जीत-हार का सार

photo10
पटना में महागठबंधन की जीत पर खुशी मनाते राजद कार्यकर्ता. फोटो: सोनू किशन

भाजपाः  बाहर बड़ी लड़ैय्या, घर में उठापटक

इस अहम चुनाव को भाजपा के नेता परिणाम आने के बाद भले ही महत्वहीन करार देने में लगे हुए हों, लेकिन यह सच सबको पता है कि भाजपा को अगर एक और सीट मिल गई होती, जिसकी मनौती चुनाव परिणाम आने के पहले भाजपा कार्यालय परिसर में एक छुटभैय्या कार्यकर्ता मांग रहे थे तो पार्टी नेताओं के बोल कुछ और होते. फिर इस चुनाव का महत्व भी वे किसी दूसरे ध्रुव से जाकर समझाते. सच यही है कि बिहार के इस उप-चुनाव परिणाम ने उनमें हताशा का भाव भरा है. यह चुनाव परिणाम वाले दिन ही लाख कोशिशों के बावजूद छुप नहीं सका. चुनाव परिणाम आने के बाद मीडिया से बात करने प्रदेश भाजपा कार्यालय में पहुंचे भाजपा के नेताओं ने इसका इजहार भी कर दिया. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मंगल पांडेय और विधायक दल के नेता नंदकिशोर यादव इस चुनाव को अल्पमहत्व का बताकर और इससे किसी भी किस्म का तनाव नहीं होने का अहसास करवाने में लगे रहे. लेकिन जब सुशील मोदी के बोलने की बारी आई तो उन्होंने यहां तक कह डाला कि राजनीति के इस खेल में अब हम बराबरी के स्कोर पर हैं. उनका कहना था, ‘लोकसभा में हम जीते, विधानसभा उपचुनाव में वे ज्यादा जीते, हिसाब बराबर हुआ.’ यानी यह सीधी स्वीकारोक्ति थी कि इस चुनाव में भी जीत-हार का वही महत्व था जितना महत्व लोकसभा चुनाव में जीतने या हारने का था. मोदी इस उप चुनाव को बेहद महत्वपूर्ण करार दे रहे थे तो उनके साथ ही बैठे नंदकिशोर यादव और मंगल पांडेय इसे महत्वहीन साबित करने की कवायद कर रहे थे.

लालू बार-बार संकेत देते रहे हैं कि वे ही इस गठबंधन में बड़े भाई की हैसियत में रहेंगे. यानी विधानसभा सीटों पर टिकट बंटवारे में कोई कम पेंच नहीं फंसेगा 

मोदी, मंगल पांडेय या नंदकिशोर यादव कुछ भी कहें, बिहार का यह उपचुनाव कई मायने में महत्वपूर्ण था. हालिया लोकसभा चुनावों में भाजपा की जो लहर बनी थी, उसका भी परीक्षण होना था कि क्या वह महज केंद्र के चुनावों या नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने भर के लिए थी या फिर नीतीश से अलगाव के बाद कमल के पक्ष में उभरे उस जनज्वार का बड़ा हिस्सा सच में भाजपा के साथ अगले कुछ साल के लिए ‘फिक्स’ सा हो गया था. जानकारों के मुताबिक इस उपचुनाव ने यह साबित किया कि वह जनज्वार नीतीश से नाराजगी की बजाय केंद्र की कांग्रेस या मनमोहन सरकार के खिलाफ नाराजगी से उभरे तत्कालीन कारणों वाला था. भाजपा को यह भी पता है कि इस चुनाव के जरिये सबसे अहम परीक्षण भविष्य के रास्ते तय करने के लिए होना था. लगभग दो दशक बाद मिले लालू प्रसाद और नीतीश कुमार के गठबंधन की स्वीकार्यता जनता में हो पाती है या नहीं, इसका भी छोटा परीक्षण इस उपचुनाव के जरिये होना था. इस परीक्षण में महागठबंधन सफल रहा जो आनेवाले दिनों में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती के रूप में उभरेगा.

भाजपा की परेशानी तो अपनी जगह है ही, उसमें भी बिहार में पार्टी नेता सुशील मोदी की चुनौतियां बढ़ गई हैं जिन्हें आजकल नमो की तर्ज पर सुमो या छोटका मोदी कहने का चलन चला है. यह उपचुनाव एक तरह से सुशील मोदी के नेतृत्व और उनके ही मार्गदर्शन में ल़ड़ा गया था. परोक्ष तौर पर बिहार में भाजपा की ओर से भविष्य के नेता के तौर पर उनको रखते हुए. लेकिन इसमें भाजपा को असफलता मिली. अब आगे की कमान भाजपा सुशील मोदी के हाथों में ही देना चाहेगी या नहीं, यह भी तय करने में इस उपचुनाव परिणाम की भूमिका अहम होगी. हालांकि भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री के रूप में सुशील मोदी का नाम आएगा, यह पूछे जाने पर मोदी खुद कहते हैं कि यह अभी से वे कैसे कह सकते हैं, यह संसदीय बोर्ड तय करेगा. और जब उनसे पार्टी की अंतर्कलह पर सवाल पूछते हैं तो वे कहते हैं कि कहीं कोई अंतर्कलह नहीं है.

खैर, मोदी क्या, उनकी जगह किसी भी पार्टी का कोई भी नेता तो यही जवाब देता. लेकिन सब जानते हैं कि प्रदेश भाजपा के अंदर अंतर्कलह चरम पर है.  भागलपुर से विधायक रह चुके और अब भाजपा सांसद अश्विनी चौबे कहते हैं कि प्रदेश स्तर पर नेताओं की कमजोरी के कारण पार्टी को हारना पड़ा. पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद डॉ सीपी ठाकुर ने तो केंद्रीय नेतृत्व से आग्रह किया है कि वह गंभीरता से इस चुनाव परिणाम को देखे और आंके क्योंकि सीटें भी कम मिली हैं और वोट प्रतिशत भी अचानक कम हो गया है. भाजपा की राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य व विधानपार्षद हरेंद्र प्रताप कहते हैं कि केंद्रीय नेतृत्व से ही उम्मीद है  कि वह देखकर दुरुस्त करे. हरेंद्र प्रताप कहते हैं, ‘कुछ माह पहले हम छपरा जैसी सीट पर शानदार जीत लोकसभा में हासिल किये और अब तीसरे नंबर पर चले गये, यह तो बेहद ही चिंता की बात है.’

भाजपा के कई नेता ऐसी ही बातें करते हैं. हताशा-निराशा के साथ एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़नेवाले अंदाज में. प्रदेश भाजपा की स्थिति कैसी है, उसे दूसरे तरीके से भी जाना-समझा जा सकता है. तीन-तीन, चार-चार गुटों में बंटकर भाजपा के नेता अपना काम कर रहे हैं और सबको यह आशा है कि अगली बार वे सत्ता में आ जाएंगे. हालांकि उप चुनाव के बाद उनके उत्साह की मात्रा कुछ कम हुई है. इन गुटों में एक ओर सुशील मोदी हैं तो दूसरी ओर नंदकिशोर यादव. तीसरी ओर रविशंकर प्रसाद को भी सीएम पद का आकांक्षी बताया जाता है, चौथी ओर शहनवाज हुसैन को भी इस रेस में शामिल माना जाता है और पांचवीं ओर मंगल पांडेय की भी अपनी दावेदारी बताई जाती है.

हालांकि भाजपा की इस हार से पार्टी का एक कुनबा बहुत खुश भी है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि रखने वाले भाजपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘जिस हार का आप आकलन और विश्लेषण कर रहे हैं, उसका आकलन-विश्लेषण पार्टी ने ऊपर के स्तर पर पहले ही कर लिया था. इस उपचुनाव में बिहार प्रदेश के भाजपा नेताओं ने केंद्रीय नेतृत्व, नए अध्यक्ष अमित शाह और नरेंद्र मोदी तक से संपर्क किया था कि टिकट बंटवारे में मदद करें या मुहर लगाएं. लेकिन केंद्रीय नेतृत्व ने साफ कह दिया कि 10 सीटों पर चुनाव हैं, प्रदेश के स्तर पर प्रदेश के नेता ही निपटा लंे, सिर्फ ध्यान रखंे कि किसी परिजन को टिकट न मिले. दिल्ली की बंदिश हटने के बाद प्रदेश भाजपा के नेताओं ने आपस में तय कर राजी-खुशी टिकट का बंटवारा किया और चुनाव लड़ा. केंद्रीय नेतृत्व ने किसी बड़े नेता को बिहार में प्रचार करने के लिए भी नहीं भेजा.’ ये नेताजी आगे कहते हैं, ‘अब जब परिणाम सामने आया है तो सब ठीक हो गया है. अगले साल विधानसभा का आम चुनाव होगा. अब केंद्रीय नेतृत्व सबकुछ अपने हाथ में  ले लेगा. टिकट बंटवारे में संघ की भूमिका होगी. तब प्रदेश के नेताओं की खेमेबंदी खत्म होगी और भाजपा के लिए कुछ बेहतर हो जाने की उम्मीद होगी.’

ऐसा होगा या नहीं. होगा तो राज्य में भाजपा की स्थिति इससे कितनी बेहतर होगी, इसका अनुमान कम से कम अभी तो नहीं लगाया जा सकता.

दूसरी ओर यह भी सच है कि उपचुनाव का यह परिणाम महागठबंधन, विशेषकर नीतीश कुमार और उनकी पार्टी के लिए इतना सुकूनदायी संकेत भी लेकर नहीं आया है, जिससे वे यह उम्मीद कर सकें कि भविष्य की चुनौतियों से भी इतनी ही आसानी से पार पा लेंगे.

महागठबंधन की चुनौतियां : ट्रेलर बनाम सिनेमा

उपचुनाव के परिणाम वाले दिन पटना में नहीं होने और स्वास्थ्य संबंधी कारणों के चलतेे भले ही लालू प्रसाद अपनी खुशी, अपने अंदाज में जाहिर नहीं कर सके और भले ही उस दिन नीतीश कुमार खुलकर खिलखिलाते दिखे, लेकिन यह सच है कि नतीजों में सबसे बड़ी जीत लालू प्रसाद की पार्टी को ही मिली. देखा जाए तो यह चुनाव परिणाम महागठबंधन की जीत के बहाने कई दूसरे संकेत और संदेश भी समेटे हुए आया है. अव्वल तो यह बिल्कुल साफ हुआ कि यह चुनाव परिणाम इतने बड़े फलक पर संदेश देनेवाला नहीं रह जिसके आधार पर यही प्रयोग देश के दूसरे हिस्सों, विशेषकर हिंदी पट्टी में आजमाने को दूसरे दल तुरंत तैयार हो जाएं. इस प्रयोग के पहले ही महागठबंधन की ओर से उत्तरप्रदेश में मुलायम सिंह यादव और मायावती जैसे विरोधियों को साथ आकर भाजपा से मुकाबला करने का न्योता दिया जा चुका था. मायावती ने इसे फौरन खारिज कर दिया. दूसरा यह भी कि इस चुनाव परिणाम से भविष्य के साफ-साफ कुछ संकेत भी नहीं मिल सके हैं. सवर्ण उम्मीदवारों का चुनाव जीत जाना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं. यह बिहार में पहले से ही होता रहा है कि सवर्ण उम्मीदवार राजद या जदयू के जरिये चुनाव लड़कर कोर वोट तथा अपनी जाति या समूह का वोट एक मंच पर लाकर बहुत आसानी से चुनाव जीत जाते हैं. लेकिन उसी दल से जब दूसरी जाति का उम्मीदवार होता है तो वे उस तरह दरियादिली नहीं दिखाते. इसका एक बड़ा उदाहरण तो यही रहा है कि पिछली लोकसभा में लालू प्रसाद की पार्टी से जो पांच सांसद थे उनमें से चार सवर्ण ही थे. लेकिन मुस्लिम उम्मीदवारों का तमाम कोशिशों के बावजूद नहीं जीतना यह संकेत देता है कि महागठबंधन को अभी सामाजिक समीकरण ठीक से साधने होंगे. इस तरह कि उसका कोर वोट बैंक किसी हाल में खिसक न पाए.

बिहार उपचुनाव के नतीजों को अगर कोई मुख्य सिनेमा का ट्रेलर या सेमीफाइनल जैसा मानकर चल रहा है तो उसे निराशा हाथ लग सकती है

इतना ही नहीं, महागठबंधन के सामने दूसरी तरह की चुनौतियां भी आने वाली हैं. इस उपचुनाव और इसके पहले लोकसभा चुनाव में भी लालू प्रसाद की जीत ही बड़ी जीत रही. लालू प्रसाद की पार्टी की ओर से शुरू से ही इस महागठबंधन को राजद गठबंधन कहा जाता रहा है. लालू प्रसाद गठबंधन के नाम पर बार-बार नीतीश कुमार को यह संकेत देते रहे हैं कि वे ही इस गठबंधन में बड़े भाई की हैसियत में रहेंगे. यानी आगे विधानसभा सीटों पर टिकट बंटवारे को लेकर भी कोई कम पेंच नहीं फंसेगा. जदयू के जितने विधायक अभी हैं कम से कम उतनी सीटों पर वह टिकट चाहेगा. उधर, लालू प्रसाद लोकसभा चुनाव के दौरान राज्य में कई सीटों पर जदयू से आगे रहकर भाजपा से मुकाबला करने और फिर उपचुनाव में भी आये परिणाम आदि का हवाला देकर अधिक से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ना चाहेंगे. पेंच और भी हैं. महागठबंधन के बावजूद लालू प्रसाद और नीतीश कुमार अभी भी दो ध्रुवों से बात कर रहे हैं. नीतीश भले ही फिर मंडलवाद का नारा दे रहे लालू प्रसाद के साथ आ गए हों, लेकिन अभी भी वे पुराने अंदाज में ही सियासत कर अपना ‘सॉफ्ट’ चेहरा बनाए रखना चाहते हैं. जानकारों के मुताबिक इसीलिए वे अब भी मंडलवादी ताकतों के एक होने जैसी बात को खुलकर कहने से साफ-साफ बच रहे हैं और सभी जातियों और समुदायों को लेकर समाजवादी राजनीति की बात कर रहे हैं. दूसरी ओर, लालू का ज्यादा से ज्यादा जोर मंडलवादी ताकतों के एका पर है.

बात इतनी ही नहीं है, दोनों दलों के महागठबंधन और उसके साथ कांग्रेस के आ जाने से एक फायदा तो होगा कि कम से कम कुछ समूहों का मत उसे मिलना पक्का हो जाएगा. मुस्लिम, महादलित, बहुत हद तक यादव और कुरमी मतदाताओं के साथ आने की गारंटी तो मिल जाएगी, लेकिन इस महागठबंधन में एक यादव, एक कुरमी और एक महादलित नेता की प्रमुखता होने की वजह से अतिपिछड़ा समूह के छिटकने का डर भी बना रहेगा क्योंकि उस समूह से कोई नेता महागठबंधन में प्रमुखता से अब तक, फेसवैल्यू बनाने के लिए ही सही, इस्तेमाल नहीं हुआ है. भाजपा की भी कोशिश होगी कि वह अतिपिछड़ा समूह पर ही नजर जमाए जो एक बड़ी आबादी रखता है और जिस समूह के अंदर हालिया वर्षों में नीतीश कुमार के ही सौजन्य से राजनीतिक महत्वाकांक्षा परवान चढ़ी है. कुछ विशेषज्ञ भी साफ-साफ कह रहे हैं कि भले ही महागठबंधन को यह जीत मिल गई है, लेकिन यह जीत अभी भी पूर्णता के रास्ते पर नहीं है. एशियन डेवलपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट के सदस्य सचिव शैबाल गुप्ता कहते हैं, ‘इस महागठबंधन के बावजूद भाजपा को चार सीटों पर जीत मिलना उसकी कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं. गुप्ता आगे कहते हैं, ‘यह महागठबंधन तभी सफल हो पाएगा जब यह जुड़ाव धरातल पर भी हो. सिर्फ उपचुनाव के जरिये इसकी पूर्णता का आकलन ठीक नहीं.’

शैबाल गुप्ता जो कहते हैं वह तो एक बात है ही, दूसरी बात और भी अहम है. इस उपचुनाव को मीडिया का एक बड़ा हिस्सा बिहार में अगले साल होनेवाले विधानसभा के आम चुनाव के सेमीफाइनल की तरह दिखाने में लगा हुआ था जबकि बिहार के हालिया वर्षों के राजनीतिक इतिहास को देखें तो कोई उपचुनाव या आम चुनाव अगले चुनाव के लिए सेमीफाइनल क्या क्वार्टर फाइनल जैसा भी साबित नहीं हुआ है. इसे जदयू के नेता भी और राजद के नेता भी अच्छी तरह जानते हैं. 2004 में लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद, लोजपा और कांग्रेस गठबंधन को अपार सफलता मिली थी. लेकिन उसके अगले साल ही हुए विधानसभा चुनाव में राजद सत्ता से बाहर हो गया था. 2009 में लोकसभा चुनाव हुआ तो जदयू और भाजपा गठबंधन को अपार सफलता मिली. दोनों ने मिलकर 32 सीटों पर कब्जा जमाया. लेकिन कुछ माह बाद ही जब 13 सीटों पर उपचुनाव हुए तो भाजपा-जदयू की करारी हार हुई. लालू प्रसाद की पार्टी की लहरमय तरीके से जीत हुई. लालू प्रसाद ने उसी उपचुनाव के आधार पर उसके अगले साल होनेवाले विधानसभा चुनाव में भी अपनी जीत पक्की मान ली. लेकिन जब अगले साल यानी 2010 में बिहार में विधानसभा के आम चुनाव हुए तो फिर जदयू और भाजपा ने मिलकर इतिहास रच दिया और लालू प्रसाद और पीछे चले गए. यानी बिहार उपचुनाव के नतीजों को अगर कोई मुख्य सिनेमा का ट्रेलर या सेमीफाइनल जैसा मानकर चल रहा है तो उसे निराशा हाथ लग सकती है. बिहार में उपचुनावों का मुख्य चुनावों पर असर नहीं पड़ता दिखता.

हां, यह जरूर है कि महागठबंधन के नाम पर इसके घटकों में ऊहापोह की जो धुंध थी कि इसकी जनता के बीच स्वीकार्यता होगी या नहीं, वह साफ हो गई. संकेत मिले कि अगले साल होनेवाले विधानसभा चुनाव में लालू प्रसाद की सांप्रदायिकता विरोधी राजनीति और नीतीश कुमार का सामाजिक न्याय के साथ विकास वाला फॉर्मूला मिलाकर सही तरीके से कॉकटेल बने तो अतीत की परछाइयों को पीछे छोड़ जनता इस महागठबंधन का साथ दे सकती है. भाजपा के लिए बिहार की सत्ता दूर रह सकती है. लेकिन यह तब, जब वोटों का बिखराव और तमाम सांप्रदायिकता विरोधी ताकतों का जुटान हो. इस उपचुनाव में तो वाम दल ही इस महागठबंधन के साथ नहीं थे. तीनों वामदलों ने साथ आकर चुनाव लड़ा था. उन्हें एक सीट पर भी जीत नहीं मिली. जीत क्या, किसी सीट पर वे दूसरे नंबर तक पर नहीं आ सके. यानी संकट के सबसे बड़े दौर से गुजर रहे वामपंथी दलों के लिए इस उपचुनाव ने अलग से संकेत और संदेश दिए हैं.

आखिर में कांग्रेस की बात. भले ही उपचुनाव में उसने एक सीट पर जीत हासिल कर ली हो, लेकिन सभी जानते हैं कि वह अब भी बिहार में अपने वजूद की ही लड़ाई लड़ रही है. पार्टी पूरी तरह से नीतीश और लालू पर ही निर्भर है और आगे भी उसके इन दोनों नेताओं की शर्त पर ही चलने की संभावना है. इसके इतर राज्य में कुछ बड़ा करने का सपना वह देखे भी तो पार्टी संगठन की जो जीर्ण-शीर्ण हालत है उसे देखते हुए वह ख्याली पुलाव ही होगा.

[email protected]

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here