दो साल की मोदी सरकार, अच्छे दिनों का इंतजार

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‘अर्थव्यवस्था में ऐसा कोई उछाल नहीं है. जितनी ग्रोथ रेट दिखाई जा रही है, उतनी तो 10-12 साल से चल रही है. 2004 से 09 के बीच ग्रोथ रेट इससे भी ज्यादा थी. रोजगार मिलना शुरू नहीं हुआ. बाजार पूरी तरह बंद पड़ा हुआ है. बड़े पूंजीपति अपनी संपत्तियां बेच रहे हैं ताकि अपना कर्ज चुका सकें’ 

रक्षा और विदेश मामलों के जानकार सुशांत सरीन का कहना है, ‘वास्तविक स्थिति क्या है, ये तो उन्हीं को पता है जिन्होंने ये निर्णय लिया है. चीन के साथ पेचीदगियां बहुत हैं. एक तो सामरिक स्तर पर जिस तरीके का चीन का रवैया है, उनके जो हित हैं, वो भारत के हित के साथ मेल नहीं खाते. मुझे लगता है कि चीन के साथ कई स्तर पर निपटना पड़ेगा. कई मामलों में आप चीन के साथ सख्ती दिखा सकते हैं लेकिन फिर कई में आपको नरमी बरतनी होगी.’

सुशांत सरीन का कहना है, ‘पाकिस्तान पर नीति में एक तरह से कमजोरी है. पिछले दो साल में कम से कम पांच बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद पहल की है. हाल में भी जब रिश्तों में कड़वाहट आई तो उसे बेहतर करने की कोशिश नरेंद्र मोदी ने की. लेकिन लगता है कि पहले के प्रधानमंत्रियों की कोशिशों की तरह उनकी कोशिश का कोई असर नजर नहीं आ रहा. दूसरा पहलू है नरेंद्र मोदी का सऊदी अरब या यूएई जाकर नए सामरिक समीकरण बनाने की कोशिश करना. ये कदम इसमें एक बड़ा बदलाव है. एक सच्चाई भारत को स्वीकार करनी होगी कि अगर नेताओं के व्यक्तिगत संबंध अच्छे भी हैं तो इससे मुल्कों के संबंध बेहतर नहीं हो जाते. जिस नाटकीयता से लाहौर की यात्रा हुई, उसकी जरूरत नहीं थी. उसका एक नकारात्मक पहलू यह रहा कि जब से मोदी सरकार आई थी तब से पाकिस्तान में जो डर या हिचकिचाहट थी- मोदी की नीतियां पाकिस्तान को लेकर पिछली सरकारों से बिल्कुल अलग होंगी; वो लगभग पूरी तरह से खत्म हो गई है.’

आॅल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस के महासचिव रह चुके भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता गुरुदास दासगुप्ता कहते हैं, ‘भाजपा सरकार की विदेश नीतियों में खामी है. ये अमेरिका से जाकर दोस्ती कर रहे हैं, जबकि नेपाल के साथ हमारा विरोध चल रहा है. यह गलत नीतियों के ही कारण है. इस समय तो विदेश नीति के मामले में कुछ भी ठीक नहीं है. सरकार जिस तरह की नीति अपनाए हुए है, वह सही नीति नहीं है. चीन और पाकिस्तान दोनों एक नहीं है. पाकिस्तान से हमारे यहां आतंकी आते हैं. लेकिन चीन के साथ ऐसा कुछ नहीं है. उसके साथ कोई द्वंद्व नहीं होना चाहिए. अच्छी दोस्ती होनी चाहिए. लेकिन ऐसा नहीं है.’

‘ये सुधार की बात करते हैं तो सिर्फ आर्थिक सुधार की बात करते हैं. हमारी पूरी मशीनरी पुरानी हो गई है. नियम-कानून पुराने हो गए. प्रशासनिक सुधार, चुनाव सुधार, पुलिस सुधार, न्यायिक सुधार- ये सब मसले लंबे अरसे से लटके पड़े हैं. मोदी सरकार से उम्मीद थी कि वह इन सुधारों की शुरुआत करेगी’ 

वाजपेयी सरकार में मंत्री रह चुके पत्रकार अरुण शौरी ने पिछले दिनों एक टीवी चैनल को दिए गए इंटरव्यू में मोदी की विदेश नीति पर सवाल उठाते हुए कहा, ‘पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते फिलहाल समझ से बाहर हैं. पाकिस्तान के साथ नरेंद्र मोदी की विदेश नीति न तो संवैधानिक है और न ही तार्किक. पाकिस्तान के पीएम ने अपनी चालबाजी से भारत को अब तक गुमराह किया है. पाकिस्तान ने हालिया दिनों में भारत को केवल मूर्ख बनाने का काम किया. देश के नागरिक से लेकर सेना के जवान तक संतुष्ट नहीं हैं. फिर कौन-से सुशासन की बात हो रही है?’ शौरी ने कहा, ‘अमेरिका के बरक्स देखें तो पता नहीं हम क्या हासिल करने में कामयाब रहे हैं. द्विपक्षीय संबंध आपसी व्यक्तिगत संबंधों के मोहताज नहीं होते. ओबामा ने अफगानिस्तान शांति वार्ता से भारत को अलग करने या फिर पाकिस्तान द्वारा जैश-ए-मोहम्मद पर कोई कार्रवाई न करने को लेकर उंगली तक नहीं उठाई है. पाकिस्तान के मुद्दे पर हम खुद को मूर्ख बना रहे हैं. कश्मीरी अलगाववादियों के पाकिस्तान के साथ वार्ता करने को लेकर रवैया लचर है. पाकिस्तानी जांचकर्ताओं को पठानकोट एयरबेस का निरीक्षण करने की अनुमति देना मूर्खतापूर्ण फैसला था. चीन के मुद्दे पर ध्यान और गंभीरता की कमी साफ देखी जा सकती है. मोदी को लगता है कि वे चीन को खुश कर सकते हैं लेकिन वर्तमान में चीन पुराने कश्मीर राज्य के 20 प्रतिशत हिस्से पर काबिज है और हो सकता है कि एक दिन ऐसा आए जब वह कहे कि कश्मीर का मसला द्विपक्षीय नहीं बल्कि त्रिपक्षीय है.’

राजनीतिक विश्लेेषक अभय कुमार दुबे कहते हैं, ‘विदेश नीति के मामले में स्थिति है कि नेपाल हमारा पड़ोसी है और आज उससे हमारे संबंध अच्छे नहीं हैं. पाकिस्तान से ठंडे-गरम संबंध होते हैं, वह भी आज किसी खास हालत में नहीं है. विदेश नीति के मामले में जब हम अपने पड़ोसियों से भी अच्छे संबंध नहीं रख पाए हैं तो इस मामले में और क्या अपेक्षा कर सकते हैं? मुझे नहीं लगता कि सरकार ने दो साल में कुछ ऐसा किया है जिस पर गर्व किया जा सके.’

हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक की सालाना बैठक में भाग लेने अमेरिका गए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर रघुराम राजन ने डाउ जोंस ऐंड कंपनी की मैग्जीन ‘मार्केटवॉच’ से एक इंटरव्यू में कहा, ‘मुझे लगता है कि हमें अब भी वह स्थान हासिल करना है जहां हम संतुष्ट हो सकें. हमारे यहां लोकोक्ति है, अंधों में काना राजा. हम थोड़े-बहुत वैसे ही हैं.’ हालांकि, कमजोर वैश्विक अर्थव्यवस्था के बीच आईएमएफ समेत विभिन्न संस्थान भारतीय अर्थव्यवस्था को सराह चुके हैं, लेकिन रघुराम राजन की निगाह में यह फिलहाल ‘अंधों में काना राजा’ जैसी स्थिति में है. राजन के नेतृत्व में रिजर्व बैंक ने भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए कई उल्लेखनीय उपाय जरूर किए हैं. उन्होंने अपने इस इंटरव्यू में कहा, ‘हम उस मोड़ की ओर बढ़ रहे हैं जहां हम अपनी मध्यावधि वृद्धि लक्ष्यों को हासिल कर सकते हैं क्योंकि हालात ठीक हो रहे हैं. निवेश में मजबूती आ रही है. हमारे यहां काफी कुछ व्यापक स्थिरता है. (अर्थव्यवस्था) भले ही हर झटके से अछूती नहीं हो लेकिन बहुत-से झटकों से बची है.’

इस बीच भारतीय अर्थव्यवस्था में कुछ उत्साहजनक तथ्य भी सामने आए हैं जो इसकी मजबूती को लेकर आशा जगाते हैं. चालू खाते और राजकोषीय घाटे का नियंत्रण में आना, वस्तु व सेवा कर (जीएसटी) का आना, महंगाई 11 से घटकर 5 प्रतिशत से नीचे आना, इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में चल रहे सुधार, दो बैंक खातों में मोबाइल से पैसा ट्रांसफर करने का नया प्लेटफॉर्म शुरू होना आदि चीजें अर्थव्यवस्था को मजबूती देंगी, ऐसे अनुमान लगाए जा रहे हैं. हालांकि, अर्थव्यवस्था के मसले पर सरकार अब तक जितना कुछ कर सकी है, उससे ज्यादा का चुनावी वादा किया गया था. दहाई अंक में वृद्धि दर, दो करोड़ नौकरियां, मनरेगा, आधार जैसी योजनाएं खत्म करने जैसे वादे अधूरे हैं.

अर्थव्यवस्था के बारे में अरुण शौरी का कहना है, ‘पुनरुद्धार के सिर्फ छोटे-मोटे संकेत प्रभावी होते दिखाई दे रहे हैं और ऐसे में सरकार के दावों की जांच होनी चाहिए. निवेश को पुनर्जीवित करने की मुख्य चुनौती पर कोई प्रगति नहीं है. टैक्स सुधार और बैंकिंग सुधार नहीं हो पाए हैं.’ गुरुदास दासगुप्ता कहते हैं, ‘सरकार की आर्थिक नीतियां गलत हैं. आज हिंदुस्तान में नौकरियां नहीं पैदा हो रही हैं. महंगाई बढ़ रही है. मजदूर विरोधी काम चल रहा है. कानून बदलकर उसे मजदूरों के खिलाफ किया जा रहा है. किसान आज भी आत्महत्या कर रहे हैं. यह नीतियों की पूरी तरह विफलता को दिखाता है.’

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अभय कुमार दुबे कहते हैं, ‘अर्थव्यवस्था में ऐसा कोई उछाल नहीं है. जितनी ग्रोथ रेट दिखाई जा रही है, उतनी ग्रोथ रेट तो 10-12 साल से चल रही है. 2004 से 09 के बीच ग्रोथ रेट इससे भी ज्यादा थी. रोजगार मिलना शुरू नहीं हुआ. बाजार पूरी तरह बंद पड़ा हुआ है. हिंदू में खबर छपी है कि हिंदुस्तान के दस बड़े पूंजीपति अपनी संपत्तियां बेच रहे हैं ताकि अपना कर्ज चुका सकें. जाहिर है कि बिजनेस करके अपना कर्ज चुका सकने की हालत में वे नहीं हैं. इसमें अंबानी ब्रदर्स हैं, अडाणी हैं. ये तो स्थिति है. न तो बाजार को कोई उछाल मिल रहा है. न निवेश में कोई बड़ी पहल हुई है. इन चीजों की जब आलोचना की जाती है तो सरकार कहती है, नहीं, हम अभी तक काम कर रहे थे, अब इसके नतीजे निकलने शुरू होंगे.’

घरेलू मामलों में भारतीय कानून और राज व्यवस्था में बहुत सी खामियां लंबे समय से चिह्नित की जा रही हैं. इन पर समय-समय पर चर्चा होने के साथ सुधारों की बात उठती रही है. नरेंद्र मोदी ने भी वादा किया था कि वे पुराने और अप्रासंगिक हो चुके कानूनों को रद्द करके सुधारों का रास्ता साफ करेंगे. लेकिन कानून बनाने के मसले पर अब तक सरकार कोई खास प्रदर्शन नहीं कर पाई है. लोकसभा में सरकार मजबूत है, लेकिन राज्यसभा में सरकार बहुमत में नहीं है. ज्यादातर कानूनी मसलों पर सर्वदलीय आम राय कायम न हो पाने के कारण ज्यादातर कानून या तो पेश ही नहीं हो सके हैं, या फिर वे पास नहीं हो सके. नई सरकार के मुकाबले यूपीए सरकार को याद करें तो उसने देश को सूचना का अधिकार, भोजन का अधिकार, आधार, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर, शिक्षा का अधिकार, रोजगार का अधिकार जैसे कानून दिए थे जो आम जनता, खासकर गरीबों के लिए मील का पत्थर हैं. जबकि मोदी सरकार की जो भी योजनाएं या कानून अब तक सामने आए हैं वे जनपक्षीय होने की जगह पूंजीपरस्त दिखते हैं. मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, स्टार्ट अप और स्वच्छ भारत अभियान आदि सरकारी स्तर के नारे हैं जिनसे गरीब जनता को फिलहाल तो कोई फायदा होता नहीं दिख रहा है. अभी यह भी देखने में नहीं आया है कि सरकार आम जनता या गरीबों को ध्यान में रखकर नीतियां बनाने जा रही हो.

राजनीतिक विश्लेषक अभय कुमार दुबे कहते हैं, ‘जब मोदी सरकार सत्ता में आई थी तो उससे उम्मीद यह थी कि जो बहुत सारे सुधार तीस-चालीस साल से लटके पड़े हैं, उन्हें सरकार पूरा करेगी. ये सुधार की बात करते हैं तो सिर्फ आर्थिक सुधार की बात करते हैं. हमारी पूरी मशीनरी पुरानी हो गई है. नियम-कानून पुराने हो गए. प्रशासनिक सुधार नहीं हुए हैं, चुनाव सुधार नहीं हुए हैं, पुलिस सुधार नहीं हुए हैं, न्यायिक सुधार नहीं हुए हैं. ये सब मसले लंबे अरसे से लटके पड़े हैं. मोदी बस औद्योगिक सुधार की बात करते हैं, लेकिन शासन चलाने के लिए तो ये सारे सुधार भी होने चाहिए. मोदी सरकार से उम्मीद थी कि वह इन सुधारों की शुरुआत करेगी. पहले ब्लू प्रिंट तैयारी करेगी, उसके बाद शुरुआत होगी तो दस-बारह साल लगेंगे. लेकिन मोदी सरकार ने इन सारे सुधारों को लेकर अब तक कोई ब्लू प्रिंट नहीं बनाया है.’

प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में प्रचार करते समय नरेंद्र मोदी मंचों से कहते थे कि देश के संसाधन पर पहला हक गरीबों और किसानों का है. लेकिन उनके सत्ता में आने के बाद 13 राज्यों में सूखा पड़ा तो सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा कि लोगों को मरता हुआ नहीं छोड़ सकते. पिछले दो साल में किसान आत्महत्याओं के आंकड़े और बढ़े हैं. कृषि और आर्थिक मामलों के जानकार देविंदर शर्मा कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि सरकार कृषि के बारे में शायद भूल ही गई है. अक्सर देखा गया है कि चुनाव के पहले सरकारें किसानों की बात करती हैं और सत्ता में आने के बाद सिर्फ कॉरपोरेट की बात करती हैं. कृषि की हालत बेहद दयनीय है. शुक्रिया सुप्रीम कोर्ट का कि उसने फटकार लगाई तो सरकार को इस बात का एहसास हुआ कि सूखा पड़ा हुआ है. 2014 में किसानों की आत्महत्या की रोजाना की एवरेज 42 आ रही थी. 2015 में यह बढ़कर 52 हो गई.’

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देविंदर शर्मा कहते हैं, ‘किसानों की समस्या उत्पादन या पानी नहीं है, समस्या आय की है. किसान की आय हमने जानबूझकर ऐसी रखी है कि उसे तो मरना ही मरना है. किसान आत्महत्या के मामले में पंजाब महाराष्ट्र से आगे निकल रहा है. इसका कारण यह है कि आपने किसान को आमदनी नहीं दी. पंजाब में खेती से जो किसान की वास्तविक आय है वह एक हेक्टेयर पर तीन हजार रुपये है. चपरासी की जो बेसिक सैलरी है वह 18 हजार रुपये है, जिसे सरकार 21 हजार करने जा रही है. इसको कोई एड्रेस नहीं करना चाहता.’ अभय कुमार दुबे कहते हैं, ‘कुछ योजनाओं की केवल घोषणाएं हुई हैं, कोई परिणाम नहीं आया है. जन-धन योजना मोदी की पहली योजना थी. आज तक उसकी व्यवस्थित समीक्षा सामने नहीं आई है कि कितने खाते खुले और लोग उनका कैसे इस्तेमाल कर रहे हैं. क्या जमीन पर उसका कोई लाभ हुआ है? मेक इन इंडिया, स्टैंड अप इंडिया, स्किल इंडिया, ये सब सुनने में बहुत अच्छी योजनाएं हैं. मोदी की प्रवृत्ति के बारे में उनके गुरु लालकृष्ण आडवाणी, जो बाद में उनके प्रतिद्वंद्वी हो गए, ने कहा था कि नरेंद्र मोदी बहुत अच्छे इवेंट मैनेजर हैं.  मेरा कहना है कि अभी तक के दो वर्ष तो इवेंट मैनेजमेंट और रीपैकेजिंग में गुजर गए. इस इवेंट मैनेजमेंट का नतीजा क्या निकलेगा, ये देखने की बात होगी.’

गांवों के विकास के सवाल पर सीपीआई के महासचिव अतुल अनजान कहते हैं, ‘प्रधानमंत्री ने कहा कि हर सांसद एक गांव को गोद लेगा. सात लाख गांवों में से सात सौ गांव गोद लेने वाली इस अनोखी योजना का यह हाल है कि उनके अपने ही ज्यादातर सांसदों ने कोई गांव गोद नहीं लिया. जिस गांव को मोदी जी ने गोद लिया था, वहीं उनका उम्मीदवार स्थानीय चुनाव हार गया. राजनाथ और कलराज के गांव में यही हाल हुआ. लोकसभा के सिर्फ 44 सांसदों ने गांव गोद लिया और राज्यसभा के 8 सांसदों ने, बाकी ने नहीं लिया. उनके अपने ही सांसद उनकी बात नहीं सुन रहे. इसलिए कह रहा हूं कि दो साल का कार्यकाल तो पूरी तरह असफलता का काल है.’

आॅल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेंद्र दुबे कहते हैं, ‘नई सरकार से आकांक्षाएं बहुत ज्यादा थीं. लेकिन दो साल में यह हालत हुई है 2008 कि मंदी के समय जितना रोजगार पैदा हुआ था, उससे कम रोजगार इनके समय में पैदा हुआ है. निचले स्तर पर भ्रष्टाचार पहले जैसा बना हुआ है. श्रम कानूनों में जितने भी संशोधन हो रहे हैं वे मजदूरों के विरोध में हैं. सरकार की नीति से पावर सेक्टर में आठ लाख करोड़ का नुकसान हुआ है. 3.8 लाख करोड़ रुपये का घाटा हुआ है और 4.3 लाख करोड़ रुपये का कर्ज हो चुका है. इसकी दो वजहें हैं. पहली- महंगी बिजली खरीदकर उपभोक्ताओं को दी जा रही है. महंगी बिजली खरीद का कारण है कि बिजली की खरीद केवल प्राइवेट सेक्टर से की जा रही है, जिससे महंगी बिजली खरीदी जा रही है. ऊर्जा नीति में संतुलन नहीं है. दूसरे, बिजली को राजनीति के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. किसानों के साथ कुछ सेक्टरों में फ्री देने और बिजली चोरी को राजनीतिक संरक्षण, ये घाटे के बड़े कारण हैं. इस पर कोई स्पष्ट नीति न होने के कारण यह घाटा हुआ है. क्रोनी कैपिटलिज्म तो वैसे ही बना हुआ है. चुनिंदा औद्योगिक घराने अंबानी और अडाणी को फायदा पहुंचाया जा रहा है.’

गंगा को साफ-सुथरा करने के लिए ‘नमामि गंगे’ मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजना है. हालांकि, गंगा की सफाई के प्रयास पिछले तीस वर्षों से जारी हैं और अब तक कोई नतीजा सामने नहीं आया है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, 40 प्रमुख नदियों में से 35 बुरी तरह प्रदूषित हैं, जिनका पानी पीने लायक बिल्कुल नहीं है. कुछ समय पहले गंगा सफाई मसले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि मौजूदा कार्ययोजनाओं से लगता नहीं कि गंगा 200 वर्षों में भी साफ हो पाएगी. ‘नमामि गंगे’ योजना पर वर्ष 2014-15 में 324.88 लाख रुपये खर्च किए गए और अगले पांच साल के लिए 20 हजार करोड़ रुपये स्वीकृत हुए. हालांकि अभी तक ‘नमामि गंगे’ अभियान अपने शुरुआती चरण में भी नहीं पहुंचा है.

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भारत की युवा आबादी के लिहाज से शिक्षा का क्षेत्र बेहद अहम है जो कि पिछले दो साल से लगातार विवादों में है. लगभग सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में टकराव और उथल-पुथल का माहौल रहा. जेएनयू, हैदराबाद, बीएचयू, इलाहाबाद, एनआईटी कश्मीर और जादवपुर विश्वविद्यालयों में संघ-भाजपा समर्थकों और बाकी दलों या विचारधाराओं के छात्रों के बीच जबरदस्त टकराव की स्थितियां पैदा हुईं. इसके उलट शिक्षा के क्षेत्र में अब तक कोई उल्लेखनीय पहलकदमी नहीं हुई है. यूपीएससी के पूर्व सदस्य प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं, ‘जहां तक मुझे याद पड़ता है, शैक्षिक नीतियों में औपचारिक रूप से कोई बुनियादी बदलाव तो आया नहीं है. उच्च शिक्षा की नीति कागज पर तो वही है जो कपिल सिब्बल के समय थी. अब सवाल ये है कि आप किस तरह के लोगों को नियुक्त कर रहे हैं. किस तरह का वातावरण विश्वविद्यालय के रोजमर्रा के कामकाज में बनाया है. अब खबरें आ रही हैं कि इलाहाबाद के कुलपति ने असंतोष प्रकट किया है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय का हस्तक्षेप बहुत बढ़ रहा है. ये गंभीर समस्याएं हैं. स्कूली शिक्षा समवर्ती सूची में है तो केंद्र और राज्य दोनों की ओर से कोई महत्वपूर्ण पहल नहीं हो रही है. जहां तक मुझे याद है कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं हुए हैं, लेकिन दोनों बजटों में शिक्षा का बजट कम कर दिया गया. एक तरफ शिक्षा बढ़ानी है दूसरी तरफ बजट में कटौती की जा रही है.’

‘जहां तक मुझे याद पड़ता है, शैक्षिक नीतियों में औपचारिक रूप से कोई बुनियादी बदलाव तो आया नहीं है. उच्च शिक्षा की नीति कागज पर तो वही है जो कपिल सिब्बल के समय थी. सवाल ये है कि आप किस तरह के लोगों को नियुक्त कर रहे हैं. किस तरह का वातावरण विश्वविद्यालय के रोजमर्रा के कामकाज में बनाया है’

भाजपा के सत्ता में आने के बाद उसके कई सांसदों और नेताओं के विवादित बयान लगातार सियासी माहौल को सांप्रदायिक रंग भी देते हैं. लव जिहाद, राम मंदिर, बीफ, गोहत्या, राष्ट्रवाद, हिंदू राष्ट्र आदि मसले इस पूरे दो साल के कार्यकाल में हमेशा न सिर्फ चर्चा में रहे हैं, बल्कि इन्हें लेकर कई जगह उपद्रव की स्थितियां बनीं. प्रधानमंत्री मोदी ने संसद में इस पर कड़ा बयान देकर अपने नेताओें को सलाह भी दी थी कि ‘इस तरह की अनाप-शनाप बयानबाजी बंद होनी चाहिए’ लेकिन शायद हिंदूवादी अभियान चलाने वाले उनके सहयोगियों ने कोई सबक नहीं सीखा. केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति, सांसद योगी आदित्यनाथ, सांसद साक्षी महाराज, विश्व हिंदू परिषद की नेता साध्वी प्राची, संगीत सोम आदि नेताओें की लगातार सांप्रदायिक बयानबाजी पर रोक न लगाना भी सरकार की मंशा पर सवाल खड़ा करता है. दादरी में अखलाक की हत्या के बाद शुरू हुई असहिष्णुता के विवाद ने सरकार की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फजीहत करवाई. कथित तौर पर कट्टरपंथी हिंदू संगठनों द्वारा तीन लेखकों की हत्या से गुस्साए लेखक खुलकर सरकार के विरोध में आए तो यह मसला व्यापक स्तर पर उठा. हालांकि, असहिष्णुता की बहस को सरकार ने राष्ट्रवाद बनाम राष्ट्रद्रोह ठहराने का प्रयास किया. इतिहासकार एस इरफान हबीब कहते हैं, ‘आज जो संघ का राष्ट्रवाद है वह धर्म और संस्कृति के आधार पर भेदभाव करता है. जो उनके इस मानदंड को पूरा करता है वह राष्ट्रवादी है और जो नहीं कर पाता है उसे यह राष्ट्रवादी मानने से इनकार कर देते हैं. चूंकि पहली बार उनकी सरकार बनी है, तो अब इसे पूरे देश में लागू करने की कोशिश की जा रही है.’ पुरुषोत्तम अग्रवाल चिंता जताते हैं, ‘देश में यह पहली बार है जब बोलना, लिखना या असहमति जताना गुनाह हो गया है. इस लिहाज से यह संकट का समय है.’ अरुण शौरी अपने इंटरव्यू में कहते हैं, ‘मुझे इस बात का डर है कि मोदी के नेतृत्व में सरकार जिस दिशा में कदम बढ़ा रही है वह भारत के लिए अच्छा नहीं है. इशारों में धमकियां देने का दौर चल रहा है. नागरिक स्वतंत्रता पर लगाम लगाने के क्रम में और अधिक व्यवस्थित प्रयास भी किए जाएंगे.’