‘डेमोक्रेसी में जनता तय करेगी विरासत, हम और आप नहीं’

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जहां मुझे संतुष्टि नहीं मिलेगी, वहां क्यों रहूंगा. मैं 90 के दशक से राजनीति में हूं. जहां जनता के पक्ष में बात नहीं होगी, वहां रहकर क्या करूंगा. पूंजीपतियों ने मिलकर इसमें से 12 साल तो मुझे जेल में डलवा दिया. 12 साल तीन महीने के बाद मैं आया. कोसी ही क्यों उनकी लहर को रोक देता है. क्यों मोदी का जादू कोसी में नहीं चलता. क्यों पति-पत्नी दोनों जीत जाते हैं. इन 12 सालों में किसी का उदय हो जाना चाहिए था. लालूजी के पुत्र का उदय हो जाना चाहिए था. मुझे ही संसद में बोलने का श्रेय मिलता है. इस दौरान मुझे मीडिया से लेकर सबने ऐसे पेश किया जैसे मैं बड़ा विलेन हूं लेकिन जनता ने तो मेरा साथ दिया. मैं बिहार के संपन्न किसान परिवार से हूं. मेरे दादा कोर्ट के ज्यूरी हुआ करते थे. मेरे परिवार ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी. मेेरे पिता ने दो बार एमपी का चुनाव लड़ा, और एक बार एमएलए का. मेरे पिता आध्यात्मिक आदमी हैं. मुझे क्या जरूरत थी, क्या कमी थी कि मैं विलेन हो गया. मैं तो फौज में जाना चाहता था. मुझे देखकर मेरी मां गाती थी, ‘तुझे सूरज कहूं या चंदा.’ दादा कहता था कि बड़ा पहलवान बनेगा. लेकिन कुछ लोगों ने मिलकर पप्पू यादव को खलनायक की तरह पेश किया.

फिर किसने यह छवि बनाई? बाहुबली पप्पू यादव को ही बिहार और देश जानता है?

मुट्ठी-भर लोगों ने, जिन्हें लगा कि मैं उनके लिए चुनौती हूं. पदाधिकारियों ने. जनता के दुश्मनों ने.

राजनीति में पिताजी से सीखकर आए?

नहीं, दादा की वजह से ही  हमारा परिवार राजनीति में है. हमारे दादा कोर्ट के ज्यूरी हुआ करते थे उससे पहले मुखिया भी रहे. मैं अमेरिका पढ़ने जा रहा था. जिला स्कूल और आनंदमार्गी स्कूल का टॉपर था. कहां पप्पू यादव बाहुबली था. ऊंचे सपने थे. वह तो सामाजिक जरूरतों ने ढकेल दिया मुझे भी राजनीति में लेकिन यहां आकर पाया कि राजनीतिक लोग सबसे ज्यादा दुष्चरित्र, बेईमान, लुटेरे हैं, गंदे हैं.

आप कभी राजनेता की तरह बात कर रहे हैं कभी सामाजिक सुधारकर्ता की तरह?

हां, मैं खुद से लड़ता हूं. राजनीति का पक्ष भारी पड़ता है कभी, तो कभी दूसरा पक्ष.

आप 90 के दशक में राजनीति में आए. उसी समय सामाजिक न्याय की राजनीति शुरू हुई. लालू- नीतीश का भी युग रहा ये. ऐसे बिहार की राजनीति में इन 25 सालों के सफर को कैसे देखते हैं?

कर्पूरी ठाकुर, चंद्रशेखरजी, मधु लिमये, देवीलाल, लालू यादव, शरद यादव, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान, भूपेंद्र नारायण मंडल, जगदेव बाबू जैसे कई लोगों ने इसमें जोर लगाया. जगदेव बाबू को यहीं लाठी से मारा गया. कर्पूरी अपमानित हुए. सामाजिक न्याय की लड़ाई का दौर लंबे समय से चल रहा था. नब्बे के दशक में एक सरकार बनी. यह कहिए. इसके पहले भी सामाजिक न्याय की सरकार बनी थी. 90 की सरकार के बाद राजनीतिक और सामाजिक जागरूकता बढ़ी. प्रत्येक क्रिया के विपरित प्रतिक्रिया शुरू हुई. इन स्थितियों में लालूजी को मौका मिला. लीडरशिप उनका था तो लालूजी का नाम हुआ. लेकिन बिहार की समस्या का समाधान नहीं हुआ. आर्थिक व शैक्षणिक सुधार तो नहीं हुआ. कोई समाधान तो नहीं मिला इस दिशा में. बिहार को न्याय और विकास तो नहीं मिला. बिहार राजनीति की उर्वर भूमि बना रहा. 8400 गांव हैं, लेकिन तकरीबन 5600 गांवों में आज भी स्कूल नहीं हैं. सिर्फ 18 लाख नौजवान बीए में पढ़ते हैं. आज तक मात्र नौ हजार बेटियां तकनीकी शिक्षा ले सकी हैं. हम अपनी विरासत को नहीं संभाल सके. शासन और ज्ञान की परंपरा को आगे नहीं बढ़ा सके इन सालों में. बिहार के पास एक लंबी परंपरा है. कर्ण की नगरी यहीं है. सीता, आर्यभट्ट,  अशोक, शेरशाह सूरी से लेकर विद्यापति, भिखारी ठाकुर, बाबू कुंवर सिंह, मंडन मिश्र यहीं के हैं. ऐसी परंपरा रही लेकिन हम उसे आगे नहीं बढ़ा सके.

‘लालूजी ने गरीब के मर्म को समझा. तब सोशल मीडिया नहीं था लेकिन अब दो मिनट में दुनिया बदलने की हड़बड़ी है. लालूजी यह नहीं समझ पा रहे हैं. जनता उकताई हुई है’

आप ये कह रहे हैं कि सामाजिक न्याय की राजनीति और सत्ता के 25 सालों में सिर्फ जागरूकता फैलाने का काम हुआ?

नहीं, जाति का जहर भी फैलाया गया और उससे अपना मकसद साधा गया.

लालू और नीतीश में क्या फर्क देखते हैं. दोनों ने इन 25 सालों में राज किया?

लालूजी ने निश्चित रूप से गरीब की भाषा और मर्म को समझा. तब सोशल मीडिया नहीं था. लेकिन अब समय बदल गया. अब दो मिनट में दुनिया बदलने की हड़बड़ी है. लालूजी यह नहीं समझ पा रहे हैं. जनता उकताई हुई है. मोदी को लाती है उसी उम्मीद में. मोदी जी गिर जाते हैं. लालू के उलट नीतीश कुमार जी दूसरी राह पर चले. ब्यूरोक्रेसी को हावी कर दिया. लालूजी के राज में ब्यूरोक्रेसी के मन में डर था. पैसा लेता था तो काम भी करता था. जनता को आंख नहीं दिखाता था लेकिन नीतीश के राज में उलटा हुआ. लालूजी के राज में भी उन्हीं लोगों ने लूटा जो नीतीश कुमार के राज में लूटे या लूट रहे हैं. अफसोस ये होता है कि सामाजिक न्याय की राजनीति में बड़े वर्ग का साथ मिला, जिसका उपयोग न लालू कर सके, न नीतीश. अल्पसंख्यक, पिछड़े, दलित, अतिपिछड़ा, ऊंची जातियाें में राजपूतों की बड़ी आबादी सामाजिक न्याय के साथ रही लेकिन लालूजी संभाल नहीं पाए. लालूजी के राज में एक जाति को लगा कि उनका राज आ गया. वे बाहुबली बनने लगे. तब लोगों को लगा कि फर्क क्या है, पहलेवाले भी तो यही करते थे. तब नारा चला कि यादवों को खत्म करो. यादव गाली बने. फिर नीतीश कुमार के कंधे पर पिछड़ों को बांटा गया और राज किया गया. नीतीश कुमार भी घिर गए. छटपटाहट है उनमें कि इनको बदलो, उनको बदलो.

किसमें छटपटाहट है. सवर्णों में?

नहीं सवर्णों को नहीं कहूंगा. बिहार में कुछ 50 घराने हैं, जो सत्ता की सियासत को हमेशा साधने में लगे रहते हैं, वही ये सब खेल करते हैं.

आपने एक बात कही कि लालू उस समय आ गए. क्या आप ये कहना चाह रहे थे कि लालू सिर्फ परिस्थितियों की देन की वजह से नेता बने, स्वाभाविक नेता नहीं?

हां, इससे इंकार नहीं कि वे परिस्थितियों की देन की तरह आए नेता थे लेकिन ऐसा भी नहीं कह सकता  िक वे नेता नहीं थे. वे 1974 के आंदोलन में सक्रिय थे. वे नेता रहे हैं.

बिहार में अब तो जीतन राम मांझी एक अहम नेता हैं, क्या कहेंगे आप?

हां, वे एक अहम नेता हैं. वे जिस घर में जाएंगे वह एक मजबूत खेमा होगा. मुझे डर है कि कहीं झारखंडवाला हाल न हो जाए महाविलय पार्टी का.

क्या हुआ झारखंड में?

झारखंड में जनता दल यू और राजद की जमानत जब्त हो गई. हेमंत सोरेन का साथ छोड़े तो असर दिख गया. कीमत चुकानी पड़ी.

पप्पू यादव सीएम बनने की लड़ाई लड़ रहे हैं. आपने कहा भी कि आपको तीन माह दिए जाएं तो ऐसा कर देंगे, वैसा कर देंगे?

आपने पूछा तो कहा.

आपकी कोई बात नहीं मानी जा रही. महाविलय हो चुका है. मांझी अलग हैं. लालूजी अब बार-बार कह रहे हैं कि मेरा बेटा उत्तराधिकारी है. ज्यादातर आपको सुना रहे हैं.

उत्तराधिकारी तो अब नीतीश कुमार हो गए. अब  यह सवाल ही खत्म हो गया.

आपको तो कोई दिक्कत नहीं है न?

मुझे किसी से क्या दिक्कत है. लेकिन ये तो सब जानते हैं न कि आज अगर यादवों को जंगलराज का पर्याय माना जाता है, उनको गाली दी जाती है तो उसमें नीतीश की भूमिका सबसे ज्यादा रही है. उन्होंने यादवों के बारे में ऐसा प्रचारित करवाया. लेकिन ऐसा होता तो है नहीं. पप्पू यादव या लालू यादव खराब हैं तो इससे पूरे यादव समाज को गाली नहीं देनी चाहिए. लेकिन नीतीश कुमार ने तो ये करवाया था.

आप करेंगे क्या? लालूजी आपको किनारे कर चुके हैं. नीतीश ही उत्तराधिकारी बन गए. आपकी किसी बात काे महत्व नहीं दिया गया न. क्या अलग रास्ता अपनाएंगे?

अब यह जमात और वर्कर तय करेगा. मैं घूम रहा हूं. राजद के कार्यकर्ताओं से मिल रहा हूं.

आप महाविलय के बाद राजद और लालटेन को अपने पास रखना चाहेंगे?

ऐसा कुछ नहीं है. राजदवाले नेता और कार्यकर्ता चाहेंगे तो ऐसा होगा.

पत्नी और कांग्रेस सांसद रंजीत रंजन की भूमिका आपके कॅरियर में अहम रही है.

रंजीत रंजन की बड़ी भूमिका रही है. जितनी भूमिका मेरे दादा और पिता की रही है, उतनी ही भूमिका मेरी पत्नी की रही है.

आपके और पत्नी के विचार एक हैं. आप युवा संवाद में उनकी तस्वीर भी लगाते हैं. वह कांग्रेस से आप राजद से. राजनीतिक तौर पर अलग-अलग क्यों हैं आप दोनों?

वह कांग्रेस की विचारधारा मानती हैं. मेरे लिए बिहार प्राथमिक सूची में है. अलग-अलग विचारधारा है इसलिए दल में हैं.

अगर आप दोनों बेस्ट पॉलिटिकल कपल हैं तो अलग क्यों. एक और एक ग्यारह क्यों नहीं बन रहे. बिहार के लिए ही सही.

यह तो कांग्रेस को तय करना चाहिए. हो सकता है कि कांग्रेस के मन में दुविधा हो. हो सकता है कि कांग्रेस के मन में हो कि मैं बाहुबली के रूप में प्रचारित किया जाता रहा हूं. लेकिन अब इस छवि का क्या किया जाए. अमित शाह पर तमाम आरोप लगे लेकिन वे आज देश की सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष हैं. आडवाणीजी पर आरोप लगा, वे गृहमंत्री बने.

आपको कांग्रेस प्रस्ताव दे तो जाएंगे. वह तो बिहार में मर गयी है?

देखेंगे. कांग्रेस बड़ी पार्टी है. वह कभी नहीं कहेगी कि मर गई है. कांग्रेस में मजबूत जनाधारवाली मेेरी पत्नी रंजीत हैं, वे आगे आएंगी तो मैं उनके साथ रह सकता हूं. अपना स्वार्थ क्यों देखूंगा.

रंजीत को आगेकर कांग्रेस कहे कि पप्पू साथ दीजिए तो क्या करेंगे?

क्या किसी दल के साथ रहना जरूरी है. कल कांग्रेस मुझे अपने काम करने से रोकने लगे तो उसके साथ कैसे रह पाऊंगा. मैं बहुत दुविधा में रहता हूं.

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