आंकड़ों की खेती सवालों की फसल! | Tehelka Hindi

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आंकड़ों की खेती सवालों की फसल!

पिछले साल भारी बारिश-ओले पड़ने से फसलों को काफी नुकसान पहुंचा था इसके बाद भी मध्य प्रदेश सरकार कृषि विकास दर में 24.99 फीसदी की अभूतपूर्व वृद्धि का दावा कर रही है. क्या ये दोनों बातें एक साथ संभव हैं?
2014-08-31 , Issue 16 Volume 6
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मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान किसानों की बर्बाद फसल का जायजा लेते हुए.

पिछले तीन सालों के दौरान देश के कृषि मानचित्र में मध्य प्रदेश का तेजी से उभार हुआ है. ‘बीमारू’ की श्रेणी में आनेवाला यह राज्य देश में सबसे अधिक कृषि विकास दर के साथ आगे बढ़ रहा है. राज्य की कृषि विकास दर वित्त वर्ष 2011-12 में 18.90  फीसदी और वित्त वर्ष 2012-13 में 20.44 फीसदी रही. इस विकास दर को देखते हुए मध्य प्रदेश को लगातार दो बार केंद्र सरकार का कृषि कर्मठ पुरस्कार भी प्राप्त हुआ. इन दो सालों में प्रदेश का मौसम तो औसत रहा लेकिन कृषि उत्पादन लगातार बढ़ता रहा.

यहां तक सबकुछ ठीक चल रहा था किंतु वित्त वर्ष 2013-14 में इंद्रदेव देश के इस हृदयस्थल पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो गए. जून से शुरू हुआ बारिश का सिलसिला इस साल फरवरी तक चलता रहा. पिछली बार राज्य में जून से सितंबर के दौरान ही सामान्य से तकरीबन 18 फीसदी ज्यादा बारिश हुई. उसके बाद आगे चार महीने बारिश होती रही. इतना ही नहीं फरवरी, 2014 के दौरान तो अतिवृष्टि के साथ ही ओलावृष्टि भी हुई. इस भारी बारिश और ओलावृष्टि के चलते राज्य में खरीफ (जिन फसलों की बुवाई मॉनसून में होती है) और रबी (ठंड के मौसम में बोई जानेवाली फसलें) दोनों सीजन की फसलों को भारी नुकसान हुआ. राज्य सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार खरीफ में 28 जिलों और रबी में सभी 51 जिलों में फसलों को नुकसान हुआ. इन स्थितियों के बाद भी चमत्कार यह कि राज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश की कृषि और उससे संबंधित पशुपालन क्षेत्र की विकास दर 24.99 फीसदी तक पहुंच गई. इसमें से यदि पशुपालन को हटा दिया जाए तो केवल कृषि क्षेत्र की विकास दर 24 फीसदी होती है. यानी लगातार तीसरे साल कृषि विकास दर में बढोत्तरी. और वह भी बीते साल की तुलना में साढ़े तीन फीसदी ज्यादा !

राज्य सरकार के इन आंकड़ों ने सभी को चौंका दिया है. खुद किसानों से लेकर विशेषज्ञ तक इस नतीजे पर हैरानी जता रहे हैं. इस संदेह का कारण खुद सरकार द्वारा दिए आंकड़ों का विरोधाभास है. इनके हिसाब से दोनों सीजनों में फसलों को भारी नुकसान तो हुआ लेकिन कुल उत्पादन पिछले सालों की तुलना में बढ़ गया है. तो क्या ये दोनों स्थितियां एक साथ संभव हैं? राज्य सरकार तो इस सवाल पर पहले ही अपना पक्ष साफ कर चुकी है लेकिन विशेषज्ञों से बातचीत और उत्पादन-नुकसान के आंकड़ों का हमारा आकलन इस संभावना पर कई गंभीर सवाल खड़े करता है.

चूंकि यहां सारे दावे और उनपर सवाल आंकड़ों पर आधारित हैं तो पहले इन्हीं को अलग-अलग कर देखते हैं. पहले खरीफ की फसल की बात करते हैं. मध्य प्रदेश में इस सीजन की मुख्य फसलें, सोयाबीन, धान, ज्वार और मक्का हैं. बीते खरीफ के सीजन में हुई भारी बारिश से सभी मुख्य फसलों को भारी नुकसान हुआ. सोयाबीन का रकबा अपेक्षाकृत बहुत ज्यादा होता है और इसकी फसल ही सबसे ज्यादा बर्बाद हुई. प्रदेश के 28 जिलों में 9.24 लाख हेक्टेयर में फसलों को नुकसान हुआ. इसमें 5.62 लाख हेक्टेयर क्षेत्र ऐसा रहा जहां पर फसलों का नुकसान 50  फीसदी से अधिक था. राज्य सरकार ने खरीफ सीजन में फसलों के नुकसान का जो आकलन किया है वह 4,640 करोड़ रुपये का है. राज्य सरकार भी उत्पादन आंकड़ों के आधार पर इसे स्वीकार करती है. वर्ष 2012 में खरीफ का कुल कृषि उत्पादन करीब 165  लाख टन था, जो वर्ष 2013 में घटकर 128 लाख टन रह गया. हालांकि कुल बुआई क्षेत्रफल वर्ष 2012 के 119.40 लाख हेक्टेयर की तुलना में वर्ष 2013 में बढ़कर 124 लाख हेक्टेयर हो गया था.

gaurishankar_bisen-BK2013-14 में दोनों सीजन की फसलों को काफी नुकसान हुआ लेकिन मुख्य फसल के स्थान पर दूसरी फसलों की उपज बढ़ने से नुकसान की भरपाई हो गई’

गौरीशंकर बिसेन कृषि मंत्री, मप्र

जैसा हमने पहले बताया है कि राज्य सरकार खरीफ सीजन में तो नुकसान स्वीकार कर रही है. लेकिन रबी सीजन के उत्पादन में वह काफी बढ़ोतरी दिखा रही है. जबकि इस सीजन में बारिश और ओलावृष्टि से खरीफ की तुलना में ज्यादा क्षेत्रफल में नुकसान हुआ था. अब यदि हम बुवाई क्षेत्रफल और उत्पादकता के सरकारी आंकड़ों को आधार मानें तो इससे भी साबित हो जाता है कि उत्पादन सरकारी अनुमान से काफी कम है. रबी सीजन में बारिश और ओलावृष्टि से नुकसान के बारे में सरकार कहती है कि कुल 37 लाख हेक्टेयर में नुकसान हुआ है. इसमें से करीब 11 लाख हेक्टेयर ऐसा क्षेत्र है जहां पर फसल का नुकसान पचास फीसदी से ज्यादा है. सरकारी प्रावधानों के मुताबिक यदि फसल का नुकसान 30 फीसदी से अधिक होता है तभी सरकार उसे नुकसान मानती है और उसका मुआवजा तय करती है. इस आधार पर माना जा सकता है कि 26 लाख हेक्टेयर में नुकसान कम से कम 30 फीसदी हुआ होगा और 11 लाख हेक्टेयर में कम से कम 50 फीसदी. रबी सीजन का कुल बुवाई क्षेत्रफल 112 लाख हेक्टेयर है. इसमें से 37 लाख हेक्टेयर को हटा दिया जाए तो करीब 75 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में कोई नुकसान नहीं हुआ. मध्य प्रदेश में रबी की उत्पादकता लगभग 2.10 टन प्रति हेक्टेयर बताई गई है. इस तरह से 75 लाख हेक्टेयर में कुल उत्पादन करीब 157.50 लाख टन हुआ. नुकसान वाले 26 लाख हेक्टेयर में उत्पादन 38 लाख टन और शेष 11 लाख हेक्टेयर में तकरीबन 11.50 लाख टन होना चाहिए.  इस तरह से 2013 की रबी फसल का कुल उत्पादन करीब 207  लाख टन होता है. हमारा अनुमान नुकसान के न्यूनतम आकलन पर आधारित है जबकि राज्य सरकार उत्पादन 238 लाख टन बता रही है. यहां उत्पादन में लगभग 31 लाख टन की बढ़ोतरी मामूली नहीं मानी जा सकती. एक  कृषि विशेषज्ञ नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ‘ खरीफ सीजन में उत्पादन में कमी खुद सरकार स्वीकार कर रही है. दूसरी ओर यदि रबी उत्पादन के आंकड़ों को सही भी मान लें तब भी विकास दर में 24 फीसदी की बढ़ोत्तरी संभव नहीं है. वैसे भी रबी में ज्यादा उत्पादन की बात को सही नहीं माना जा सकता’  वित्त वर्ष 2012-13 में जब औसत मौसम था तब रबी का कुल उत्पादन 221.15 लाख टन हुआ था, जो वित्त वर्ष 2013-14 में खराब मौसम के बावजूद बढ़कर 238 लाख टन हो गया. इस सीजन की सबसे प्रमुख फसल गेहूं होती है, जिसका उत्पादन 161 लाख टन से बढ़कर 178 लाख टन हो गया है.  इन आंकडों पर कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा कहते हैं, ‘ जो भी आंकड़े राज्य सरकार ने प्रस्तुत किए हैं  उन पर पूरी तरह विश्वास करना मुश्किल है. उत्पादकता में भारी बढ़ोतरी हो रही होती तो दोनों ही स्थितियां एक साथ संभव थीं पर ऐसा नहीं हुआ.’

मध्य प्रदेश की कृषि विकास दर में सबसे ज्यादा योगदान सोयाबीन और गेहूं का होता है. सरकार के दावे को आधार बनाकर इन्हीं दोनों के उत्पादन आंकड़ों पर प्रश्न चिन्ह खड़ा किया जा रहा है.

सोयाबीन हुआ तो गया कहां?
मध्य प्रदेश सबसे ज्यादा सोयाबीन (देश के कुल सोयाबीन उत्पादन में 55 फीसदी योगदान) उत्पादन करनेवाला राज्य है. सबसे ज्यादा सोयाबीन प्रोसेसिंग  प्लांट भी यहीं पर हैं. इसी कारण यहां से सबसे ज्यादा सोयामील (सोयाबीन की खली) का निर्यात भी होता है. सोया उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि राज्य सरकार सोयाबीन उत्पादन के जो आंकड़े प्रस्तुत कर रही है वे जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाते. सरकार ने वित्त वर्ष 2013-14 में सोयाबीन का उत्पादन लगभग 47 लाख टन बताया है जो पिछले साल के 83 लाख टन से काफी कम है. लेकिन इस हिसाब से भी प्लांटों के लिए बाजार में सोयाबीन अपेक्षानुसार उपलब्धता नहीं है. इसी का परिणाम है कि इस वर्ष सोयामील निर्यात में भारी गिरावट आई है. सोयाबीन की फसल अक्टूबर से मंडियों में आने लगती है. आंकड़े बताते हैं कि अक्टूबर, 2013 से लेकर जुलाई, 2014 तक सोयामील का निर्यात लगातार कम हुआ है.

पिछले तीन सालों के दौरान मध्य प्रदेश के विभिन्न जिलों में गेहूं की सरकारी खरीद 50 फीसदी से लेकर दोगुना तक बढ़ी और घटी है

इंदौर की सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन (सोपा) के आंकड़ों के अनुसार जुलाई, 2014 के दौरान देश से सोयामील का निर्यात 6,682 टन हुआ है, जबकि जुलाई, 2013 में यह निर्यात 1.07 लाख टन था. इसी तरह अक्टूबर, 2013 से जुलाई, 2014 के दौरान कुल निर्यात 20.58 लाख टन हुआ है जबकि पिछले तेल वर्ष (अक्टूबर, 2012 से सितंबर, 2013 तक) में निर्यात 31.15 लाख टन था. सोपा के प्रवक्ता राजेश अग्रवाल बताते हैं, ‘ निर्यात में जो कमी आई है उसकी मुख्य वजह सोयाबीन की उपलब्धता का अभाव है. बाजार में सरकार के अनुमान के हिसाब से सोयाबीन नहीं है. इसके चलते दाम भी काफी ऊंचे हंै. वास्तविक उत्पादन सरकारी अनुमान से कहीं कम है.’

गेहूं का गोलमाल
राज्य सरकार का दावा है कि गेहूं का उत्पादन वर्ष 2012 के 161.25 लाख टन की तुलना में वर्ष 2013 में 174.78 लाख टन हुआ है. इसके लिए सरकार गेहूं की सरकारी खरीद को आधार बता रही है. उसका कहना है कि पिछले वर्ष की तुलना में इस साल अधिक उत्पादन की वजह से सरकारी खरीद में बढ़ोत्तरी हुई है. इसके विपरीत जानकारों का कहना है कि राज्य में गेहूं की सरकारी खरीद में एक बड़ा हिस्सा पड़ोसी राज्यों से आई गेहूं का है. असल में मध्य प्रदेश में गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर 150 रुपये प्रति क्विंटल का बोनस होता है इस वजह से अन्य राज्यों के किसानों ने काफी मात्रा में यहां गेहूं बेचा है.  यही वजह है कि गेहूं ‘उत्पादन’ में मध्य प्रदेश भारी बढ़ोतरी दर्ज कर रहा है.

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(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 6 Issue 16, Dated 31 August 2014)

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