ग्वालियर : कागजों में बसा सपनों का शहर

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वहीं इस पूरी अवधि में अगर कहीं वृद्धि हुई तो वह बस नए शहर को बसाने के क्षेत्रफल में, जो 30,000 हेक्टेयर जमीन से बढ़कर 78,000 हेक्टेयर हो गया और पुरानी जमीन पर कोई विकास कार्य नहीं हुआ. इस कारण देवसहायम इस योजना को ही ‘जालसाजी’ करार देते हैं. (देखें बॉक्स)
ऐसा भी सुनने में आता है कि कुछ सालों पहले एनसीआरपीबी ग्वालियर से मैग्नेट सिटी का दर्जा वापस लेने पर विचार कर रहा था. कारण यहां विकास की गति का धीमा होना था. ग्वालियर जिला कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. दर्शन सिंह बताते हैं, ‘ग्वालियर से काउंटर मैग्नेट सिटी का दर्जा छिनने की बात चली थी, लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया के हस्तक्षेप से दर्जा बचा था. वे केंद्र में मंत्री थे. माधवराव सिंधिया के प्रयासों से ग्वालियर को काउंटर मैग्नेट सिटी का दर्जा मिला था. उसी को बचाने के लिए उनके पुत्र ने प्रयास किए.’ इस प्रकरण में वे मध्य प्रदेश सरकार पर आरोप लगाते हुए कहते हैं, ‘काउंटर मैग्नेट सिटी को प्रदेश की भाजपा सरकार कहीं और स्थानांतरित करना चाहती थी, जिसके कारण यहां पर ऐसे कई किसान बर्बाद हो जाते. जिनकी जमीनें इस योजना की भेंट चढ़ चुकी हैं. जो भविष्य में होने वाले विकास से उम्मीदें लगाए बैठे हैं. वहीं एक अन्य कारण यह भी है कि यह नया शहर माधवराव सिंधिया के नाम पर प्रस्तावित है और भाजपा की नीति है कि जिन नामों में कांग्रेस जिंदा है उन नामों को खत्म किया जाए. वरना अगर इनकी नीयत में खोट नहीं होता तो नगर निगम और प्रदेश में दशक भर से इनकी सरकार है और अब केंद्र में भी है. ये काफी कुछ कर सकते थे.’ आरटीआई र्कायकर्ता राकेश सिंह कुशवाह विकास की इस धीमी रफ्तार के लिए भ्रष्टाचार को जिम्मेदार ठहराते हैं. वे कहते हैं, ‘सड़क निर्माण में यहां करोड़ों का घोटाला हुआ है. जो सड़क 78 लाख रुपये में बननी थी, उसमें छह करोड़ रुपये फूंक दिए गए. मैंने इसका खुलासा किया तो मुझे जान से मारने की धमकी दी गई. यह तो महज एक घोटाले का पर्दाफाश हुआ है. अगर जांच कराई जाए तो सामने आएगा कि दशकों से यह कवायद कुछ लोगों के लिए अपनी जेबें भरने का माध्यम बनी रही है. विकास बस इसलिए नहीं हुआ कि पैसा जहां लगना था वहां नहीं लगा. अगर साडा से सूचना के अधिकार के तहत जानकारी भी मांगी जाए तो ये लोग जानकारी तक नहीं देते. इस तरह शहर कैसे बसेगा?’

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न बची जमीन  न हुआ विकास

नया शहर बसाने के लिए शुरुआती दौर में 36 गांवों की जमीन अधिगृहीत व अधिसूचित की गई थी. जिन लोगों की जमीन अधिगृहीत की गई थी, उनमें से कुछ को अब तक मुआवजा नहीं मिला है. वहीं अधिसूचित जमीन के संबंध में कई ऐसी शर्तें थोप दी गई हैं जिससे किसानों में रोष है

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शुरुआती दौर में जिस 30 हजार हेक्टेयर जमीन पर काउंटर मैग्नेट सिटी बनाने की बात की गई थी, उसमें से सरकारी जमीन महज 6500 हेक्टेयर थी. 14,500 हेक्टेयर वनक्षेत्र था, बाकी 9000 हेक्टेयर जमीन क्षेत्र से लगे 36 गांवों की थी, जिनका मालिकाना हक ग्रामीणों के पास था. वे इस जमीन पर खेती करते थे. इसमें से कुछ जमीन का सरकार ने अधिग्रहण कर लिया और सड़कें बिछा दीं, बाकी जमीन को अधिसूचित कर दिया गया. जो जमीन अधिसूचित की गई, उस जमीन को किसान बिना साडा की अनुमति लिए बेच नहीं सकते हैं. वहीं ग्रामीणों के अनुसार कुछ जमीन बंधक भी बना ली गई है. यह जमीन साडा की अनुमति के बगैर न तो बेची जा सकती है, न इस पर बैंक कर्ज देता है.
पंजाबीपुरा गांव के निवासी कुलजीत सिंह बताते हैं, ‘हमारी 650 बीघा जमीन बंधक है. सरकारी कागजात में हमारे नाम हैं पर लिखा आता है कि साडा की संपत्ति है. न उसे बेच सकते हैं, न कर्ज ले सकते हैं. बेचना भी है तो साडा की अनुमति लो पर वह अनुमति देता नहीं है, चक्कर लगवाता है. जमीन खरीदने का कोई इच्छुक उनसे पूछताछ करने जाए तो उसे कह दिया जाता है कि ले लो, जब हम चाहेंगे छीन लेंगे.’ एक अन्य ग्रामीण गुलजार सिंह कहते हैं, ‘जमीन हमारे पास है. हम खेती कर रहे हैं. पर मालिक तो एक तरह से वही हैं. सरकारी कामों में जमीनी कागजात मान्य नहीं होते. खाद तक नहीं मिलता. खेती-किसानी का सामान छूट या लोन पर लेने का भी लाभ नहीं मिलता. 36 गांवों को यहां ग्रहण लग गया है. अपनी ही जमीन में मकान बनाया तो नोटिस थमा दिया कि साडा से एनओसी ली या नहीं.’ खेरिया के निवासी रामनरेश सिंह यादव की भी 20 बीघा जमीन पर साडा की नजर है. उनकी जमीन बंधक नहीं है पर फिर भी वह बेच नहीं सकते. वे बताते हैं, ‘साडा का एक मास्टर प्लान है. हर क्षेत्र एक तय गतिविधि के लिए आरक्षित है. आप वहां उसके अतिरिक्त कुछ और नहीं कर सकते. मान लीजिए जो क्षेत्र शिक्षा के लिए आरक्षित है, वहां आप स्कूल-काॅलेज ही खोल सकते हैं. बेचना चाहें तो ऐसे व्यक्ति को ही बेच सकते हैं जो वहां स्कूल-काॅलेज खोले या फिर किसानी करे.’ पर एमजी देवसहायम कहते हैं, ‘ऐसा तो कोई कानून नहीं है कि आप किसी जमीन का अधिग्रहण किए बिना ही उसके संबंध में गाइडलाइन जारी कर दें. अगर ऐसा हो रहा है तो पूरी तरह से वहां के किसानों के अधिकारों पर डाका डाला जा रहा है.’

वहीं जिन लोगों की जमीन का अधिग्रहण किया गया है उनकी शिकायत है कि उन्हें अब तक उनकी जमीन का पूरा मुआवजा तक नहीं मिला. भयपुरा गांव के निवासी करण सिंह कुशवाह का कहना है, ‘क्षेत्र में सड़क डालने के लिए हमारी छह बीघा जमीन का अधिग्रहण किया गया था. 59,000 रुपये बीघा के हिसाब से हमारा भुगतान होना था लेकिन हमें 50,000 रुपये बीघा का भुगतान किया और बाकी का भुगतान बाद में करने का आश्वासन दिया. जो अब तक नहीं हुआ है.’
खेरिया के बेताल सिंह यादव की कुलैथ में दस बीघा जमीन है. इसका दस साल पहले अधिग्रहण कर लिया गया और उन्हें 62,000 रुपये बीघा के हिसाब से चेक भेज दिया गया. इस कीमत पर उन्होंने अपनी जमीन देने से इनकार कर दिया. बाद में उन्हें ढाई लाख रुपये बीघा का चेक दिया गया. उन्होंने वह भी लेने से इनकार कर दिया. वर्तमान में वे मुकदमा लड़ रहे हैं. वे बताते हैं, ‘जबरन जमीन पर कब्जा किया जा रहा है. कह रहे हैं कि प्लॉट काटेंगे पर हम नहीं देंगे. उन्होंने हमारी जमीन के कागजों में हमारा नाम हटाकर अपना नाम चढ़ा लिया है. ढाई लाख रुपये बीघा के हिसाब से चेक हमें भेज दिए थे. इस रेट में तो कोई उस जमीन पर खड़ा भी नहीं होने देगा. आज 15-16 लाख रुपये बीघा कीमत है. वैसे तो ये लोग दोगुना मुआवजा देने की बात करते हैं. हम तो कहते हैं, गाइडलाइन का ही दे दो.’ कुलजीत कहते हैं, ‘विकास नहीं हो पा रहा तो हमारी जमीन क्यों ले रखी है, इसे हमें वापस करो.’ वहीं भयपुरा गांव के रहने वाले गुरुनाथ सिंह की व्यथा यह है कि उन्हें बिना नोटिस दिए ही साडा ने उनकी जमीन के कागजात में अपना नाम चढ़ा लिया.

‘किसान मरे नहीं तो क्या करे, खड़ी फसल मौसम से बर्बाद हो जाती है और सरकारें नए-नए कानूनों की गाज उन पर गिराती जाती हैं’

साडा अध्यक्ष राकेश जादौन मुआवजा न मिलने की बात से इनकार करते हैं. वे कहते हैं, ‘अधिग्रहण और अधिसूचना दो अलग मामले हैं. जिनकी जमीन अधिगृहीत हुई है, हम उन सबको मुआवजा दे चुके है. अगर कोई अपवाद है तो वो हमारे पास आएं. जहां तक जमीनों को अधिसूचित करने का सवाल है तो यह विभिन्न परियोजनाओं को ध्यान में रखकर किया गया है. जब तक हम उनकी जमीन का अधिग्रहण नहीं करेंगे, वे खेती करते रहें. बस उन्हें बेचने के संबंध में कुछ बाध्यताएं जरूर लगाई हैं.’ लेकिन आरटीआई कार्यकर्ता राकेश सिंह कुशवाह दावा करते हैं, ‘मुआवजे के नाम पर फर्जीवाड़ा हुआ है. जिनकी जमीनें ली गईं, उन्हें तो मुआवजा मिला ही नहीं बल्कि उनके नाम के फर्जी दस्तावेज बनाकर अपने चहेतों को मुआवजे की राशि के चेक थमा दिए गए हैं.’
ग्रामीण बताते हैं कि बीस सालों में यहां कोई विकास नहीं हुआ, उल्टा इन बाध्यताओं के कारण वे लोग पिछड़ गए हैं. इससे उनके सामने एक नई ही प्रकार की समस्या खड़ी हो गई है. उनके बच्चों के रिश्ते नहीं हो पा रहे हैं. गुलजार सिंह बताते हैं, ‘पानी, बिजली और मौसम की मार के कारण फसल हो नहीं रही. साडा जमीन छीन लेगा तो हमारे पास बचा क्या? तो कोई क्यों तय करेगा रिश्ता?’ कुलजीत कहते हैं, ‘ग्रामीण जमीन बेचता है तब उसके घर में शहनाई बजती है. वो भी बेच नहीं पा रहा. किसान क्रेडिट कार्ड तक नहीं बन रहे.’
इसलिए ग्रामीणों का कहना है कि काउंटर मैग्नेट सिटी में जो जमीन सरकार की है पहले उस पर तो विकास करो, तब हमारी जमीन पर नजर गड़ाओ. बेताल कहते हैं, ‘पहले बनाते-बनाते आगे तो बढ़ो, अगर कमी पड़े तो किसानों से जमीन लो. वहां कुछ हुआ नहीं है, तब तक किसानों को परेशान कर रहे हो.’
वहीं इस पूरी कवायद ने मैग्नेट सिटी के दायरे में आ रहे सभी गांवों में जमीन के दाम बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं. जिगसौली गांव की जमीन गाइडलाइन में 12 लाख रुपये बीघा है. वहीं उससे जुड़ा खेरिया गांव जो नगर निगम के दायरे में आता है, वहां जमीन की कीमत साठ लाख रुपये बीघा है. रामनरेश यादव कहते हैं, ‘खेत से खेत लगे हुए हैं, तब भी इतना अंतर. क्योंकि जिगसौली पर साडा का ग्रहण जो लगा है. जमीन की कीमत इतनी कम हो गई है कि बेचने का फायदा ही नहीं दिखता.’ वहीं पंजाबीपुरा के ग्रामीणों का कहना है, ‘अगर यह परियोजना यहां से हट जाए तो हमारी जमीनें करोड़ों की हों. तीन किलोमीटर की दूरी पर जमीन डेढ़ करोड़ रुपये बीघा है और हमारे यहां महज 15 लाख रुपये एक बीघा की कीमत है. मुआवजा अगर गाइडलाइन का दोगुना भी देते हैं तब भी हम नुकसान मंे ही रहेंगे.’ एक अन्य ग्रामीण कुलवंत सिंह कहते हैं, ‘हम तो चाहते हैं कि ये सब बंद हो. ये परियोजना यहां से हटे तो विकास के नाम पर हमारी बलि चढ़ना बंद हो.’ कुलजीत कहते हैं, ‘साडा हटेगा तो विकास जल्दी होगा क्योंकि यहां जलस्तर अच्छा है. साडा ने यहां के विकास की संभावनाओं का कत्ल कर दिया है और खुद विकास करने में अक्षम साबित हुआ है.’
बेताल कहते हैं, ‘पहले हम खेती में बहुत बचत कर लेते थे और अब हाल ये है कि खेती तो कर पा रहे हैं पर एक रुपया भी नहीं बचा पा रहे. उल्टा कर्जदार बन रहे हैं.’ जाते-जाते करण हमें रोककर पूछते हैं, ‘किसान मर रहे हैं, खुदकुशी कर रहे हैं, उन्हें कुछ तो दिक्कत होगी जो मर रहे हैं? किसान मरे नहीं तो क्या करे, खड़ी फसल मौसम से बर्बाद हो जाती है और सरकारें उन पर नए-नए कानूनों की गाज गिराती जाती हैं.’ [/symple_box]

वहीं प्राइवेट बिल्डर भी यहां निवेश करके खासे नुकसान में रहे हैं. यही कारण रहा है कि उन्होंने यहां निर्माण कार्य पूरी तरह रोक दिया. 107 एकड़ में फैली ‘सहारा सिटी’ और 375 एकड़ में फैली ‘मंत्री सिटी’ के नाममात्र के बने ढांचे में सिवा सुरक्षा गार्ड के कोई नहीं रहता. वहीं क्षेत्र को विकसित देखने की चाह में अपनी जमीन साडा को देने वाले ग्रामीण बताते हैं कि उन्हें बोला गया था कि एक दूसरा नोएडा यहां भी बसेगा. पानी-सड़क-बिजली-शिक्षा-रोजगार घर बैठे मिलेगा. यही सोचकर उन्होंने अपनी जमीन साडा को दे दी. सोचा कि जब शहर बसेगा तो गांववालों को भी लाभ होगा. पर आज सालों बीत गए लेकिन कुछ नहीं हुआ, उल्टा उनकी जमीन उनसेे छिन गई और अब तक पूरा मुआवजा भी नहीं मिला है. खेरिया निवासी गुप्त सिंह यादव कहते हैं, ‘जमीन अधिग्रहण कर सड़कें बना दी गईं, उसके बाद से यहां कोई विकास कार्य नहीं हुआ. बीस साल से सुन रहे हैं कि यहां शहर बसेगा पर लगता नहीं कि अगले बीस-तीस साल भी यहां कुछ होना है.’ क्षेत्र में लगने वाले तिघरा थाना में पदस्थ काॅन्स्टेबल त्रिभुवन सिंह बताते हैं, ‘इस जंगल में कौन रहने आएगा! कम से कम बीस-पच्चीस साल तो कोई उम्मीद ही छोड़ दो. इसी रफ्तार से चले तो वो भी कम हैं.’ इस सबके बीच एनसीआरपीबी की कार्यशैली पर भी प्रश्न उठते हैं. वह इस योजना को दिल्ली में होने वाले पलायन को रोकने के उद्देश्य से लाया था. लेकिन दिल्ली की तरफ लोगों का रोजगार और शिक्षा के लिए पलायन लगातार बढ़ता जा रहा है. काउंटर मैग्नेट सिटी के लिए जो शहर चुने गए थे, वे इस पलायन को खुद में समेटने में नाकाम रहे हैं. सवाल उठता है कि एनसीआरपीबी इन शहरों को फंड तो लगातार जारी करता रहा है पर क्या ये शहर अपने उद्देश्य में सफल हो सके. इसके उलट वह कई और नए शहरों को काउंटर मैग्नेट सिटी का दर्जा बांटे जा रहा है.
बहरहाल इस पूरी कवायद में यह तो तय है कि सरकारें आती हैं, योजनाएं लाती हैं. सरकारें बदल जाती हैं, योजनाएं ठप हो जाती हैं. हर योजना सुनहरे सपने दिखाती है लेकिन वे सपने कभी जमीनी धरातल पर नहीं उतर पाते. नेता आश्वासन देते रहते हैं और नौकरशाही योजनाओं में पलीता लगाती रहती है. सपने आम जनता के टूटते हैं जो इन योजनाओं की सफलता से अपने लिए कुछ उम्मीद पाल लेती है. काउंटर मैग्नेट सिटी की तरह ही अब स्मार्ट सिटी का शिगूफा छेड़ा गया है, देखना रोचक होगा कि यह नई कवायद क्या करवट लेती है. जिस तरह आज काउंटर मैग्नेट सिटी के विकास की धीमी रफ्तार पर राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप मढ़ रहे हैं, संभव है स्मार्ट सिटी के मामले में भी आने वाले सालों में हमें यही देखने को मिले. ग्वालियर भी स्मार्ट सिटी की इस अंधी दौड़ में शामिल है, वह देश की वैकल्पिक राजधानी तो नहीं बन सका, अब स्मार्ट सिटी बनाने का सपना उसे दिखाया जा रहा है. इस सपने का हश्र भी काउंटर मैग्नेट सिटी के पुराने सपने की तरह हो, तो कोई आश्चर्य नहीं.