़ेगी. कार्यकर्ता क्या करेंगे. अधिकारियों को सीधे-सीधे कह दिया गया है कि वे कार्यकर्ताओं का किसी तरह का हस्तक्षेप बर्दाश्त न करें. जनता सीधे कार्यकर्ता के पास अपनी समस्या लेकर जाती है और कार्यकर्ताओं की इतनी हैसियत नहीं रह गई है कि वे छोटी-मोटी पैरवी तक कर सकें. जिन्होंने पैरवी करने की कोशिश की, उन पर रंगदारी मांगने से लेकर न जाने कितने तरीके के मुकदमे कर दिए गए. जिन कार्यकर्ताओं ने 15-20 साल में अपनी पहचान जनता के बीच बनाई, जो घरों से निकालकर मतदाताओं को बूथ तक लाते रहे, उनकी औकात को कम कर देना तो सीधे-सीधे उनकी पहचान को खत्म करनेवाली बात है. यह एक किस्म का राजनीतिक अपराध है. यही सब तो कहा था जिसकी मुझे सजा मिली.

शरद यादव किसी तरह से लोकसभा या राज्यसभा में बने रहना चाहते हैं. वही उनका इकलौता मकसद है. बाकी उन्हें पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है

यानी नीतीश कुमार सार्वजनिक सवालों को भी व्यक्तिगत सवाल बनाकर राजनीति करते हैं?
मैं यह नहीं कह रहा कि व्यक्ति का या व्यक्तिवाद का महत्व नहीं है. एक नेता तो होना ही चाहिए, जिसके नाम पर टीम काम करे, लेकिन उस व्यक्ति को यह नहीं भूलना चाहिए कि उसके बनने या बने रहने में टीम की भी भूमिका है.

यह भी कहा जाता है कि नीतीश कुमार लोगों को बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं.
टॉलरेंस लेवल है ही नहीं. नीतीश कुमार से मेरा कोई आज का संबंध नहीं है. इनको राजनीति में स्थापित करने में मैंने कोई कम भूमिका नहीं निभाई. मैं 60 के दशक में ही जेल जा चुका था. जब ये राजनीति में आए, तब तक मैं बिहार में युवा नेता के रूप में स्थापित हो चुका था. इतने वर्षों तक साथ दिया, लेकिन एक बार सार्वजनिक रूप से पार्टी के बारे में बात कह दी, तो उन्होंने ठेलकर वहां पहुंचा दिया, जहां से सिर्फ भाजपा में जाने का रास्ता ही बचा था मेरे पास. जब जदयू से मेरी दूरी बढ़ी, तो भाजपा से प्रस्ताव आया और मुझसे पूछा गया कि क्या आप चुनाव लड़ना चाहते हैं? तो मैंने सीधे कह दिया कि यह अपराध होगा मेरे लिए. मैं जानता था कि भाजपा से चुनाव लड़कर जीत भी जाऊंगा. शुरुआत से समाजवादी राजनीति के साथ रहा था, इसलिए अब भाजपा से चुनाव नहीं लड़ सकता था. लेकिन नीतीश ने वहां तक तो पहुंचा ही दिया था.

आप अपने मामले को छोड़ दें तो और कब लगा कि नीतीश कुमार लोगों को टॉलरेट नहीं कर पाते?
तमाम उदाहरण हैं. अब पिछले लोकसभा चुनाव में ही देखिए. जदयू के इकलौते मुस्लिम सांसद मोनाजिर हसन थे बेगुसराय से. नीतीश ने किसी वजह से मोनाजिर को नापसंद किया होगा, तो भाजपा से अलगाव के बाद नीतीश पर प्रगतिशील बनने का इतना भूत सवार हुआ कि इकलौते मुस्लिम सांसद की सीटिंग सीट भी सीपीआई को दे दी. सीटिंग सीट पर इकलौते मुस्लिम सांसद का टिकट काटकर गंगा स्नान करने लगे. वह सीट तो नीतीश हार ही गए, मोनाजिर भी भाजपा में चले गए.

आपके बारे में भी कहा जाता है कि आप पेंडुलम की तरह कभी लालू, तो कभी नीतीश के पाले में आते-जाते रहे. इस तरह पाला बदलने की क्या मजबूरी थी?
लालू और नीतीश के साथ ही जाते रहे. और तो कहीं नहीं गए न! दोनों एक ही जमीन की उपज हैं. दोनों के हित टकराए थे, तो ये अलग हो गए थे. दोनों लोहिया-जेपी का ही नाम लेते रहे हैं, कभी हेडगेवार या सावरकर का नाम तो इन्होंने नहीं लिया. दोनों सामाजिक न्याय की राजनीति करते रहे और मैं उसका पक्षधर हूं, तो दोनों के साथ रहा. मुझ पर तो यही एक आरोप है. लेकिन कभी उन दोनों नेताओं से भी पूछा जाना चाहिए कि मेरे जैसे आदमी को, जिसने अपना सब कुछ उन्हें दिया, वे क्यों एकोमोडेट नहीं कर पाते थे.

खैर! आप तो दोनों के साथ पिछले तीन दशक से हैं. दोनों की राजनीति में क्या बेसिक फर्क देखते हैं?
मैंने नीतीश की तुलना में लालू के लिए ज्यादा किया और लालू से ही ज्यादा जुड़ाव भी रहा. कोई आज का या सिर्फ राजनीतिक संबंध नहीं है लालू से. लालू जब स्कूल में पढ़ते थे, तब से उनसे संबंध है और निहायत ही व्यक्तिगत रिश्ता भी है उनसे. लालू की खासियत है कि चाहे जितना भी मनमुटाव हो जाए, अलगाव हो जाए, वे संवाद बंद नहीं करते. वे जब चोट करते हैं तो ऊपरी घाव लगता है, लेकिन नीतीश सिर्फ संवाद ही बंद नहीं करते, बल्कि वे जब चोट देते हैं तो अंदर तक बेधनेवाली पीड़ा देते हैं. यदि किसी ने नीतीश के मन की बात नहीं की, तो वे उसी दिन से उसकी राजनीतिक हत्या करने के लिए पूरी उर्जा लगा देते हैं. लालू ऐसे नहीं हैं.

अब तो वर्षों बाद दोनों मिल रहे हैं. क्या फर्क पड़ेगा बिहार की राजनीति पर दोनों के मिलने से?
हमें तो बहुत उम्मीद नहीं दिख रही, क्योंकि दोनों कोई नई बात कह नहीं पा रहे. पिछले दस साल से जो कह रहे हैं, उसी को दोहरा रहे हैं, जबकि स्थितियां बदल गई हैं. 65 फीसदी आबादी अब उन लोगों की हो गई है, जिनकी उम्र 35 साल से कम है, उनके लिए क्या है इनके पास. उन युवाओं के अपने सपने हैं, उनकी अपनी आकांक्षा है और मोदी उन सपनों पर बात कर रहे हैं. उन्हें लग रहा है कि उनकी आकांक्षा पूरी होगी. ऐसा होगा या नहीं, यह नहीं कह सकता. मोदी ने सपनों का उभार शुरू किया है. इन लोगों के पास तो रोडमैप भी नहीं है.

बात तो पूरे देश के समाजवादियों के मिलन की हो रही है. क्या जनता परिवार जैसा कुछ बनेगा?
कौन समाजवादी भाई? कैसा समाजवादी? चौटाला कैसे समाजवादी हैं, जो जेल के अंदर हैं. उनका प्रभाव क्या है हरियाणा के बाहर? मुलायम यूपी के बाहर क्या कर लेंगे? लालू और नीतीश बिहार के बाहर क्या कर पाएंगे? देवगौड़ा कब से समाजवादी हो गए? लोग बेवकूफ हैं क्या, जो नहीं जान रहे कि इनका मिलन समाजवादी राजनीति को बढ़ाने के लिए नहीं हो रहा, बल्कि मोदी से घबराकर अपने वजूद को बचाने के लिए हो रहा है.

बिहार में तो यह देखा जा रहा है कि लालू प्रसाद मौन साधे हुए हैं, नीतीश ज्यादा बेचैन हैं.
बेचैनी दोनों में बराबर है.

समाजवादी सबसे ज्यादा बिखरे हैं और प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों की तरह अपनी पार्टियां चला रहे हैं. क्या समाजवादी राजनीति के बुनियादी प्रशिक्षण में ही कोई गड़बड़ी रही?
यह सिर्फ समाजवादियों की दिक्कत नहीं है. लोकतंत्र का जो पैटर्न अपने यहां है, उसी में गड़बड़ी है. एमएन रॉय जैसे चिंतक ने तभी कहा था कि यह समाज को खंड-खंड में बांट देगा. गांधी कहते थे कि यह बांझ है. लोकसभा और विधानसभा को छोड़ दीजिए तो भी आज कितने किस्म के चुनाव हो रहे हैं देश में. पंचायत के, मुखिया के, जिला परिषद के, शिक्षा समिति के. जाति के बीच जाति का बंटवारा हो गया है. गली-गली और टोले-टोले को बांट चुके हैं ये चुनाव. रही बात समाजवादियों की, तो यह तो शुरू से देखना होगा. इस लोकतांत्रिक प्रणाली में अपनी आलोचना सुनने की आदत तो विकसित हो ही नहीं पाई. कोई विरोध न करे, सिर्फ अपनी मर्जी चले, इसके लिए इतनी पार्टियां बनती गईं. यह सब कांग्रेस की देन है. जवाहरलाल के जमाने में पटेल के जाने के बाद कौन रहा, जो उनकी बातों को काट पाता या उचित को उचित और अनुचित को अनुचित कह पाता.

नीतीश जिनको चाहें, वही विधायक-सांसद बन जाएं और कभी-कभार शरद के भी एक-दो लोग खप जाएं, बस इसी तरह दुकान चलती है

राजगीर सम्मेलन के बाद शरद यादव मुझसे बोले कि आपने जो बोला, वह पार्टी लाइन नहीं है. मैंने कहा कि आप जो बोलते हैं, वह पार्टी लाइन कैसे हो जाता है या नीतीश जो बोलते हैं, वह पार्टी लाइन कैसे होता है. किस मीटिंग में यह तय होता है कि पार्टी लाइन क्या होगी? जदयू के संविधान में लिखा हुआ है कि एक संसदीय बोर्ड होगा, जो पार्टी के राजनीतिक फैसले लेगा, लेकिन जदयू में आज तक संसदीय बोर्ड का गठन ही नहीं हुआ. नीतीश जिनको चाहें, वही विधायक बन जाए, वही सांसद बन जाए और कभी-कभार शरद के भी एक दो लोग खप जाएं, उनके लोगों पर भी कृपा हो जाए, बस इसी तरह दुकान चलती है. अब जैसे केसी त्यागी सांसद बने. शरद यादव उनके लिए वर्षों से लगे हुए थे, अंत में नीतीश ने कृपा कर दी.

आपने कहा कि आपको भाजपा से ऑफर मिला, लेकिन अपराधबोध के कारण आप नहीं गए. जब जदयू का भाजपा से गठबंधन हो रहा था, तब आप भी उसके पक्षधर थे, जबकि गठबंधन बाबरी ध्वंस के बाद हो रहा था.
हां, मैं पक्षधर था. भाजपा उस समय आर्थिक नीतियों में स्वदेशी मॉडल की बात कर रही थी. ऐसा लग रहा था कि वह अगर सत्ता में आई, तो स्वदेशी मॉडल से देश चलेगा.

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(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 7 Issue 2, Dated 31 January 2015)

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