नरेंद्र मोदी और अमित शाह

जिस तरह कुछ समय पहले मोदी देश के शीर्ष पद पर बैठने को बेताब थे उसी तरह की बेकरारी से वे उस समय भी ग्रस्त थे जब केशुभाई पटेल गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे. मोदी की नजर सीएम की कुर्सी पर थी. मोदी ने अपनी महत्वाकांक्षा से शाह को अवगत करा दिया था. लेकिन प्रदेश के राजनीतिक समीकरण आने वाले समय में कुछ इस कदर बदले कि मोदी को केशुभाई पटेल और तत्कालीन संगठन मंत्री संजय जोशी ने गुजरात से बाहर भिजवाने का इंतजाम कर दिया. वर्ष 1996 में मोदी राष्ट्रीय सचिव बनकर दिल्ली आ गए. लेकिन उनका मन गुजरात से दूर नहीं हो पाया और वे अमित शाह के माध्यम से गुजरात पर नजर बनाए रहे.

उधर केशुभाई पटेल के नेतृत्व में प्रदेश भाजपा की स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही थी. पार्टी स्थानीय चुनावों में लगातार हार रही थी. रही सही कसर 2001 में आए भयानक भूकंप ने पूरी कर दी. भूकंप पीड़ितों को राहत पहुंचाने के मामले में विफल रहने का आरोप केशुभाई सरकार पर लगने लगा. भाजपा को लगने लगा कि यदि केशुभाई पटेल के नेतृत्व में सरकार को छोड़ा गया तो आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ेगा. केशुभाई के खिलाफ दिल्ली में खूब लॉबीइंग हुई. पद्मश्री से सम्मानित गुजरात के वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक देवेंद्र पटेल कहते है, ‘केशुभाई के खिलाफ माहौल बनाने का काम नरेंद्र मोदी के लिए अमित शाह ने ही किया था.’

केशुभाई को मुख्यमंत्री पद से हटाकर मोदी को प्रदेश की कमान सौंप दी गई. यहां से मोदी और अमित शाह के संबंधों का एक नया दौर शुरू हुआ.

2002 में जब प्रदेश में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी तो सबसे कम उम्र के अमित शाह को मोदी ने गृह (राज्य) मंत्री बनाया. यही नहीं, सबसे अधिक 10 मंत्रालय उन्हें दे दिए गए. अमित शाह के रसूख में दिन दूनी, रात चौगुनी तरक्की होने की यह सिर्फ शुरुआत भर थी. धीरे-धीरे प्रदेश में स्थिति ऐसी होती गई कि अमित शाह राज्य में मोदी के बाद सबसे अधिक प्रभाव वाले नेता बन गए.

गुजरात में अमित शाह अपनी क्षमता साबित कर चुके थे. इसलिए जब मोदी की दिल्ली पर नजर पड़ी तो उन्होंने गांधीनगर से 7 आरसीआर (भारत के प्रधानमंत्री का आधिकारिक आवास) तक की राह सुनिश्चित करने का दायित्व भी शाह को सौंपा. शाह अपने ‘साहेब’ की उम्मीदों पर खरे उतरते हुए उन्हें प्रधानमंत्री बनवाने में सफल रहे. शाह को इसका तुरंत इनाम भी मिला और वे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिए गए.
मोदी की तरफ से शाह को हमेशा खुली छूट मिली है. उसका एक उदाहरण हाल ही में हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में भी देेखने को मिला. हरियाणा में अकेले चुनाव लड़ने को लेकर भाजपा के भीतर काफी असमंजस था तो वहीं महाराष्ट्र में शिवसेना के खिलाफ लड़ने पर भी पार्टी एकराय नहीं थी. लेकिन अमित शाह किसी दुविधा में नहीं थे. उन्होंने सारी आशंकाओें को किनारे रख गठबंधन तोड़ने और अकेले चुनाव में उतरने का फैसला ले लिया. जितने आत्मविश्वास के साथ शाह आगे बढ़े उसी भरोसे के साथ मोदी ने भी उनके निर्णयों पर अपनी मोहर लगा दी. उसी तरह जब महाराष्ट्र चुनाव में शाह ने मोदी की 30 के करीब रैलियां रखीं तो बतौर प्रधानमंत्री मोदी को यह कुछ अव्यावहारिक सा लगा. उन्होंने शाह से रैलियों की संख्या कम करने के लिए कहा लेकिन पार्टी अध्यक्ष ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि इससे कम में काम नहीं हो पाएगा. मोदी ने शाह की बात मान ली.

खैर चुनावी राजनीति में जीत या हार कुछ भी अंतिम नहीं होता. ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि अगर पार्टी आने वाले विधानसभा चुनावों में हारती है या 2019 में शाह अपने ‘साहेब’ को फिर से पीएम नहीं बना पाते हैं तब इस जोड़ी के आपसी रिश्ते किस रूप में सामने आएंगे?

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