विरोधियों को राष्ट्रविरोधी घोषित करने की मुहिम

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Irfan-habib

इस पूरी बहस के सहारे कोशिश की जा रही है कि भाजपा और आरएसएस के खिलाफ जो भी लोग हैं उन्हें राष्ट्रविरोधी घोषित किया जाए. ये मुहिम चला रहे हैं. हर जगह जनता में बंटवारे की कोशिश की जा रही है. अगर यह तर्क है कि देश को बचाने के लिए यह राष्ट्रवादी अभियान चलाया जा रहा है तो देश पर कौन सा ऐसा खतरा आ गया है जिससे वे बचा रहे हैं? राष्ट्र काफी पुराना शब्द है, उसका मतलब एक देश से होता है. अंग्रेजी शब्द जो नेशन है उसके मायने भी बदलते रहे हैं, लेकिन आखिर में उसे समझा जाता है कि वह एक ऐसा मुल्क है जिसके लोग चेतना संपन्न हों, उन्हें यह एहसास हो कि हम इस मुल्क के हैं और हमारी हुकूमत होनी चाहिए. वह राष्ट्र बनता है. राष्ट्र कोई ऐसी चीज नहीं है कि वह कोई जमीन का टुकड़ा हो, या कोई भौगोलिक देश हो, लोग होते हैं जो राष्ट्र निर्मित करते हैं.

यहां तो यह समझा जाता है कि हदबंदी कर रखी है. किसी ने कह दिया कि उस देश से आप सुलह कर लो, कुछ उन्हें दे दो, कुछ उनसे ले लो, जो उनके पास है उसे रहने दो, जो हमारे पास है वो हमारे पास रहे तो यह कोई गैर-राष्ट्रीयतावाद है. असली चीज तो यह है कि आप देश के लोगों से प्रेम करते हैं कि नहीं करते हैं. 1947 से पहले तो वही लोग देशभक्त कहे जा सकते थे जो अंग्रेजों के विरोधी हों. उसमें तो आरएसएस और हिंदू महासभा ने कोई खास काम नहीं किया. आरएसएस ने तो बिल्कुल नहीं. 1947 तक इन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ कोई मुहिम नहीं चलाई. मुसलमानों का विरोध करते रहे और कांग्रेस का विरोध करते रहे. यह समझ में नहीं आता कि ये कैसी देशभक्ति है! जब देश को देशभक्ति की जरूरत थी तब तो आप मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए.

आजादी के आंदोलन में आरएसएस की कोई भूमिका नहीं रही. इन्होंने उसे बार-बार तोड़ने की कोशिश की. टू नेशन थ्योरी की बात करते थे. गोलवलकर ने अपनी किताब में ‘वी आर आवर नेशनहुड डिफाइंड’ में यही लिखा है कि सिर्फ हिंदू यहां के नागरिक होंगे, बाकी नहीं होंगे. यह 1937 में लिखी हुई किताब है, जिसे ये अपना बाइबिल मानते हैं. इस तरह की बात से तो अंग्रेजों को लाभ ही होगा. पूरे राष्ट्रीय आंदोलन को तो इन्होंने नुकसान ही पहुंचाया है.

आजादी के बाद अगर आप सरकार के साथ आरएसएस का पत्र व्यवहार देखें तो ये तिरंगा झंडा मानने को तैयार नहीं थे. तब भारत सरकार ने कहा, तभी आप जेल से छोड़े जाएंगे जब झंडा स्वीकार करेंगे. उस वक्त तक ये संविधान नहीं बना था. उस समय जो सरकार थी, जिसने कानून बनाया था. उसके बाद 1950 में हमारा संविधान बना, उसको भी मानने को तैयार नहीं थे. उसी तरह झंडे को मानने को तैयार नहीं थे. इस बात के कागजात मौजूद हैं कि इन्होंने देश के प्रतीकों को मानने से इनकार किया था. लेकिन जब बताया गया कि अगर आप नहीं मानेंगे तो रिहा भी नहीं होंगे. तब इन्होंने उस पर सहमति जताई.

अब बुद्धिजीवियों पर हमले करके यह कोशिश की जा रही है कि वे और लोगों की आवाज बंद कर दें. जिन नारों के बहाने सरकार जेएनयू पर कार्रवाई कर रही है, वह फिजूल है. इससे मालूम पड़ता है कि आप घबरा गए हैं. कश्मीर में तो इस तरह रोज आजादी के नारे लगते हैं. इतना बड़ा देश है, ऐसे कुछ नारों से क्या फर्क पड़ता है. सरकार जो कर रही है, वह सब राष्ट्रवाद के लिए तो बिल्कुल नहीं है. क्योंकि इससे राष्ट्र को फायदा हो रहा है या और बदनाम हो रहा है? इससे हमें क्या फायदा होगा? जितना नुकसान वे कर सकते थे, वह कर चुके हैं. राष्ट्रवाद का अर्थ गुंडागर्दी तो बिल्कुल नहीं होता है.

इसका असर क्या होगा, यह किस हद तक जाएगा, यह कहना तो बड़ा मुश्किल है. भारत बड़ा देश है. सिर्फ आरएसएस ही भारत नहीं है. देश की सारी जनता वैसी ही नहीं है जैसी भाजपा समझती है. उन्हें मात्र 31 प्रतिशत वोट मिले हैं. लेकिन जो मौका मिला है, वे समझते हैं कि इसका फायदा उठाकर मनमानी कर लें. हालांकि, मुझे शक है कि यह ज्यादा वक्त तक चल पाएगा.

(लेखक इतिहासकार हैं)