आग का ‘झरिया’ | Tehelka Hindi

झारखंड A- A+

आग का ‘झरिया’

कोयले की खदानों में लगी आग ने झरिया को विनाश के मुहाने पर खड़ा कर दिया है. 2016 आग लगने की इस घटना का शताब्दी वर्ष है. 1916 में लगी आग आज तक बुझाई नहीं जा सकी है. इससे तमाम लोग जहां अपनी जमीन छोड़ने पर मजबूर हुए वहीं जो अब भी रह रहे हैं वे घुटन भरी जिंदगी जीने को मजबूर हैं.

निराला 2016-05-15 , Issue 9 Volume 8
DSC_0065WEB

घनुडीह के इस इलाके को कभी झरिया का का हृदयस्थल भी कहा जाता था. अब वह लगभग खत्म हो चुका है, वहां बसने वाली बड़ी आबादी अपनी जड़ों से उखड़ चुकी है या कहें उन्हें उखाड़ा जा चुका है. सब लोग कहीं और बस गए या बसाए जा चुके हैं

धधकते अंगारों पर चलने की कला सदियों से दुनिया को आश्चर्यचकित और रोमांचित करती रही है. झारखंड के अनेक हिस्सों में यह कला आज भी जीवित है और लोगों की मान्यता है कि इसे वे लोग ही कर सकते हैं जिन्हें अलौकिक शक्ति प्राप्त है. झरिया कोयलांचल के लाखों लोग पिछले कई वर्षों से कोयले के धधकते अंगारों पर न सिर्फ चल रहे हैं, बल्कि रह रहे हैं. हमें नहीं मालूम उन्हें कोई अलौकिक शक्ति प्राप्त है या नहीं, पर यह जरूर पता है कि आग में जीवित लोगों को झोंकने वाली शक्तियां कौन हैं.

धनबाद से झरिया की यात्रा के दौरान एक मित्र साथ थे. वे बता रहे थे कि धनबाद की जाे रौनक आज है वह झरिया की देन है. झरिया न होता तो धनबाद कभी आबाद नहीं होता. उन्होंने दुख जताया कि आज के झरिया में धनबाद के जैसे तरह-तरह के उत्सव-आयोजन नहीं होते. यह शहर अगलगी के शताब्दी वर्ष में पहुंचकर बिना किसी आयोजन के घुटन और खामोशी के साथ मातमी महोत्सव मना रहा है.

झरिया की खदानों में 1916 में अाग लगी थी, अब साल 2016 है. इस बातचीत के दौरान हम झरिया शहर पार कर सुनसान इलाके में प्रवेश करके चुके होते हैं. रात के तकरीबन 11 बज रहे थे और चारों ओर सन्नाटा था. हम घनुडीह इलाके में थे. गाड़ी से बाहर निकलते ही सनसनाती हुई तेज हवा से सामना हुआ. कुछ ही देर में हम आग की तेज लपट के पास थे. लपटों से निकल रही आवाज हवा के साथ मिलकर उस सन्नाटे को तोड़ रही थी. वहां रुके कुछ ही देर हुई थी कि पुलिस की एक गाड़ी आकर रुकती है. तेज आवाज में पुलिसवाले पूछते हैं- कौन! हम लोग बताते हैं- कुछ नहीं बस फायर एरिया देखने आए थे. दरोगा ठेठ भाषा में कहते हैं, ‘ओहो! अगलगी देख रहे हैं! देखिए, बहुत लोग आता है देखने, रोजे-रोज चाहे हर कुछ दिन पर लेकिन जादा देर मत रुकिए, घुटन होगा.’ 

पास ही कुछ घर भी नजर आते हैं. किसी घर में ताला नहीं लगा होता. हम आवाज लगाते हैं लेकिन कोई आवाज नहीं आती. घरों में बल्ब की तेज रोशनी होती है और बिछौने भी रखे हुए होते हैं. मेरे मित्र टोकते हैं, ‘चलिए, कोई नहीं मिलेगा यहां. ये सिर्फ आरामखाना है. अभी सब लोग धंधे पर गए होंगे.’ आधी रात में ‘कौन-सा धंधा’ के सवाल पर वे कहते हैं, ‘इहां अउर का धंधा है. दिन-दुपहरिया हो चाहे अधरतिया, तेज जाड़ा हो चाहे गरमी, चाहे झमाझम बरसात, साल भर, चौबीसों घंटा इहां एक ही धंधा होता है कोयले का. कोयला ही यहां के लिए सब है. ओढ़ना-बिछौना, जीवन-मरण सब.’

उस फायर एरिया से आगे निकल ओपन माइंस एरिया में जाने की हमारी कोशिश सफल नहीं हो पाती. ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर तेज गति से आते-जाते बड़े-बड़े ट्रक छोटी गाड़ियों को आने-जाने के लिए जगह ही नहीं छोड़ रहे थे. दूर से ही दिखाई पड़ रहा था कि कैसे खदानों से निकाले गए सुलगते कोयले को ट्रकों पर लादा जा रहा था. यह दृश्य रोंगटे खड़ा कर देने वाला था. बताया जाता है कि आग से यहां कोई मतलब नहीं. हर हाल में बस कोयला चाहिए. खदानों में लगी आग को यहां सिर्फ अभिशाप नहीं समझा जाता. यह कइयों के लिए वरदान भी साबित हुई है. इसके बाद हम वहां से लौट आते हैं. देश की सबसे बड़ी भूमिगत आग का वह दृश्य लगातार आंखों के सामने तैरता रहता है. खासकर जलते हुए कोयले को उठाकर ट्रकों पर डालने वाला दृश्य.

2002 में झरिया आए पूर्व राष्ट्रपति डॉ. कलाम ने आकर कहा था कि खदानों में लगी आग को अब भी फैलने से रोका जा सकता है, बस कोशिशें तेज हों

घनुडीह का यह इलाका झरिया का वह इलाका है जिसे हृदयस्थली भी कहते थे. अब वह लगभग खत्म हो चुका है, वहां बसने वाली बड़ी आबादी अपनी जड़ों से उखड़ चुकी है या कहें उन्हें उखाड़ा जा चुका है. सब कहीं और बस गए या बसाए जा चुके हैं. जो आग के पास रह रहे हैं, यह उनकी जिद ही है. यह जिद बेजा नहीं है. वे जानते हैं कि जब तक उनका घर आग में घिर न जाए, तब तक वे अपनी जगह नहीं छोड़ सकते क्योंकि अपनी जगह को पूरी तरह से छोड़ देने का मतलब है, दो वक्त की रोटी पर भी आफत.

घनुडीह जैसी 11 बस्तियां अब तक इस आग की भेंट चढ़ चुकी हैं. शहर के मानचित्र से सदा-सदा के लिए गायब. दस जगहों पर जिंदगी अभी मुश्किल के दौर में है. 4.18 लाख लोग इस आग का दंश झेल रहे हैं. बीसीसीएल (भारत कोकिंग कोल लिमिटेड) की ओर से उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के मुताबिक, पिछले छह साल में झरिया के आसपास के करीब 1400 परिवारों को विस्थापित होना पड़ा है. आग से विस्थापित हुए लोगों को दूसरी जगह बसाने के लिए 314 करोड़ खर्च किए जा चुके हैं और झरिया कोल फील्ड की आग बुझाने पर अब तक 2,311 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं. आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि हर रोज फायर एरिया से आठ से दस हजार टन कोयले का खनन और उठाव हो रहा है. घनुडीह इलाके में अभी वीरानगी है लेकिन झरिया के ही इडली पट्टी,  कुकुरतोपा,  भगतडीह,  एलयूजी पीट,  बागडिगी,  लालटेनगंज जैसे इलाके नक्शे से गायब हो चुके हैं.

अगले दिन सुबह-सुबह हम बेलगढ़िया के लिए निकल पड़ते हैं. बेलगढ़िया जिसके बारे में दावा किया जाता है कि यह दुनिया की सबसे बड़ी पुनर्वास योजना के तहत बसाई गई पहली कॉलोनी है. झरिया से विस्थापित हुए लोगों को यहीं बसाया गया है. बेलगढ़िया, धनबाद से कोई 12-15 किलोमीटर दूर है. झरिया से भी यह दूरी लगभग बराबर है. सुबह पहली मुलाकात मोहन भुइयां से होती है. यहां बसाए गए लोग यहां मिली मूलभूत सुविधाओं से संतुष्ट नहीं नजर आते. वे यहां बसाए जाने का विरोध भी करते हैं. यहां कुल 1,360 परिवार बसाए गए हैं.

मोहन हमें अपने घर ले जाते हैं. वे कहते हैं, ‘देख लीजिए नौ बाई दस का एक कमरा रहने के लिए और 10 बाई छह का यह बरामदा. इसी में पूरी दुनिया सिमट गई है. कहां पति-पत्नी रहें, कहां अपने मां-बाप को कोई रखे और कहां अपने जवान होते बच्चे को. आप बस कमरों को देखकर ही समझ जाइएगा कि हर परिवार का परिवारशास्त्र कैसे गड़बड़ाया हुआ होगा और हर घर में कलह का माहौल रहता है.’ मोहन के घर के पास ही रहने वाले मोहम्मद जफर अली कहते हैं,  ‘दावा किया जा रहा है कि यहां झरियावालों को बसाया जा रहा है. दुनिया की सबसे बड़ी पुनर्वास योजना चलाई जा रही है. जाकर पूछिएगा साहब लोगों से कि यहां बसा दिए गए लोगों को क्या अमरत्व मिला हुआ है. क्या वे मरेंगे नहीं और अगर मरेंगे तो चाहे हिंदू हो या मुसलमान उनका अंतिम संस्कार कहां किया जाएगा?’ जफर नाराजगी जताते हुए कहते हैं, ‘अभी कुछ दिन पहले ही यहां तनाव का माहौल था. एक मुस्लिम की मौत हो गई थी. उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वे अपना इलाज करा सकें. चंदे के पैसे से किसी तरह इलाज की कोशिश हुई लेकिन बचाए नहीं जा सके. तनाव इसलिए था क्योंकि यहां हिंदू मरे या मुसलमान, उसके अंतिम संस्कार के लिए कम से कम 25 किलोमीटर दूर जाना होता है. दूसरे गांववाले अपने कब्रिस्तान में या श्मशान का प्रयोग करने नहीं देते हैं. 25 किलोमीटर की यात्रा पैदल नहीं की जा सकती. शव ले जाने के लिए 1,600 रुपये किराया देना होता है. अधिकांश परिवारों के पास इतने पैसे नहीं होते कि वे किसी के मर जाने के बाद 1,600 रुपये किराया देकर अंतिम संस्कार कर सकें.’

जफर के साथ मिले बिजेंदर कहते हैं, ‘हमारे यहां कोई अस्पताल नहीं. बस एक पीएचसी है जो बंद ही रहता है. अगर स्कूल-अस्पताल खुल भी गए तो क्या, हम यहां रहकर करेंगे क्या, यह एक बड़ा सवाल है. हमारे यहां से झरिया जाइए या धनबाद, आने-जाने में 40 रुपये का खर्च है. रोजमर्रा की मजदूरी का काम भी उन्हीं शहरों में मिलना है. यहां से रोज लोग जाते हैं मजदूरी की तलाश में वहां जाते हैं. जिन्हें काम मिल गया, वे तो ठीक, जिन्हें नहीं मिला, उन पर क्या गुजरती होगी, सोच लीजिए. एक तो घर में एक पैसा नहीं होता, ऊपर से मजदूरी के लिए अपना पैसा लगाकर जाना और फिर वहां से भी खाली हाथ लौट आना, कितना पीड़ादायी होता होगा. हम यहां नरक की जिंदगी गुजार रहे हैं.’ मोहन भुइयां, जफर अली, बिजेंदर जैसे कई लोग मिलते हैं. सब अपनी पीड़ा और परेशानी बताते हैं. वे बताते हैं कि उनकी चौथी पीढ़ी यहां रह रही है. गांव छोड़कर बाप-दादा झरिया आकर बस गए थे. अब झरिया से हटा दिया गया. गांव में कोई पूछता नहीं. बाल-बच्चों के साथ यहीं हैं. शादी-ब्याह पर भी आफत है.

‘इहां अउर का धंधा है. दिन-दुपहरिया हो चाहे अधरतिया, साल भर, चौबीसों घंटा इहां एक ही धंधा होता है कोयले का. कोयला ही यहां के लिए सब है’

ये लोग खुद को आवंटित घर दिखाते हैं कि कैसे उन्हें जो घर मिले हैं, उनके टाॅयलेट को उन्होंने एक छोटा रूम बना दिया है ताकि परिवार का कोई एक सदस्य उसमें सो सके. टाॅयलेट के लिए तो फिर भी वैकल्पिक इंतजाम हो सकते हैं. बेलगढ़िया से लौटते समय बड़ा सवाल यही होता है कि जब इतने ही लोगों को अच्छे से नहीं बसाया जा सका तो दुनिया की सबसे बड़ी पुनर्वास योजना सफल कैसे होगी.

बेलगढ़िया में इस तरह आनन-फानन में लोगों को बसाए जाने की भी अपनी कहानी है. झरिया में आग का खेल सौ वर्षों से जारी है. इस पर गंभीरता से पहली बार बात 1997 में शुरू हो सकी थी. वह भी स्वेच्छा से नहीं बल्कि तत्कालीन सांसद हराधन राय की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दायर करने के बाद. उसी पीआईएल की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने झरिया की आग को ‘राष्ट्रीय त्रासदी’ घोषित किया और आदेश दिया गया कि लोगों को बसाने के लिए योजना बने और कोर्ट को प्रगति रिपोर्ट भी दी जाए. उस आदेश के बाद ही योजना बन सकी. नतीजा, आनन-फानन में कोरम पूरा करने के लिए बेलगढ़िया बनाया और बसाया जा सका.

ED 12 New illegal MiningWEB

1916 में पहली बार भौरा की एक कोयला खदान में आग लगी थी. झरिया में दुनिया का बेहतरीन कोयला है. पिछले सौ सालों में तीन करोड़ 17 लाख टन जलकर राख हो जाने के बावजूद एक अरब 86 करोड़ टन बचा हुआ है

सरकार ने आग और भू-धंसान वाले इलाके के लोगों को बसाने के लिए 2004 में झरिया पुनर्वास एवं विकास प्राधिकार (जेआरडीए) का गठन किया. यह जरेडा के नाम से जाना जाता है. जरेडा ने पुनर्वास के लिए 7,112 करोड़ रुपये का मास्टर प्लान तैयार किया है. इसे दो फेज में 2021 तक पूरा किया जाना है. साथ ही आग बुझाने के लिए 23.11 करोड़ रुपये का प्लान अलग से है. जरेडा का सर्वे ही बताता है कि कुल 85 हजार परिवार यानी करीब 4.18 लाख लोग अाग और भू-धंसान वाले इलाके में हैं. इतने लोगों को बसाने का लक्ष्य है, उनमें से अब तक सिर्फ 1360 लोगों को बेलगढ़िया में बसाया जा सका है. बेलगढ़िया से लौटते समय लगता है कि क्या 83,640 परिवारों को भी इसी तरह और ढेर सारे बेलगढ़िया बनाकर बसा दिए जाने की योजना है सरकार की! और फिर सोचकर सिहरन होती है कि 1,360 परिवारों से बसा बेलगढ़िया इस नारकीय स्थिति में है तो फिर जब पूरे के पूरे लोग कई बेलगढ़िया में बसा दिए जाएंगे तो वह पूरा इलाका कैसा होगा. बड़ा सवाल यह भी है कि झरिया काे उजाड़कर क्या और कई बेलगढ़िया बसा पाना संभव हो पाएगा या फिर पुनर्वास की बात तब तक कही जाती रहेगी जब तक खदानों से कोयला निकाल लिए जाने का मामला है. जवाब पेंच दर पेंच फंसता है.

बीसीसीएल के एक अधिकारी नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं, ‘सब खेल है. पुनर्वास इतना आसान नहीं. अपनी जमीन पर जो बसे हैं और जो आग वाले इलाके में हैं, वैसे परिवारों की संख्या 29,444 है. बीसीसीएल की जमीन पर जो लोग बसे हैं और आग वाले इलाके में हैं, वैसे परिवारों की संख्या 23,847 है. इस तरह पुनर्वास के लिए कुल 2,730 एकड़ जमीन चाहिए, जबकि बीसीसीएल मात्र 849.68 एकड़ जमीन ही दे सकी है. जरेडा ने भी अब तक सिर्फ 120.82 एकड़ जमीन ही अधिगृहीत की है, यानी अगर बेलगढ़िया की तरह ही जिंदगी और लाखों लोगों को देनी है तो वह सपने जैसा ही है.’

Pages: 1 2 Single Page

(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 8 Issue 9, Dated 15 May 2016)

Comments are closed