कारतूस के साये में कलम | Tehelka Hindi

पत्रकारिता विशेषांक A- A+

कारतूस के साये में कलम

जम्मू-कश्मीर, छत्तीसगढ़ और उत्तर पूर्व जैसे हिंसाग्रस्त इलाकों में पत्रकारों के लिए हमेशा दोहरा खतरा बना रहता है. ये आतंकवादियों-उग्रवादियों के निशाने पर तो रहते ही हैं, सरकारी एजेंसियां भी इन पर नजर गड़ाए रखती हैं

34-35-1-2तकरीबन तीन हफ्ते पहले कश्मीर घाटी के सोपोर में जब छह लोगों की अज्ञात बंदूकधारियों ने हत्या कर दी तो 1990 के दशक की याद आ गई जब इस तरह की घटनाएं आम थीं. उस वक्त बहुत सारे लोग मारे गए, किसी ने न तो इसकी जिम्मेदारी ली थी और न ही सरकार पर सवाल उठाए गए. मामलों की जांच बहुत ही दबे अंदाज में की गई. इन मामलों का सच अगर जाना जाता तो सिर्फ विश्वसनीय लोगों के बीच ही उसे साझा किया जाता. कश्मीर में किसी पत्रकार के लिए यह अस्पष्ट और अव्यस्थित वास्तविकता है, जो इस ‘विवादित राज्य’ को पत्रकारिता के लिहाज से चिंता या तनावपूर्ण जगह बना देती है. सोपोर में हुई हत्याएं पत्रकारिता की चुनौतियों की झलक दिखाती हैं, जिसका एक विशिष्ट विश्वासघाती पहलू यहां लगातार जारी हिंसा है.

हालिया हिंसा की शुरुआत 25 मई को हुई जब एक नए और कम चर्चित आतंकी संगठन लश्कर-ए-इस्लाम ने बीएसएनएल के एक आउटलेट पर हमला कर 26 साल के मोहम्मद रफीक की हत्या कर दी थी. इस हमले में तीन लोग घायल हुए थे. इससे पहले इस संगठन ने पोस्टर लगाकर दूरसंचार टावर अपने घरों में लगाने वालों से टावर हटाने की धमकी दी थी, जिसके तुरंत बाद ही गुलाम हसन डार की हत्या कर दी गई थी, जिनकी संपत्ति में एक ट्रांसमिटिंग टावर लगा हुआ था. हिजबुल मुजाहिदीन, लश्कर-ए-तैयबा और दूसरे अलगाववादी संगठनों ने इन हत्याओं से खुद को अलग रखते हुए लश्कर-ए-इस्लाम को सरकारी सहायता प्राप्त संगठन बताया. साथ ही इस संगठन को रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के उस बयान से जोड़ा, जिसमें उन्होंने कहा था, ‘आतंकवादियों को खत्म करने के लिए आतंकवादी होने की जरूरत है.’ इससे उलट राज्य की पुलिस ने इसके लिए पहले हिजबुल और बाद में एक दूसरे अलगाववादी संगठन को इन मौतों का जिम्मेदार ठहराया. वहीं लश्कर-ए-इस्लाम ने खुद को विशुद्ध मुजाहिदीन बताने पर जोर दिया और हिजबुल और लश्कर-ए-तैयबा को उनकी साख की जांच फिर से करने की चुनौती भी दी. इस बीच संगठन के फील्ड ऑपरेशन के प्रवक्ता गाजी अबु सरीक ने आरोप लगाया कि सैयद अली शाह गिलानी के नेतृत्व वाले हुर्रियत के कुछ सदस्यों ने चार शीर्ष आतंकवादियों के साथ विश्वासघात किया, जिसकी वजह से वे मारे गए. हालांकि हुर्रियत ने इन आरोपों को खारिज कर दिया. इसके बाद सोपोर में खामोशी छा गई, जो 1989 में अलगाववादी आंदोलन शुरू होने के बाद से एक आंतकवादी गढ़ रहा है. अलगाववादियों और सुरक्षा एजेंसियों के बीच की स्थिति और कठोर हो गई और दोनों एक-दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगा रहे थे. इसके बाद मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने मामले की समयबद्ध जांच के आदेश दे दिए हैं, जो अब भी शुरू होनी बाकी है. पुलिस की ओर से सोपोर में पोस्टर लगाए गए जिसमें हिजबुल से अलग हुए आतंकी संगठन के दो कमांडरों के बारे में जानकारी देने और हत्याओं की जानकारी देने वाले को 10 लाख रुपये का इनाम देने की घोषणा की गई है.

अब दो हफ्तों के बाद कश्मीर के हालात फिर से सामान्य हो गए हैं. ये घटना अब समाचार की हिस्सा नहीं है और न ही इस मुद्दे पर कोई राजनीतिक बहस ही हो रही है. अब आप इस खबर की सच्चाई लोगों को कैसे बताएंगे? उन छह लोगों को किसने मारा, जिससे चार महिलाएं विधवा और 14 बच्चे अनाथ हो गए? और क्यों मारा? इस मामले में स्पष्टता बहुत ही कम है. पत्रकार की जिज्ञासा कश्मीर के अपने ‘अजनबीपन’ से आपको परिचित कराएगी, यह एक अंधेरी जगह है, जहां बहुत ही कम दिखाई देता है और जहां हर कोने पर खतरा मौजूद है. कश्मीर में ये खतरा हर समय मीडियाकर्मियों का पीछा करता है. पिछले 25 सालों के दौरान प्रेस पर तमाम हमले हुए जिसमें कुछ पत्रकारों को अपनी जान गंवानी पड़ी. अतीत की ओर निगाह दौड़ाएं तो पता चलता है कि कई सारे किस्से हमारे लिए मौजूद हैं, जिसमें उस समय के खतरों और डर की झलक हमें मिलती है. इतना ही नहीं ये किस्से इस बात की भी समझ बनाते हैं कि कश्मीरी पत्रकारों को एक खबर के लिए किस हद के खतरों से गुजरना पड़ता है. ऐसी ही एक घटना 1990 में हुई जिसने पत्रकारिता को हिलाकर रख दिया था. एक सफल स्थानीय अखबार ‘अलसफा’ के संपादक मोहम्मद शाबान वकील की हत्या कर दी गई थी. वकील के नेतृत्व में अलसफा कश्मीर में जारी उथल-पुथल की लगातार रिपोर्टिंग कर रहा था. वकील को उनके ऑफिस से खींचकर बाहर निकाल गया और हत्या कर दी गई. इसके बाद कई और हत्याएं हुईं. 1997 में ‘आंखों देखी’ के सैदीन शफी और 2003 में ‘न्यूज एंड फीचर्स अलायंस’ के परवाज सुल्तान की हत्या कर दी गई. इन हत्याओं के जिम्मेदार लोगों की कभी पहचान नहीं की जा सकी.

 इतना ही नहीं कश्मीर में व्याप्त राजनीतिक और वैचारिक विभाजन के बीच पत्रकार सुरक्षा एजेंसियों और आतंकवादियों के लिए आसान निशाना होते हैं. घाटी के खतरनाक माहौल में फंसे पत्रकार एक ऐसी जगह फंसे हुए हैं जहां उनके अपराधकर्ताओं के लिए उनकी हत्याएं करना काफी आसान है. 1995 में पत्रकार युसूफ जमील ने ऐसा ही अनुभव किया. एक बुर्कानशीं ने उनके ऑफिस में उनके लिए ‘उपहार’ के तौर पर एक पार्सल छोड़ा. जमील, जो उस वक्त बीबीसी के संवाददाता थे, के इस पार्सल को खोलने से पहले ही उनके युवा फोटोग्राफर मुश्ताक अली ने उसे खोल दिया. यह उपहार एक बम था. अली के उपहार खोलने के साथ ही यह फट गया और तुरंत ही उनकी मौत हो गई. इस खौफनाक घटना के डेढ़ दशक होने के बावजूद भी मुश्ताक इसके सदमे से उबर नहीं पाए. जमील के सहकर्मी और ‘द एशियन एज’ के फोटोग्राफर हबीब नक्श ने चार बार मौत को मात दी. वे उस वक्त मुश्ताक अली के साथ ही थे जब ऐसी घटनाएं हुईं. फिर 1999 में एक दिन नक्श कश्मीर के तब के रक्षा प्रवक्ता मेजर पी. पुरुषोत्तम के साथ सेना के एक दफ्तर में बैठे हुए थे. उसी वक्त वहां फिदायीन हमला हो गया. हमले में एक अधिकारी मारे गए. उनकी मौत से कुछ मिनट पहले ही मेजर ने नक्श और उनके साथी पत्रकारों को वॉशरूम में छिपा दिया था. एक साल बाद नक्श श्रीनगर के रेजिडेंसी रोड पर एक एंबेसड कार की तस्वीर ले रहे थे कि तभी उसमें धमाका हो गया, जिसमें नौ लोग और हिन्दुस्तान टाइम्स के एक फोटोग्राफर मारे गए.

जफर इकबाल ने जब पत्रकारिता शुरू की थी तब उन पर अज्ञात बंदूकधारियों ने हमला किया था. उस समय वह स्थानीय अंग्रेजी अखबार ‘कश्मीर इमेजेज’ के दफ्तर में बैठे थे. शुक्र की बात ये थी कि इस हमले में इकबाल बाल-बाल बच गए और अब राज्य में वह पत्रकारिता के जाने-माने नाम हैं, जो जम्मू से एनडीटीवी के लिए रिपोर्टिंग करते हैं. कूका परे, जो इखवान (आत्मसमर्पण कर चुके आतंकवादी जो सुरक्षा एजेंसियों के लिए आतंकवादियों के खिलाफ सशस्त्र अभियान चलाते थे) का नेतृत्व कर रहे थे, ने एक बार कुछ स्थानीय अखबारों के संपादक और कुछ संवाददाताओं का अपहरण कर सुरक्षा एजेंसियों के खिलाफ जवाबी कार्रवाईयों के पक्ष में कवरेज करने की मांग की थी. राज्य के पत्रकारों पर आतंकवादियों का भी खूब दबाव होता था. आतंकी कई बार अखबार में प्रकाशित होने वाली सामग्री तय करते थे कि क्या प्रकाशित किया जाए, उसकी रिपोर्ट कैसे की जाए. यहां तक कि खबर का पेज पर डिजाइन कैसा होना चाहिए, ये भी तय करने की कोशिश करते थे. आलोचना को बर्दाश्त न करने के क्रम में आतंकवादियों की तरह ही सुरक्षा प्रतिष्ठान भी थे, लेकिन आतंकवादियों या इखवान की तुलना में ये दबाव के अप्रकट साधन अपनाते थे. 90 के दशक में जब कश्मीर में आतंकवाद चरम पर था तब वहां पत्रकारिता करना उतना ही मुश्किल काम था. पत्रकारों पर हर समय खतरा मंडराता रहता था. नए भूराजनीतिक बदलावों में घाटी फंस गई और इसकी वजह से श्रीनगर से लेकर अफगानिस्तान तक यह एक अस्थिर राज्य का सहज हिस्सा बन गया, बल्कि भारत और पाकिस्तान के बीच के युद्धक्षेत्र में भी तब्दील हो गया. शीर्ष कश्मीरी पत्रकार मुजामिल जलील राज्य में पत्रकारिता पर लिखते हैं, ‘कश्मीर में वास्तविकता के कई चरण और आयाम हैं. कश्मीर की अपनी एक हकीकत है, फिर भारत में उसे देखने का एक राष्ट्रीय नजरिया है और इस एक आयाम पाकिस्तान से भी जुड़ा हुआ है. ये सभी हकीकत एक-दूसरे से मुठभेड़ और विरोध भी करते हैं. कभी-कभार ये आपस में घुले-मिले से भी नजर आते हैं. दुखद ये है कि कश्मीर में किसी भी तरह की तटस्थ स्थिति नहीं हैं. पत्रकारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती हिंसा से तबाह इस इलाके में इस तटस्थ स्थिति को फिर से वापस पाना है.’

 कश्मीर में पत्रकारिता की जो स्थितियां हैं कुछ वैसी ही स्थितियां हिंसा से ग्रस्त भारत के दूसरे इलाकों की भी हैं. उत्तर-पूर्व और वनों के गढ़ वाले राज्य माओवादी हिंसा से प्रभावित हैं. हालांकि इन स्थितियों में कुछ महत्वपूर्ण अंतर भी हैं. ब्रिटेन के ‘जेन डिफेंस वीकली’ से जुड़े रक्षा पत्रकार राहुल बेदी के अनुसार, ‘कश्मीर में विवाद के अंतरराष्ट्रीय आयाम भी हैं जो दूसरे इलाकों में नहीं हैं. कश्मीर में हिंसा शहरी और ग्रामीण इलाकों में सामान रूप से है जबकि उत्तर-पूर्व और माओवाद प्रभावित राज्यों से हिंसा मुख्य रूप से गांवों में ही है. उग्रवाद प्रभावित उत्तर-पूर्व और माओवाद प्रभावित राज्यों में जारी हिंसा की तुलना में कश्मीर में जारी हिंसा हमेशा से ही ज्यादा नुकसानदायक रही है.’ हालांकि उत्तर-पूर्व में काफी समय से पत्रकारिता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार समुद्र दास गुप्ता इन राज्यों में जारी हिंसा और पत्रकारिता की चुनौतियों में काफी समानता देखते हैं. उनके अनुसार, ‘मणिपुर में उग्रवादी गुट ये चाहते हैं कि उनके बयानों को उसी तरह से लिया जाए जैसा कि वे कहे गए हैं और कभी-कभी वे चाहते हैं कि उनके विरोधी गुटों के बयानों को न जारी किया जाए.’ वह बताते हैं, ‘इस तरह की स्थितियां कई बार उग्रवादी गुटों और पत्रकारों के बीच विवाद खड़े कर देती हैं, जो स्थितियां कई बार पत्रकारों पर जानलेवा हमले का भी रूप ले लेती हैं.’ कश्यप 1997 के उन दिनों को याद करते हैं जब वह ग्रामीण विकास कार्यकर्ता संजय घोष की ब्रह्मपुत्र नदी के मजुली द्वीप पर हुई हत्या की रिपोर्टिंग कर रहे थे. इस दौरान वे उग्रवादी संगठन यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) की नजरों में चढ़ गए थे. उस समय एक फोन बूथ से जब वे इस खबर की जानकारी अपने दफ्तर को दे रहे थे तब उन्होंने पाया कि एक व्यक्ति काफी देर से उन पर नजर रख रहा था. बाद में उस व्यक्ति ने उनसे अपनी पहचान उल्फा के उग्रवादी के रूप में बताई. वह पीबी (उल्फा नेता परेश बरुआ) का आदमी था. कश्यप बताते हैं, ‘उस उग्रवादी ने बताया कि उसका काम उनकी (कश्यप) की सुरक्षा करना था.’

उत्तर-पूर्व में पत्रकारिता की और क्या-क्या चुनौतियां हैं इस पर ‘तहलका’ के पूर्व संवाददाता रतनदीप चौधरी कहते हैं, ‘यहां सैकड़ों जनजातियां और उप-जनजातियां हैं, जिनके बीच रिश्ता कभी भी बहुत सामान्य नहीं रहे हैं. इस क्षेत्र में तकरीबन 50 उग्रवादी संगठन हैं और विभिन्न जातियों और अलग-अलग नेतृत्व में करीब-करीब 10 अलगाववादी आंदोलन चलाए जा चुके हैं. इसलिए पत्रकारों को यहां बहुत ही सावधानी से पत्रकारिता करनी होती है. यह भी सुनिश्चित करना होता है कि आपकी खबर तथ्यात्मक रूप से सही और संतुलित हो. इसके अलावा आपकी पत्रकारिता को इस तरह से देखा जाता है कि आप किसी एक या दूसरे संगठन के इशारे या फिर सुरक्षा एजेंसियों के लिए काम कर रहे हैं.’

हालांकि उत्तर-पूर्व और उग्रवादी आंदोलनों की रिपोर्टिंग कर चुकीं ‘द टेलीग्राफ’ की संवाददाता सोनिया सरकार हिंसाग्रस्त इलाकों में पत्रकारिता करने में सिर्फ विवादों को तवज्जो देने को सही नहीं मानतीं. उनके अनुसार, ‘इन क्षेत्रों से सकारात्मक खबरें भी की जा सकती हैं और उन लोगों की कहानियां बताई जा सकती हैं जो इन क्षेत्रों में अपना अस्तित्व बचाते हुए जीवनयापन कर रहे हैं.’ अपनी एक रिपोर्ट में वह बताती हैं कि कैसे हिंसा से ग्रस्त मणिपुर के तमाम लोग पढ़ाई और रोजगार की तलाश में इस राज्य को छोड़कर चले गए थे और फिर वापस यहां लौटकर अपना कारोबार शुरू कर रहे हैं. सरकार ने एक फीचर स्टोरी मॉलीवुड (मणिपुरी सिनेमा उद्योग) पर किया, जिसमें महिला प्रधान फिल्में खुद युवा महिलाएं ही बना रही हैं. सोनिया तर्क देती हैं, ‘कई बार कुछ पत्रकार स्थितियों को बहुत ही बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने की कोशिश करते हैं ताकि दूसरों को ये महसूस करा सकें कि उनकी रिपोर्ट से महत्वपूर्ण वे खुद हैं.’ हालांकि रक्षा पत्रकार राहुल बेदी कश्मीर के हालात को दूसरे राज्यों की तुलना में अलग मानते हैं. वह बताते हैं, ‘कश्मीर में जो विवाद है वह अपने गंभीर राजनीतिक, कूटनीतिक और रणनीतिक आयामों के साथ देश में दूसरी किसी भी जगह के विवाद की तुलना में कहीं ज्यादा बड़ा है.’ दूसरी ओर घाटी में लगातार कम होती हिंसा मीडिया के लिए खतरनाक माहौल में थोड़ी-सी ढील जरूर देती है, फिर भी राज्य ने शांति के हालात बहुत ही कमजोर स्थिति में हैं. बहरहाल निर्दोष लोगों की जान की कीमत पर घाटी में हिंसा का खेल खेला जा रहा है. यहां पत्रकारिता करना बहुत जोखिम भरा है और पत्रकार एक कमजोर कड़ी है जिसे कभी-भी तोड़ा जा सकता है.

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