शिक्षा सुधार पर तकरार

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दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) के अरविंद केजरीवाल ने जब दोबारा सरकार बनाई तो उनके सामने प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षा के स्तर को सुधारने के साथ-साथ यहां के प्राइवेट स्कूलों की मनमानियों पर नकेल कसना भी एक चुनौती थी. इन्हीं चुनौतियों से पार पाने के प्रयास में दिल्ली विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दूसरे दिन उपमुख्यमंत्री और शिक्षामंत्री मनीष सिसोदिया ने शिक्षा सुधार से संबंधित तीन विधेयक सदन में पेश किए, दिल्ली विद्यालय (लेखों की जांच और अधिक फीस की वापसी) विधेयक, 2015, दिल्ली विद्यालय शिक्षा (संशोधन) विधेयक, 2015 व नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार (दिल्ली संशोधन) विधेयक, 2015. लेकिन इन तीनों ही विधेयकों पर बवाल खड़ा हो गया है.

शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाले कार्यकर्ता व गैर सरकारी संगठन इन विधेयकों में किए गए प्रावधानों को शिक्षा विरोधी और प्राइवेट स्कूलों की मनमानियों को बढ़ावा देने वाला करार दे रहे हैं. उनका मानना है कि राज्य सरकार ‘दिल्ली विद्यालय विधेयक’ और ‘दिल्ली विद्यालय शिक्षा (संशोधन) विधेयक’ की आड़ में दिल्लीवासियों के साथ साजिश कर रही है. आम जनता को प्राइवेट स्कूलों पर लगाम कसने का सब्जबाग दिखा कर वह इन दोनों विधेयकों के माध्यम से प्राइवेट स्कूलों को यह कानूनी अधिकार देने जा रही है कि वह शिक्षा को व्यवसाय बनाकर जो अब तक करते आए थे, उसे जारी रख सकते हैं. साथ ही 2009 में पारित शिक्षा के अधिकार कानून में अनावश्यक हस्तक्षेप कर उसमें से धारा 8 व 16 को संशोधित कर आठवीं कक्षा तक बच्चों को फेल न करने वाली नो डिटेंशन पाॅलिसी को हटाए जाने को भी शिक्षा विरोधी करार दिया जा रहा है.

अखिल भारतीय अभिभावक संघ (एआईपीए) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट अशोक अग्रवाल कहते हैं, ‘सरकार का उद्देश्य केवल प्राइवेट स्कूलों को खुली छूट देना है. दिल्ली विद्यालय विधेयक के प्रभाव में आने के बाद सभी प्राइवेट स्कूलों को यह अधिकार मिल जाएगा कि वह जब चाहंे, जितनी चाहें फीस बढ़ा सकते हैं. वहीं दिल्ली विद्यालय शिक्षा विधेयक, 1973 में संशोधन कर धारा 10(1) को हटाया जा रहा है जिसे 42 साल पहले काफी संघर्ष के बाद इस कानून में जोड़ा गया था. इस धारा में प्रावधान था कि प्राइवेट स्कूल के कर्मचारियों को सरकारी स्कूल के कर्मचारियों के समान ही वेतनमान दिया जाएगा और सभी वेतन आयोग इन पर भी लागू होंगे. लेकिन अब इन्हें घरेलू नौकर बनाने की तैयारी है, जिन पर कोई कानून लागू नहीं होता. अब प्राइवेट स्कूल चाहें तो इन्हें कितना भी वेतन दें. दो से तीन हजार रुपये प्रतिमाह भी.’

‘आठवीं तक फेल न करने की नीति ‘एजुकेशन फॉर ऑल’ के तहत लाई गई थी, ताकि गरीबों के बच्चे भी हर परिस्थिति में शिक्षा से जुड़े रहें’

प्राइवेट स्कूलों द्वारा बढ़ाई जाने वाली मनमानी फीस पर लगाम कसने के उद्देश्य से राज्य सरकार द्वारा लाए गए दिल्ली विद्यालय विधेयक, 2015 में प्रावधान है कि कोई भी प्राइवेट स्कूल अभिभावकों से जितनी चाहे उतनी फीस वसूल सकता है बशर्ते वह इस फीस का उपयोग उसी विद्यालय के अंदर विद्यालयीन जरूरतों की पूर्ति और सुविधाओं पर ही करे, विद्यालय के बाहर किसी और मद में नहीं. इसकी जांच के लिए सरकार एक समिति का गठन करेगी. हर स्कूल सरकार को अपने सालभर के लेखापरीक्षित खाते (ऑडिटेड अकाउंट) सौंपेगा और यह समिति उन खातों की जांच समिति में ही शामिल लेखा परीक्षक (चार्टर्ड अकाउंटेंट) की सहायता से करेगी. अगर यह समिति पाती है कि स्कूल के द्वारा वसूली गई फीस स्कूल के अलावा कहीं और खर्च की गई है तो उसे अतिरिक्त फीस लेना करार दिया जाएगा और ऐसी फीस को समिति या तो अभिभावकों को वापस करने का आदेश दे सकती है अथवा उसे निर्धारित मदों में उपयोग किए जाने का हुक्म सुना सकती है. इसके अतिरिक्त समिति को विद्यालय प्रबंधन को दंडित करने का भी अधिकार होगा. दंडस्वरूप वह पचास हजार से अधिकतम पांच लाख रुपये तक का अर्थदंड या तीन साल के कारावास की सजा अथवा दोनों ही सुना सकती है.

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लेकिन इस विधेयक में सरकार ने कई ऐसे पेंच फंसा दिए हैं जो प्राइवेट स्कूलों के पक्ष में जाते हैं. जिनके बारे में चर्चा करते हुए अशोक अग्रवाल कहते हैं, ‘नए विधेयक में अभिभावकों से फीस वृद्धि के खिलाफ न्यायालय में जाने का अधिकार छीना गया है. सारे अधिकार समिति को दे दिए गए हैं. अब अगर फीस वृद्धि के खिलाफ कोई न्यायालय जाना भी चाहे तो नहीं जा सकता, उसे इसी समिति के समक्ष अपनी शिकायत दर्ज करानी होगी. लेकिन सरकार ने इसमें भी एक पेंच फंसा दिया है. शिकायत दर्ज कराने के लिए कम से कम बीस या संबंधित विद्यालय के कुल पांच फीसदी छात्रों के अभिभावकों की जरूरत होगी. वहीं शिकायत दर्ज कराने के लिए अभिभावकों को सत्र शुरू होने के बाद कम से कम 18 महीनों तक इंतजार करना होगा. क्योंकि बिल में ऐसा ही प्रावधान है कि एक स्कूल अभिभावकों से मनचाही फीस ले सकता है और सालभर उस फीस का उपयोग कर सकता है. सालभर बाद उसे इस फीस से संबंधित सभी खाते सरकार को सौंपने होंगे और सरकार उन खातों की जांच गठित समिति से कराएगी. जांच में तकरीबन छह माह का समय लगेगा. इस प्रकार देखा जाए तो उस स्कूल द्वारा बढ़ाई गई फीस के खिलाफ इस अवधि में कानूनन रूप से कोई भी शिकायत वैध नहीं होगी.’

‘शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार नहीं आया तो सरकार धारा 17 के तहत बच्चों को काॅरपोरल पनिशमेंट (शारीरिक दंड) देने की भी वकालत करने लगेगी’

इसके अतिरिक्त विवाद इस समिति के अध्यक्ष को लेकर भी है. सरकारी विधेयक के अनुसार इस समिति का अध्यक्ष उच्च न्यायालय अथवा जिला न्यायालय का कोई सेवानिवृत्त न्यायाधीश या फिर प्रमुख सचिव स्तर का कोई सेवानिवृत्त नौकरशाह हो सकता है. इसके विरोध में तर्क यह है कि जब किसी नौकरशाह को अध्यक्ष बनाने का विकल्प मौजूद है ही तो फिर क्यों किसी न्यायाधीश को इस समिति की बागडौर सौंपी जाएगी? एआईपीए का कहना है, ‘केजरीवाल जो अपने उदय से ही नौकरशाही पर बेईमान होने का आरोप लगाते आए, आज वो उसी बेईमान नौकरशाही पर इतना भरोसा जता रहे हैं. यहां उनकी कथनी और करनी में ही अंतर नहीं बल्कि उनकी नीयत में भी खोट नजर आता है.’ अशोक अग्रवाल बताते हैं, ‘समिति चार्टर्ड अकाउंटेंट द्वारा जिस भी स्कूल के खातों की जांच कराएगी, चार्टर्ड अकाउंटेंट की फीस भी वही स्कूल देगा. इससे केजरीवाल सरकार ने स्कूलों को फीस बढ़ाने का एक नया कारण और उपलब्ध करा दिया है.’

प्राइवेट स्कूलों द्वारा वसूली जाने वाली मनमानी फीस के संबंध में अगर तमिलनाडु, महाराष्ट्र और राजस्थान सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों पर नजर दौड़ाई जाए तो वहां सरकार अपने अधीन एक समिति का गठन करती है  और समिति इन स्कूलों की फीस तय करती है कि हमारे राज्य में कौन सा स्कूल कितनी फीस लेगा. अगर कोई  स्कूल अपनी फीस बढ़ाना चाहता है तो वो इस समिति को प्रस्ताव देता है और वो समिति तय करती है कि फीस वृद्धि आर्थिक लाभ के उद्देश्य से तो नहीं की गई. इस कानून के पक्ष में सभी की सहमति है. लेकिन मनीष सिसोदिया कहते हैं, ‘अगर सरकार प्राइवेट स्कूलों की फीस तय करने की जिम्मेदारी ले लेगी तो ये तानाशाही होगी. इससे प्राइवेट स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होगी और सुविधाओं पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा. कैसे हम सबको एक लाठी से हांक सकते हैं?’

वहीं दिल्ली विद्यालय शिक्षा विधेयक, 1973 की धारा 10(1) के संशोधन पर मचे बवाल के बीच अपने बचाव में सरकार का कहना है कि यह प्रावधान प्राइवेट स्कूलों के लिए यह अनिवार्य करता है कि वह अपने कर्मचारियों को सरकारी स्कूल कर्मियों के समान वेतन दें लेकिन यह गैर व्यवहारिक है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कहते हैं, ‘एक सरकारी स्कूल में शिक्षक की तनख्वाह औसतन चालीस हजार होती है. अगर बात करें प्राइवेट स्कूल की तो दिल्ली के 1800 प्राइवेट स्कूलों में से लगभग एक हजार स्कूल ऐसे हैं जिनकी फीस हजार रुपये प्रतिमाह से अधिक नहीं है. कई स्कूल तो ऐसे हैं जो दो सौ रुपये की मामूली मासिक फीस पर भी बच्चों को पढ़ा रहे हैं. किसी स्कूल में तीन सौ तो किसी में चार सौ बच्चे हैं . इस लिहाज से देखें तो बीस छात्रों की एक कक्षा में एक शिक्षक के अनुपात से प्रबंधन को स्कूल में 15-20 शिक्षकों की जरूरत होती है. अब अगर इन शिक्षकों को सरकारी स्कूलों के शिक्षकों के समान वेतन दिया जाए तो छह लाख से आठ लाख रुपये का खर्चा आएगा लेकिन इतना तो इनके पास फीस कलेक्शन भी नहीं होता. इसका नतीजा ये होता है कि ये स्कूल फर्जी खातों का सहारा लेते हैं या फिर शिक्षक को सरकारी स्कूल के समान वेतन का चेक थमाते समय उससे  एक ब्लैंक चेक पर हस्ताक्षर करा लेते हैं और बाद में इस चेक के माध्यम से उस शिक्षक के खाते से दी हुई फीस को वापस अपने खाते में ट्रांसफर कर लेते हैं. इस प्रकार एक शिक्षक को न्यूनतम वेतन से भी कम में अपना गुजारा करना होता है. हमारा प्रयास है कि इस फर्जीवाड़े को रोका जाए. इसलिए हम दिल्ली विद्यालय शिक्षा कानून (डीएसई एक्ट),1973 में शामिल गैर व्यवहारिक धारा 10 (1) को हटाने के लिए यह संशोधन विधेयक लाए हैं.’ लेकिन जब कानून में समान वेतन के सिद्धांत वाली यह धारा नहीं रहेगी तो फिर वेतन निर्धारित करने के क्या मापदंड होंगे? यह अभी निर्धारित नहीं हुआ है. इसके लिए सरकार एक समिति के गठन पर विचार कर रही है जो दिल्लीवासियों के बीच जाकर उनसे रायशुमारी कर कोई ऐसा तरीका ईजाद करेगी जो प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों के साथ वेतन के मामले में हो रहे शोषण पर लगाम लगा सके और उन्हें एक सम्मानजनक वेतन दिला सके.

अशोक अग्रवाल कहते हैं, ‘सरकार केवल और केवल अंधेरे में रखने का काम कर रही है. सच तो यह है कि यह धारा प्राइवेट स्कूलों के गले की हड्डी बनी हुई थी और वो किसी भी तरह से इसे हटाना चाहते थे. बेरोजगारी के इस दौर में आज आसानी से दो-दो हजार रुपये में पढ़ाने वाले शिक्षक उपलब्ध हो सकते हैं पर इस धारा के कारण स्कूल विवश थे कि वह अपने कर्मचारियों को सरकारी स्कूल के समान वेतन दें. उनकी समस्या का समाधान सरकार ने कर दिया.’ पर केजरीवाल आश्वासन देते हैं कि जितना वेतन वर्तमान में एक शिक्षक को मिल रहा है, नए कानून के बाद उससे कम नहीं मिलेगा. शिक्षा के अधिकार की लंबे समय से लड़ाई लड़ते आ रहे सूर्यकांत कुलकर्णी कहते हैं, ‘अभी सरकार ने घोषित किया है कि इसके लिए ब्लॉक, जिला, ग्रामीण स्तर पर रायशुमारी करेंगे लेकिन इसके बाद जो लाखों सुझाव आएंगे, उन्हें कौन देखेगा? कौन पढ़ेगा? ये कमेटी तो पांच-दस सदस्यों तक सीमित होगी. यह सब महज खानापूर्ति है. सरकार का एजेंडा पहले से ही साफ है और वह वही करने वाली है.’ अगर इसे सही मानकर चलें तो सरकार शिक्षकों की फीस निर्धारित करने के लिए जिस फार्मूले का प्रयोग करने जा रही है उसके तहत वह स्कूल को मिलने वाली कुल फीस का एक निश्चित प्रतिशत कर्मचारियों के वेतन के रूप में बांटे जाने के प्रावधान पर काम कर रही है. या फिर अलग-अलग किस्म के स्लैब भी बनाए जा सकते हैं कि इस किस्म के स्कूल कम से कम इतनी तनख्वाह देंगे.

अशोक अग्रवाल कहते हैं, ‘मान लीजिए अगर वह कुल फीस का चालीस फीसदी वेतन के रूप में दिया जाना निर्धारित करते हैं. अब सवाल ये उठता है कि स्कूलों के पास फीस पाने के तो बहुत स्रोत होते हैं. जैसे ट्यूशन फीस, वार्षिक फीस आदि. तो कौन सी फीस का चालीस प्रतिशत? इस पर कहेंगे कि ट्यूशन फीस का चालीस प्रतिशत तो स्कूल ट्यूशन फीस नहीं बढ़ाएगा और वार्षिक फीस दोगुनी कर देगा और कहेगा कि ट्यूशन फीस तो मैंने बढ़ाई ही नहीं. इसलिए मैं वेतन क्यों बढ़ाऊं? कुल मिलाकर देखा जाए तो सरकार निजीकरण को बढ़ावा देने पर तुली है. एक बैठक के दौरान केजरीवाल ने मुझसे कहा भी था कि प्राइवेट स्कूलों पर हाथ डालने का अधिकार हमें नहीं है.’  वहीं स्लैब बनाए जाने का फैसला तो और अधिक विवादित जान पड़ता है. केजरीवाल की ही भाषा में कोई स्कूल 200 रुपये फीस लेता है तो कोई 300 रुपये, कोई 500 रुपये तो कोई 1000, 5000, 7000 या 10000 रुपये प्रतिमाह. मतलब हर स्कूल का अपना एक अलग फीस स्ट्रक्चर है तो क्या सरकार हर स्कूल के लिए एक अलग स्लैब निर्धारित करेगी? और यदि वह स्लैब इस आधार पर बनाती है कि एक हजार प्रतिमाह तक फीस वसूलने वाले अपने शिक्षकों को इतना निर्धारित वेतन देंगे या 1000 से 5000 प्रतिमाह तक फीस वसूलने वाले इतना, तो सरकार के लिए यह अपने ही उस कथन से मुकरना होगा जहां वह कहते हैं, ‘सरकार अगर प्राइवेट स्कूलों की फीस तय करने की जिम्मेदारी ले लेगी तो ये तानाशाही होगी. इससे प्राइवेट स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होगी’. तो सवाल उठता है, क्या शिक्षकों की फीस तय करने का अधिकार तानाशाही नहीं होगा? जहां एक हजार से लेकर पांच हजार फीस तक वसूलने वाले स्कूल के शिक्षकों को समान वेतन मिलेगा. इससे भी तो शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होने का डर है.

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इस विधेयक में सरकार ने प्रवेश के समय स्कूलों द्वारा वसूली जाने वाली कैपिटेशन फीस के संबंध में भी सजा के नए प्रावधान किए हैं. अब तक जहां इस एक्ट में कैपिटेशन फीस वसूलने वाले स्कूलों की मान्यता रद्द करने या उनके प्रबंधन को सरकारी नियंत्रण में लेने का प्रावधान था. अब इसमें ढील देकर इसे केवल अर्थदंड में बदल दिया गया है. इसके पीछे जो तर्क है वह यह कि मान्यता रद्द करने का नकारात्मक प्रभाव शिक्षकों के रोजगार व छात्रों की आगे की पढ़ाई पर पड़ता है. लेकिन प्रवेश के समय बच्चों की छंटाई प्रक्रिया (स्क्रीनिंग) को लेकर सरकार ने अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की है जो विवाद को जन्म दे रहा है. सरकार ने विधयेक में इस संबंध में स्कूलों पर अर्थदंड लगाने का तो प्रावधान किया है लेकिन जो हालिया सर्कुलर जारी हुआ है उसमें नर्सरी में दाखिला अंक पद्धति के आधार पर बच्चे का आकलन करने के बाद होना बताया गया है. लेकिन ये अंक पद्धति क्या होगी? अभी यह स्पष्ट नहीं है. अशोक अग्रवाल कहते हैं, ‘स्क्रीनिंग पर लगाम लगाने का झांसा देकर सरकार की जबरदस्त स्क्रीनिंग को बढ़ावा देने की तैयारी है. अंक पद्धति हो या बच्चे का इंटरव्यू, स्क्रीनिंग तो हुई ही न. बस अब इसे सरकारी अमलीजामा पहनाया जा रहा है.’

‘सरकार निजीकरण को बढ़ावा देने पर तुली है. एक बैठक में केजरीवाल ने मुझसे कहा था कि प्राइवेट स्कूलों पर हाथ डालने का अधिकार हमें नहीं है’

दिल्ली विद्यालय विधेयक और दिल्ली विद्यालय शिक्षा (संशोधन) विधेयक के इतर जो नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार (दिल्ली संशोधन) विधेयक दिल्ली सरकार लेकर आई है उस पर भी वह घिरती नजर आ रही है. इस बदलाव के पीछे सरकार का तर्क है कि बच्चे को आठवीं तक फेल न करने की नीति ने शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित किया है. इससे छात्रों और शिक्षकों की क्षमताओं का सही से मूल्यांकन नहीं हो पा रहा है. जब फेल होना ही नहीं है तो छात्र, शिक्षक और अभिभावक भी लापरवाह हो गए हैं. इसलिए इस नीति को बदलने की जरूरत है. लेकिन सरकार के इस तर्क का व्यापक विरोध भी हो रहा है. सूर्यकांत कुलकर्णी कहते हैं, ‘यह नीति हवा में नहीं लाई गई थी. इसके पीछे सोच थी. दस साल इस पर व्यापक चर्चा हुई थी. इसका मकसद था बच्चों को विकास की प्रक्रिया से जोड़ने के लिए शिक्षित करना. उनको स्कूलों में रोकना. बस्ते का बोझ कम करना. फेल-पास के तंत्र से बाहर निकालकर उन्हें तनावमुक्त करना. अफसर या उच्च वर्ग के बच्चे तो कैसे भी पढ़ ही लेते हैं. लेकिन यह नीति ‘एजुकेशन फॉर ऑल’ के तहत लाई गई थी, ताकि गरीबों के बच्चे भी हर परिस्थिति में शिक्षा से जुड़े रहें. उदाहरण के तौर पर इस नीति के आने से पहले महाराष्ट्र में एसएससी लेवल के चालीस प्रतिशत बच्चे फेल हो जाते थे. उन चालीस प्रतिशत को आगे बढ़ने से रोक दिया जाता था इसका नतीजा यह होता था कि बच्चों का बीच में शिक्षा छोड़ने का प्रतिशत काफी बढ़ गया था. इस तरह आप उन्हें विकास की प्रक्रिया से अलग कर रहे थे. बच्चा नहीं पढ़ रहा तो क्या उसे विकास की प्रक्रिया से हटा देंगे? उन्हें प्रोत्साहन की जरूरत होती है और यह पॉलिसी उन्हें वही देती है. लेकिन दुर्भाग्य से कई राज्यों ने इसे ढंग से लागू ही नहीं किया. संकल्पना थी कि जो बच्चे ढंग से नहीं पढ़ सकते उन्हें प्रोत्साहन मिले. इसे नजरअंदाज किया गया. हमें करना ये था कि बच्चों की कमजोरी का पता लगाकर उसे दूर करने के प्रयास करते. यहां सरकारें असफल हुईं लेकिन सजा बच्चों को दी जा रही है.’ अशोक अग्रवाल कहते हैं, ‘फेल बच्चा नहीं होता, फेल शिक्षक होता है. व्यवस्था होती है. और यह नीति प्राइवेट स्कूलों के लिए नहीं थी, सरकारी स्कूलों के लिए थी. उन स्कूलों के लिए जहां पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं हैं, बैठने के लिए जगह नहीं है. कहीं डेढ़ सौ बच्चों की क्लास एक शिक्षक के भरोसे है तो कहीं एक शिक्षक पहली से आठवीं तक के सैकड़ों बच्चों की संयुक्त क्लास ले रहा है. और उस शिक्षक की शैक्षणिक योग्यता क्या है, वह इसी से समझा जा सकता है कि उसे देश के प्रधानमंत्री का नाम तक नहीं पता होता. अब इन हालातों में बच्चों को फेल-पास की कसौटी पर तौला जाना कहां तक जायज है?’ सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति को मनीष सिसोदिया भी स्वीकारते हैं लेकिन साथ ही अपने बचाव में एक हास्यापद तर्क भी देते हैं. वह कहते हैं, ‘नो डिटेंशन पॉलिसी एक अच्छा कदम साबित हो सकती थी लेकिन इसे लाने में जल्दबाजी की गई. इसे लाने से पहले सभी सरकारों को सरकारी स्कूलों की बदहाली को दूर करना चाहिए था. शिक्षकों को आधुनिक शिक्षा के हिसाब से ट्रेनिंग दी जानी चाहिए थी और शिक्षक-छात्र अनुपात कम करने जैसे आवश्यक कदम उठाकर यह स्थिति उत्पन्न करनी चाहिए थी कि हर छात्र गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पा सके. हम ऐसा ही करेंगे.’ लेकिन प्रश्न ये उठता है कि जब हर छात्र गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पाकर पास होने की स्थिति में आ जाएगा तब इस नीति को लागू करने की जरूरत ही क्यों होगी? लेकिन अगर यह नीति खत्म की जाती है तो यह उन सभी बच्चों के साथ अन्याय होगा जो सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे हैं. वे डेढ़ सौ बच्चों की क्लास में कुछ सीख सकेंगे नहीं और उन्हें फेल करके ऐसी परिस्थितियां उनके सामने खड़ी कर दी जाएंगी कि हताशा में या तो वे खुद स्कूल से मुंह मोड़ लें या मां-बाप के दबाव में पढ़ना छोड़ दें. इसका जवाब सरकार के सिपहसालारों के पास नहीं है. वहीं एक ओर सरकार यह भी मान रही है कि शिक्षक का महत्व बहुत अधिक है और वर्तमान शिक्षक शिक्षा प्रदान करने की योग्यता पर खरे नहीं उतरते. जिससे यह स्वत: ही तय हो जाता है कि वर्तमान शिक्षक बच्चों को वो शिक्षा ही नहीं दे पाएगा जिसकी उन्हें जरूरत है. यहां फेल शिक्षक और शिक्षा व्यवस्था को होना चाहिए लेकिन छात्र फेल होगा. अशोक अग्रवाल कहते हैं, ‘इसके बाद भी अगर शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार नहीं आया तो सरकार धारा 17 के तहत बच्चों को कॉरपोरल पनिशमेंट (शारीरिक दंड) देने की भी वकालत करने लगेगी.’

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फीस वापसी सिर्फ एक झांसा ?

फीस वापसी की बात करें तो छठे वेतन आयोग के बहाने प्राइवेट स्कूलों द्वारा बढ़ाई गई फीस की जांच के लिए दिल्ली हाइकोर्ट ने जस्टिस अनिल देव समिति का गठन किया था और निर्देश दिए थे कि अगर स्कूलों द्वारा फीस वृद्धि किन्हीं गैरवाजिब कारणों से की गई है तो अतिरिक्त फीस 9 प्रतिशत की ब्याज दर के साथ अभिभावकों को लौटाई जाएगी. लेकिन एआईपीए का दावा है कि यह समिति अब तक 450 से अधिक स्कूलों को गैरवाजिब कारणों से फीस में बढ़ोतरी करने का दोषी पा चुकी है. जिनसे कि लगभग 250 करोड़ रुपये की राशि वसूली जानी बाकी है. लेकिन अब तक किसी भी स्कूल ने अभिभावकों को बढ़ाई गई फीस वापस नहीं की है. इसलिए दिल्ली सरकार के दिल्ली विद्यालय (लेखों की जांच और अधिक फीस की वापसी) विधेयक, 2015 पर सवाल उठना लाजमी है. लेकिन कई विशेषज्ञों का मानना है कि फीस वापसी की नौबत ही नहीं आएगी. मान लीजिए अगर कोई स्कूल फीस बढ़ाकर भी लेता है तो वह दोषी तब माना जाएगा जब वह उस अतिरिक्त फीस का उपयोग स्कूल के अलावा कहीं और करे. लेकिन यदि वह उस फीस को अपने खाते में सुरक्षित जमा दिखाकर यह कहता है कि इसका उपयोग वह स्कूल में ही करेगा तो उस पर कोई आरोप ही नहीं बनता और विधेयक में यह प्रावधान भी है कि समिति ऐसी फीस को स्कूल प्रबंधन को निर्धारित मदों में खर्च करने का आदेश दे सकती है. [/box]

अपने खिलाफ बन रहे माहौल पर काबू पाने के लिए केजरीवाल अब जहां एक ओर अभिभावकों के बीच यह संदेश प्रसारित करवा रहे हैं कि वेतन आयोग के आने पर प्राइवेट स्कूलों को शिक्षकों का वेतन बढ़ाना पड़ता था और वो इसकी वसूली आपकी जेब से करते थे. अब हमने वो कानून ही खत्म कर दिया. इसलिए फीस बढ़ेगी ही नहीं. वहीं दूसरी ओर उन्होंने शिक्षकों को यह सब्जबाग दिखाकर विरोधी रुख अपनाने से रोका हुआ है कि नए प्रावधान के अनुसार आपको वेतन तो मिलेगा ही, साथ ही फीस की जांच के बाद जितनी भी राशि विद्यालयों द्वारा अभिभावकों से अतिरिक्त वसूली गई होगी, उसे भी वेतन के रूप में आपमें बांट दिया जाएगा.