अनिल कुंबले : चुनौतियां ज्यादा, समय कम | Tehelka Hindi

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अनिल कुंबले : चुनौतियां ज्यादा, समय कम

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने अनिल कुंबले को अगले एक साल के लिए टीम का नया कोच नियुक्त किया है. वे टीम के साथ वेस्टइंडीज दौरे पर अपनी पहली चुनौती का सामना कर रहे हैं. क्रिकेट के तीनों प्रारूपों में भारत को विश्व की नंबर एक टीम बनाने का सपना साकार करने में जुटे कुंबले के सामने कई चुनौतियां हैं लेकिन उनके पास उनसे पार पाने के लिए समय शायद कम है.

All Photos : BCCI

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अनिल कुंबले के नाम के जिक्र के साथ ही उनसे जुड़ी उपलब्धियां आंखों के सामने तैर जाती हैं. यह पूर्व लेग स्पिनर भारत का सर्वकालिक सफल गेंदबाज है. इंग्लैंड के जिम लेकर के बाद वे पारी के सभी दस विकेट चटकाने का अद्भुत कारनामा करने वाले विश्व के दूसरे और भारत के इकलौते गेंदबाज हैं. उन्हें 2002 में एंटीगुआ में वेस्टइंडीज के खिलाफ खेले टेस्ट मैच के लिए भी याद किया जाता है जब वे टूटे जबड़े के साथ मैदान पर गेंदबाजी के लिए उतर आए थे. 2008 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कहने वाले कुंबले आज फिर से भारतीय क्रिकेट टीम के ड्रेसिंग रूम का हिस्सा बन गए हैं. लेकिन इस बार एक नई और पहले से कहीं बड़ी जिम्मेदारी के साथ. एक लंबी चयन प्रक्रिया के बाद पिछले दिनों भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने अनिल कुंबले को अगले एक साल के लिए टीम का नया कोच नियुक्त किया है. उन्होंने अपना पदभार संभाल लिया है. वे टीम के साथ वेस्टइंडीज दौरे पर अपनी पहली चुनौती का सामना कर रहे हैं. क्रिकेट के तीनों प्रारूपों में भारत को विश्व की नंबर एक टीम बनाने का सपना साकार करने में जुटे कुंबले के सामने कई चुनौतियां हैं लेकिन उनके पास उनसे पार पाने के लिए समय शायद कम है.

कोच के तौर पर कुंबले के साथ केवल एक साल का करार किया गया है ताकि उनकी काबिलियत को परखा जा सके. बीसीसीआई अध्यक्ष अनुराग ठाकुर कहते हैं, ‘इस एक साल के दौरान कुंबले को एक महान खिलाड़ी से एक महान कोच में खुद को ढालना है, ऐसी हम उम्मीद करते हैं. यह एक पेशेवर नियुक्ति है और ऐसी नियुक्तियां सभी संभावनाओं को ध्यान में रखकर की जाती हैं. कुंबले अब टीम ड्राइविंग की सीट पर हैं और एक साल के लिए हम उन्हें चाबी दे चुके हैं. अब उन्हें खुद को साबित करना है.’

इस एक साल के दौरान भारत को कुल 17 टेस्ट (चार वेस्टइंडीज में और 13 भारत में), घरेलू जमीन पर ही आठ एकदिवसीय और तीन टी-20 मैच खेलने हैं, साथ ही जून में इंग्लैंड में होने वाली चैंपियंस ट्रॉफी में भी भाग लेना है. लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि कुंबले पर भरोसा इसलिए जताया गया कि वे विदेशी जमीन पर भारतीय टीम को जीत दिला सकें. वहां भारतीय स्पिनरों के लचर प्रदर्शन को सुधार सकें. क्रिकेट सलाहकार समिति (सीएसी) के सामने कुंबले ने टीम के भविष्य की तैयारियों को लेकर जो प्रस्तुति दी, उसमें भी इसी बात पर जोर दिया कि कैसे गेंदबाजी के क्षेत्र में टीम को मजबूत बनाया जाए और युवा खिलाड़ियों को अंडर-19 स्तर से ही इस तरह तैयार किया जाए कि वे भविष्य में देश के लिए घरेलू पिचों पर ही नहीं, बाहरी पिचों पर भी निरंतर उम्दा प्रदर्शन कर सकें. उनका ज्यादातर जोर इसी बात पर रहा कि उपमहाद्वीपीय परिस्थितियों के बाहर टीम के प्रदर्शन को सुधारा जा सके, जो टीम की सबसे कमजोर पक्ष रहा है.

उपमहाद्वीप से बाहर की परिस्थितियों से तालमेल बिठाने में कुंबले भी अपने शुरुआती करिअर में जूझते नजर आए थे. उन्हें घरेलू शेर बताया जाता था

लेकिन उनके एक साल के कार्यकाल के दौरान टीम भारत के बाहर चार टेस्ट मैच ही खेलने वाली है. वह भी टेस्ट क्रिकेट में आठवें पायदान की उस कमजोर वेस्टइंडीज के खिलाफ जिससे 2002 के बाद से भारत कभी कोई द्विपक्षीय सीरीज नहीं हारा है. इसलिए कैरेबियाई दौरे पर शायद ही भारत को किसी चुनौती का सामना करना पड़े. इसके अलावा भारत को बांग्लादेश के खिलाफ एक टेस्ट, न्यूजीलैंड के खिलाफ तीन टेस्ट और पांच एकदिवसीय, इंग्लैंड के खिलाफ पांच टेस्ट और तीन एकदिवसीय व तीन टी-20 और ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ चार टेस्ट मैचों की मेजबानी करनी है. अगर घरेलू मैदानों पर टीम के पिछले छह सालों के प्रदर्शन पर नजर डालें तो टीम ने कुल 26 टेस्ट मैच खेले हैं जिनमें से 18 में उसे जीत मिली, तीन में हार और बाकी ड्रॉ रहे हैं. वहीं पिछले दस टेस्ट से भारत अपराजित रहा है, इन 10 में से 9 मुकाबले बड़े अंतर से जीते गए हैं. इस दौरान उसने विश्व की चोटी की टीम दक्षिण अफ्रीका को जहां चार मैचों की सीरीज में 3-0 से पराजित किया तो वहीं मजबूत ऑस्ट्रेलियाई आक्रमण का 4-0 से सूपड़ा साफ कर दिया. वेस्टइंडीज और न्यूजीलैंड ने दो-दो टेस्ट मैचों की सीरीज खेली और उन्हें भी ह्वाइटवॉश झेलना पड़ा. केवल इंग्लैंड ही रहा जो अपनी इज्जत बचा सका और 2012 में 4 मैचों की टेस्ट सीरीज 2-1 से अपने नाम की. घरेलू मैदानों पर भारत के इस वर्चस्व में सबसे बड़ा योगदान भारतीय गेंदबाजी की ताकत उस स्पिन आक्रमण का रहा जो विदेशी मैदानों पर जाकर फिसड्डी साबित होता है. इंग्लैंड अगर सीरीज अपने नाम कर सका तो सिर्फ इसलिए कि उसकी ग्रीम स्वान और मोंटी पनेसर की स्पिन जोड़ी भारतीय स्पिनरों से बीस साबित हुई.

इसलिए बांग्लादेश, न्यूजीलैंड, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया अपने आगामी भारत दौरे पर घरेलू जमीन पर भारत के वर्चस्व को चुनौती दे पाएंगे, ऐसा असंभव ही है. न्यूजीलैंड 1955 से ही आज तक भारत में कोई टेस्ट सीरीज नहीं जीत सका है और 1988 से पहली टेस्ट जीत के लिए तरस रहा है. ऑस्ट्रेलिया का भी यही हाल है, उसने 2004 के बाद से भारत की जमीन पर कोई टेस्ट मैच नहीं जीता है. एकदिवसीय में न्यूजीलैंड ने 1975 से अब तक भारत की जमीन पर कोई सीरीज अपने नाम नहीं की है. अब तक खेले कुल 27 में से 21 मुकाबलों में उसे यहां पटखनी खानी पड़ी है. वहीं इंग्लैंड भी 1985 के बाद से भारत में कोई एकदिवसीय सीरीज नहीं जीत सका जबकि पिछली तीन में से दो सीरीज में उसे व्हाइटवॉश का सामना करना पड़ा है. भारत में जीत के लिए जरूरी है विश्वस्तरीय स्पिन आक्रमण का होना और भारतीय दौरे पर कुंबले के एक साल के कार्यकाल के दौरान आने वाली किसी भी टीम के पास एक नियमित स्पिन गेंदबाज तक नहीं है. इसलिए भारत को अपनी जमीन पर तो कोई चुनौती मिलने वाली नहीं. कुंबले की अगर असली अग्निपरीक्षा होगी तो जून 2017 में इंग्लैंड में खेली जाने वाली चैंपियंस ट्रॉफी में, जहां भारत के सामने अपना खिताब बचाने की चुनौती होगी. इसके अलावा कुंबले का कार्यकाल बिना किसी चुनौती के ही बीतेगा. बतौर कोच उनकी काबिलियत अगर परखी जानी थी तो यह सिर्फ विदेशी दौरों पर ही संभव था. फिर कुंबले की काबिलियत कैसे परखी जाएगी यह एक बड़ा सवाल है.

वर्तमान में जितने भी तेज गेंदबाज भारतीय टीम का हिस्सा हैं या टीम से अंदर-बाहर होते रहे हैं, सभी दाएं हाथ के तेज गेंदबाज हैं

इसलिए इस लिहाज से तो कुंबले का एक साल चुनौतीपूर्ण नहीं रहने वाला और पूरा संभव है कि अगले साल उनका कार्यकाल बढ़ा दिया जाएगा. सीएसी के समक्ष दी गई कुंबले की प्रस्तुति से भी लगता है कि वे टीम के साथ एक लंबी पारी खेलने आए हैं. जहां उन्होंने एक लघुकालीन योजना के साथ 2019 विश्वकप तक की एक दीर्घकालीन योजना भी पेश की. हालांकि क्रिकेट विशेषज्ञों की नजर में जिन चुनौतियों का सामना कुंबले को करना है और जिन पर सबकी नजर रहेगी, उनका विश्लेषण जरूरी है.

विदेशी धरती पर अच्छा करने की चुनौती

पिछले पांच सालों में टीम का भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर टेस्ट क्रिकेट में लचर प्रदर्शन रहा है, जिसकी मुख्य वजह भारत की कमजोर गेंदबाजी रही. भारत की गेंदबाजी की ताकत स्पिनर रहे हैं लेकिन इस दौरान उनका प्रदर्शन औसत से भी निचले दर्जे का रहा. कुंबले को प्राथमिकता देने का कारण यही रहा कि विदेशी दौरों पर भारतीय स्पिनरों का प्रदर्शन सुधारा जा सके. 2011 से उपमहाद्वीप के बाहर खेले गए 21 टेस्ट मैचों में से महज एक मैच में भारत ने जीत का स्वाद चखा है और 16 में उसे हार मिली है, जो इस बात की पुष्टि करता है कि टीम की तैयारियों में कहीं तो खामियां हैं. कुंबले के सामने चुनौती है कि वे इन खामियों को दूर करें.

सीमित ओवर क्रिकेट के प्रदर्शन में अस्थिरता

2011 विश्वकप जीत के बाद से ही एकदिवसीय और टी-20 के मुकाबलों में टीम का प्रदर्शन स्थिर नहीं रहा है. टीम अहम मौकों पर जाकर चूक रही है. अगर 2013 में जीते चैंपियंस ट्रॉफी के खिताब को छोड़ दिया जाए तो पांच साल के दौरान टीम ने कोई भी बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं की है. 2012 के टी-20 विश्वकप में उसका प्रदर्शन निराशाजनक रहा, 2014 के टी-20 विश्वकप का फाइनल और 2015 के एकदिवसीय विश्वकप का सेमीफाइनल जरूर खेला लेकिन अहम मौकों पर मुंह की खानी पड़ी. ऑस्ट्रेलिया में टी-20 सीरीज में ऑस्ट्रेलिया को ह्वाइटवॉश जरूर किया लेकिन एकदिवसीय में शर्मनाक प्रदर्शन रहा. इंग्लैंड और वेस्टइंडीज में सीरीज अपने नाम की तो वहीं बांग्लादेश जैसी टीम से सीरीज में हार का मुंह देखना पड़ा. पिछले साल मजबूत अफ्रीकी टीम से घरेलू सीरीज गंवाई. 2016 का टी-20 विश्वकप भारत में आयोजित हुआ, पूरी उम्मीद थी कि 2011 की तरह ही भारत यह खिताब भी अपने नाम करेगा लेकिन फिर सेमीफाइनल में वेस्टइंडीज से हारकर सीरीज से बाहर हो गया. आखिर क्यों अहम मौकों पर भारतीय टीम चूक रही है? इसका जवाब भी कोच के तौर पर अनिल कुंबले को ही खोजना होगा. भारतीय टीम के पूर्व कोच रहे जॉन राइट और गैरी कर्स्टन इस काम को पहले बखूबी अंजाम दे चुके हैं. न्यूजीलैंड के जॉन राइट के रूप में जब भारतीय टीम के लिए पहली बार एक फुलटाइम कोच नियुक्त किया गया था, तब भारत को दक्षिण अफ्रीकी टीम के समान ही चोकर्स का तमगा हासिल था. उनके कार्यकाल में पहली बार इंग्लैंड में ऐतिहासिक नेटवेस्ट सीरीज में जीत से पहले भारत लगातार 15 से अधिक फाइनल मुकाबलों में हार का मुंह देख चुका था.

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तेज गेंदबाजी की कुंद है धार

भारत को विदेशी जमीन पर जीत दिलाने के लिए तेज गेंदबाजी की धार तेज करनी होगी. स्पिन के बूते एशियाई टर्निंग पिचों पर तो मैदान मारा जा सकता है पर उपमहाद्वीप के बाहर घास भरे विकेटों पर नहीं. भारत का तेज गेंदबाजी का इतिहास चुनिंदा गेंदबाजों तक ही सिमटा हुआ है. कपिल देव के बाद जवागल श्रीनाथ ने भारतीय तेज गेंदबाजी का भार अपने कंधे पर उठाया था जिसमें वेंकटेश प्रसाद और अजीत अगरकर से बेहतरीन सहयोग मिला. श्रीनाथ के बाद जहीर खान पर तेज गेंदबाजी की कमान संभालने का भार आ गया. लेकिन जहीर खान की टीम से विदाई के बाद अब तक कोई ऐसा तेज गेंदबाज सामने नहीं आया जो यह जिम्मेदारी उठा सके. वर्तमान में जो इशांत शर्मा टेस्ट क्रिकेट में भारत के मुख्य तेज गेंदबाज हैं, उनकी गेंदबाजी में भी वह धार नहीं कि विपक्षी खेमे में खौफ पैदा कर सके. इसके अलावा दूसरे और तीसरे गेंदबाज के लिए भारत के पास कोई ऐसा नाम नहीं जिसका अंतिम एकादश में स्थान सुरक्षित हो. उमेश यादव समय-समय पर अपनी गेंद की तेजी से प्रभावित करने में सफल तो रहे हैं पर उनके प्रदर्शन में निरंतरता नहीं है इसलिए टीम से अंदर-बाहर होते रहते हैं. वरुण आरोन के साथ भी यही समस्या है. मोहित शर्मा अब तक कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाए हैं और एक औसत गेंदबाज बनकर रह गए हैं. भुवनेश्वर कुमार भी प्रदर्शन में निरंतरता न होने के कारण टीम से अंदर-बाहर होते रहे हैं, हालांकि उन्होंने अभी कम ही मैच खेले हैं. मोहम्मद शमी ने प्रभावित जरूर किया है लेकिन वे कब तक अपना प्रदर्शन दोहरा पाते हैं, यह चुनौती है. पहले भी मुनाफ पटेल, आरपी सिंह और प्रवीण कुमार ने प्रभावित तो किया था लेकिन अपने प्रदर्शन को बरकरार नहीं रख पाए और गुमनामी के अंधेरे में कहीं खो गए. इस साल वेस्टइंडीज दौरे पर पहले अभ्यास मैच में ही तेज गेंदबाजी की पोल खुल गई. इशांत, कुमार, शमी और उमेश ने 60 ओवर गेंदबाजी की और महज 3 विकेट चटकाए. तेज गेंदबाजी के मामले में भारत की दरिद्रता इसी से समझी जा सकती है कि चयनकर्ता आशीष नेहरा को उस उम्र में एकदिवसीय का स्ट्राइक गेंदबाज बनाकर टीम में वापस लाए हैं जब उन्हें क्रिकेट को अलविदा कह देना चाहिए था. विशेषज्ञों के मुताबिक विदेशी दौरों पर भारत के लचर प्रदर्शन का कारण भी यही है. तेज गेंदबाज भारत को अच्छी शुरुआत दे नहीं पाते जिससे दबाव स्पिन गेंदबाजी पर आ जाता है और वह भी दबाव में बिखर जाती है. ऐसे तेज गेंदबाज खोजना एक चुनौती है जो लंबे समय तक टीम में न सिर्फ बने रहें बल्कि अपनी रफ्तार और स्विंग से विपक्षी बल्लेबाजों की नाक में दम भी कर सकें.

टीम संयोजन के लिए बाएं हाथ के तेज गेंदबाज की जरूरत

बाएं हाथ का तेज गेंदबाज टीम संयोजन में एक अचूक हथियार की तरह होता है. उसकी मौजूदगी विपक्षी टीम पर दबाव बनाती है कि वह अपनी बल्लेबाजी की रणनीतियां बदलती रहे. जैसे बल्लेबाजी में दाएं-बाएं हाथ के बल्लेबाजों की जोड़ी गेंदबाजों की नाक में दम किए रहती है कुछ उसी तरह दाएं-बाएं हाथ के तेज गेंदबाज जब दोनों छोर से एक साथ गेंदबाजी करते हैं तो बल्लेबाज लगातार दबाव में रहता है. बार-बार बदलती गेंदबाजी की लाइन उसका ध्यान भंग करती है. मैच में नई गेंद ऐसी जोड़ी को थमाने पर शुरुआती सफलता जल्द मिलने की संभावना बढ़ जाती है. वसीम-वकार की ऐसी ही एक जोड़ी विश्व की सबसे घातक गेंदबाजी जोड़ियों में से एक मानी जाती है. लेकिन वर्तमान में जितने भी तेज गेंदबाज भारतीय टीम का हिस्सा हैं या टीम से अंदर-बाहर होते रहे हैं, सभी दाएं हाथ के तेज गेंदबाज हैं. गेंदबाजों की अगली खेप में भी कोई ऐसा नाम सुनने में नहीं आ रहा जो जहीर खान की बाएं हाथ की गेंदबाजी की विरासत संभाल सके. यही कारण रहा कि गेंदबाजी में विविधता लाने के लिए आशीष नेहरा को एकदिवसीय टीम में सालों बाद वापस बुलाया गया. उन्हें टेस्ट में जरूर आजमाया जाता लेकिन उन्होंने टेस्ट खेलने से इनकार कर दिया. नेहरा को टीम में लाने से भारतीय गेंदबाजी में सुधार भी नजर आया है. लेकिन टेस्ट में अभी भी सूनापन है और नेहरा भी अपने करिअर के अंतिम पड़ाव पर हैं. इरफान पठान और आरपी सिंह की वापसी की संभावनाएं कम ही नजर आती हैं. कुछ समय पहले भारतीय गेंदबाजी कोच भरत अरुण ने भी इस पर चिंता जताई थी.

विदेश में घूमती नहीं है स्पिनरों की गेंद

एशियाई टर्निंग विकेटों पर तो भारतीय स्पिनरों का कोई सानी नहीं. उनकी असली परीक्षा उपमहाद्वीप के बाहर होती है. एक तो स्पिन के अनुकूल परिस्थितियों का अभाव और दूसरा प्रभावहीन तेज गेंदबाजी के बाद सारा दबाव स्पिन गेंदबाजी पर आने से घरेलू मैदानों पर विश्वस्तरीय भारतीय स्पिनर औसत से भी कम दर्जे के नजर आते हैं. उदाहरण के तौर पर, भारतीय स्पिन गेंदबाजी की कमान संभालने वाले रविचंद्रन अश्विन के उपमहाद्वीप और उसके बाहर के आंकड़ों की ही तुलना करें तो स्थिति साफ हो जाती है. अश्विन ने अपने करिअर में खेले 32 टेस्ट मैचों में 25.39 के प्रभावशाली औसत से 176 विकेट चटकाए हैं लेकिन इनमें से उपमहाद्वीप के बाहर खेले नौ टेस्ट मैचों में 56.58 की महंगी औसत से सिर्फ 24 विकेट लिए हैं. रविंद्र जडेजा का भी कुछ यही हाल है. इसके अलावा समय-समय पर अमित मिश्रा, प्रज्ञान ओझा, अक्षर पटेल को भी आजमाया गया पर कोई भी खास प्रभाव नहीं छोड़ सका.
उपमहाद्वीप के बाहर की परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाने की इसी समस्या का सामना कुंबले ने भी अपने शुरुआती आधे करिअर में किया था. उन्हें घरेलू शेर बताया जाता था. फिर उन्होंने वापसी की और भारत को विदेशी जमीनों पर भी अपनी फिरकी से जीत दिलाई. इसलिए कुंबले की सिर्फ तकनीकी सलाह ही काम नहीं आएगी, समान परिस्थितियों से जूझने का उनका अनुभव भी भारतीय स्पिनरों का मनोबल बढ़ाएगा.

कुंबले के लिए यह फैसला लेना सबसे चुनौतीपूर्ण होगा कि क्या भारत में भी तेज विकेट बनें जिससे विदेशी परिस्थितियों के हिसाब से खिलाड़ी खुद को ढाल सकें

बल्लेबाजी की रीढ़ भी कमजोर

बल्लेबाजी की बात करें तो टेस्ट क्रिकेट में बल्लेबाजी क्रम में संतुलन बनाने और विविधता लाने के लिए वर्तमान में भारत के पास शिखर धवन को छोड़कर कोई अन्य बाएं हाथ का विशेषज्ञ बल्लेबाज नहीं है. पिछली दो टेस्ट सीरीजों में चुनी गई टीम पर नजर डालें तो शिखर धवन के अलावा रविंद्र जडेजा दूसरे नाम थे जो बाएं हाथ से बल्लेबाजी करते थे. लेकिन न तो रविंद्र जडेजा विशेषज्ञ बल्लेबाज हैं और न ही उन्होंने बतौर ऑलराउंडर भी अपनी बल्लेबाजी से प्रभावित किया है. शिखर धवन के प्रदर्शन में भी निरंतरता नहीं है. वे टीम से अंदर-बाहर होते ही रहते हैं. यह स्थिति अभी आई हो ऐसा भी नहीं है. सौरव गांगुली के संन्यास और गौतम गंभीर के टीम से बाहर होने के बाद से ही भारत टेस्ट क्रिकेट में उनका विकल्प नहीं ढूंढ़ सका है. सुरेश रैना, युवराज सिंह, शिखर धवन, रविंद्र जडेजा विकल्प के तौर पर आजमाए गए, पर अब तक प्रभावित नहीं कर पाए हैं. समस्या यह है कि नई प्रतिभाएं भी दाएं हाथ से ही बल्लेबाजी करने वाली मिल रही हैं.

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अस्थिर बल्लेबाजी क्रम में भी भरना होगा दम

सौरव गांगुली की कमी एक मायने में और खलती है. वे छठे क्रम पर बल्लेबाजी किया करते थे. टीम का शुरुआती बल्लेबाजी क्रम जब जल्द ढह जाता था तो वे आकर पारी संभाला करते थे. कभी शीर्ष क्रम और मध्यम क्रम के बल्लेबाजों के साथ तो कभी पुछल्ले बल्लेबाजों के साथ मिलकर टीम के स्कोर को आगे ले जाया करते थे. उनके जाने के बाद से छठे और सातवें क्रम पर भारतीय बल्लेबाजी अस्थिर रही है. सुब्रमण्यम बद्रीनाथ, युवराज सिंह, सुरेश रैना, रविंद्र जडेजा, रोहित शर्मा, विराट कोहली तक को आजमाया गया. लेकिन कोई भी गांगुली जैसी स्थिरता दिखाकर उनकी जगह भर न सका. इसका असर सातवें क्रम की बल्लेबाजी पर भी पड़ा. धोनी ने एक क्रम ऊपर आकर छठे क्रम पर खेलना शुरू कर दिया. लेकिन इस कारण सातवें क्रम पर कोई उनकी जगह लेने वाला न मिलने से भारतीय बल्लेबाजी ढह जाती थी. वर्तमान की स्थिति यह है कि वेस्टइंडीज दौरे पर रोहित शर्मा को छठे और रिद्धिमान साहा को सातवें क्रम पर बल्लेबाजी के लिए भेजा जाएगा.

पिचों का स्वभाव बदलने की चुनौती

भारत के सामने चुनौती है कि विदेशी जमीन पर अच्छा करे और कुंबले की जिम्मेदारी है कि वे इस हिसाब से खिलाड़ियों को तैयार करें. तैयारी अभ्यास से आती है और खिलाड़ियों को तेज विकेटों पर खेलने का अभ्यास हमारे यहां बनने वाले धीमे टर्निंग विकेटों पर मिल नहीं पाता. टर्निंग विकेट पर हम स्पिन के बूते दौरे पर आई टीमों को तो हरा देते हैं पर न तो अपने तेज गेंदबाजों को अंतरराष्ट्रीय बल्लेबाजों के सामने अपनी गेंदबाजी की धार परखने का मौका मिल पाता है और न ही बल्लेबाजों को विश्वस्तरीय तेज गेंदबाजी खेलने का. स्पिन के बूते हम आसानी से विपक्षी खेमे के सभी विकेट झटक मैच एकतरफा जीत लेते हैं, कोई चुनौती ही नहीं मिलती. दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ खेली गई पिछली टेस्ट सीरीज का उदाहरण लें. भारतीय स्पिनर सीरीज में पूरी तरह हावी रहे. विपक्षी टीम कहीं मुकाबले में नजर ही नहीं आई. हम सीरीज तो जीत गए पर हुआ यह कि न तो हमारे बल्लेबाजों को डेल स्टेन और मोर्ने मोर्केल जैसे विश्व के चोटी के तेज गेंदबाजों का सामना करने का मौका मिला और न ही हमारे तेज गेंदबाजों को पर्याप्त गेंदबाजी का मौका मिला. इसलिए कुछ महीने बाद जब हम ऑस्ट्रेलिया गए तो यह कमी वहां अखरी. न हमारे बल्लेबाज ऑस्ट्रेलिया की गेंदबाजी का सामना कर सके और न तेज गेंदबाज उनकी बल्लेबाजी को ध्वस्त कर पाए (स्पिनर तो बेअसर रहे ही). ऐसा इसलिए हुआ कि तेज विकेटों पर गेंदबाजी का न तो हमारे गेंदबाजों को अभ्यास था और न तेज विकेट पर विश्वस्तरीय तेज गेंदबाजी खेलने का हमारे बल्लेबाजों को. एक कोच के तौर पर कुंबले के लिए यह फैसला लेना सबसे चुनौतीपूर्ण होगा कि क्या भारत में भी ऐसे तेज विकेट बनाए जाएं जिससे विदेशी परिस्थितियों के हिसाब से खिलाड़ियों को ढलने का अभ्यास हो.

सौरव गांगुली के संन्यास और गौतम गंभीर के टीम से बाहर होने के बाद से ही भारत टेस्ट क्रिकेट में उनका विकल्प नहीं ढूंढ़ सका है

दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ पिछले साल भारत में ही खेली गई एकदिवसीय सीरीज के फाइनल मैच में ऐसा ही एक तेज विकेट बनाया गया था जहां भारतीय गेंदबाजी और बल्लेबाजी पूरी तरह बिखर गई. इस पर टीम डायरेक्टर रवि शास्त्री और पिच क्यूरेटर के बीच कहासुनी भी हो गई थी. बाद में हुई पूरी टेस्ट सीरीज में स्पिन फ्रेंडली विकेट बनाए गए और भारत एकतरफा जीत हासिल कर सका. बिना मुकाबले के जीतना न जीतने के बराबर माना गया.

पूर्व भारतीय क्रिकेटर मनिंदर सिंह के मुताबिक, ‘हम घरेलू टूर्नामेंट में भी ऐसे ही स्पिन फ्रेंडली विकेट बनाते हैं जिस पर मैच तीन दिन में खत्म हो जाते हैं. तेज गेंदबाजों को गेंदबाजी का मौका नहीं मिलता. बल्लेबाजों को बल्लेबाजी का मौका नहीं मिलता. जब खिलाड़ियों की मैच प्रैक्टिस ही नहीं होगी तो वे कैसे प्रतिस्पर्धात्मक प्रदर्शन करेंगे. घरेलू क्रिकेट में तेज गेंदबाज प्रैक्टिस नहीं कर पा रहे, बल्लेबाज तेज गेंदबाजों को नहीं खेल पा रहे. विदेशी टीम भारत दौरे पर आएं तो हम स्पिन फ्रेंडली विकेट के सहारे तीन दिन में मैच जीत जाते हैं. न उनके तेज गेंदबाजों को खेलते हैं और न अपने तेज गेंदबाजों को गेंदबाजी का मौका देते हैं. तेज गेंदबाजी की परिस्थितियों में खेलने का अभ्यास ही नहीं होता. तेज गेंदबाजी से हमारे बल्लेबाजों का पाला सीधा विदेशी दौरों पर पड़ता है. वहीं गेंदबाजों को सीधा वहीं बॉलिंग का मौका मिलता है. अब बताइए इस तरह हम क्या विदेशों में जीतेंगे?’ क्या कुंबले भारतीय विकेटों के साथ प्रयोग का साहसिक कदम उठा सकेंगे? देखना रोचक होगा.

तुनकमिजाज विराट कोहली, कैप्टन कूल महेंद्र सिंह धोनी

विराट कोहली- टेस्ट कप्तान. महेंद्र सिंह धोनी- एकदिवसीय और टी-20 कप्तान. एक तुनकमिजाज, दूसरा शांत दिमाग. अलग फॉर्मैट में अलग कप्तान की वर्तमान थ्योरी भारतीय क्रिकेट में कुंबले के कप्तान रहने के दौरान ही आई थी. आज वही थ्योरी कोच कुंबले के लिए एक चुनौती बन बैठी है. उन्हें एक-दूसरे से एकदम विपरीत स्वभाव रखने वाले इन दो कप्तानों के साथ तालमेल बिठाते हुए आगे बढ़ना है. दोनों के ही लिए ही उन्हें अलग रणनीतियां बनानी होंगी क्योंकि दोनों का ही कप्तानी का अंदाज जुदा है. कोहली जहां आक्रामकता दिखाकर विपक्षी पर हावी होना चाहते हैं, वहीं धोनी ठंडे दिमाग से मैच बनाते हैं. इंग्लैंड जैसे देशों में अलग फॉर्मैट के अलग कप्तान होना पुरानी बात है पर वहां अक्सर ऐसा देखा जाता है कि जो खिलाड़ी जिस फॉर्मैट में कप्तानी करता है वह दूसरे फॉर्मैट में नहीं खेलता है. जैसे वर्तमान में इंग्लैंड के कप्तान एलिएस्टर कुक हैं जो सिर्फ टेस्ट खेलते हैं, वहीं सीमित ओवरों के कप्तान इयॉन मोर्गन हैं जो सिर्फ सीमित ओवरों की टीम का हिस्सा हैं. लेकिन जब अलग-अलग फॉर्मैट के कप्तान एक-दूसरे की कप्तानी में खेलते हैं तो स्वाभिमान वाली बात आगे आ जाती है. पिछले डेढ़ साल में कई बार भारतीय ड्रेसिंग रूम से ऐसी अफवाहें उड़ती रही हैं कि कोहली सीमित ओवरों में भी भारत की कप्तानी चाहते हैं. कप्तानी के इस द्वंद्व से निपटना किसी चुनौती से कम नहीं.

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