न्याय की रक्षक को न्याय की तलाश

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Aruna-Rai

23 अप्रैल 2014 का दिन खबरों के लिहाज से बेहद घटनापूर्ण था. आईपीएल में स्पॉट फिक्सिंग की जांच के लिए बनी जस्टिस मुद्गल कमेटी ने इसी दिन बीसीसीआई के अध्यक्ष एन श्रीनिवासन की भूमिका अपनी जांच के दायरे में लेने का फैसला किया था. इसी दिन एक वीडियो सामने आया था जिसमें पूर्व ‘आप’ नेता शाजिया इल्मी मुसलमानों से वोट देते समय ‘कम्युनल’ हो जाने की अपील करती दिख रही थीं. इसी दिन बॉलीवुड के दो चमकदार नामों रानी मुखर्जी और आदित्य चोपड़ा ने एक-दूजे का हो जाने की घोषणा भी की थी. इतनी सारी खबरों के बीच दिल्ली से सटे मेरठ शहर से आई एक खबर लगभग गुम हो गई. यह खबर थी मेरठ के पुलिस ट्रेनिंग स्कूल में तैनात एक महिला सब इंसपेक्टर (एसआई) के साथ हुए यौन दुर्व्यवहार की. हालांकि खबर पूरी तरह दम तोड़ती उससे पहले सोशल मीडिया और दूसरे माध्यमों के जरिए इस पर बहस छिड़ गई. इस चर्चा में आने का नतीजा यह हुआ कि मामले की जांच के लिए पुलिस को विभागीय जांच बिठानी पड़ी और प्रदेश सरकार को एक अलग जांच कमेटी बनानी पड़ी. तहलका को मिली जानकारी के मुताबिक कमेटी ने अपनी फाइनल रिपोर्ट में आरोपी को दोषी भी पाया है.

लेकिन अब उस रिपोर्ट को लेकर सरकार और पुलिस विभाग का रुख कुछ स्पष्ट नहीं है. आरोपी अधिकारी एक बार फिर से बहाल हो चुका है. पीड़िता एसआई अपनी लड़ाई को फिर भी आगे बढ़ाने में लगी हुई है. उधर, इस मामले में आरोपी और उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी उलटे खुद को ही पीड़ित बताते हैं .

यह कहानी मेरठ के पुलिस ट्रेनिंग स्कूल में तैनात एसआई अपूर्वा राय (बदला हुआ नाम) की है. 23 अप्रैल को अपूर्वा अपने दफ्तर में थीं जब उनके वरिष्ठ अधिकारी उप महानिरीक्षक (डीआईजी) देवी प्रसाद श्रीवास्तव ने उन्हें अपने कमरे में तलब किया. अपूर्वा के मुताबिक उनके कमरे में प्रवेश करने के बाद श्रीवास्तव ने उनके साथ मौखिक और शारीरिक रूप से अभद्रता करने की कोशिश की. अपूर्वा किसी तरह से उनके कमरे से निकलीं और अपने वरिष्ठ अधिकारी सीओ धुरेंद्र कुमार सिंह से डीआईजी के आचरण की शिकायत की. श्रीवास्तव यहीं नहीं रुके उन्होंने मोबाइल के जरिए अपूर्वा से संपर्क करने की कई कोशिशें की. पीड़िता द्वारा बतौर सबूत पेश किए गए मोबाइल रिकॉर्ड से भी इस बात की पुष्टि होती है. आरोपों के मुताबिक डीआईजी ने आगे भी पीड़िता को परेशान करना जारी रखा. उन्होंने अपने पद की धौंस देते हुए पीड़िता पर किसी तरह की शिकायत न करने का दबाव डाला. आरोप है कि इससे भी बात नहीं बनी तो उन्होंने अपनी पत्नी को अपूर्वा को मनाने के लिए भेजा. बाद में फोन पर उन्होंने अपूर्वा से माफी मांगते हुए उन्हें अपनी बहन बनाने का प्रस्ताव भी रखा जिसे अपूर्वा ने रिकॉर्ड कर लिया. यह रिकॉर्डिंग भी बतौर साक्ष्य जांच कमेटी के सामने प्रस्तुत की गई है. तहलका ने जब इस मामले पर श्रीवास्तव से बात की तो उनका कहना था, ‘मैंने उसकी गलती पर उसे डांटा था. इन लोगों ने मेरठ पुलिस ट्रेनिंग स्कूल में अपना गुट बना रखा है. इसके जरिए ये लोग उलटे-सीधे काम करते हैं. वरिष्ठ होने के नाते यह मेरी जिम्मेदारी थी कि मैं चीजों पर नजर रखता. लेकिन उसने इस डांट को यौन उत्पीड़न के रूप में लोगों के सामने रखा. इससे मैं बहुत नर्वस हो गया. उसी दबाव में मैंने उससे माफी मांगी थी.’

अपूर्वा के मुताबिक अपने साथ हुई इस घटना से घबराकर उन्होंने वरिष्ठ अधिकारी के अनैतिक व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाने का फैसला किया. 26 अप्रैल को डीजी ट्रेनिंग अरविंद कुमार जैन का पुलिस ट्रेनिंग स्कूल, मेरठ का दौरा था. अपूर्वा ने उनसे डीआईजी की लिखित शिकायत कर दी.

यहां एक बात पर ध्यान देना जरूरी है. शुरुआत से ही अपूर्वा कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के लिए बने नए कानून के तहत शिकायत दर्ज करवाना चाहती थीं. लेकिन विभाग ने उनकी बात पर ध्यान दिए बिना एक विभागीय जांच शुरू कर दी. लेकिन अपूर्वा पूरे समय अपनी इस बात पर अड़ी रहीं कि उन्हें महिलाओं के साथ कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न कानून के तहत मामला दर्ज करवाना है. इसके तहत एक स्वतंत्र कमेटी का गठन करना अनिवार्य था. इस बीच अपूर्वा ने एक और काम किया, उन्होंने अपने साथ हुए शोषण को सोशल मीडिया और अखबारों के माध्यम से भी आगे बढ़ाया.

अपूर्वा की शिकायत के आधार पर उनके विभाग ने आंतरिक जांच शुरू कर दी. लेकिन अपूर्वा को इस विभागीय जांच पर भरोसा नहीं था. उनका दबाव था कि मामले की जांच यौन उत्पीड़न के नए कानूनों के तहत एक कमेटी करे. मामला बड़ा होता जा रहा था. पुलिस विभाग पर दबाव बढ़ गया था लिहाजा आनन-फानन में तीन मई को विशाखा गाइडलाइंस के तहत एक और जांच कमेटी का गठन कर दिया गया. बाद में इस कमेटी को यौन उत्पीड़न के नए कानून के तहत पूर्ण कालिक कमेटी का दर्जा दे दिया गया. यह कमेटी विभागीय जांच के समानांतर अपनी जांच आगे बढ़ाने लगी. यहां से इस मामले में पेंच फंसते दिखते हैं. अपूर्वा कहती हैं, ‘मुझे विभागीय कार्रवाई पर कभी भी भरोसा नहीं था. यह लोग मामले में लीपापोती करने की कोशिश कर रहे थे. इसीलिए मैं शुरू से ही यौन उत्पीड़न अधिनियम के तहत मामला दर्ज करवाना चाहती थी.’

जांच के दौरान हुए घटनाक्रम से अपूर्वा का यह आरोप समझा जा सकता है. विभागीय जांच कर रही कमेटी को अपनी रिपोर्ट 45 दिनों के भीतर देनी थी. पर यह जांच अभी तक पूरी नहीं हो सकी है. विभागीय जांच के एक नियम के मुताबिक अगर नियत समय के भीतर जांच की रिपोर्ट नहीं आती है तो आरोपी व्यक्ति का निलंबन वापस लेकर उसे बहाल कर दिया जाना चाहिए. इस कानूनी पेंच की मदद से आरोपी डीपी श्रीवास्तव का निलंबन वापस ले लिया गया है. बहाल करते हुए उन्हें डीजी ऑफिस लखनऊ से अटैच कर दिया गया है.

समय सीमा के भीतर रिपोर्ट आ जाने के महीने भर बाद भी पुलिस महानिदेशक कार्यालय ने अभी तक इस पर कोई कार्रवाई नहीं की है

इस मामले में पुलिस विभाग की हीलाहवाली का एक दूसरा पक्ष भी है. जो पुलिस विभाग 45 दिन में रिपोर्ट न दे पाने की तकनीकी सीमाओं का फायदा उठा कर आरोपी अधिकारी को तत्काल बहाल कर देता है उसी विभाग का विशाखा कमेटी की रिपोर्ट के प्रति जो रवैया है वह सवाल खड़े करता है. तहलका को मिली जानकारी के मुताबिक रिपोर्ट में आरोपी डीआईजी श्रीवास्तव के खिलाफ संस्तुतियां की गई हैं जिसमें विभागीय कार्रवाई के साथ ही उनके खिलाफ यौन उत्पीड़न कानून 2013 के तहत एफआईआर दर्ज करने की बात कही गई है. गौरतलब है कि इस कमेटी को अपनी रिपोर्ट 90 दिनों के भीतर दे देनी थी. कमेटी ने इससे पहले ही पांच अगस्त को अपनी रिपोर्ट पुलिस महानिदेशक को सौंप दी. लेकिन जो पुलिस विभाग 45 दिन के नियम का हवाला देकर आरोपी को बहाल करने में कोई वक्त नहीं लगाता वह समय से पहले कमेटी की रिपोर्ट आ जाने पर भी उसकी संस्तुतियों पर कार्रवाई करने की बजाय चुप है. इस जांच कमेटी की एक सदस्य शालिनी माथुर कहती हैं, ‘मैं जांच के निष्कर्षों के बारे में तो कुछ नहीं कहूंगी. इतना जरूर कहूंगी कि लगभग महीना होने को आ रहा है, लेकिन पुलिस महानिदेशक कार्यालय ने अभी तक इस पर कोई कार्रवाई नहीं की है.’ तहलका ने यह जानने की कई कोशिशें कीं कि कमेटी द्वारा दी गई जांच रिपोर्ट पर पुलिस विभाग क्या कार्रवाई कर रहा है. उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक आनंद लाल बनर्जी से फोन और ईमेल से संपर्क करने के प्रयास किए गए. लेकिन खबर लिखे जाने तक उनका कोई जवाब नहीं आया था.

वैसे शुरुआत से ही इस पूरे मामले में विभाग का रवैय्या सवालिया रहा है. तीन मई को जांच कमेटी का गठन होने के बाद जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ी. इसी के तहत 31 मई को आरोपी अधिकारी के खिलाफ मेरठ के महिला थाने में एक एफआईआर भी दर्ज करवाई गई. इसमें तमाम धाराओं के साथ ही धारा 364 भी लगाई गई थी. यह गैर जमानती धारा है जिसमें आरोपी की गिरफ्तारी संभव थी. 13 जून को पुलिस ने चुपके से यह धारा एफआईआर से हटा दी. इससे अपूर्वा के आरोपों को बल मिलता है कि पुलिस विभाग मामले में लीपापोती कर रहा था. लेकिन आरोपी डीआईजी श्रीवास्तव का इस पूरे प्रकरण पर अपना अलग मत है. वे कहते हैं, ‘पुलिस ने प्रथम दृष्टया अपनी जांच में ऐसा कुछ पाया ही नहीं तो धारा लगाने का सवाल ही पैदा नहीं होता.’

अपूर्वा राय का पूरा मामला असल में उत्तर प्रदेश समेत देश के सारे पुलिस विभाग में महिलाओं के प्रति फैली एक किस्म की उदासीनता की कहानी है. अपूर्वा कहती हैं, ‘सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद आज तक प्रदेश के पुलिस विभाग में विशाखा गाइडलाइंस की तर्ज पर कोई कमेटी नहीं है जहां महिलाएं अपने साथ हुए किसी तरह के दुर्व्यवहार की शिकायत कर सकें. मेरे साथ भी यही हुआ. अगर मीडिया और सोशल मीडिया में लोगों ने सहयोग नहीं किया होता तो शायद इस मामले में भी जांच कमेटी का गठन नहीं किया जाता.’ इस मामले की जांच कमेटी की सदस्य शालिनी माथुर कहती हंै, ‘महिलाओं के साथ होने वाले उत्पीड़न से जुड़े कानूनों को लेकर किसी को ज्यादा कुछ पता नहीं है. कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से जुड़ा कानून है लेकिन उसके बारे में महिलाकर्मियों को ज्यादा कुछ पता नहीं है. इस एक्ट का एक प्रमुख हिस्सा है कि इस कानून का प्रचार-प्रसार संबंधित विभाग द्वारा किया जाए और लोगों को इसके बारे में जागरुक किया जाए, लेकिन इस किस्म की कोई प्रयास विभागीय स्तर पर नहीं होता है. यह चिंता का विषय है.’

जानकारी या कहें कि विकल्पों के अभाव में अक्सर इस तरह के मामले लीपापोती करके बंद कर दिए जाते हैं. अपूर्वा इस मामले में भाग्यशाली रहीं कि उन्हें कानूनों की भी जानकारी थी और उन्होंने इस मामले मंे अपनी पहचान न छिपाने का फैसला किया. इससे उन्हें अपनी लड़ाई को सोशल मीडिया जैसे प्लेटफॉर्म पर ले जाने में आसानी हुई. इसके बावजूद उनकी लड़ाई अभी अधर में है. फिलहाल मामले में पुलिस विभाग का रवैया लचर है, लेकिन अपूर्वा का हौसला कायम है. वे कहती हैं, ‘मैं अपनी लड़ाई को अंतिम मुकाम तक पहुंचाऊंगी. आगे की लड़ाई में मैं सूचना कानून के अधिकार का सहारा लूंगी.’

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