फांसी का समाजशास्त्र | Tehelka Hindi

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फांसी का समाजशास्त्र

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली के ‘सेंटर ऑन डेथ पेनल्टी’ की रिपोर्ट में कहा गया है कि मौत की सजा पाने वाले तीन चौथाई से अधिक यानी 76 फीसदी लोग आर्थिक, शैक्षिक तथा सामाजिक रूप से पिछड़े या धार्मिक अल्पसंख्यक वर्ग के हैं. 44 प्रतिशत दोषियों को यह भी नहीं मालूम है कि सुप्रीम कोर्ट में उनका मुकदमा लड़ने वाले वकील का नाम क्या है. 54.5 प्रतिशत कैदी ऐसे हैं जिनको फांसी की सजा सुनाने के लिए चली मुकदमे की कार्यवाही समझ में नहीं आई तो 97 प्रतिशत का कहना है कि जब पुलिस ने उनसे पूछताछ की तो उनके साथ कोई वकील नहीं था. इस रिपोर्ट से हमारी न्याय व्यवस्था की तमाम विसंगतियां सामने आई हैं.

कृष्णकांत 2016-06-15 , Issue 11 Volume 8
ग्राफिक्स : प्रदीप कुमार

ग्राफिक्स : प्रदीप कुमार

आम कहावत है कि कानून सिर्फ गरीबों के लिए होता है. दिल्ली स्थित नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी की हालिया रिपोर्ट इस मामूली कहावत की तस्दीक करती है जिसमें कहा गया है कि मौत की सजा पाने वाले तीन चौथाई लोग वंचित, सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े और धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं. विश्वविद्यालय के ‘सेंटर ऑन डेथ पेनल्टी’ के शोधकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि मौत की सजा पाने वाले तीन चौथाई से अधिक यानी 76 फीसदी दोषी आर्थिक, शैक्षिक तथा सामाजिक रूप से पिछड़े या धार्मिक अल्पसंख्यक वर्ग के हैं. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मौत की सजा सुनाए गए 80 फीसदी से अधिक कैदियों को जेलों में ‘अमानवीय शारीरिक एवं मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है.’ इस रिपोर्ट में उन 385 कैदियों का जिक्र है जो देश की विभिन्न जेलों में बंद हैं और जिन्हें मौत की सजा सुनाई गई है. यह रिपोर्ट इन कैदियों से और उनके परिजनों से बातचीत के आधार पर तैयार की गई है. भारत सरकार के पास ऐसा कोई विश्वसनीय आंकड़ा नहीं है जिससे यह पता चल सके कि देश में कुल कितने लोग जेलों में बंद हैं जिन्हें फांसी की सजा मिल चुकी है. आजादी के बाद से कितने लोगों को फांसी की सजा हुई और माफ कर दी गई, इसका भी कोई रिकॉर्ड नहीं है.

अध्ययनकर्ताओं ने 385 ऐसे कैदियों की पहचान की जिन्हें फांसी की सजा मिल चुकी है और इनमें से 373 कैदियों और उनके परिजनों से परिजनों से बातचीत के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है. हाल ही में दो खंडों में जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि फांसी की सजा पाने वाले जितने कैदी जेलों में बंद हैं, उनमें से 80 प्रतिशत ने अपनी स्कूली शिक्षा भी पूरी नहीं की और 18 साल की उम्र से पहले ही काम करने लगे थे. इनमें से 24.5 प्रतिशत आदिवासी और 20 प्रतिशत अल्पसंख्यक समुदाय से हैं. देश में 12 महिला कैदियों को भी मृत्युदंड की सजा सुनाई गई है और ये महिला कैदी भी सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग से ताल्लुक रखती हैं.

साल 2013 से 2015 के बीच किए इस अध्ययन के मुताबिक, 270 कैदियों में से 216 यानी करीब 80 फीसदी ने स्वीकार किया कि जेल में रहने के दौरान उन्हें बेहद अमानवीय किस्म की प्रताड़ना झेलनी पड़ी. इन कैदियों के साथ सिगरेट से जलाने, नाखूनों में सुई घुसाने, निर्वस्त्र रखने, गुप्तांगों में लोहे की छड़ें या कांच की बोतलें डालने, पेशाब पीने को मजबूर करने जैसे अमानवीय कृत्य किए गए. इसके अलावा पिटाई और अन्य कई निर्मम किस्म के व्यवहार उन्हें झेलने पड़े जो मानवीय गरिमा के विरुद्ध हैं.

अमीर और गरीब में एक खाई जरूर है क्योंकि अमीरों को ​बढ़िया वकील मिल जाते हैं और गरीबों को बहुत ही नौसिखिए वकील मिलते हैं. वकील नहीं मिलते, ऐसा नहीं है. लेकिन सक्षम वकील नहीं मिलते हैं. उनको नए वकील या कम सक्षम वकील मिल जाते हैं, जिनकी प्रैक्टिस उतनी अच्छी नहीं है, या कुछ अनुबंध वाले लोग चुन लिए जाते हैं

रिपोर्ट के अनुसार, फांसी की सजा पाने वाले 44 प्रतिशत दोषियों को यह भी नहीं मालूम है कि सुप्रीम कोर्ट में उनका मुकदमा लड़ने वाले वकील का नाम क्या है. कुल सजायाफ्ता कैदियों में से 54.5 प्रतिशत कैदी ऐसे हैं जिनको फांसी की सजा सुनाने के लिए चली मुकदमे की कार्यवाही समझ में नहीं आई. 78.3 ने कहा कि उनसे ‘जबरदस्ती इकबालिया बयान’ लिया गया और उसी के आधार पर उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई. 97 प्रतिशत का कहना है कि जब पुलिस ने उनसे पूछताछ की तो उनके साथ कोई वकील नहीं था.

इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद हमारी न्याय व्यवस्था की तमाम विसंगतियां सामने आई हैं. रिपोर्ट कहती है कि सन 2000 से 2015 के बीच निचली अदालतों ने जितनी भी फांसी की सजा दी, उनमें से पांच प्रतिशत से भी कम सजाओं को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा. मौत सजा के कुछ 1486 मामलों में से 73 ही सुप्रीम कोर्ट में टिक सके.

सर्वे के मुताबिक, 276 में 21 (7.6 प्रतिशत) कैदी ऐसे हैं जिनका पहले से कोई आपराधिक रिकॉर्ड रहा है. इनमें से 18 (5.8 प्रतिशत) कैदी ऐसे हैं जो अपराध के समय 18 वर्ष से कम उम्र के थे, जबकि 54 (17 प्रतिशत) ऐसे हैं जो अपराध के समय 18 से 21 वर्ष के बीच की उम्र के थे. हत्या एवं हत्या व बलात्कार के आरोप में 297 दोषियों को मौत की सजा मिली है जबकि आतंकवाद के आरोप में 31 को दोषी पाया गया है.

गुजरात में 79 प्रतिशत (12 प्रतिशत) फांसी की सजा पाए व्यक्ति अल्पसंख्यक समुदाय से हैं, जबकि राज्य में उनकी कुल आबादी 12 प्रतिशत है. महाराष्ट्र में 50 (18 प्रतिशत) कैदियों को फांसी की सजा मिली है जो आदिवासी और दलित समुदाय से हैं. राज्य में इनकी कुल आबादी 20 प्रतिशत है. केरल में 93 प्रतिशत (14 कैदी) आर्थिक रूप से वंचित तब​के से हैं. 64 प्रतिशत कैदी प्राइवेट वकील करते हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुंचने तक यह आंकड़ा मात्र 30 प्रतिशत रह जाता है. 70 प्रतिशत दोषियों का मानना है कि निचली अदालतों में उनके वकील उनसे या परिवारवालों से केस के बारे में विस्तार से बातचीत नहीं करते. प्राइवेट वकील की सेवा लेने के चलते ज्यादातर अपनी जायदाद बेच देते हैं. हाई कोर्ट में केस के दौरान 68.4 प्रतिशत दोषियों के वकीलों ने उनसे कभी बात नहीं की. 90 प्रतिशत कैदियों ने माना कि जब वे पहली बार मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए गए तो उनके साथ कोई वकील नहीं था.

Infographics by : National Law University's Report

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रिपोर्ट जारी होने के दौरान सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश मदन बी. लोकुर ने कहा, ‘हमारी न्याय व्यवस्था में गंभीर खामिया हैं. इसमें न सिर्फ प्रक्रियात्मक, बल्कि आमूल सुधार की जरूरत है. कानूनी सहायता भारत में एक मजाक के सिवा और कुछ नहीं है. इसमें किसी का भरोसा नहीं है. अगर आरोपी अशिक्षित है तो उसके बचाव पर इसका प्रभाव पड़ता है.’

ज्यादातर गरीब और वंचित समुदाय के लोगों को फांसी क्यों होती है, इसे निठारी कांड पर निगाह डालकर समझा जा सकता है. निठारी कांड के मामले में जब सुरेंद्र कोली को फांसी हुई तो ​प्रमुख महिला संगठनों की कुछ महिलाओं ने राष्ट्रपति से अपील की कि कोली को फांसी को तब तक रोका जाए, जब तक अन्य आरोपियों की भूमिका साफ नहीं हो जाती. अपीलकर्ता महिलाओं में उमा चक्रवर्ती, कविता कृष्णन, वाणी सुब्रह्मण्यम, रेबेका जॉन, वृंदा ग्रोवर, मैरी ई. जॉन, आयशा किदवई, रोहिणी हेंसमैन, लक्ष्मी मूर्ति, अमृता नंदी आदि शामिल थीं.

इस अपील में कहा गया, ‘ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि कोली ही वास्तव में 18 औरतों व बच्चों का हत्यारा था. कोली की ‘आत्मस्वीकृति’- उसे दंडित करने का एकमात्र आधार- स्वयं ही घोषित करती है कि इसे मारपीट कर (टाॅर्चर) और पुलिस द्वारा रटा कर हासिल किया गया था. बच्चों के निठारी से असामान्य तौर पर गायब होने की परिघटना 2003 से ही जारी थी- कोली के पंढेर के घर में 2004 में घरेलू नौकर के तौर पर आने के पहले से. और वह परिघटना कोली के गिरफ्तार होने और दंडित किए जाने के बाद भी जारी है. ऑटोप्सी सर्जन, जिसने कि शवों का परिक्षण किए, ने नरभक्षण की बात को गलत बताया है और मानव अंगों के व्यापार को इन हत्याओं का कारण होने की ओर इशारा किया है. महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा नियुक्त कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में माना है कि पुलिस कोली को दोषी मान कर चली और उसने मानव अंगों के व्यापार की संभावना की जांच ही नहीं की. ऑटोप्सी सर्जन ने कमेटी के सामने कहा था कि मानव शरीरों को सर्जरी के औजारों से काटा गया है. वकीलों का कहना है कि पुलिस ने ऑटोप्सी सर्जन के साक्ष्य को ही दबा दिया. मुकदमे के दौरान उससे एक गवाह की तरह न तो कोई पूछताछ की गई न ही चार्जशीट में उसके मत को ही शामिल किया गया. एक डॉक्टर पर मानव अंगों के व्यापार का आरोप लगा था, उसकी पुलिस ने जांच ही नहीं की. कोली ने अपने कथित बयान में कहा था कि उसने अपने मालिक के ड्राॅइंग रूम में 16 व्यक्तियों की हत्या की लेकिन डीएनए के साक्ष्यों के हिसाब से 19 लोगों के शरीर के हिस्से वहां मिले. उनमें से 11 की शिनाख्त नहीं हो पाई. स्पष्ट है कि उन हत्याओं की कहानी में कई झोल हैं और कोली की आत्मस्वीकृति सारे तथ्यों के साथ मेल नहीं खाती है. इस ओर इशारा करना प्रासंगिक होगा कि कोली दलित व गरीब है और उसे बहुत ही सस्ती कानूनी मदद मिली. मीडिया और पुलिस द्वारा उसे नरभक्षी और हत्यारा बनाकर प्रस्तुत किया गया और उसे चुनौती देने के लायक ही नहीं छोड़ा. कोली का उदाहरण इस बात को रेखांकित करता है कि किस तरह से अधिकतर मामलों में आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर लोगों को मृत्युदंड मिलता है, क्योंकि वे जनमत को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं होते.’

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अधिवक्ता मोहम्मद शोएब कहते हैं, ‘न्याय प्रणाली पर तो सवाल उठता ही है, इसके अलावा शासन व्यवस्था भी ऐसे लोगों को ही टारगेट करती है. विधायिका कानून ही ऐसे बनाती है, सारे कानून अमीरों और पूंजीपतियों की सुरक्षा के लिए बनाए जाते हैं. सवर्ण या अमीर लोग अपराध में शामिल होते हैं, दलितों से ज्यादा होते हैं. लेकिन हर स्तर पर- पुलिस में, शासन में उनकी पकड़ ज्यादा होती है, न्याय व्यवस्था में भी उनकी पकड़ ज्यादा होती है. वे असर डाल पाने की स्थिति में होते हैं, इसलिए उनको सजा नहीं हो पाती. ये भी है कि हर स्तर पर, चाहे शासन हो, पुलिस हो या न्याय व्यवस्था हो, सबमें वर्चस्व सवर्णों का ही रहता है. वहां पर जो दलित या पिछड़े जाते हैं, वे दबाव में काम करते हैं. जो दबाव समाज में बना हुआ है, वह वहां भी काम करता है. इसलिए वे भी न्याय सही तरीके से नहीं दे पाते. सवर्ण या अमीर लॉबी से टकराना बहुत कठिन हो, ऐसा नहीं है. यह आसान काम है, लेकिन हिम्मत चाहिए. दूसरे, दलित हमारे समाज में हर तरह से दलित है. उसे सामाजिक न्याय नहीं मिलता, आर्थिक न्याय नहीं मिलता, इसलिए उसे कानूनी न्याय भी नहीं मिलता.’

अधिवक्ता कमलेश जैन इससे ​थोड़ी अलग राय रखती हैं. वे कहती हैं, ‘यह बहुत ही जटिल मसला है. जैसा कहा जा रहा है वैसा भी नहीं होता. इन मामलों में बहुत सारे पहलू काम करते हैं. क्रिमिनल जस्टिल सिस्टम को आप गहराई से देखेंगे तो चीजें ज्यादा समझ में आएंगी. अमीर और गरीब में एक खाई जरूर है क्योंकि अमीरों को ​बढ़िया वकील मिल जाते हैं और गरीबों को बहुत ही नौसिखिए वकील मिलते हैं. वकील नहीं मिलते, ऐसा नहीं है. लेकिन सक्षम वकील नहीं मिलते हैं. उनको नए वकील या कम सक्षम वकील मिल जाते हैं, जिनकी प्रैक्टिस उतनी अच्छी नहीं है, या कुछ अनुबंध वाले लोग चुन लिए जाते हैं. दूसरी बात है कि कभी-कभी जजों में भी खामियां होती हैं. कौन से जज के ​यहां केस पहुंचता है. उसे क्रिमिनल लॉ की कितनी समझ है. तीसरी बात है कि इसके अलावा अमीर-गरीब के बीच मामला होने पर गवाह कितने टिक पाते हैं. जो दबंग लोग हैं वे धमकियां देते हैं. एक केस मैं देख रही हूं जिसमें सुनवाई के बाद कोर्ट के बाहर ही आरोपी ने धमकी दी. तो अपने देश में चीजें बहुत जटिल हैं. जाति या धर्म के आधार पर तो मैं नहीं कहूंगी, लेकिन जज के दिमाग में भी यह बात असर डालती है कि आरोपी कौन-सा काम करता है. अगर वह गार्ड है, घरेलू नौकर है, या कोई ऐसा काम करता है कि सुरक्षा ही उसकी ड्यूटी थी, लेकिन उसने उलट काम किया तो यह चीजें बुरा प्रभाव डालती हैं. धनंजय चटर्जी को फांसी दी गई थी, वह गार्ड था. चीजें बहुत महीन ढंग से काम करती हैं.’

दुनिया भर में फांसी की सजा में बढ़ाेतरी

दुनिया भर में फांसी की सजा में आई नाटकीय बढ़ोतरी के बीच यह भी बहस जारी है कि फांसी की सजा दी जाए या खत्म कर दी जाए. एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट कहती है कि पिछले साल दुनिया भर में मौत की सजा में खौफनाक इजाफा हुआ है. 2015 में ईरान, पाकिस्तान और सऊदी अरब में सबसे ज्यादा मौत की सजाएं दी गईं, जो वैश्विक आंकड़ों का 89 प्रतिशत है. 2014 में दुनिया भर में 1061 और 2015 में 1634 लोगों को फांसी दी गई. यह संख्या 1989 के बाद सबसे ज्यादा है. हालांकि, 2015 में ही फिजी, मेडागास्कर, रिपब्लिक ऑफ कांगो और सूरीनाम ने अपने यहां फांसी की सजा को समाप्त कर दिया है. अब तक दुनिया भर में 140 ऐसे देश हैं जहां पर फांसी की सजा या मृत्युदंड समाप्त कर दिया गया है, जबकि एशियाई देशों में फांसी की सजा में बढ़ोतरी दर्ज की गई है. एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक, चीन दुनिया भर में सबसे ज्यादा फांसी देने वाला देश है, लेकिन गोपनीयता के कारण आंकड़े सामने नहीं आते.

दूसरी ओर अधिवक्ता पवन दुग्गल कहते हैं, ‘हमारा सिस्टम संविधान पर आधारित है और संविधान सभी को समानता का अधिकार देता है. लेकिन कहीं न कहीं आर्थिक स्थितियां असर डालती हैं. अगर आप निचले तबके आते हैं तो आपके जीवन में रोटी, कपड़ा, मकान जैसे बुनियादी संघर्ष होते हैं. इसी के क्रम में कई बार आपराधिक घटनाएं भी होती हैं. अधिकांशत: लोगों के पास इतनी क्षमता भी नहीं होती कि वे अपने आपको कानूनी लड़ाई में बचा सकें, वे कानूनी सलाह नहीं ले पाते. निचले वर्ग में पैसे की कमी तो है ही, जागरूकता की भी कमी है. बहुत बार लोग ऐसे काम कर जाते हैं जो उन्हें लगता है कि ये तो साधारण बात है. बिना जानते हुए कि ये कानून का उल्लंघन है. हालांकि आप कानून से अनभिज्ञ हैं तो भी वह आप पर लागू होता है.’

न्यायपालिका के बारे में लोगों की धारणाएं भी कम समझ के आधार पर बन जाती हैं, इसे समझाते हुए कमलेश जैन कहती हैं, ‘अफजल गुरु के केस में इतना बड़ा जजमेंट मैंने बहुत बारीकी से पढ़ा तो पाया कि उसमें परिस्थितिजन्य साक्ष्य वगैरह बहुत पक्के थे. जबकि उसके सिर्फ एक पैराग्राफ को लेकर लोगों ने बड़ा बवाल मचाया. मेरा यह कहना है कि क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम की जिसे अच्छे से पहचान है, वही इसे समझ सकता है. यह जरूर है कि हमारे समाज में कमजोर के प्रति, गरीबों के प्रति पूर्वाग्रह है. बाहर का पूरा समाज जैसा रहता है, पूरा न्यायिक तंत्र भी वैसे ही रहता है. तो मेरा कहना है कि गरीब या कमजोर होने का फर्क तो पड़ता है, लेकिन यह नहीं कह सकते कि पूरी तरह तंत्र खराब हो चुका है.’

फांसी की सजा के 95 प्रतिशत मामले सुप्रीम कोर्ट में नहीं टिकने या उम्रकैद में तब्दील हो जाने को लेकर पवन दुग्गल कहते हैं, ‘फांसी अल्टीमेट सजा है. उच्चतम न्यायालय कहता है कि जब तक कोई मामला दुर्लभतम न हो, रेयरेस्ट आॅफ रेयर न हो, तब तक फांसी की सजा नहीं दी जानी चाहिए. जिन मुकदमों में सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि यहां फांसी की जगह आजीवन कारावास की सजा दी जा सकती है, तो वह देता है. सजा देने का उद्देश्य यह नहीं है कि आप ऐसी सजा दें कि दोषी का जीवन ही खत्म हो जाए. बल्कि ऐसी सजा दें कि उसे पश्चाताप हो और उसे सुधरने का मौका मिले. मरने के बाद यह संभावना खत्म हो जाती है. फांसी दुर्लभ से दुर्लभ मामलों में ही दी जा सकती है. दूसरी बात, सुप्रीम कोर्ट के पास जितने विशेषाधिकार हैं, वह दूसरी अदालतों के पास नहीं हैं. सुप्रीम कोर्ट अंतिम न्यायालय है. उसके बाद कोई न्यायालय नहीं है. सुप्रीम कोर्ट हर फैसले में इस बात का भी ध्यान रखता है. निचली अदालत कानून जैसा बोलता है, उसे ही फॉलो करती है, पर सुप्रीम कोर्ट उसकी समीक्षा भी करता है और नई व्याख्याएं भी देता है.’

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फांसी पाने वाले लोगों में दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यकों की संख्या ज्यादा होने को लेकर समाजशास्त्री प्रो. विवेक कुमार कहते हैं, ‘इसके सामाजिक पहलू हैं. वो ये कि बद अच्छा बदनाम बुरा, ये जो कलंकीकरण है समाज का, इसके चलते दलित-पिछड़े समुदाय के छोटे-मोटे अपराध को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है. इसको सही ठहराने के लिए बहुत बार कहा जाता है कि अरे ये तो ऐसा है, ऐसा ही रहेगा. इस तरह एक समुदाय के कलंकीकरण को इस तरह सही भी ठहराया जाता है. दूसरी बात उनके पास अपने को बचाने का मैकेनिज्म नहीं है. आप सोचिए कि निठारी कांड में पंढेर कैसे बच जाता है जो कोली के माध्यम ये काम कर रहा था? कोली को सजा हुई लेकिन पंढेर बाहर हो गया. आपको मालूम है कि भंवरी देवी के केस में क्या हुआ था? जजों ने निर्णय दिया कि ऊपरी जाति के लोग अपने बच्चों के सामने रेप जैसा अपराध कर ही नहीं कर सकते.’

आर्थिक अपराध का उदाहरण देते हुए विवेक कुमार कहते हैं, ‘जो एनपीए यानी नॉन परफार्मिंग एेसेट्स एक लाख चौदह हजार करोड़ रुपये का है. इनमें से कौन दलित है? फिर आप कैसे कहते हैं कि दलित ही चोर होते हैं? भारतीय समाज में जजों की क्या ट्रेनिंग है? भारतीय समाज के अनुरूप कौन सा कोर्स है जिसको पढ़ाकर उनको संवेदनशील बनाया जाता हो? जब तक आप यह नहीं करेंगे तब तक कानून की सीरत और सूरत दोनों नहीं सुधरेगी. समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से यह थ्योरी बहुत पुरानी है कि सफेदपोश अपराध को कभी अपराध नहीं माना जाता. ब्लू कॉलर वर्कर का अपराध हमेशा अपराध होता है.’

भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने 1951 में स्पष्ट किया था कि मजिस्ट्रेट को अभियुक्त से ‘उचित’ पूछताछ के बाद ही उसके बयान को सबूत के तौर पर दर्ज करना चाहिए. तारा सिंह बनाम राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता के धारा 313 का मूल मकसद ‘अभियुक्त को अपने ऊपर लगाए गए आरोपों की सफाई देने के लिए निष्पक्ष और उचित मौका उपलब्ध कराना है.’ हालांकि, कई मजिस्ट्रेट अभियुक्तों के इस बुनियादी अधिकार की अनेदखी करते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने 1983 में अपने एक फैसले में कहा था कि सिर्फ दुर्लभतम (रेयरेस्ट ऑफ रेयर) मामलों में ही फांसी की सजा दी जा सकती है. क्रूरतम हत्या, हत्या के साथ डकैती, बच्चे को खुदकुशी के लिए उकसाने, राष्ट्र के खिलाफ युद्ध भड़काने और सशस्त्र बल के किसी सदस्य द्वारा विद्रोह करने की स्थिति में भारत में फांसी दी जा सकती है. 1989 में इस नियम को बदला गया और इसमें नशीली दवाइयों का कारोबार करने वालों के लिए भी फांसी की सजा तय कर दी गई. कुछ समय पहले आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने वाले व्यक्तियों को भी फांसी की सजा देने का फैसला किया गया.

‘ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि कोली ही 18 औरतों व बच्चों का हत्यारा था. कोली की आत्मस्वीकृति- उसे दंडित करने का एकमात्र आधार- स्वयं ही घोषित करती है कि इसे टाॅर्चर और पुलिस द्वारा रटा कर हासिल किया गया था. बच्चों के निठारी से गायब होने की घटना 2003 से ही जारी थी- कोली के पंढेर के घर में 2004 में घरेलू नौकर के तौर पर आने के पहले से’

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर गौर करें तो 2004 से 2013 के बीच भारत में 1,303 लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई, लेकिन इस अवधि में सिर्फ तीन लोगों को ही फांसी दी गई. 14 अगस्त, 2004 को धनंजय चटर्जी, 21 नवंबर, 2012 को अजमल कसाब और 9 फरवरी, 2013 को अफजल गुरु को. इसके उलट इस दौरान 3751 लोगों की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया गया. इसके बाद एकमात्र फांसी मुंबई सीरियल ब्लास्ट मामले में 30 जुलाई, 2015 को याकूब मेमन को दी गई. धनंजय चटर्जी से पहले 1995 में सीरियल किलर शंकर को सेलम में फांसी दी गई थी. इन दस सालों में सबसे ज्यादा 318 फांसी की सजा उत्तर प्रदेश में दी गई. महाराष्ट्र 108, कर्नाटक 107, बिहार 105 और मध्य प्रदेश में 104 लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई. 57 प्रतिशत फांसी के मामले इन्हीं पांच राज्यों से थे. एमनेस्टी इंटरनेशल के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में 2007 में 100, 2006 में 40, 2005 में 77, 2002 में 23 और 2001 में 33 लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई लेकिन किसी भी दोषी को फांसी पर लटकाया नहीं गया. देश आजाद होने के बाद भारत में पहली फांसी नाथूराम गोडसे को दी गई थी. तबसे अब तक सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में कुल 57 लोगों को फांसी दी जा चुकी है. सबसे अंतिम फांसी याकूब मेमन को दी गई. भारत में फांसी की सजा पाने वाला याकूब 57वां अपराधी था.

फांसी की सजा को खत्म करने के लिए भारत में समय-समय पर आवाज उठती रही है. कई न्यायाधीश से लेकर सामाजिक कार्यकर्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ता इस बात के पक्षधर हैं कि फांसी की सजा को खत्म कर दिया जाना चाहिए ​क्योंकि इसके अब तक कोई सबूत नहीं हैं कि फांसी देने से अपराध में कमी आती है या अपराधियों की मानसिकता पर कोई फर्क पड़ता है. इसके उलट फांसी मानवीय गरिमा के खिलाफ है जो व्यक्ति से सुधरने या उसके जीवन के अधिकार को छीन लेती है.

पूर्व न्यायाधीश राजेंद्र सच्चर लिखते हैं, ‘फांसी की सजा वह उद्देश्य पूरा नहीं करती, जिसके लिए इस सजा का प्रावधान किया गया है. वैसे भी, सभ्य समाज में सजा की संकल्पना अपराधियों को सुधारने के लिए की गई है, उन्हें मौत की नींद सुलाने के लिए नहीं. अगर हम उनकी जान लेने लगे, तो एक राष्ट्र के तौर पर हममें और आतंकवादी में भला क्या अंतर रह जाएगा? मृत्युदंड का प्रावधान भारतीय दंड संहिता में साल 1861 में किया गया था. 1931 में बिहार विधानमंडल में एक विधायक ने इसकी समाप्ति को लेकर विधेयक पेश करने की कोशिश की थी, लेकिन वह सफल नहीं हो सके. अलबत्ता मृत्युदंड के पक्ष में आवाज दिनोंदिन मजबूत ही होती गई. आजादी के बाद जब केंद्र सरकार ने राज्यों से इस मामले में अपनी राय जाहिर करने को कहा, तब उनमें से ज्यादातर राज्य सरकारों ने इस सजा का पक्ष लिया. इन्हीं सब कारणों से विधि आयोग ने 1967 में अपनी 35वीं रिपोर्ट में मौत की सजा को बरकरार रखा और माना कि यह अपराध को हतोत्साहित करने में कारगर होगा. मगर सच तो यह है कि ऐसे कोई ठोस आंकड़े नहीं हैं, जो यह साबित करते हों कि फांसी की सजा से वाकई अपराध के खिलाफ माहौल बनता है. अगर कोई व्यक्ति समाज के लिए खतरा है, तो उसे निश्चय ही सजा मिलनी चाहिए. मगर फांसी देने से बेहतर है कि उसे पूरी उम्र जेल में रखा जाए. आजीवन कारावास की सजा तो मौत से कहीं ज्यादा कष्टदायक होती है.’

(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 8 Issue 11, Dated 15 June 2016)

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