कनहर में दफन होती समाजवाद की थीसिस | Tehelka Hindi

उत्तर प्रदेश, राज्यवार A- A+

कनहर में दफन होती समाजवाद की थीसिस

सोनभद्र में बन रहा कनहर बांध विवादों के केंद्र में है. आंबेडकर जयंती पर इसके विरोध में प्रदर्शन कर रहे ग्रामीणों पर गोलीबारी कई तरह के सवाल उठा रही है

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इस साल अक्षय तृतीया पर जब देशभर में लगन चढ़ा हुआ था, बारातें निकल रही थीं और हिंदी अखबारों के स्थानीय संस्करण हीरे-जवाहरात के विज्ञापनों से पटे पड़े थे, तब बनारस से सटे सोनभद्र के दो गांवों में पहले से तय दो शादियां टल गईं. फौजदार (पुत्र केशवराम, निवासी भीसुर) के बेटे का 22 अप्रैल को तिलक था. शादी अगले हफ्ते होनी थी. पड़ोस के गांव में 24 अप्रैल को देवकलिया और शनीचर (निवासी सुंदरी) की बेटी की शादी थी. हाल ये था कि फौजदार समेत देवकलिया और शनीचर सभी 20 अप्रैल तक दुद्धी तहसील के ब्लॉक चिकित्सालय में भर्ती थे. देवकलिया की बेटी घर पर अकेली थी. 20 की शाम को अचानक फौजदार और शनीचर को गंभीर घायल घोषित कर के पांच अन्य मरीजों के साथ जिला चिकित्सालय में भेज दिया गया जबकि देवकलिया को दस मरीजों के साथ छुट्टी दे दी गई. देवकलिया जानती थी कि चार दिन में अगर वह शादी की तैयारी कर भी लेगी तो उसके पति शनीचर को अस्पताल से नहीं छोड़ा जाएगा क्योंकि उत्तर प्रदेश के समाजवादी राज में सरकारी अस्पताल ‘जेल’ साबित हो रहा है.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को शायद नहीं पता कि हेम्बोल्ट विश्वविद्यालय के अभिलेखागार से राममनोहर लोहिया की जिस गायब थीसिस पर वे अप्रैल के तीसरे सप्ताह में ट्वीट कर के चिंता जता रहे थे, उसे उत्तर प्रदेश की पुलिस ने कनहर नदी की तलहटी में हफ्ताभर पहले ही दफना दिया था. पिछले पांच महीने से सोनभद्र जिले को ‘विकास’ नाम का रोग लगा हुआ है. इसके पीछे पांगन नदी पर प्रस्तावित कनहर नाम का एक बांध है जिसे कोई चालीस साल पहले सिंचाई परियोजना के तहत मंजूरी दी गई थी. झारखंड (तत्कालीन बिहार), छत्तीसगढ़ (तत्कालीन मध्य प्रदेश) और उत्तर प्रदेश के बीच आपसी मतभेदों के चलते लंबे समय तक इस पर काम रुका रहा. बीच में दो बार इसका लोकार्पण भी हुआ. पिछले साल जिस वक्त अखिलेश यादव की सरकार ने नई-नई विकास परियोजनाओं का एेलान करना शुरू किया, ठीक तभी उनकी सरकार को इस भूले हुए बांध की भी याद हो आई. कहते हैं कि उनके चाचा सिंचाई मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने इसमें खास दिलचस्पी दिखाई और सोनभद्र को हरा-भरा बनाने के नाम पर इसका काम शुरू करवा दिया. दिसंबर में काम शुरू हुआ तो ग्रामीणों ने विरोध करना शुरू किया. प्रशासन से उनकी पहली झड़प 23 दिसंबर 2014 को हुई. इसके बाद 14 अप्रैल, 2015 को आंबेडकर जयंती के दिन पुलिस ने धरना दे रहे ग्रामीणों पर लाठियां बरसाईं और गोली भी चलाई. एक आदिवासी अकलू चेरो को छाती के पास गोली लगकर आर-पार हो गई. वह बनारस के सर सुंदरलाल चिकित्सालय में भर्ती है. उसे अस्पताल लानेवाले दो साथी लक्ष्मण और अशर्फी मिर्जापुर की जेल में बंद हैं. इस घटना के बाद भी ग्रामीण नहीं हारे. तब ठीक चार दिन बाद 18 अप्रैल की सुबह सोते हुए ग्रामीणों को मारकर खदेड़ दिया गया, उनके धरनास्थल को साफ कर दिया गया और पूरे जिले में धारा 144 लगा दी गई. यह धारा 19 मई तक पूरे जिले में लागू है. अब तक दो दर्जन से ज्यादा गिरफ्तारियां हो चुकी हैं. आंदोलनकारियों को चुन-चुनकर पकड़ा जा रहा है.

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फौजदार, शनीचर और देवकलिया उन 15 घायलों में शामिल सिर्फ तीन नाम हैं जिन्हें 20 अप्रैल तक दुद्धी के ब्लॉक चिकित्सालय में बिना पानी, दातुन और खून से लथपथ कपड़ों में अंधेरे वार्डों में कैद रखा गया था. प्रशासन की सूची के मुताबिक 14 अप्रैल की घटना में 12 पुलिस अधिकारी/कर्मचारी घायल हुए थे जबकि सिर्फ चार प्रदर्शनकारी घायल थे. इसके चार दिन बाद 18 अप्रैल की सुबह पांच बजे जो हमला हुआ, उसमें चार पुलिसकर्मियों को घायल बताया गया है जबकि 19 प्रदर्शनकारी घायल हैं. दोनों दिनों की संख्या की तुलना करने पर ऐसा लगता है कि 18 अप्रैल की कार्रवाई हिसाब चुकाने के लिए की गई थी. इस सूची में कुछ गड़बडि़यां भी हैं. मसलन, दुद्धी ब्लॉक के सरकारी चिकित्सालय में भर्ती सत्तर पार के जोगी साव और तकरीबन इतनी ही उम्र की रुकसार का नाम सरकारी सूची में नहीं है.

हम वास्तव में नहीं जान सकते कि कनहर बांध की डूब से सीधे प्रभावित होनेवाले गांवों सुंदरी, भीसुर और कोरची के कितने बसे-बसाए घर उजड़ जाएंगे

हम वास्तव में नहीं जान सकते कि कनहर बांध की डूब से सीधे प्रभावित होनेवाले गांवों सुंदरी, भीसुर और कोरची के कितने घरों में इस लगन में बारात आने वाली थी, कितने घरों में वाकई आई और कितनों में शादियां टल गईं. कितने घर बसने से पहले उजड़ गए और कितने बसे-बसाये घर बांध के कारण उजड़ेंगे, दोनों की संख्या जानने का कोई भी तरीका हमारे पास नहीं है. दरअसल, यहां कुछ भी जानने का कोई तरीका नहीं है सिवाय इसके कि आप सरकारी बयानों पर जस का तस भरोसा कर लें. वजह इतनी-सी है कि यहां एक बांध बन रहा है और बांध का मतलब विकास है. इसका विरोध करनेवाला कोई भी व्यक्ति विकास-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी है. भरोसा न हो तो विंध्य मंडल के मुख्य अभियंता कुलभूषण द्विवेदी के इस बयान पर गौर करें, ‘पहली बार देश को मर्द प्रधानमंत्री मिला है. पूरी दुनिया में उसने भारत का सिर ऊंचा किया है वरना हम कुत्ते की तरह पीछे दुम दबाए घूमते थे.’ इनका कहना है कि मुख्य सचिव, मुख्यमंत्री और आला अधिकारी 14 अप्रैल की गोलीबारी के बाद कनहर बांध पर रोज बैठकें कर रहे हैं और पूरे इलाके को छावनी में तब्दील करने का आदेश ऊपर से आया है. फिलहाल कनहर में मौजूद पुलिस चौकी को थाने में तब्दील किया जा रहा है.

सोनभद्र के पुलिस अधीक्षक शिवशंकर यादव कहते हैं, ‘पूरी जनता साथ में है कि बांध बनना चाहिए. सरकार साथ में है. तीनों राज्य सरकारों का एग्रीमेंट हुआ है बांध बनाने के लिए… हम लोगों ने जितना एहतियात बरता है, उसकी जनता तारीफ कर रही है.’ यादव का यह बयान एक मान्यता है. इस मान्यता के पीछे काम कर रही सोच को आप सोनभद्र के युवा जिलाधिकारी संजय कुमार के इस बयान से समझ सकते हैं, ‘हमने जो भी बल प्रयोग किया, वह इसलिए ताकि लोगों को संदेश दिया जा सके कि लॉ ऑफ द लैंड इज देयर… आप समझ रहे हैं? ऐसे तो लोगों में प्रशासन और पुलिस का डर ही खत्म हो जाएगा. कल को लोग कट्टा लेकर गोली मार देंगे… आखिर हमारे दो गजेटेड अफसर घायल हुए हैं..!’

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3 Comments

  • Very good and well researched article.
    Sanjay Rai

  • अभिषेक जी मजबूत खबर लिखी है.. आगे भी इस पर फालोअप हो तो अच्छा लगेगा

  • “सब पापी पेट का खेला है” कभी यही बात हमें महेशा भाई ने बोली थी ! खैर एक बात की पुष्टि तो हो ही रही है की आन्दोलन चलाना और उसको अंजाम तक ले जाना एन० जी० ओ० वालों के बस की बात नहीं है !