शंकर गुहा नियोगी: मजदूर आंदोलन

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शंकर गुहा नियोगी की हत्या के मामले पर सुप्रीम कोटट का फैसला 2005 में आया था
शंकर गुहा नियोगी की हत्या के मामले पर सुप्रीम कोटट का फैसला 2005 में आया था.
शंकर गुहा नियोगी की हत्या के मामले पर सुप्रीम कोटट का फैसला 2005 में आया था.

भारत में यूं तो कई मजदूर नेता हुए हैं लेकिन इनमें से एक ही दौर के दो लोग सबसे ज्यादा चर्चित रहे. इनमें पहला नाम है दत्ता सामंत का. उन्होंने बंबई के कपड़ा मिल मजदूरों की मांगों को लेकर 1982 में हड़ताल की थी. इसे एशिया में अब तक की सबसे बड़ी हड़ताल कहा जाता है. हालांकि इसके चलते कई मिलें हमेशा के लिए बंद हो गईं और तकरीबन अस्सी हजार मजदूरों को बेरोजगार होना पड़ा. इसी दौर के जो दूसरे सबसे चर्चित नेता रहे वे थे शंकर गुहा नियोगी. उन्होंने 1977 में असंठित क्षेत्र के मजदूरों का सबसे बड़ा आंदोलन खड़ा किया था. छत्तीसगढ़ के इस मजदूर नेता का आंदोलन सिर्फ हड़ताल तक सीमित नहीं था. अपने सामाजिक कार्यों की वजह से इसे आज भी दूसरे आंदोलनों के लिए अनुकरणीय माना जाता है.

मूल रूप से पश्चिम बंगाल के जलपाइगुड़ी के रहनेवाले नियोगी का असली नाम धीरेश था. 1970 के दशक की शुरुआत में वे छत्तीसगढ आए और यहां भिलाई स्टील संयंत्र (बीएसपी) में बतौर कुशल श्रमिक काम करने लगे. अपने छात्र जीवन से मजदूरों के समर्थन में काम करने वाले धीरेश जल्दी ही बीएसपी में एक मजदूर नेता के तौर पर पहचाने जाने लगे. उस समय तक इस संयंत्र में कभी मजदूरों की हड़ताल नहीं हुई थी या कहें कि उन्हें कभी अपनी मांगों के लिए एकजुट नहीं होने दिया गया था. लेकिन धीरेश के आने से यहां स्थितियां बदल गईं. पहली बार मजदूरों ने अपनी काम करने की दशाओं में सुधार के लिए हड़ताल की और उनकी मांगों के आगे प्रबंधन को झुकना पड़ा. हालांकि इसके बाद प्रबंधन ने धीरेश को नौकरी से बर्खास्त कर दिया. यह घटना 1967 की है. इसके बाद लंबे अरसे तक तक वे छत्तीसगढ़ में घूम-घूमकर मजदूरों को अपने अधिकारों के लिए जागरूक करते रहे. 1970-71 में वे दोबारा भिलाई आ गए और अपना नाम बदलकर शंकर कर लिया. अब वे भिलाई के दानी टोला की चूना पत्थर खदानों में मजदूर की हैसियत से काम करने लगे. अपने पहले के काम की वजह से धीरेश यानी शंकर यहां भी मजदूरों के बीच लोकप्रिय हो गए. उस समय बीएसपी की दल्ली और राजहरा स्थित लौह अयस्क खदानों में ठेके पर काम करने वाले मजदूरों की बहुत बुरी दशा थी. 14-16  घंटे काम करने के बदले उन्हेें महज दो रुपये मजदूरी मिलती थी. उनकी कोई ट्रेड यूनियन भी नहीं थी. शंकर ने इन मजदूरों को साथ लेकर 1977 में छत्तीसगढ़ माइन्स श्रमिक संघ (सीएमएसएस) का गठन किया और इसके बैनर तले मजदूरों के कल्याण के लिए कई गतिविधियां शुरू कीं. यूनियन के गठन के दो महीने के भीतर ही इससे तकरीबन 10-12 हजार मजदूर जुड़ गए थे. यह शंकर गुहा नियोगी और उनके कुछ साथियों का नेतृत्व ही था कि इस यूनियन ने अपने कामों में शिक्षा व स्वास्थ्य और शराबबंदी जैसे कार्यक्रमों को पूरी प्रतिबद्धता से शामिल किया. यह संगठन सितंबर, 1977 में उस समय देशभर में चर्चा में आया जब दल्ली-राजहरा की खदानों में काम करने वाले हजारों मजदूरों ने नियोगी के नेतृत्व में अनिश्चितकालीन हड़ताल कर दी. यह ठेके पर काम करने वाले मजदूरों की देश में सबसे बड़ी हड़ताल थी. इसका असर इतना व्यापक था कि संयंत्र प्रबंधन को मजदूरों की तमाम मांगें माननी पड़ीं.

इस एक हड़ताल ने छत्तीसगढ़ में नियोगी को सबसे प्रभावशाली मजदूर नेता बना दिया. उनकी यूनियन का साल दर साल विस्तार होने लगा. भिलाई की कई निजी कंपनियों के मजदूर भी उसके सदस्य बनने लगे. कहा जाता है कि सन 1990 के आसपास उद्योगपतियों की ताकतवर लॉबी इस संगठन से आशंकित रहने लगी. नियोगी को जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं और आखिरकार सितंबर, 1991 में पल्टन मल्लाह नाम के व्यक्ति ने उनकी हत्या कर दी. यह घटना छत्तीसगढ़ के मजदूर आंदोलन के लिए बहुत बड़ा आघात थी. नियोगी हत्याकांड में मल्लाह के साथ ही कुछ उद्योगपतियों को आरोपी बनाया गया था लेकिन इस मामले में मुख्य अभियुक्त के अलावा किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सका.

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