आईएस: समस्याजनक समाधान

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पिछले हफ्ते खबरें आई कि चेन्नई के एक युवा ने आईएस यानी इस्लामिक स्टेट (आईएस) के फिदायीन हमले में शामिल होकर खुद को बम से उड़ा लिया है. इससे कुछ ही पहले महाराष्ट्र में ठाणे के चार नौजवानों के आईएस में भर्ती होने की बात सुर्खियां बनी थीं. बाद में पता चला कि उनमें से आरिफ मजीद नाम के एक युवा की लड़ाई में मौत भी हो गई. हालांकि गृहमंत्री राजनाथ सिंह सहित तमाम हस्तियां तर्क दे रही हैं कि भारत के मुसलमान आईएस का विरोध करते हैं, लेकिन सुरक्षा एजेंसियां चिंतित हैं. उनके पास पक्की जानकारी है कि महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु के करीब 20 से 30 युवा आईएस में भर्ती होकर सीरिया और इराक के युद्धग्रस्त इलाकों में लड़ रहे हैं. खतरा यह है कि जब वे लौटेंगे तो भारत में आतंकवादी गतिविधियों के तार इस्लामिक स्टेट से सीधे जुड़ जाएंगे. सुरक्षा एजेंसियों के हवाले से यह भी खबरें आ रही हैं कि इनके भारत लौटने पर इन पर कोई मामला दर्ज करना भी मुश्किल है क्योंकि अपराध उन्होंने दूसरे देश की धरती पर किया है और जिस संगठन के लिए उन्होंने काम किया है वह प्रतिबंधित आतंकी संगठन नहीं है.

यह एक उदाहरण है जो बताता है कि आईएस के उभरने के बाद आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का मुद्दा और भी ज्यादा जटिल हो गया है. चिंताजनक बात यह है कि इस समस्या के खिलाफ नए सिरे से लड़ने की तैयारी कर रहा अमेरिकी नेतृत्व उसी समाधान की तरफ बढ़ता दिख रहा है जिसमें समस्या की जड़ छिपी है.

अपनी बर्बरता के लिए कुख्यात आईएस ने सीरिया और इराक का जितना इलाका कब्जा लिया है उसका क्षेत्रफल ब्रिटेन से भी बड़ा बताया जा रहा है. कभी आईएस अल कायदा की ही एक शाखा हुआ करता था. 1999 में वजूद में आए इस संगठन का नाम तब जमात उल ताविद वल जेहाद था. बाद में इसे अल कायदा इन इराक भी कहा जाने लगा. आज इसने अपने मातृसंगठन को हर मामले में पीछे छोड़ दिया है. इसलिए जब हाल ही में अलकायदा ने भारतीय उपमहाद्वीप में कायदात अल जिहाद के नाम से अपनी एक नई शाखा खोलने का ऐलान किया तो बहुत से लोगों ने यही माना कि वह आईएस के चलते खुद को पिछड़ता पा रहा है और यह ऐलान उसकी खुद को प्रासंगिक बनाए रखने की एक कोशिश है.

बगदादी की अगुवाई वाला आईएस इंटरनेट और सोशल मीडिया जैसी नई दौर की तकनीकों का इस्तेमाल बखूबी जानता है

आईएस और अलकायदा में कुछ बुनियादी फर्क हैं. इनमें से कुछ ऐसे हैं जिनकी आईएस के उभार में महत्वपूर्ण भूमिका रही है. अलकायदा की नीति स्थानीय आतंकी संगठनों के हाथ मजबूत करने की रही है. जैसे अफगानिस्तान में वह तालिबान का साथ दे रहा है तो नाइजीरिया में बोको हरम का. वह सीधे सत्ता की लड़ाई में शामिल नहीं है. अलकायदा का मकसद यह रहा है कि दुनिया के सारे मुसलमान अपने भेद भुलाकर एक हो जाएं और तब शरीयत पर आधारित इस्लामी साम्राज्य बनाने के मसद की ओर बढ़ा जाए. आईएस का मामला इसके उलट है. वह सीधे सत्ता की लड़ाई लड़ रहा है. सीरिया और इराक के कई इलाके अपने कब्जे में लेकर इस आतंकी संगठन के मुखिया अबू बकर अल बगदादी ने खुद को मुसलमानों का खलीफा घोषित कर दिया है. वहाबी इस्लाम की राह पर चल रहा आईएस सुन्नियों का संगठन है जो खुद से असहमति रखनेवालों को जरा भी बर्दाश्त नहीं करता. यही वजह है कि अपने कब्जे वाले इलाकों में उसने बड़ी संख्या में गैरमुस्लिमों और शिया मुसलमानों की नृशंस हत्याएं की हैं. एक वजह यह भी थी कि मार्च 2014 में अल कायदा ने इसे खुद से अलग कर दिया.

दूसरी बात यह है कि जो काम अलकायदा भविष्य में करने की सोच रहा था वह आईएस ने तुरंत कर दिया. यानी इस्लामी राज्य की स्थापना का ऐलान. इस वजह से दुनिया भर के इस्लामी कट्टरपंथियों में आईएस के लिए जबर्दस्त आकर्षण पैदा हो गया है. आलम यह है कि अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के कई दूसरे विकसित देशों के नागरिक तक आईएस के लिए लड़ रहे हैं. उधर, अल कायदा ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद कमजोर पड़ा है. जानकार मानते हैं कि अयमान अल जवाहिरी की अगुवाई वाला इसका नेतृत्व अब बूढ़ा हो रहा है जो अब लड़ाकों में पहले जितना जोश नहीं जगा पा रहा. उधर बगदादी की अगुवाई वाले आईएस का नेतृत्व अपेक्षाकृत युवा है जो इंटरनेट और सोशल मीडिया जैसी नई दौर की तकनीकों का इस्तेमाल बखूबी जानता है. इसके चलते वह बहुत तेजी से सुर्खियों में छाया है. हाल में जब इसने दो अमेरिकी और एक ब्रिटिश पत्रकार का सिर कलम किया और उसके वीडियो इंटरनेट पर जारी किए तो दुनिया में खलबली मच गई. अमेरिका के जनमानस में इतना रोष फैला कि वहां के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने सीरिया और इराक में आईएस के ठिकानों पर मिसाइल और हवाई हमले करने का ऐलान कर किया. अमेरिका की योजना यह भी है कि आईएस से निपटने के लिए वह सऊदी अरब और तुर्की सहित इस क्षेत्र के कई देशों के साथ मिलकर एक साझा क्षेत्रीय गठबंधन बनाए.

लेकिन क्या इससे आईएस को वास्तव में खत्म किया जा सकेगा? जानकार मानते हैं कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के मामले में सऊदी अरब या तुर्की जैसे देशों का व्यवहार लंबे समय से दोहरे मापदंडों वाला रहा है. सऊदी अरब को परदे के पीछे से सुन्नी चरमपंथियों की खूब मदद करने के लिए जाना जाता रहा है. सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल असद के खिलाफ अभियान छेड़ने वाली फ्री सीरियन आर्मी के लड़ाकों को उसने हथियार और तनख्वाहें दी थीं, यह जगजाहिर है. कतर भी इस काम में उसका सहयोगी था. कुछ ऐसा ही हाल तुर्की का भी है. इराक से सटा तुर्की कभी नहीं चाहेगा कि आईएस से निपटने के लिए कुर्दों के हाथ मजबूत किए जाएं जो अमेरिका सोच रहा है. कुर्दों की एक बड़ी आबादी तुर्की के इराक से सटे इलाकों में भी है और उसे चिंता है कि कहीं मजबूत होकर कुर्द कुर्दिस्तान नाम से अपना एक अलग देश न बना लें जिसके लिए वे काफी समय से मांग कर रहे हैं. इसके अलावा जब आईएस ने इराक के मोसुल शहर पर कब्जा किया था तो वहां तुर्की दूतावास के करीब 50 अधिकारियों को भी अपने कब्जे में ले लिया था. इन्हें उसने आज तक नहीं छोड़ा है. माना जा रहा है कि यह तथ्य भी तुर्की को पूरे मन से आईएस के खिलाफ जाने से रोक सकता है. संयुक्त अरब अमीरात से भी आतंकी संगठनों को मोटा चंदा मिलता रहा है. जानकारों के मुताबिक ऐसे में आईएस को हराने के लिए जरूरी है कि उसे मिलने वाली आर्थिक सहायता रोकने के लिए एक मजबूत क्षेत्रीय रणनीति बनाई जाए.

चिंता उस नीति से भी उपजती है जो अमेरिका दुनिया भर के अस्थिर इलाकों में लंबे समय से इस्तेमाल करता रहा है. यानी विरोधी को निपटाने के लिए उसके विरोधियों के हाथ मजबूत कर दो. लेकिन इससे समस्या और विकराल हुई है. जैसे  फ्री सीरियन आर्मी को अमेरिका ने भी जमकर हथियार दिए. बाद में जब यह संगठन बिखरने लगा तो इसके सदस्यों की एक बड़ी संख्या आईएस में शामिल हो गई. बगदादी के बारे में तो कहा जा रहा है कि उसे अमेरिका की मिलीभगत से इजरायली जासूसी एजेंसी मोसाद ने ट्रेनिंग दी थी. यानी पश्चिम ने खुद अपने लिए एक भस्मासुर पैदा किया है. अमेरिका की इस रणनीति का परिणाम अक्सर यही रहा कि एक आतंकी संगठन खत्म हुआ तो दूसरा पैदा हो गया. एक लेख में सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी लिखते हैं, ‘ अफगानिस्तान में सोवियत सेनाओं का मुकाबला करने के लिए रीगन प्रशासन ने खुलेआम इस्लाम का हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया. 1985 में व्हाइट हाउस में अफगान मुजाहिदीनों के सम्मान में आयोजित कार्यक्रम में रोनाल्ड रीगन ने कहा था कि नैतिकता में ये भद्रपुरुष अमेरिका की स्थापना करने वाले महापुरुषों जैसे हैं. बाद में ये ही भद्रपुरुष अलकायदा के कर्णधार बने जिन्होंने अपने आतंक से दुनिया को थर्रा दिया. अफगान युद्ध के लड़ाकों में आईएस का स्वयंभू खलीफा अबू बकर अल बगदादी भी शामिल था.’

दोस्त हुआ दुश्मन: एक फाइल फोटो में अमेरिकी सीनेटि जॉन मैकेन (सबसे दाएं) के साथ बगदादी (सबसे बाएं)
दोस्त हुआ दुश्मन: एक फाइल फोटो में अमेरिकी सीनेटि जॉन मैकेन (सबसे दाएं) के साथ बगदादी (सबसे बाएं)

आईएस से लड़ना इसलिए भी बनिस्बत पेचीदा है क्योंकि दूसरे आतंकी संगठनों के उलट वह कहीं छिपा हुआ नहीं है. अपने कब्जे में आ चुके ब्रिटेन जितने बड़े इलाके  में वह व्यवस्थित तरीके से शासन चला रहा है. कई शहरों में बिजली-पानी, यातायात, बैंकों, अदालतों और स्कूलों को संभालने के लिए उसने एक तंत्र खड़ा कर लिया है. तेल की कई इकाइयां उसके कब्जे में हैं और अलग-अलग रिपोर्टों के मुताबिक तेल की बिक्री और बंधकों को छोड़ने के एवज में वसूली जैसे कामों के चलते उसकी रोज की कमाई करीब तीस लाख डॉलर के बराबर है. स्वाभाविक ही है कि वह अपने नियंत्रणवाला इलाका एक दिन चीन और यूरोप तक फैलाने के सपने देख रहा है.

सवाल है कि ऐसे में क्या किया जाए. माना जा रहा है कि इस्लामिक स्टेट को हवाई हमलों से कमजोर तो किया जा सकता है लेकिन उसे हराया तभी जा सकेगा जब उसके सुन्नी समर्थक उसके खिलाफ हो जाएं. इसके लिए जरूरी है कि सीरिया और इराक में ऐसी जिम्मेदार सरकारें बनें जो सभी धड़ों को साथ लेकर चलें. जानकार मानते हैं कि इराकी प्रधानमंत्री नूरी अल मलिकी तो हट गए लेकिन इससे समस्या नहीं सुलझेगी. यह बस इराक में ऐसी सरकार स्थापित करने की दिशा में पहला कदम हो सकता है जिसमें सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व हो. माना जा रहा है कि नूरी अल मालिकी की पक्षपाती नीतियों के कारण आईएस को पनपने का मौका मिला. यानी नए प्रधानमंत्री हैदर अल-अबादी में प्रतिद्वंदी धड़ों शिया, सुन्नी और कुर्दों को साथ लेकर चलने की कितनी क्षमता है, इस पर भी यह निर्भर करेगा कि आईएस से लड़ाई का भविष्य क्या होता है.

आईएस को हराने के लिए जरूरी है कि सीरिया और इराक में ऐसी जिम्मेदार सरकारें बनें जो शिया, सुन्नी और कुर्द, सभी धड़ों को साथ लेकर चलें

एक वर्ग का यह भी मानना है कि अमेरिका और ईरान मिलकर काम करें तो आईएस को खत्म किया जा सकता है. एक समाचार वेबसाइट से बातचीत में ईरानी राजनीतिक विश्लेषक मोहम्मद अली शबानी  कहते हैं, ‘ईरान और अमेरिका के बीच बहुत सारे मुद्दों पर मतभेद हंै, लेकिन जब बात आईएस की आती है तो उनका एक ही लक्ष्य है.’ शबानी मानते हैं कि ईरान और अमरीका के बीच मैदान-ए-जंग बनने की बजाय पुल बनने का इराक को कहीं ज्यादा फायदा होगा. विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि अगर इराकी और कुर्द बल एकजुट होकर काम करें और उन्हें ईरान और अमेरिका से मदद मिले तो आईएस के खिलाफ हमले कहीं ज्यादा कारगर होंगे. इसके बाद आईएस के स्थानीय और क्षेत्रीय समर्थकों को कमजोर किया जा सकता है. अहम यह भी है कि सीरिया के संकट को सुलझाया जाए. गौरतलब है कि आईएस के लड़ाकों की एक बड़ी संख्या सीरिया से भी आती है.

अमेरिकी थिंक टैंक सेंटर फॉर स्ट्रैटजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज से जुड़े एंथनी कॉर्डसमैन का मानना है कि आईएस से सैन्य नहीं बल्कि राजनीतिक तरीके से निपटा जा सकता है. इराक की नई सरकार को सुन्नी और कुर्दों को साथ लेकर चलना होगा, उन्हें विश्वास दिलाना होगा कि संप्रदाय के आधार पर भेदभाव नहीं होगा और देश की राजनीतिक शक्ति और तेल संपदा पर सबका हक है. पश्चिमी देश इस काम में बस मदद कर सकते हैं, लेकिन इस लड़ाई में मुख्य भूमिका उस जमीन के बाशिंदों की ही होनी चाहिए.

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