पेरुमल मुरुगन : एक फैसले की कहानी

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MuruganWEB

‘यह चिंता का विषय है कि एक विकसित होते समाज के रूप में हमारी सहिष्णुता का स्तर नीचे जाता प्रतीत हो रहा है. किसी भी विपरीत विचार या सामाजिक सोच को समय-समय पर धमकियों और हिंसक बर्ताव का सामना करना पड़ता है. सामाजिक रीति-रिवाजों पर लोगों के भिन्न-भिन्न विचार होते हैं और जबकि हर किसी को अपने स्वतंत्र विचार रखने का अधिकार है, उसे किसी और के हलक में धकेला नहीं जा सकता. किसी किताब, किसी फिल्म, पेंटिंग, शिल्प या कलात्मक अभिव्यक्ति के अन्य रूपों के खिलाफ एक अभियान दिखाई पड़ना आजकल कोई असामान्य बात नहीं रह गई है.’

ये शब्द कथित तौर पर ‘राजनीति’ से प्रेरित होकर पुरस्कार लौटाने वाले किसी लेखक के नहीं हैं. 2014 के लोकसभा चुनावों में अपने खराब नतीजों से बौखलाई हुई किसी पार्टी के प्रवक्ता के भी नहीं हैं. (केंद्र में सरकार चला रही भाजपा और उसके बिरादर अक्सर यही आरोप लगाते हैं) ये शब्द मद्रास उच्च न्यायालय के उस फैसले से लिए गए हैं जो उसने तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन के उपन्यास ‘मधोरुबगन’ (अंग्रेजी में ‘वन पार्ट वुमन’ के नाम से अनूदित) के मामले में दिया है.
यह ऐतिहासिक फैसला मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश संजय किशन कौल और न्यायाधीश पुष्पा सत्यनारायण की संयुक्त पीठ द्वारा पांच जुलाई को सुनाया गया. यह ऐतिहासिक इस अर्थ में नहीं है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रश्न पर ऐसा कोई फैसला पहले नहीं आया था. खुद मुख्य न्यायाधीश संजय किशन कौल ने दिल्ली उच्च न्यायालय में न्यायाधीश रहते हुए एमएफ हुसैन के मामले में वर्ष 2008 में ऐसा ही महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था, जिसकी शुरुआत ही पाब्लो पिकासो के इस प्रसिद्ध उद्धरण से की गई थी, ‘कला कभी संयत नहीं हो सकती और जो संयत हो, वह कला नहीं हो सकती.’ इस बार का फैसला ऐतिहासिक इस अर्थ में है कि यह आजाद भारत के अब तक के सबसे असहिष्णु दौर में आया है. एक ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण दौर जब भारतीय संस्कृति और परंपरा के नाम पर अभिव्यक्ति की आजादी को निशाना बनाने वालों का मनोबल अपने चरम पर है और धार्मिक अल्पसंख्यकों, सामाजिक रूप से अशक्त समूहों के साथ-साथ लेखक समुदाय भी खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है. ऐसे समय में यह फैसला वाॅल्टेयर के उद्धरण से शुरू होता है, ‘हो सकता है तुम्हारी बातों से मेरी सहमति न हो, पर तुम्हारे कहने के अधिकार की रक्षा मैं मरते दम तक करूंगा.’ और खत्म इस वाक्य के साथ होता है, ‘लेखक उसी काम को करने के लिए पुनरुज्जीवित हो जो वह सबसे बेहतर कर सकता है, लिखना.’

ध्यान रहे कि पेरुमल मुरुगन ने अपने खिलाफ चल रहे उपद्रव के दौरान अपना उपन्यास पूरी तरह वापस लेने के समझौते पर रजामंदी दी थी और उसके बाद फेसबुक पर अपने लेखक की मृत्यु की घोषणा कर दी थी. लिखा था, ‘लेखक पेरुमल मुरुगन मर गया. वह भगवान नहीं है, इसलिए वह खुद को पुनरुज्जीवित नहीं कर सकता.’ यह फैसला लगभग भावुक कर देेने वाले स्वर में लेखक के पुनरुज्जीवन का आह्वान करता है.

मामला क्या था?

पेरुमल मुरुगन का उपन्यास ‘मधोरुबगन’ 2010 में प्रकाशित हुआ था. इसकी कहानी तिरुचेंगोडे में स्थित है जो खुद मुरुगन का अपना शहर है और पहाड़ी के शिखर पर स्थित अर्धनारीश्वर मंदिर की वजह से जाना जाता है. उपन्यास लगभग अस्सी साल पहले की एक कहानी कहता है जिसमें मुख्य पात्र एक निःसंतान दंपति हैंः पोन्ना (पत्नी) और काली (पति). पति-पत्नी में बहुत प्यार है, लेकिन निःसंतान होने के कारण उन्हें सामाजिक रूप से लांछित होना
पड़ता है. निःसंतान होने और उसके लिए अपमान सहने की पीड़ा पर ही उपन्यास केंद्रित है.

उपन्यास में उस समय के तिरुचेंगोडे में प्रचलित एक प्रथा का हवाला आता है जो इसकी कथा में निर्णायक महत्व रखती है. प्रथा यह है कि अर्धनारीश्वर मंदिर में हर साल चौदह दिनों का वैकासी उत्सव होता है जिसके 14वें दिन निःसंतान विवाहिता स्त्रियों को सभी तरह की यौन वर्जनाएं लांघने की छूट होती है. वे मेले में शामिल होती हैं और आपसी रजामंदी से किसी भी युवक के साथ शारीरिक संबंध बनाकर अपनी संतति-कामना पूरी कर सकती हैं. यह एक ऐसी प्रथा रही है जिसका उल्लेख लोकगीतों में मिलता है.

2010 में तमिल में प्रकाशित होने के बाद से चार साल तक इस उपन्यास पर कोई हंगामा नहीं हुआ. अंग्रेजी अनुवाद के प्रकाशन और लेखक द्वारा सिंगापुर लिटरेचर फेस्टिवल में इस उपन्यास में वर्णित प्रथा के उल्लेख के बाद धर्म और संस्कृति के ध्वजावाहकों को होश आया. उन्होंने दिसंबर 2014 में उपन्यास के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया. किताब के कुछ पन्ने फोटोकाॅपी कराके बांटे जाने लगे, उसके बारे में पर्चे छपने लगे कि किस तरह वह भारतीय और तमिल संस्कृति पर एक हमला है. साथ ही तिरुचेंगोडे नगर और वहां की महिलाओं को बदनाम करने के लिए लिखी गई है. उसमें कोंगू गोंदर समुदाय का, जिससे मुरुगन खुद आते हैं, और अर्धनारीश्वर मंदिर के देवता का भी अपमान किया गया है.

इसके बाद मुरुगन को लगातार फोन पर धमकियां भी मिलनी शुरू हुईं. 26 दिसंबर, 2014 को आरएसएस से संबद्ध स्थानीय संगठन हिंदू मुन्नानी के अध्यक्ष श्रीमहालिंगम के नेतृत्व में लगभग पचास लोगों का एक जुलूस निकला जिसने किताब की प्रतियां जलाईं और मुरुगन की तस्वीर पर जूतमपैजार की. धीरे-धीरे वे मामले को इतना गरमाते गए कि 9 जनवरी, 2015 को वे पूरा शहर बंद करवाने में कामयाब रहे. मुरुगन को अपनी सुरक्षा की खातिर तीन दिन के लिए शहर छोड़कर चेन्नई में रहना पड़ा.

कानून और व्यवस्था की बिगड़ती हालत का हवाला देकर नमक्कल जिला प्रशासन ने 12 जनवरी को उग्र संस्कृति-रक्षकों और लेखक को शांति-वार्ता के लिए बुलाया. यहां डिस्ट्रिक्ट रेवेन्यू आॅफिसर ने लेखक पर दबाव बनाते हुए ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर कराया जिसके लिए लेखक राजी नहीं थे. मुरुगन अपनी ओर से ‘गंभीर खेद’ प्रकट करने को तैयार थे, पर अधिकारी ने दबाव डाला कि ‘बिना शर्त माफी’ से कम किसी भी चीज पर मामला निपटेगा नहीं. इसके बाद मुरुगन ने हताशा में किसी भी तरह के वक्तव्य पर हस्ताक्षर करने की रजामंदी जाहिर की. खुद को आहत बताने वाले समूह की कई और मांगों को भी उस माफीनामे में शामिल कर दिया गया. यह स्पष्ट था कि इस शांतिवार्ता में हमलावर पक्ष की पूरी तरह से जीत हुई और कलम की आजादी के परखच्चे उड़ा दिए गए जिसे भारतीय संविधान की धारा 19(1) (ए) की सुरक्षा मिली हुई है. इसी के बाद मुरुगन ने अपने लेखक की मृत्यु की घोषणा की. लेकिन मामला यहीं रुका नहीं रहा.
फरवरी 2015 में कई पक्षों ने मद्रास उच्च न्यायालय में अपनी-अपनी याचिकाएं दायर कीं. एक तरफ पीयूसीएल और मानवाधिकार के पक्षधर व्यक्ति थे जो लेखक को अपनी किताब वापस लेने पर मजबूर करने वाली उस शांतिवार्ता को असंवैधानिक बताकर चुनौती दे रहे थे. दूसरी तरफ तिरुचेंगोडे के कई धार्मिक और सामुदायिक संगठन एवं व्यक्ति थे जो लेखक पर आपराधिक मुकदमा चलाकर सजा देने, एक महाआदेश द्वारा किताब की तमाम प्रतियां जब्त करने तथा किंडल आदि सभी जगहों पर उसे प्रतिबंधित करने की मांग कर रहे थे.

5 जुलाई, 2016 काे आया फैसला

फैसले में एक बात तो यह कही गई है कि प्रशासन द्वारा आयोजित शांतिवार्ता बाध्यकारी नहीं है और बिगड़ती कानून-व्यवस्था के नाम पर संविधान प्रदत्त लेखकीय स्वतंत्रता का इस तरह दमन नहीं किया जा सकता. इसके साथ-साथ मुरुगन पर आपराधिक मामला दायर करने की प्रार्थना को खारिज कर दिया गया है. उनकी किताब पर प्रतिबंध लगाने की प्रार्थना को भी अदालत ने नामंजूर किया है. ये बातें 160 पृष्ठ के इस फैसले के अंतिम अमली हिस्से में हैं, लेकिन इसके पहले का वह पूरा हिस्सा भी जो इस निर्णय तक पहुंचने की प्रक्रिया और तर्क-वितर्कों पर केंद्रित है, जबरदस्त तरीके से पठनीय है.

सभी पक्षों के तर्कों को सामने रखते हुए फैसले में उपन्यास पर लगाए गए अश्लीलता, ईशनिंदा, मानहानि, हिंदुओं की भावनाओं को आहत करने, नैतिक रूप से अस्वीकार्य होने आदि के आरोपों को खारिज किया गया है. मसलन, मूल तमिल में भद्दी जबान का इस्तेमाल होने के आरोप पर अदालत का कहना है कि विषय-वस्तु की मांग के अनुसार ही लेखक भाषा तय करता है और उपन्यास को अश्लील ठहराने या उसके कुछ अंशों को हटा देने की मांग करने का यह पर्याप्त आधार नहीं है. उपन्यास जिन लोगों की कहानी कह रहा है, वे सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हैं. इसलिए भाषा भी प्रसंगानुसार होगी. एक और जगह कहा गया है कि उपन्यास को उसके सही परिप्रेक्ष्य में समझा जाना चाहिए और सिर्फ संवादों में थोड़ी भद्दी जबान का इस्तेमाल लेखक की खिंचाई का आधार नहीं हो सकता. आप सिर्फ इसलिए भी इसे एक बड़ा सामाजिक मुद्दा नहीं बना सकते कि इसमें किसी खास मंदिर या खास जगह का नाम लिया गया है, जो कि इसकी कड़ी में आने वाले अगले उपन्यासों में से लेखक ने खुद ही हटा भी दिया है. इसके ऐतिहासिक होने का कोई दावा खुद लेखक नहीं कर रहा है. यह एक कहानी है और यह कहानी जिस प्रथा का हवाला देती है वह लाेकगीतों में मौजूद है.

अदालत ने प्रकाशक के वकील डाॅ. वी. सुरेश के इस तर्क को भी महत्व दिया है कि अभिजनों के औपन्यासिक इतिहास, जिसके पास रिकाॅर्ड का आधार होता है और जुबानी चलने वाले लोकगीतों पर आधारित उपन्यास के बीच हमें फर्क करना चाहिए जो कि बहुत अहम और बारीक है. एक और जगह पर अदालत एस. रंगराजन के मामले के हवाले से स्पष्ट शब्दों में कहती है, ‘कला अक्सर हमें उकसाने वाली होती है और वह हर किसी के लिए नहीं होती, न ही वह पूरे समाज को बाध्य करती है कि उसे देखा जाए और सिर्फ इसलिए कि लोगों के एक समूह को उससे दिक्कत है, उन्हें इस बात की इजाजत नहीं मिल जाती कि वे शत्रुतापूर्ण तरीके से अपने विचार प्रकट करें, और राज्य ऐसे शत्रुतापूर्ण आॅडिएंस की समस्या से निपटने की अक्षमता की दुहाई नहीं दे सकता.’ इसी आशय की बात उपसंहार खंड में इन शब्दों में आई हैः ‘सदियों से मौजूद और हाल में लिखे गए ऐसे लेखन के प्रति, जो ‘हमारी तरह के’ नहीं हैं, सहिष्णुता का रवैया होना जरूरी है. लेखक और उसकी तरह के कलाकारों को लगातार इस आशंका में नहीं रहना चाहिए कि अगर वे चिराचरित रास्ते से हटे तो उन्हें प्रतिकूल परिणाम का सामना करना होगा. उपन्यास के विरोधियों को निश्चित रूप से उसकी आलोचना करने का अधिकार है, वैसे ही जैसे उसके पक्षधरों को उसकी प्रशंसा करने का.’

इन बातों से जाहिर है कि पूरे फैसले का ‘टोन’ बिना किसी किंतु-परंतु के लेखक और लेखन के पक्ष में है. यहां तक कि प्रशासन को बहुत सख्ती के साथ यह हिदायत दी गई है कि वह जब भी शांतिवार्ता की राह अपनाता है, उसे लेखक पर दबाव बनाने के बजाय स्वतंत्र अभिव्यक्ति के पक्ष में एक पूर्वधारणा के साथ इस तरह की वार्ता में मध्यस्थता करनी चाहिए. ‘जब भी किसी प्रकाशन, कला, नाटक, फिल्म, गीत, कविता, कार्टून या रचनात्मक अभिव्यक्ति के खिलाफ शिकायत हो, यह पूर्वधारणा अपने जेहन में होनी ही चाहिए.’ इसका मतलब यह कि प्रशासन को लेखन का पक्षधर बनकर मामले को ठंडा करने का कोई भी प्रयास करना चाहिए. अगर कानून और व्यवस्था को दुरुस्त रखना प्रशासन का काम है तो लेखक की आजादी को सुनिश्चित करना भी उसी का काम है, जब तक वह लेखन ऐसी स्वतंत्रता के संवैधानिक रूप से निर्दिष्ट अपवाद की श्रेणी में न आता हो.

फैसले पर आपत्तियां

फैसला आने के बाद, जाहिर है, असहिष्णुता के माहौल से चिंतित लोगों और खासकर लेखकों के बीच इसे लेकर खासा उत्साह देखा गया, लेकिन कुछ आपत्तियां भी व्यक्त की गईं. ये आपत्तियां भी सहिष्णुता और अभिव्यक्ति की आजादी के पैरोकारों के बीच से ही आई हैं. नंदिनी कृष्णन ने, जिनके द्वारा लिखी गई मुरुगन के उपन्यास की प्रशंसात्मक समीक्षा को अदालत ने सकारात्मक ढंग से अपने निष्कर्ष के पक्ष में उद्धृत किया है, इस फैसले से असंतोष जताया है. साथ ही, विधि-विशेषज्ञ गौतम भाटिया ने एक लेख लिखकर इस फैसले की सीमाओं को चिह्नित किया है. असंतोष का एक सामान्य नुक्ता यह है कि अगर उपन्यास का बहुप्रशंसित और बहुपुरस्कृत होना, किसी कथित भारतीय परंपरा के अनुकूल होना, और अपनी विषय-वस्तु में कामोत्तेजक न होना ही इस फैसले का आधार है तो क्या इससे यह स्वर नहीं निकलता कि जो कृतियां ऐसी नहीं हैं उन्हें प्रतिबंधित करना उचित हो सकता है. कई कालजयी रचनाएं अपने समय में आलोचकों की प्रशंसा हासिल नहीं कर पातीं. कई बहुत मूलगामी कृतियां अपनी परंपरा के प्रति एकदम प्रतिकूल होती हैं. कोई साहित्यिक रचना कामोत्तेजना को सौंदर्यात्मक धरातल तक ले जाने का अभिनव प्रयोग कर सकती है. क्या ऐसी कृतियों को इस फैसले से कोई सहारा मिल पाएगा? आंशिक रूप से यह आपत्ति सही हो सकती है, लेकिन पीछे फैसले के जिन अंशों का हवाला दिया गया है उनसे गुजरते हुए कोई भी समझ सकता है कि ऐसी कृतियों के लिए भी इस फैसले के पास सकारात्मक तर्क हैं. जहां तक ‘मधोरुबगन’ को मिली आलोचकीय प्रशंसा आदि की चर्चा का सवाल है, यह जरूर ध्यान में रखना चाहिए कि उपन्यास विशेष के खिलाफ याचिका दायर करने वालों की खास-खास आपत्तियों का जवाब देना भी फैसले का काम है. इसका मतलब यह नहीं है कि लेखकीय स्वतंत्रता के पक्ष में न्यायाधीश उसे ही आधारभूत तर्क के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं. फैसले में एक जगह बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा गया है, ‘यह तथ्य कि उपन्यास ने कई पुरस्कार हासिल किए, अपने आप में कोई निर्धारक तत्व नहीं है, हालांकि यह इस बात का सशक्त सूचक है कि समाज इसे कैसे देखता है.’

बावजूद इसके, फैसले पर उठाए गए सवाल एकदम निराधार नहीं हैं. मसलन, नियोग पद्धति से या दूसरे पुरुष से संतानोत्पत्ति की बात महाभारत और अनेक प्राचीन ग्रंथों में मिलने का हवाला देकर यह फैसला उपन्यास को विक्टोरियन दर्शन के प्रभाव से पहले की भारतीय परंपरा के अनुकूल बताता है, तो इस पर गौतम भाटिया का यह सवाल वाजिब है कि क्या प्राचीन भारतीय परंपरा अगर यौन मामलों में संकीर्ण और अनुदार होती तो अदालत का फैसला कुछ और होता.

इसी तरह उनकी यह आपत्ति कि फैसला जिस रूप में आया है, उससे यह न्यायाधीश-केंद्रित प्रतीत होता है, बेबुनियाद नहीं है. एक न्यायाधीश को अपनी व्याख्या के अनुसार कोई कृति पसंद आई तो एक तरह का फैसला आया, किन्हीं और को नापसंद हो तो दूसरी तरह का फैसला आ जाएगा. (ध्यान रखिए कि फैसले में बार-बार उपन्यास की केंद्रीय संवेदना के बारे में न्यायाधीश ने अपनी राय व्यक्त की है और इसी आधार पर इसे अश्लील मानने से इनकार किया है.) इससे लेखकीय स्वतंत्रता के मसले पर एक वस्तुनिष्ठ संवैधानिक स्थिति, जो व्यक्तिगत मतों से निरपेक्ष हो, सामने नहीं आती, जबकि मुरुगन के मामले ने इसका अच्छा अवसर मुहैया कराया था.

नंदिनी कृष्णन ने भी कई सवाल उठाए हैं, लेकिन विशिष्ट संदर्भ में आए तर्कों पर उनकी आपत्तियों को अगर छोड़ दें तो उनका ज्यादा बुनियादी सवाल भारतीय संविधान के प्रावधानों को लेकर है. उनके अनुसार, परेशान करने वाली बात यह है कि भारतीय संविधान में प्रतिष्ठापित कानून और प्रावधान जस्टिस कौल जैसी विचारशीलता, पांडित्य और कला के प्रति संवेदनशीलता रखने वाले न्यायाधीश के लिए भी एक युगांतकारी फैसला लिखना मुश्किल बना देता है, एक ऐसा फैसला जो एक दृष्टांत बन जाए और वर्तमान से लेकर भावी तक, सभी लेखकों को राहत दे. नंदिनी कृष्णन की यह बात जितना इस फैसले की सीमाओं को दिखाती है, उससे ज्यादा उन सीमाओं के कारण को चिह्नित करती है. यह एक बड़ा सवाल है कि न्यायपालिका संवैधानिक मर्यादाओं का किस हद तक विस्तार कर सकती है? अगर मुरुगन मामले पर उठी बहस इस सवाल को कायदे से संबोधित कर पाए तो यह लेखकीय स्वतंत्रता के मुद्दे पर एक जरूरी पहल होगी.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं)