फर्जी एनकाउंटर का खेल जनता को स्वीकार नहीं करना चाहिए | Tehelka Hindi

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फर्जी एनकाउंटर का खेल जनता को स्वीकार नहीं करना चाहिए

आप एक सामान्य चोरी के आरोपी को थाने में ले आइए तो लोगों की प्रतिक्रिया होती है कि साहब देखिए, थाने में बैठाए हुए हैं, अब तक इसे उल्टा लटकाया नहीं गया, इसे पीटा नहीं गया.

2016-04-30 , Issue 8 Volume 8
इशरत जहां एनकाउंटर

इशरत जहां एनकाउंटर, जिसे बाद में हुई जांच में फर्जी पाया गया था

सबसे बड़ी बात यह है कि भारतीय समाज में एनकाउंटर को स्वीकार्यता मिली हुई है. समाज इसे स्वीकार करता है. आप इसे एक उदाहरण से समझिए कि एक मशहूर कांड; भागलपुर का अंखफोड़वा कांड, जिस पर प्रकाश झा ने फिल्म भी बनाई थी वह बहुत ही जघन्य कांड था. बिहार की जनता आम तौर पर पुलिस विरोधी जनता है और जब भी कोई बात होती है तो सड़क पर निकल आती है. लेकिन उस कांड की जांच करने जब एक दल गया तो पूरा भागलपुर बंद हो गया. भागलपुर के प्रोफेसरों से लेकर रिक्शेवालों तक सबने हड़ताल की और सबने कहा कि नहीं बहुत सही हुआ था. तो सबसे बड़ी दिक्कत है कि सामाजिक रूप से जब आप ऐसी घटनाओं को इस तरह से स्वीकार करेंगे तो पुलिसवालों को भी लगता है कि अगर कानून-कायदा और अदालतें काम नहीं कर रही हैं तो यह उसकी जिम्मेदारी है कि वह सब कुछ ठीक करे और अपराधी को मार दे क्योंकि अपराधी को अदालतें सजा नहीं दे पा रहीं.

यह बड़ा खतरनाक खेल है कि एक-दो अपराधी, जो सचमुच दुर्दांत होते हैं, जिनको अदालत सजा नहीं दे पाती वे मारे जाते हैं. फिर एक चलन बन जाता है और पैसा लेकर मारना शुरू हो जाता है. इसमें यह भी होता है कि किसी राजनीतिक व्यक्ति के कहने पर उसके दुश्मन को मार दिया जाता है. जो माफिया गैंग हैं वे अपने विरोधियों को पकड़-पकड़कर पुलिस को देते रहते हैं, पैसा भी देते हैं और लोग मारे जाते हैं. तो कुल मिलाकर यह एक खराब और खतरनाक खेल होता है जिसमें पुलिस फंसती है जबकि उसे इससे बचना चाहिए.

वंजारा साहब जिस इशरत जहां के केस में फंसे थे, उसमें मसला यह नहीं था कि इशरत लश्कर-ए-तैयबा की सदस्य थी कि नहीं, वह तो लश्कर की सदस्य थी. उसमें बहस यह होनी चाहिए थी कि क्या राज्य को यह अधिकार है कि आप किसी को भी पकड़कर मार देंगे. अगर वह लश्कर की सदस्य भी है तो क्या आप उसको पकड़कर मार देंगे? आपको यह मारने का ये अधिकार भारत का संविधान या कानून देता है! इस पर बहस होने लगी कि नहीं वह तो बड़ी भली महिला थी. उसे गलत तरीके से मारा गया. आप किसी को पकड़कर नहीं मार सकते. ऐसा इसलिए हुआ कि यह कांग्रेस भी इस तरह की मूर्खता करती रहती है. प्रतिस्पर्धात्मक सांप्रदायिकता पर अमल करती है और इसमें कांग्रेस से भाजपा हमेशा जीत जाएगी. यह कहने के बजाय कि वह बड़ी भली महिला थी, सज्जन थी, कहना यह था कि वह लश्कर की थी भी तो आपको यह अधिकार किसने दिया कि आप उसे पकड़कर मार दें. आप किसी को भी ऐसे नहीं मार सकते.

पीलीभीत वाले मामले में कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे. इस एनकाउंटर को अंजाम देने वालों को इनाम दिया गया था जबकि पूरा उत्तर प्रदेश जानता था कि ये फर्जी है

एनकाउंटर ऐसा खेल है जिसे जनता को स्वीकार नहीं करना चाहिए. लेकिन आपको इसी के साथ सवाल उठाना चाहिए कि 1947 के बाद पुलिस का बुनियादी स्वरूप क्यों नहीं बदला गया. ये पुलिस अंग्रेजों ने बनाई थी. 1860-61 में यह पुलिस बनाई गई थी. और यह भी पूछना चाहिए कि 60-70 देशों में अंग्रेजों ने पुलिस बनाई, लेकिन सारे देशों में अलग-अलग पुलिस क्यों बनाई. भारत में ऐसी पुलिस क्यों बनाई जो कानून विरोधी थी, जनता की दुश्मन थी? यह पुलिस भारत में क्यों बनाई, श्रीलंका, केन्या और बर्मा में ऐसी ही पुलिस क्यों नहीं बनाई? उनमें केवल रैंक एक जैसी हैं, लेकिन उनके स्वरूप अलग-अलग हैं. यह एक गंभीर मसला है जिस पर बहस होनी चाहिए.

अब फर्जी एनकाउंटर काफी हद तक कम हो गए हैं क्योंकि मीडिया बहुत सक्रिय हो गया है. न्यायपालिका का समर्थन कम हो गया है. एक जमाने में न्यायपालिका का भी समर्थन खूब मिलता था. पीलीभीत वाले मामले में कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे और इस एनकाउंटर को अंजाम देने वालों को इनाम दिया गया था जबकि पूरा उत्तर प्रदेश जानता था कि यह फर्जी है. उसमें एक ऐसा भी अफसर शामिल था जिसने मेरठ में मलियाना कांड किया था, जिसने 84 में सिखों को मरवाया. लेकिन उसे कभी कोई सजा नहीं मिली. उसने अपनी नौकरी पूरी की और ऊपर तक पहुंचकर रिटायर हुआ. अब इसमें सच्चाई यह है कि आपने छोटे पुलिसवाले को सजा दे दी. गुजरात का मसला अलग है जिसमें डीजी रैंक का अफसर जेल चला गया वरना छोटे स्तर के अधिकारी और कर्मचारी ही सजा पाते हैं.

यह भी बात महत्वपूर्ण है कि यह काम उन्हीं से कराया जाता है जो इसे करने को तैयार होते हैं. जो करने को नहीं तैयार होते, उनसे कोई कहता ही नहीं. हमारे साथ एक इंस्पेक्टर बनवारी हुआ करते थे, वे कभी गलत काम नहीं करते थे तो कभी उनसे कोई कहता भी नहीं था. लेकिन ज्यादातर लोग उसके लिए तैयार रहते हैं. यह एक मनोवैज्ञानिक निर्मिति है कि पुलिसवाले जानते हैं कि वे जो कर रहे हैं वह कानून और जनता के हित में है और सबसे बड़ी बात जनता इसे सपोर्ट करती है. आप जाकर यूनिवर्सिटी में प्रोफेसरों से बात कीजिए तो वे भी सपोर्ट करते हैं. आप एक सामान्य चोरी के आरोपी को थाने में ले आइए तो लोगों की प्रतिक्रिया होती है कि साहब देखिए, थाने में बैठाए हुए हैं, अब तक इसे उल्टा लटकाया नहीं गया, इसे पीटा नहीं गया. लोग थर्ड डिग्री के लिए दबाव डालते हैं तो पुलिसवाला सोचता है कि वह थर्ड डिग्री करके बड़ा पवित्र काम कर रहा है.

(लेखक पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं )

(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 8 Issue 8, Dated 30 April 2016)

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