पंजाब की राजनीति का 'गुरु' फैक्टर | Tehelka Hindi

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पंजाब की राजनीति का ‘गुरु’ फैक्टर

क्रिकेटर से नेता बने नवजोत सिंह सिद्धू राजनीति की नई पारी खेलने के लिए तैयार हैं. हालांकि, वे कौन-सी सियासी टीम चुनेंगे, इस बारे में अभी अटकलें ही लगाई जा रही हैं. किसी भी महफिल को ठहाके और शायरी से गुंजा देने वाले सिद्धूू फिलहाल खामोश हैं.

अमित सिंह 2016-09-15 , Issue 17 Volume 8
फोटो : तहलका आर्काइव

फोटो : तहलका आर्काइव

दुनिया भर के गेंदबाजों की नाक में दम करने वाले क्रिकेटर से राजनेता बने नवजोत सिंह सिद्धू राजनीति की पिच पर अपने खेल से सबको चौंका रहे हैं. अपनी कंमेंट्री, अपने हंसने के अंदाज और चुटीले संवाद के लिए मशहूर पूर्व सलामी बल्लेबाज सिद्धू का गेम प्लान विश्लेषकों की समझ में नहीं आ रहा है. 18 जुलाई को सिद्धू ने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया. इसके बाद से सिद्धू चुप हैं और अटकलों का बाजार गरम है. विश्लेषक इस इस्तीफे को अलग तरीके से देख रहे हैं तो भाजपा समेत पंजाब में सक्रिय दूसरे बड़े दल इसे अपने तरीके से देख रहे हैं. भाजपा जहां यह बता रही है कि सिद्घू ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिया है और अभी वे पार्टी में शामिल हैं तो आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सिद्धू के आप में शामिल होने की अफवाह को कमजोर नहीं होने दे रहे हैं. हाल ही में (19 अगस्त को) केजरीवाल ने इस संदर्भ में कई ट्वीट के जरिए बताया, ‘नवजोत सिद्धू के आप में शामिल होने को लेकर कई अफवाहें चल रही हैं. ये मेरी जिम्मेदारी है कि मैं अपना पक्ष सामने रखूं. इस दिग्गज क्रिकेटर के प्रति मेरे मन में बहुत सम्मान है. वे पिछले हफ्ते मुझसे मिले थे. कोई पूर्व शर्त नहीं रखी. उन्हें सोचने के लिए कुछ वक्त चाहिए. उनके इस फैसले का सम्मान होना चाहिए. वे बहुत अच्छे इंसान और क्रिकेटर हैं. मेरा सम्मान उनके प्रति कायम रहेगा भले ही वे हमारी पार्टी में शामिल हों या नहीं.’ इतना ही नहीं, सिद्धू के राज्यसभा से इस्तीफे के बाद केजरीवाल ने ट्वीट करके सिद्धू की प्रशंसा की थी. अपने ट्वीट में केजरीवाल ने लिखा, ‘लोग राज्यसभा की सीट के लिए क्या नहीं करते. लेकिन क्या कभी अपने राज्य को बचाने के लिए किसी राज्यसभा के सदस्य को इस्तीफा देते देखा था? मैं सिद्धू के साहस के लिए उनको सैल्यूट करता हूं.’ इसके अलावा कांग्रेस के तमाम नेता उन्हें पार्टी जॉइन करने का न्योता दे रहे हैं. जहां पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह ने उन्हें याद दिलाया कि सिद्धू के पिताजी भगवंत सिंह सिद्धू पटियाला जिला कांग्रेस के कार्यालय प्रभारी रह चुके हैं, वहीं हाल ही में कांग्रेस में शामिल हुए राज्य के पूर्व वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल कहते हैं कि पार्टी में सिद्धू के स्वागत के लिए वे नंगे पैर उनके पास जाने को तैयार हैं.

‘सिद्धू के लिए आप में शामिल होने का रास्ता भी आसान नहीं है. जैसे ही सिद्धू के आप में शामिल होने और पंजाब में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने की अफवाहें उड़ीं, वैसे ही पार्टी में अंदरूनी खींचतान शुरू हो गई’

राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री राजिंदर कौर भट्टल भी कहती हैं, ‘सिद्धू कांग्रेस के लिए पूरी तरह उपयुक्त हैं. उनका भाजपा में शामिल होना सिर्फ एक प्रयोग था. कांग्रेस तो उनके खून में है.’ कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला कहते हैं, ‘हम सब सिद्धू की इज्जत करते हैं. एक क्रिकेटर-कलाकार के तौर पर उनकी अपनी हैसियत है. हम भले अलग-अलग पार्टियों में रहे हों, राजनीतिक तौर पर हमारे विचार न मिलते हों, मगर मोदी ने उन्हें जिस तरह बेवकूफ बनाया और धोखा दिया, वैसा किसी के साथ भी नहीं किया जाना चाहिए. यह मेरी इच्छा है. साथ ही, मैं यह भी कहना चाहूंगा कि सिद्धू को आप या केजरीवाल से भी ज्यादा उम्मीद नहीं रखनी चाहिए.’ मजेदार बात यह है कि बोलने के लिए मशहूर सिद्धू को छोड़कर सब कुछ न कुछ बोल रहे हैं. इस पूरे मामले पर सिद्धू आखिरी बार राज्यसभा से इस्तीफा देने के बाद दिल्ली में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोले थे. उन्होंने कहा, ‘पंछी भी उड़ता है तो शाम को अपने घर वापस जाता है, चार चुनाव जीतने के बाद राज्यसभा देकर यह कहा जाता है कि सिद्धू पंजाब से दूर रहो, आखिर क्यों? मेरे लिए राष्ट्र धर्म से बड़ा कुछ भी नहीं, इसलिए पंजाब से मैं कैसे अलग हो सकता हूं, पंजाब की माटी मेरी मां है और कोई बच्चा अपनी मां से कैसे अलग हो सकता है.’ सिद्धू ने आगे कहा, ‘जब आंधी चली तब मुझे उठाया गया और जब लहर चली तब मुझे उसमें डुबोया गया, मैंने अटल जी के कहने पर चुनाव लड़ा और मोदी लहर ने मुझे डुबो दिया.’ इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद क्रिकेट कमेंट्री से लेकर कॉमेडी शो और राजनीति में भी लगातार सक्रिय सिद्धू ने पंजाब की राजनीति गर्मा दी. दिल्ली से लेकर पंजाब तक उनके आप की सदस्यता लेने की चर्चा जोरों पर रही. ऐसी अटकलें भी लगाई जा रही थीं कि आम आदमी पार्टी सिद्धू को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित कर देगी. राजनीति के जानकारों का कहना है कि आम आदमी पार्टी पंजाब में एक अदद मुख्यमंत्री पद के दावेदार की तलाश में है. आप पंजाब में अपने संगठन में कोई ऐसा चेहरा तलाश नहीं पा रही है, जिसे वह मुख्यमंत्री पद के दावेदार के तौर पर आगे कर सके. पार्टी के दो सांसद पहले से पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं. भगवंत मान का नाम लंबे समय तक चला पर पारिवारिक विवाद और दूसरे कारणों से उनका ग्राफ नीचे चला गया. जीत के लिए पार्टी सिद्धू जैसे चेहरे की तलाश में जुटी रही. SiddhuFamilyWeb बीते सालों में सिद्धू के पार्टी में शामिल होने की बात कई बार चली, पर मामला सिरे नहीं चढ़ पाया. उनकी पत्नी नवजोत कौर सिद्धू लगातार अकाली और भाजपा की आलोचना करती रहीं पर कभी आप को नहीं कोसा. उन्होंने एक बार आप की तारीफ करते हुए कहा, ‘सियासत को आम आदमी पार्टी ने नई राह दिखाई है. इस पर कई नेता और दल अब चलने की कोशिश करने लगे हैं. प्रमुख सियासी दलों को आप से राजनीति करना सीखना चाहिए.’ हालांकि इस बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं हो पाया. न तो अभी तक सिद्धू आप में शामिल हुए न तो आप की तरफ से ऐसी किसी पेशकश की सूचना मीडिया के सामने आई.

‘आम आदमी पार्टी के पास पंजाब में कोई ईमानदार छवि वाला सिख चेहरा नहीं है, जिसकी सूबे में एक अलग पहचान हो.  ऐसे में नवजोत सिद्धू से बेहतर कोई चेहरा हो नहीं सकता. वे आप के लिए तुरुप का पत्ता साबित हो सकते हैं’

विश्लेषक इस पूरे मामले को दूसरी तरह से देखते हैं. वे कहते हैं, ‘सिद्धू के लिए आप में शामिल होने का रास्ता भी आसान नहीं है. जैसे ही सिद्धू के आप में शामिल होने और पंजाब में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने की अफवाहें उड़ीं, वैसे ही राज्य में आप के लिए काम करने वाले स्थानीय नेताओं के कान खड़े हो गए. पार्टी में अंदरूनी खींचतान शुरू हो गई. इन नेताओं के भारी दबाव के चलते सिद्धू के साथ अरविंद केजरीवाल के साथ हुई कई गोपनीय बैठकों का नतीजा सिफर रहा.’ आम आदमी पार्टी पर नजर रखने वाले जानकार इसकी वजह आप का संविधान बताते हैं. गौरतलब है कि आप के संविधान के मुताबिक परिवार का एक ही व्यक्ति पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ सकता है अथवा कोई पद संभाल सकता है. उनका संविधान यह भी कहता है कि किसी सजायाफ्ता व्यक्ति को पार्टी टिकट नहीं देगी. सिद्धू के साथ ये दोनों दिक्कतें हैं. एक तो वे रोड रेज के एक मामले में गैर-इरादतन हत्या के दोषी साबित हो चुके हैं. यह मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में है. दूसरे, वह अपने साथ-साथ पत्नी के लिए भी विधानसभा का टिकट चाहते हैं. अगर पत्नी को टिकट मिले तो आप के संविधान के मुताबिक सिद्धू को टिकट नहीं मिल पाएगा. ऐसे में जब विधानसभा चुनाव लड़ने का टिकट ही नहीं मिल सकता तो मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवारी अपने आप खत्म हो जाती है. हालांकि आप का एक धड़ा यह बात जोर-शोर से प्रचारित कर रहा है कि सिद्धू की मुख्यमंत्री बनने की प्रबल इच्छा के चलते ही पार्टी के साथ उनकी हालिया बैठक निष्फल हुई है तो दूसरी तरफ पार्टी में एक सोच यह भी है कि अगर उसे पंजाब में सत्ता हासिल करनी है तो एक ऐसे सिख चेहरे की जरूरत है जो युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय हो. अन्ना आंदोलन में सक्रिय रहे और अमृतसर के सामाजिक कार्यकर्ता हरजिंदर सिंह कहते हैं, ‘पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू और आम आदमी पार्टी दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है. आम आदमी पार्टी के पास अभी पंजाब में कोई ऐसा चेहरा नहीं है जिसकी पूरे सूबे में अपनी एक अलग पहचान हो या जिसकी युवाओं के बीच भी अपील हो. वाक्पटुता और प्रभावी भाषण शैली वाला हो और सबसे बड़ी बात ईमानदार छवि वाला हो. साथ में सिख भी हो. ऐसे में नवजोत सिद्धू से बेहतर कोई चेहरा हो नहीं सकता. अगर वे आप की तरफ से बैटिंग करते हैं तो पार्टी की कई समस्याएं दूर हो सकती हैं. वे आप के लिए पंजाब में तुरुप का पत्ता साबित हो सकते हैं. दूसरी तरफ इतनी खूबियां होने के बावजूद भाजपा ने जिस तरह का व्यवहार सिद्धू के साथ किया है, उनके लिए आप एक बेहतर विकल्प हो सकता है.’ गौरतलब है कि भाजपा से सिद्धू की नाराजगी तब खुलकर सामने आई जब 2014 के लोकसभा चुनाव में उनका टिकट काट दिया गया था. हालांकि पार्टी से कड़वाहट की खबरें पहले से आने लगी थीं. दरअसल कभी क्रिकेट की दुनिया में अपनी बल्लेबाजी से लोगों के दिलों पर छा जाने वाले सिद्धू जब सियासत में आए तो यहां भी उनका प्रदर्शन शानदार ही रहा. अमृतसर से 2004 से 2014 के बीच लगातार सांसद रहे. वे भाजपा के ऐसे सांसद रहे हैं जो अपने बयानों और जुमलों के कारण हमेशा विरोधियों पर भारी पड़ते रहे हैं. उनके बारे में एक कहानी यह भी है कि अमृतसर में कांग्रेस ने उन्हें बाहरी कहा तो पटियाला के मूल निवासी सिद्धू ने पटियाला न जाने की सौंगध उठा ली. उसके बाद वे पटियाला में दिखे भी नहीं. अब तो घर भी अमृतसर में ही बना लिया है. उसके बाद पत्नी भी अमृतसर से ही पंजाब विधानसभा की विधायक चुनी गईं, लेकिन यहीं से उनका अकाली दल से विवाद शुरू हो गया क्योंकि स्थानीय स्तर पर अकाली नेता नवजोत कौर से खुश नहीं थे. सिद्धू परिवार और भाजपा के बीच यहीं से दरार बढ़नी शुरू हुई. बाद में 2014 में जब उन्हें अरुण जेटली के लिए अमृतसर सीट खाली करने को कहा गया तो भाजपा से उनके मोहभंग की शुरुआत हो गई.

सिद्धू भाजपा में बने रहने के लिए मोल-भाव करना चाहते हैं, लेकिन अकालियों के साथ उनकी पुरानी दुश्मनी की वजह से यह स्पष्ट था कि भाजपा उन्हें पंजाब के मामलों में शामिल नहीं करेगी

हालांकि सिद्धू ने विरोध को झंडा बुलंद नहीं किया, लेकिन साफ दिखा कि वे खुश नहीं थे. वे जेटली के चुनाव प्रचार से गायब रहे. हालांकि इस चुनाव में कांग्रेस अपने दिग्गज कैप्टन अमरिंदर सिंह को ले आई और जेटली चुनाव बुरी तरह हार गए. सिद्धू ने उसके बाद भी अमृतसर में अधिक दिलचस्पी नहीं ली. लेकिन उनकी पत्नी नवजोत कौर ने अकाली सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है. इसके अलावा सिद्धू इससे पहले भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल थे. वे नितिन गडकरी की टीम में पार्टी के राष्ट्रीय सचिव थे. लेकिन अमित शाह की टीम में उन्हें कोई जगह नहीं दी गई. उनके बजाय अमृतसर के ही तरुण चुघ को पार्टी का राष्ट्रीय सचिव बना दिया गया जो राजनीति में सिद्धू से काफी जूनियर हैं. हालांकि काफी सोच-विचार के बाद और विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए सिद्धू की नाराजगी दूर करने के लिए भाजपा ने तीन महीने पहले ही उन्हें राज्यसभा भेजा था. इस पूरे मसले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद हस्तक्षेप किया. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को भले ही सिद्धू ने राज्यसभा की सदस्यता और केंद्र में मंत्री पद के लिए मना कर दिया था, लेकिन जब प्रधानमंत्री मोदी ने सिद्धू को यह बताया कि सरकार उन्हें राष्ट्रपति के कोटे से राज्यसभा भेज रही है तो सिद्धू उन्हें मना नहीं कर पाए. यह बात सिद्धू ने भी राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने के बाद स्वीकार की कि वे प्रधानमंत्री के आदेश पर राज्यसभा जाने को तैयार हुए थे. हालांकि मोदी ने भले ही सिद्धू को राज्यसभा भेजकर केंद्र में मंत्री बनाने की बात सीधे तौर पर नहीं कही हो, लेकिन जानकारों की मानें तो सिद्धू को इस बात की उम्मीद थी कि पांच जुलाई को हुए मंत्रिमंडल विस्तार में उन्हें मोदी सरकार में जगह मिलेगी. इस बात की चर्चा राजनीतिक गलियारे में भी थी. लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. मंत्रिमंडल विस्तार के दो हफ्ते के अंदर राज्यसभा से सिद्धू के इस्तीफे को उन्हें केंद्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल नहीं किए जाने की निराशा से भी जोड़कर देखा जा रहा है. SiddhuBJPWeb वैसे जब सिद्धू ने राज्यसभा से इस्तीफा दिया था तब भाजपा की सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया था. हालांकि इसके बाद उनकी पत्नी नवजोत कौर सिद्धू ने बयान जारी किया था. उन्होंने कहा था, ‘राज्यसभा से सिद्धू के इस्तीफे को भाजपा से इस्तीफा भी मान लिया जाना चाहिए.’ हालांकि बाद में वे इससे थोड़ा हटती नजर आईं. एक तरफ वे यह संकेत देती रहीं कि वे भाजपा छोड़ सकती हैं. साथ ही वे भाजपा की तिंरगा यात्राओं में भी शामिल रहीं. सूत्रों का कहना है कि इस दौरान कई बार उनकी मुलाकात पंजाब भाजपा के अध्यक्ष विजय सांपला से भी हुई है. सापंला ने भी इस दौरान कहा कि सिद्धू ने भाजपा नहीं छोड़ी है इसलिए उनसे पार्टी में लौटने के लिए कहने का कोई मतलब ही नहीं है. जबकि, सिद्धू ने पूरे मामले पर चुप्पी साधे रखी. ‘तहलका’ ने भी जब इस मसले पर पंजाब भाजपा के प्रवक्ता दीवान अमित अरोड़ा से बातचीत की तो उन्होंने बताया, ‘नवजोत सिंह सिद्धू ने सिर्फ राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिया है, पार्टी की सदस्यता से नहीं. वे अब भी पंजाब भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में शामिल हैं और हमारे आदरणीय नेता हैं. आगामी विधानसभा चुनावों में उनकी भूमिका क्या रहेगी इसका जवाब भविष्य में आपको मिल जाएगा.’ जब उनसे यह पूछा गया कि राज्यसभा से इस्तीफे के बाद उनकी पत्नी नवजोत कौर ने कहा था कि राज्यसभा के इस्तीफे को ही पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा समझा जाए तो अरोड़ा ने कहा, ‘पार्टी का शीर्ष नेतृत्व सिद्धू से बातचीत कर रहा है. वैसे भी कई बार पति-पत्नी अलग-अलग पार्टी में होते हैं. ऐसे में किसी की पत्नी के बयान को पति का इस्तीफा कैसे मान लिया जाए?’ हालांकि इससे यह संकेत मिला कि सिद्धू भी भाजपा में बने रहने के लिए मोल-भाव करना चाहते हैं. लेकिन अकालियों के साथ उनकी पुरानी दुश्मनी की वजह से यह स्पष्ट था कि भाजपा उन्हें पंजाब के मामलों में शामिल नहीं करेगी. सिद्धू यही नहीं चाहते हैं. यह बात उन्होंने राज्यसभा की सदस्यता छोड़ते वक्त कही भी थी. जहां तक बात सिद्धू को पंजाब की राजनीति से दूर रखे जाने की है तो इसका सीधा-सा कारण है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व किसी भी कीमत पर अकाली दल के साथ गठबंधन रखने के पक्ष में है. जबकि सिद्धू और पत्नी इसके खिलाफ हैं. नवजोत कौर ने यहां तक कह रखा है कि अगर 2017 के चुनाव में अकाली दल से गठबंधन बना रहा तो वे भाजपा से चुनाव नहीं लड़ेंगी. अमृतसर के भाजपा कार्यकर्ता और सिद्धू के समर्थक बलविंदर सिंह कहते हैं, ‘पंजाब में पिछले नौ साल से भाजपा-अकाली की सरकार है. लेकिन इस कार्यकाल के दौरान जनता में अकाली दल की छवि बहुत ज्यादा खराब हुई है. भाजपा को लेकर लोगों में उस तरह का गुस्सा नहीं है. ऐसे में अगर भाजपा अकेले चुनावी मैदान में उतरती है तो उसे नुकसान होने के बजाय फायदा ही होगा. 2012 में भाजपा को गठबंधन में सिर्फ 23 सीटें मिली थीं जिनमें से पार्टी को 12 पर जीत हासिल हुई. अब यदि भाजपा नवजोत सिंह सिद्धू को अपना मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित करके राज्य की सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़े तो वह अपने बूते पर ही पहले से अधिक सीटें जीत सकती है. इससे कांग्रेस और आप दोनों को भारी नुकसान होगा.’ जानकारों का कहना है कि पंजाब भाजपा में भी एक ऐसा धड़ा है जो यह मानता है कि अगर भाजपा अकाली दल से अलग होकर चुनाव लड़े तो न सिर्फ कांग्रेस का खेल खराब हो सकता है बल्कि आप के पंजाब मिशन को झटका लग सकता है. इसका मानना है कि अगर सिद्धू के नेतृत्व में भाजपा चुनाव लड़ती है तो पहली बार पंजाब में चुनावी मुकाबला चतुष्कोणीय हो जाएगा बल्कि संभव है कि किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत ही न मिले. ऐसे में भाजपा के लिए नए विकल्प खुलने की संभावना बन जाती है और इसी वजह से सिद्धू अभी तक आप में नहीं गए हैं. दोस्तों के बीच शेरी नाम से मशहूर सिद्धू का जीवन भी कम दिलचस्प नहीं हैं. उनकी जिंदगी में जहां जीत और हार के रंग हैं तो वहीं जेल का अंधेरा भी शामिल है. उन्होंने क्रिकेट में भले ही बल्लेबाजी का जलवा दिखाया हो लेकिन निजी जीवन में वे ऑल राउंडर है. अभी एक तरफ वे क्रिकेट की कमेंट्री करते हैं तो दूसरी तरफ द कपिल शर्मा शो में जज की भूमिका में आते हैं. राजनीति की पिच पर सफल हैं तो बिग बॉस जैसे टीवी सीरियल में भी हिस्सा ले चुके हैं. उनके हंसने के अंदाज, उनकी शायरी की चर्चा पूरे देश में होती हैं. इसके लिए एक शब्द सिद्धूइज्म बना है.

‘पंजाब में बीते नौ साल से भाजपा-अकाली सरकार है लेकिन इस कार्यकाल के दौरान जनता में अकाली दल की छवि बहुत खराब हुई है.  ऐसे में अगर भाजपा अकेले चुनावों में उतरती है तो उसे नुकसान के बजाय फायदा ही होगा’

पंजाब के पटियाला में 20 अक्टूबर, 1963 को एक जाट सिख परिवार में नवजोत सिंह सिद्धू का जन्म हुआ था. सिद्धू को पहली बार अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में हाथ आजमाने का मौका उस वक्त मिला जब 1983-84 में वेस्टइंडीज के खिलाफ उन्हें टीम इंडिया में शामिल किया गया. लेकिन अपने पहले टेस्ट मैच में सिद्धू महज 19 रन पर आउट हो गए. जिसके बाद उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया, लेकिन घरेलू क्रिकेट में शानदार प्रदर्शन के बूते उन्होंने एक बार फिर राष्ट्रीय टीम में वापसी की. और इस बार सिद्धू के बल्ले ने अपना जलवा दिखाया. 1987 के क्रिकेट वर्ल्ड कप में सिद्धू ने पांच मैचों में चार अर्धशतक जमाए थे. स्पिनरों की गेंद पर छक्कों की बरसात करने वाले सिद्धू क्रिकेट प्रेमियों के बीच सिक्सर सिद्धू के नाम से भी मशहूर हुए. जनवरी 1999 में अपना आखिरी टेस्ट खेलने वाले सिद्धू के खाते में 51 टेस्ट और 136 वनडे दर्ज हैं. सिद्धू ने वनडे में छह शतक और 33 अर्धशतक जड़ते हुए 37 की औसत से 4,413 रन बनाए हैं. इसके बाद वे क्रिकेट की कमेंट्री करने लगे. इस दौरान वे अपने खास अंदाज, शेरो शायरी और चुटीले जुमलों की वजह से भी काफी मशहूर हुए. SiddhuWEB क्रिकेट के मैदान से शुरू हुआ उनका ये सफर 2004 में राजनीति के मैदान तक पहुंच गया जब वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. अमृतसर से पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ रहे सिद्धू ने कांग्रेस के आर एल भाटिया को 90 हजार वोटों से धूल चटा दी थी. कांग्रेस सांसद रहे आर एल भाटिया ने ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद भी कांग्रेस के टिकट पर अमृतसर से जीत दर्ज की थी और यही वजह थी कि अमृतसर सीट से चुनाव जीतने के बाद बीजेपी और पंजाब की राजनीति में सिद्धू का कद अचानक काफी बड़ा हो गया था. हालांकि साल 2006 में उन्हें उस वक्त बड़ा झटका लगा जब हरियाणा और पंजाब हाई कोर्ट ने हत्या के एक केस में उन्हें सजा सुना दी. दरअसल यह पूरा मामला साल 1988 का है जब पटियाला में गुरुनाम सिंह नाम के शख्स के साथ सिद्धू का झगड़ा हुआ था. पुलिस ने इस मामले में सिद्धू के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या का केस दर्ज किया था. इस केस में निचली अदालत से तो सिद्धू को राहत मिल गई थी लेकिन दिसंबर 2006 में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने सिद्धू को दोषी करार देते हुए उन्हें तीन साल कैद और एक लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी जिसके बाद सिद्धू को कुछ दिन जेल की कालकोठरी में गुजारने पड़े थे. इस दौरान उन्होंने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा भी दे दिया. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें राहत देते हुए न सिर्फ हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी बल्कि उन्हें जमानत देकर चुनाव लड़ने की अनुमति भी दे दी. साल 2007 के उपचुनाव में वे एक बार फिर अमृतसर से चुनाव जीत गए. बाद में वे 2009 का आम चुनाव भी जीतने में सफल रहे. हालांकि 2014 के आम चुनाव में भाजपा ने मोदी के दुलारे समझे जाने वाले सिद्धू का टिकट अमृतसर से काटकर अरुण जेटली को दे दिया. वैसे राजनीति हो या क्रिकेट, सिद्धू छक्के मारने के लिए जाने जाते हैं. इस बार भी उन्होंने गेंद हवा में उछाल दी है. पर गेंद सीमा रेखा के बाहर जाएगी या वे कैच आउट होंगे यह देखना दिलचस्प होगा.

(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 8 Issue 17, Dated 15 September 2016)

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