कश्मीर में एनएचपीसी के मुनाफे पर रार

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फोटो : फैज़ल खान
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बीते 21 अप्रैल को जे ऐंंड के आरटीआई मूवमेंट नाम के एनजीओ ने पिछले 15 साल में जम्मू कश्मीर में एनएचपीसी के पावर प्रोजेक्टों द्वारा हुई कमाई का ब्यौरा जारी किया. एनएचपीसी की कमाई का यह आंकड़ा लगभग 194 अरब रुपये का है, जिसके सामने आने के बाद से ही राज्य में एनएचपीसी को लेकर बहस फिर शुरू हो गई. कई नागरिक और राजनीतिक संगठनों ने इस कमाई को एनएचपीसी द्वारा राज्य के संसाधनों की कथित लूट की पुष्टि मानते हुए एनएचपीसी से राज्य में उसके स्वामित्व के सभी पावर प्रोजेक्ट वापस लेने की बात का समर्थन किया है.

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सभी स्टेकहोल्डर पहले कही हुई बातें ही दोहराते हैं. कश्मीर सेंटर फॉर सोशल एंड डेवलपमेंट स्टडीज की संयोजक हमीदा नईम कहती हैं, ‘एनएचपीसी खुद को समृद्ध बनाने के लिए राज्य के जल संसाधनों का अनुचित दोहन कर रही है और हमें (राज्य को) कुछ नहीं मिल रहा. इसीलिए जम्मू कश्मीर एक गरीब राज्य बना हुआ है जो दिल्ली की खैरात पर जी रहा है.’

बिजली को लेकर राज्य में छिड़ी यह बहस तथ्यों, भ्रांतियों और राजनीति का कॉकटेल बनकर रह गया है. यह मुद्दा रह-रहकर एनएचपीसी और केंद्र सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर लोगों में नाराजगी का कारण बनता है. फिर आरटीआई के बाद सामने आए कमाई के आंकड़े ने एनएचपीसी के खिलाफ शिकायतों में इजाफा ही किया है.

यहां के नामी बिजनेसमैन शकील कलंदर कहते हैं, ‘ये सब राज्य के साथ हो रहे अन्याय को दिखाता है. यहां सवाल एनएचपीसी से पावर प्रोजेक्ट वापस लेने का नहीं बल्कि हमारे जल संसाधनों पर अवैध कब्जे का है.’

‘ये सब राज्य के साथ हो रहे अन्याय को दिखाता है. यहां सवाल एनएचपीसी से पावर प्रोजेक्ट वापस लेने का नहीं बल्कि हमारे जल संसाधनों पर अवैध कब्जे का है’

राज्य में बिजली से जुड़ी इन शिकायतों का अपना इतिहास है जो 1960 में हुई इंडस वाटर ट्रीटी (सिंधु जल समझौता) से जुड़ा है. इस समझौते में पंजाब और कश्मीर, दोनों राज्यों की तीन-तीन नदियों को भारत और पाकिस्तान के बीच बांटा गया था. पाकिस्तान को कश्मीर की सिंधु, चेनाब और झेलम का अधिकार मिला और भारत के हिस्से में पंजाब की ब्यास, रावी और सतलुज नदियां आईं. इस हिसाब से जम्मू कश्मीर केवल रन ऑन रिवर पावर प्रोजेक्ट ही चला सकता है यानी राज्य बिना किसी बांध, जलाशय आदि के निर्माण के सिर्फ बहते पानी के सहारे छोटे स्तर पर ही बिजली उत्पादन कर सकता है. इस संधि ने राज्य के कृषि विकल्पों को भी प्रभावित किया. राज्य में सिंचाई के लिए निर्धारित सीमा से ज्यादा पानी प्रयोग नहीं किया जा सकता. सार यह है कि इस समझौते ने राज्य के अपने बलबूते पर 20 हजार मेगावाॅट बिजली उत्पादन क्षमता के विकल्पों को सीमित किया है. और जहां तक राज्य के हाइड्रो प्रोजेक्ट निर्माण की बात थी, वह फंड की भारी कमी के चलते नहीं बनाए जा सके. फिर केंद्र सरकार ने इन परियोजनाओं के लिए अंतरराष्ट्रीय वित्त पोषण पर दस्तखत करने से इनकार कर दिया और यहीं से एनएचपीसी राज्य में पहुंचा.

जम्मू कश्मीर ने एनएचपीसी के साथ राज्य में इन योजनाओं के निर्माण का अनुबंध किया. अब तक राज्य में एनएचपीसी ने सात प्रोजेक्ट लगाए हैं- सलाल, ऊरी-1, दुल हस्ती, सेवा-2, ऊरी-2, चतक और निम्मो बाजगो, जिनके बदले जम्मू कश्मीर को रॉयल्टी के रूप में 12 प्रतिशत फ्री बिजली मिलती है (पीक समय में जो महज कुछ सौ मेगावाॅट होती है). बाकी बिजली राज्य बाजार दरों पर एनएचपीसी, उत्तरी ग्रिड और बाकी जगहों से खरीदता है.

इस वित्त वर्ष में अब तक जम्मू कश्मीर सरकार बिजली खरीदने पर 4,600 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है. 2014-15 में राज्य ने बिजली खरीद पर 4,701 करोड़ रुपये खर्च किए थे. आधिकारिक आंकड़े के अनुसार पिछले 12 साल में राज्य ने बिजली खरीदने में लगभग 32 हजार करोड़ रुपये खर्च किए हैं. 16वें ऑल इंडिया पावर सर्वे के अनुसार 2020-21 तक जम्मू कश्मीर की बिजली की जरूरत 1,9500 करोड़ यूनिट तक पहुंचने की उम्मीद है. इस पर कश्मीर चेंबर ऑफ कॉमर्स एेंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष मुश्ताक अहमद वानी कहते हैं, ‘इसका मतलब है कि हमारे बजट का एक बड़ा हिस्सा हमारे ही जल संसाधनों से बनी बिजली खरीदने में जाएगा.’

इकोनॉमिक सर्वे रिपोर्ट 2015-16 के अनुसार वर्तमान में राज्य की बिजली मांग 1,772.30 करोड़ यूनिट है जबकि राज्य के स्वामित्व वाले बिजली घरों द्वारा केवल 256.20 करोड़ यूनिट बिजली पैदा होती है. यही कारण है कि बिजली और एनएचपीसी राज्य की राजनीति की दुखती रग बन गए हैं. रैम्बोल कंपनी के पूर्व सीनियर डायरेक्टर और गुड़गांव स्थित कंपनी के ग्लोबल इंजीनियरिंग सेंटर के पूर्व प्रमुख इफ्तिखार द्राबू कहते हैं, ‘राज्य में स्वायत्त शासन आने के बाद से पावर प्रोजेक्ट को वापस लाने के मुद्दे पर सबसे ज्यादा बहस हुई है. भले ही आप किसी भी राजनीतिक विचारधारा के हों, ये मुद्दा सभी के लिए जरूरी रहा है.’

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वैसे महबूबा मुफ्ती ने भाजपा के साथ सरकार बनाने के गठबंधन के लिए रखी गई शर्तों में सबसे पहले पावर प्रोजेक्ट की वापसी की मांग रखी थी, जिसे केंद्र द्वारा ठुकरा दिया गया. उन्हें कहा गया कि यह मांग वे मुख्यमंत्री का पदभार संभालने के बाद आगे बढ़ा सकती हैं. जम्मू कश्मीर 390 मेगावाॅट वाले दुल हस्ती और 480 मेगावाॅट क्षमता वाले ऊरी-1 प्रोजेक्ट को अपने नियंत्रण में लेने की मांग लंबे समय से कर रहा है. इसकी अनुशंसा रंगराजन कमेटी और तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में कश्मीर पर हुए गोलमेज सम्मेलन द्वारा भी की गई थी. यहां तक कि पीडीपी और भाजपा गठबंधन के एजेंडे में दोनों ‘दुल हस्ती और उरी हाइड्रो पावर प्लांट के हस्तांतरण के साधन ढूंढ़ने’ की बात पर सहमत भी हैं.

हालांकि पिछले साल मार्च में केंद्रीय ऊर्जा मंत्री ने बताया कि विभिन्न पैनलों द्वारा प्रस्तावित सिफारिशें भारत सरकार द्वारा स्वीकार नहीं की गईं क्योंकि इन प्रोजेक्टों द्वारा उत्पन्न की जा रही बिजली जम्मू कश्मीर सहित कई राज्यों को आवंटित है. ‘इसके अलावा परियोजनाओं के हस्तांतरण में काफी  वित्तीय, गैर-वित्तीय और कानूनी समस्याओं के आने की भी संभावना है.’ पीडीपी सांसद तारिक हमीद कारा के एक सवाल के जवाब में केंद्रीय ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल ने यह कहा था.

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पर इसके साथ राज्य में एक राय यह भी है कि इन ऊर्जा परियोजनाओं के वापस आने से न कोई आर्थिक लाभ होगा न ही कोई खास फर्क पड़ेगा. इफ्तिखार द्राबू जैसे विशेषज्ञ जो जम्मू कश्मीर के वित्त मंत्री हसीद द्राबू के भाई भी हैं, नहीं मानते कि इन परियोजनाओं की वापसी से राज्य को कोई लाभ होगा. एक अखबार में लिखे लेख में द्राबू कहते हैं, ‘इतने बड़े हाइड्रो प्रोजेक्ट को वापस लेने के अपने रिस्क हैं. ये लगभग दो दशक पुराने हैं, लिहाजा इसके काफी रखरखाव की जरूरत पड़ेगी.’  द्राबू ने सरकार को ऊर्जा के लिए थर्मल और हाइड्रो पावर के मेल का उचित प्रयोग न करने और हाइड्रो पावर पर ज्यादा भरोसा करने के बारे में चेताया भी है. वे लिखते हैं, ‘इन परियोजनाओं को वापस लाने के लिए लड़ने का कोई फायदा नहीं है. हो सकता है इन्हें वापस लाने के बाद एहसास हो कि हमने अपने लिए कई दूसरी परेशानियां खड़ी कर ली हैं और फिर हमें ताउम्र इस फैसले पर पछताना पड़े.’