वर्ष 2014: साहित्यिक उपलब्धियों का इंद्रधनुष

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bookहिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं में वर्ष 2014 में प्रकाशित 100-150 पुस्तकों के बीच से साहित्यिक गुणवत्ता की दृष्टि से सिर्फ 10 श्रेष्ठ पुस्तकों का चुनाव करना निश्चय ही चुनौतीपूर्ण काम है लेकिन आपका साहित्यिक विवेक इस निर्णय को आसान कर सकता है यदि आपमें कोई पूर्वग्रह या राग-द्वेष न हो. यह प्रसन्नता की बात है कि इस वर्ष भी कुछ अच्छी पुस्तकें आई हैं, जिनसे हिंदी साहित्य समृद्ध हुआ है.

आज साहित्यिक विधाओं में जिस प्रवृत्ति की सबसे ज्यादा चर्चा है, उसमें फैंटेसी के साथ फिक्शन है, जो यथार्थ तक पहुंचने में हमारी मदद करता है. पिछले दिनों अपने एक वक्तव्य में अंग्रेजी के प्रसिद्ध लेखक सलमान रुश्दी एक सवाल उठाते हैं, ‘फिक्शन में यथार्थ के क्या मायने हैं ? फिर इस सवाल को स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं- ‘कथा की पहली सीमा यह है कि यह सच नहीं होती. कहानी; उन घटनाओं को दर्ज नहीं करती है, जो घटती हैं, उन लोगों को सामने लाती है, जो सचमुच नहीं है. उसी तरह जो नहीं होता है, वह सब वहां होता है. यह उपन्यास का प्रवाह है. उपन्यास सीधे-सीधे बताता है कि यह सब सच्चाई नहीं है. इस तरह साहित्य में तब सच का क्या मतलब रह जाता है?’ स्पष्टतः हम जो लिखते या समझते हैं, अंततः वह मानवीय सच्चाई है.

इस वर्ष प्रकाशित उपन्यासों के बीच से मैंने तीन उपन्यासों को इस वर्ष की उपलब्धि के रूप में भाषा, शिल्प, कथा संयोजन और संवाद की दृष्टि से उल्लेख करने के लिए चुना है. हालांकि रवीन्द्र श्रीवास्तव लेखक पुराने हैं, लेकिन ‘रुक्काबाई का कोठा’ उनका पहला ही उपन्यास है, जिसमें उन्होंने हमारे समाज के कोने और अंधेरे में झांकने की कोशिश की है. वेश्याओं की जिन्दगी को लेकर अब तक हिंदी में बहुत कुछ लिखा गया है- ‘वैशाली की नगरवधू’ चतुरसेन शास्त्री, ‘ये कोठेवालियां’ अमृतलाल नागर, ‘जलते हुए मकान में कुछ लोग’ राजकमल चौधरी, ‘मुरदाघर’ जगदंबा प्रसाद दीक्षित, ‘खुदा सही सलामत है’ रवीन्द्र कालिया, ‘सलाम आखिरी’ मधु कांकरिया आदि, लेकिन यह पहली बार हुआ है कि इस अंधेरी दुनिया की गलाजत में डूबकर किसी लेखक ने हमारे समाज के सर्वाधिक उपेक्षित और घृणा की दृष्टि से देखे जाने वाले वर्ग के शोषण और उसके शोषकों की मक्कारियों और चालबाजियों को बेनकाव किया है. उपन्यास का मुख्य घटनास्थल रांची शहर और वहां के कोठों के मोहल्ले की लेखक की अपनी परिकल्पना है. कहानी का मुख्य पात्र रमाकांत है और पूरी कहानी फ्लैशबैक में चलती है. इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता इसका नया शिल्प और भाषा की जीवंतता है, जिसके माध्यम से सुदूर अतीत के भयावह समय को प्रस्तुत किया गया है.

प्रतिष्ठित कथाकार अखिलेश के दूसरे उपन्यास ‘निर्वासन’ को समय-समाज की भावनाओं की बेदखली का आख्यान कहा गया है. बेशक यह उपन्यास पारंपरिक ढंग का नहीं है लेकिन उपन्यास का कथा-संयोजन जिस तरह किया गया ह,ै उसमें यथार्थवाद, आधुनिकतावाद और जादुई यथार्थवाद का समावेश है. निर्वासन शब्द के अर्थ को इस उपन्यास में एक व्यापक आयाम दिया गया है, जिसके कारण इसके घेरे में समय, समाज और भावनाओं का निर्वासन भी है. निर्वासन की कथा तो छोटी है, लेकिन इसका प्रत्याख्यान बड़ा है. पर्यटन निदेशालय का दफ्तर है, जिसमें उसके उच्चाधिकारी और कर्मचारी हैं. वहां संपूर्णानंद बृहस्पति हैं, जो पर्यटन के अध्यक्ष ही नहीं, प्रदेश के मुख्यमंत्री के सलाहकार भी हैं. चूंकि वे बहुत महत्वाकांक्षी हैं इसलिए टकराहट तो होनी ही थी और वह टकराहट हुई पर्यटन के उपनिदेशक सूर्यकांत से, जो अंततः बृहस्पति से त्रस्त होकर अपनी नौकरी छोड़ने को विवश है. अपने एक पत्रकार मित्र की सहायता से उसे एक बड़ा प्रोजेक्ट मिलता है, जिसमें उसे करना यह है कि वह रामअयोर पांडे के बाबा, जो भारत से गिरमिटिया मजदूर के रूप में सूरीनाम गए थे, के पुश्तैनी गांव का पता लगाएं. उस स्थान की भौगोलिक स्थिति के बारे में सिर्फ इतना भर ज्ञात है कि वह उत्तर प्रदेश में है और गांव का नाम गोंसाईगंज है. पांडे अपने गांव की खोज तो करवाना ही चाहता था, साथ ही साथ अपने पुरखों की जीवनी भी लिखवाना चाहता था. उपन्यास रोचक और पठनीय है. लेकिन कहीं-कहीं इसकी भाषा अमर्यादित ही नहीं फूहड़ भी है. फिर भी इस वर्ष का यह एक उल्लेखनीय उपन्यास है.

हिंदी के सुपरिचित कथाकार भगवान दास मोरवाल का चौथा उपन्यास ‘नरक मसीहा’ अब तक उनके द्वारा लिखे गए उपन्यासों की विषयवस्तु से अलग हटकर है. इसमें पिछले कई दशकों से भारत में तेजी से पनपती गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) की महागाथा है. यूं तो आजादी के कुछ दशकों बाद ही मानवीय मूल्यों का हृास होना शुरू हो गया था. औपनिवेशिक पूंजीवाद की उपभोक्तावादी संस्कृति और कॉरपोरेट जगत की मिलीभगत ने हमारे समाज, उसके विचार, विश्वास, प्रतीक और अवधारणाओं को न केवल हाइजैक कर लिया, बल्कि समाज-सेवा की आड़ में देशी-विदेशी अनुदानों के बल पर एक ऐसी संस्कृति विकसित की जिसने हमारे तमाम मानवीय, सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को नष्ट कर दिया. यह गैर सरकारी संगठन आज भारत में खूब फल-फूल रहे हैं. इस उपन्यास का आरंभ एक पात्र गंगाधर आचार्य द्वारा कभी न देखी जाने वाली प्रचंड गर्मी से होता है और अंत उसी गंगाधर आचार्य द्वारा सारी आत्मस्वकृतियों को बापू के चरणों में अर्पित कर उनकी समाधि स्थल से बाहर आते हुए होता है. यह बेहद दिलचस्प उपन्यास है और एनजीओ के कोने-अंतरे में झांकते हुए उसकी गतिविधिओं को बेनकाव करनेवाला.

उपन्यास की तुलना में इस वर्ष कहानी-संग्रहों की संख्या भी कम नहीं है, जिसमें नए और पुराने लेखकों के संग्रह शामिल हैं. सुपरिचित वरिष्ठ कथाकार ममता कालिया का इसी वर्ष महत्वपूर्ण नया कहानी-संग्रह ‘थोड़ा सा प्रगतिशील’ आया है जिसमें उनकी 13 कहानियां संकलित हैं. ये कहानियां उनकी लेखन-प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जिसमें एक ओर प्रेम है तो दूसरी ओर बदलते समाज की धड़कने. अपने लेखन की वजह का खुलासा वे कुछ इस तरह करती हैं, ‘समय के सवालों से जूझने की चुनौती और उत्कंठा तथा जीवन के प्रति नित-नूतन विस्मय ने ही रचनाओं का लिखना संभव किया है.’ कहानी में यथार्थ की गुजांइश के बारे में उनका मानना है कि ‘बड़ा अजीब लगता है कि कहानी में पहले अपने यथार्थ को कल्पना बनाओ, फिर उसे कथा यथार्थ बनाकर ऐसे लिखो कि वह अकेले एक की नहीं, हर एक की कथा लगे. इस प्रक्रिया में यथार्थ से एक जायज दूरी हासिल करनी होती है और उन स्मृतियों से भी छुटकारा मिलता है, जो आपके मन पर बैठी रहती हैं.’ ममता जी की कहानियों की एक बड़ी उपलब्धि यह है कि उनमें सहज, सरल और पारदर्शी भाषा के साथ गजब की पठनीयता है, जो पाठक को पूरी तरह अपनी गिरफ्त में ले लेती है.

‘वागर्थ’ में प्रकाशित ‘तक्षशिला में आग’ कहानी से चर्चित राकेश मिश्र का दूसरा कहानी-संग्रह है ‘लाल बहादुर का इंजन’, जिसमें उनकी सात कहानियां संकलित हैं. राकेश मिश्र की ये तमाम कहानियां कहानी के पारंपरिक ढांचे से न केवल अलग हटकर हैं बल्कि कथावस्तु की दृष्टि से बिखरी हुई भी हैं. यह उनके कथा शिल्प की कमजोरी नहीं बल्कि उसकी ताकत है, क्योंकि वे कहानी में यथार्थ को ऊपर से नहीं थोपते हैं, बल्कि उस यथार्थ के भीतर से कहानी निकालते हैं. यह उनकी कहानी ‘शोक’ और ‘लाल बहादुर का इंजन’ में उभरकर आया है.

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