बाबा, बवाल और जरूरी सवाल

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पांच अक्टूबर को बनारस में जो हुआ, उसे सबने देखा. टीवी और सोशल मीडिया के जरिये धारणा बनी कि मोदी के बनारस आने पर अब यही सब होना है. दिल्ली से लेकर दूर देस में बसे लोग बनारस की घटना पर तरह-तरह से तर्क दे रहे थे और बनारसी उन सारे तर्कों को हंसी उड़ा रहे थे. दरअसल पांच अक्टूबर को जो कुछ भी हुआ और फिर उसे जिस तरह से बताया गया, उन दोनों यानी तथ्यों व तर्कों में तालमेल का अभाव था, उसमें घालमेल जैसा ज्यादा था.

उस दिन जो भी हुआ वह पहले से तय था. अनायास जैसा कुछ नहीं था. देखते ही देखते बनारस रणक्षेत्र बन गया. हजारों की संख्या में साधु-संन्यासी बनारस की सड़कों पर उतर गए और पुलिस से टकराव हुआ. पत्थरबाजी और लाठीचार्ज हुआ. कुछ देर के लिए कर्फ्यू भी लगा रहा. बाद में बात उड़ी कि प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र में फैली यह अशांति और डेढ़ दशक बाद काशी में लगा कर्फ्यू कहीं भाजपा और संघ परिवार की नई चाल तो नहीं. कुछ यह कह रहे थे कि बनारस का बवाल मोदी की लोकप्रियता कम करने के लिए चली गई चाल है. हालांकि सच्चाई इसके पार की है. सच यही है कि बनारस के बवाल की वजह और परिणाम दूसरा ही था. इससे जो कुछ भी हासिल हुआ उसके जरिये पहला निशाना सीधे-सीधे उत्तर प्रदेश की सरकार पर साधने की गुंजाइश है, बाद में जिसका असर पूरे देश पर होगा.

बनारस साधु-संन्यासियों से पटा रहता है, लेकिन उस दिन जो कुछ भी हुआ वह इस शहर के बदलते हुए मिजाज की ओर संकेत दे रहा है. पहली बार ऐसा हुआ कि एक-दूसरे के घोर विरोधी माने जाने वाले साधु-संन्यासी एक साथ खड़े नजर आए. यह सब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की अगुवाई में निकली अन्याय प्रतिकार यात्रा में दिखा, जो कुछ दिन पहले गणेश प्रतिमा के विसर्जन को लेकर साधु-संतों पर पुलिस के लाठीचार्ज के विरोध में निकाली गई थी. अविमुक्तेश्वरानंद बनारस के श्रीविद्यामठ के प्रमुख हैं. श्रीविद्यामठ जोशीमठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद का आश्रम है. स्वरूपानंद और कांग्रेस के मधुर संबंध राम जन्मभूमि आंदोलन के समय से ही सब जानते हैं. भाजपा और विश्व हिंदू परिषद (विहिप)जैसी संस्थाएं स्वामी स्वरूपानंद को खुलेआम कांग्रेसी एजेंट कहती रही हैं. इस नाते स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद भी हमेशा से भाजपा, विहिप जैसे संगठनों के निशाने पर रहे हैं. गंगा सेवा अभियान से लेकर दूसरे तमाम अभियानों में भाजपा और संघ के लोग उनके विरोध में ही रहे हैं. हालांकि यह समीकरण उस रोज बदलता हुआ दिखा. हिंदुत्व के उभार के नाम पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में विहिप, भाजपा समेत साध्वी प्राची जैसे वे संत-संन्यासी भी आ गए, जो अविमुक्तेश्वरानंद के विरोधी रहे हैं. यह बनारस के बदलते हुए समीकरण का संकेत है.

नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र बनारस में यह सब मोदी के सांसद बनने के बाद हो रहा है लेकिन बनारसवाले जानते हैं कि यह अखिलेश सरकार के लिए नया जख्म बनने जा रहा है

इस घटना का आगे क्या असर पड़ेगा, इस पर बात करने के पहले यह जान लेना जरूरी है कि बात यहां तक पहुंची कैसे थी? हर साल की तरह इस साल भी बनारस में कुछ जगहों पर गणेश चतुर्थी का आयोजन हुआ था. बात 17 सितंबर की है. प्रतिमा विसर्जन की बारी आई तो प्रतिमाओं को गंगा की ओर ले जाने की तैयारी हो रही थी. इसके पहले हाईकोर्ट ने प्रशासन को यह आदेश दिया था कि किसी भी प्रतिमा का विसर्जन गंगा में न हो, प्रशासन इसके लिए वैकल्पिक इंतजाम करे. बनारस में प्रशासन ने राजघाट के पास एक कुंड बनवाकर इंतजाम कर दिया था. लेकिन इस पूरे मामले में काशी विद्वत परिषद ने अड़ंगा लगा दिया. परिषद ने तर्क दिया कि कुंड में प्रतिमा को विसर्जित करना शास्त्रसम्मत नहीं. प्रतिमा का विसर्जन प्रवाहमान जल में ही होना चाहिए, ठहरे हुए जल में नहीं. परिषद ने तर्क गढ़े तो पूजा समितियों को बल मिला. गणेश की प्रतिमाएं शहर के दशाश्वमेध घाट के पास पहुंचीं. उसे पुलिस ने रोका तो प्रतिमा विसर्जित करने वाले गंगा में विसर्जन को लेकर अड़ गए और बात बढ़ती चली गई. धरना प्रदर्शन शुरू हो गया. इस धरने में दो दिन गुजर गए. श्रीविद्यामठ के प्रमुख स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने आश्रम के बच्चों के साथ शामिल हो गए. वह कहते हैं, ‘मैंने एक दिन देखा, दो दिन देखा. मुझे अच्छा नहीं लगा कि गणेशजी की प्रतिमाएं सड़क पर हैं और हम लोग आराम कर रहे हैं. इसलिए मैं पहुंच गया.’

[ilink url=”http://tehelkahindi.com/is-india-being-governed-by-dictators/” style=”tick”]अविमुक्तेश्वरानंद से बातचीत..यहां पढ़ें[/ilink]

अविमुक्तेश्वरानंद वहां पहुंचे तो पुलिस से बात बढ़ी. लाठीचार्ज शुरू हुआ और बवाल मच गया. अविमुक्तेश्वरानंद समेत कई लोग घायल हुए. प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र होने पर भी मोदी ने पुलिसिया लाठीचार्ज पर कुछ नहीं बोला. इससे भाजपा कार्यकर्ता नाराज हुए. भाजपा के करीब 300 कार्यकर्ताओं ने इस्तीफा दे दिया. यह एक आश्चर्यजनक बात थी क्योंकि बनारस में यह सब जानते हैं कि भाजपा और अविमुक्तेश्वरानंद में छत्तीस का आंकड़ा रहा है. उन्हीं अविमुक्तेश्वरानंद के लिए भाजपाइयों के दिल में प्यार उपजा, जो इस घटना के कुछ दिनों पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के न आने के बाद बीएचयू के नवनिर्मित ट्रॉमा सेंटर का उद्घाटन नारियल फोड़ खुद कर आए थे. यह कहते हुए कि पीएम नहीं आ रहे हैं तो क्या गरीबों के लिए बने इस अस्पताल का उद्घाटन रुका रहेगा!

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अविमुक्तेश्वरानंद घायल हुए तो उन्होंने ऐलान किया कि नासिक कुंभ के बाद पांच अक्टूबर को बनारस में संतों का जमावड़ा होगा और अन्याय प्रतिकार यात्रा निकलेगी. प्रशासन सचेत हो गया. लाठीचार्ज के बाद पुलिस को भी लग गया कि गलत जगह पर उसने हाथ डाल दिया है और अब बवाल मचेगा. प्रशासन ने दूसरा रास्ता अपनाया. बनारस में संतों में फूट डाली, जिसकी स्वाभाविक संभावना हमेशा बनी रहती है. अविमुक्तेश्वरानंद के दो घोर विरोधी संतों को अपने पाले में किया गया. उन दोनों का संघ से गहरा जुड़ाव माना जाता है. गंगा महासभा से जुड़े स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती और विहिप के सौजन्य से शंकराचार्य बने स्वामी नरेंद्रानंद ने प्रशासन के लाठीचार्ज कार्रवाई को गैरवाजिब नहीं बताया. हालांकि दोनों की बात का कोई खास असर नहीं हुआ. इसी बीच बनारस में राज्य के डीजीपी जगमोहन यादव का आना हुआ. उनसे पूछा गया कि लाठीचार्ज की जो घटना हुई और जिसकी वजह से शहर अंदर ही अंदर जल रहा है, उस पर आप क्या कर रहे हैं. डीजीपी ने जवाब दिया, ‘जिसने लाठीचार्ज किया है, उनसे पूछिए, मैं कुछ नहीं जानता.’ डीजीपी के बयान से बात और बिगड़ गई. मामला संभालने के लिए राज्य के पर्यटन मंत्री ओमप्रकाश सिंह भी सरकार का दूत बनकर अविमुक्तेश्वरानंद से मिलने पहुंच गए. फिर शिवपाल यादव ने भी बात की लेकिन बात बनी नहीं. तब तक अन्याय प्रतिकार यात्रा निकालने का समय आ गया और देखते ही देखते नजारा बदल गया. विहिप और दूसरे हिंदूवादी संगठन जो अविमुक्तेश्वरानंद का कांग्रेसी एजेंट कहकर विरोध करते थे, वे भी यात्रा में शामिल हुए. साध्वी प्राची जैसी फायर ब्रांड नेता भी पहुंच गई. प्रदर्शन शुरू हुआ. भीड़ में संतों और समर्थकों की संख्या बढ़ी तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अविमुक्तेश्वरानंद से बात करने की कोशिश की तब स्वामीजी ने मना कर दिया और उसके बाद जो हुआ वो सबके सामने है. बात यह हो रही है कि बनारस में डेढ़ दशक बाद कर्फ्यू लगा. घटना का दूसरा पक्ष यह है कि ढाई दशक बाद कांग्रेस और भाजपा के खेमे में बंटे रहने वाले संत एक हुए. ये नरेंद्र मोदी के लिए कम और अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव के लिए ज्यादा खतरे की घंटी है. ऊपरी तौर पर यह बताया जा रहा है कि नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र बनारस में यह सब मोदी के सांसद बनने के बाद हो रहा है लेकिन बनारसवाले जानते हैं कि यह अखिलेश सरकार के लिए नया जख्म बनने जा रहा है. अविमुक्तेश्वरानंद कहते हैं, ‘लॉ एंड ऑर्डर केंद्र का नहीं, राज्य का मसला है. हमारा विरोध राज्य सरकार से है. इस बहाने बनारस में इतिहास बना, आपसी विरोध के सारे बंधन टूट गए, सनातन समाज के नाम पर सबमें एका हो गया है, इसका असर देखने को मिलेगा.

अब आगे कौन, कैसा आंदोलन करेगा, ये तो संत ही जानें लेकिन इसके संकेत मिल गए हैं. साथ ही कुछ हलको में यह संदेश चला भी गया है कि विहिप और संघ परिवार ने इस घटना के जरिये अविमुक्तेश्वरानंद का समर्थन कर एक बड़ी चाल चली है. देश में स्वामी स्वरूपानंद ही भाजपा विरोधी मुखर संत माने जाते हैं, जो इतने बड़े ओहदे यानी दो पीठों के शंकराचार्य हैं. स्वामी स्वरूपानंद का उत्तराधिकारी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ही माना जाता है. अगर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को संघ या विहिप या फिर भाजपा ने साध लिया तो फिर देश में संतों के जरिये राजनीति करने में उनके लिए राह आसान होगी. आज नहीं लेकिन एक समय के बाद भाजपा के लिए संभावनाओं के नए द्वार खुलेंगे.

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