नाम का इकबाल

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एक तरह से देखें तो हमारी पूरी सुरक्षा की यह एक जरूरी शर्त है. आखिर सड़क पर, बैंक में, ट्रेन में, हवाई जहाज में, हर जगह डर, दहशत और अविश्वास का एक वास्तविक माहौल तो है ही. अगर कोई धोखा हो, अगर कोई धमाका हो, अगर कोई हमला हो तो क्या हम उन जांच एजेंसियों को जिम्मेदार नहीं ठहराएंगे जिन्होंने सुरक्षा में चूक की, हमारे नाम के साथ छेड़छाड़ नहीं की, हमारे कृत्रिम पांव हटाकर नहीं देखे? आखिर बोधगया में यह सवाल उठ ही रहा है कि वहां रात भर सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं था. लेकिन बोधगया में तो सदियों से यह इंतजाम नहीं था, वहां 2013 में जाकर धमाके क्यों हुए?

सवाल यहीं से पैदा होता है. हमारी सुरक्षा पर इतने खतरों, हमारी स्वतंत्रता पर इतने पहरों और हमारी पहचान के साथ जुड़ी इतनी सारी शर्तों की नौबत कहां से आई? हमारे चारों तरफ इतने संदेह के घेरे हमेशा से तो नहीं थे? जैसे-जैसे हम विकसित होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे असुरक्षित क्यों होते जा रहे हैं?  क्या इसलिए कि हम घर को खोकर मकान बना रहे हैं, समाज को खोकर कॉलोनी बसा रहे हैं और मनुष्य को खोकर व्यवस्था बना रहे हैं?

कई बरस पहले, दिल्ली के किसी अपार्टमेंट में दाखिल होने से पहले, रजिस्टर पर पहली बार नाम-पता भरते हुए मुझे कुछ अजीब लगा था. जैसे इस प्रक्रिया ने ही मुझे कुछ छोटा, कुछ अजनबी, कुछ बाहरी बना डाला हो. अब भी गांवों-कस्बों से आए लोगों को मैं कई बार दरबानों से उलझता देखता हूं कि वे रजिस्टर क्यों भरें तो मुझे लगता है कि वे अपने खुलूस से उलझ रहे हैं, अपने आत्मसम्मान की बची हुई गांठ बचाए रखने की कोशिश में उलझ रहे हैं.

आज एक रजिस्टर हमारे अपार्टमेंट के गेट पर है, गेट से बाहर जो नई बस्तियां हैं वहां पीली सलाखों वाले बड़े-बड़े फाटक हैं जहां चौकीदार आने-जाने वालों पर नजर रखते हैं. क्या हमें कभी याद आता है कि ये बस्तियां हम उन मुहल्लों को छोड़ और तोड़कर बसा रहे हैं जहां हर घर अपना लगता था, जहां आने-जाने वालों को पहचान दर्ज नहीं करानी पड़ती थी?

यह विकास के साथ बदलते समय और समाज की सूरत है. अपार्टमेंट बड़े होते जा रहे हैं, रिश्ते छोटे होते जा रहे हैं, सुरक्षा कड़ी होती जा रही है, असुरक्षा बड़ी होती जा रही है, संदेह स्वभाव बनता जा रहा है, अविश्वास नियम बनता जा रहा है. इसकी ज्यादा कीमत उन्हें अदा करनी पड़ रही है जो तथाकथित मुख्यधारा वाली पहचानों में शामिल नहीं हैं. इस व्यवस्था में हमारा नाम- जो हमारी पहली पहचान है- तक भी महफूज नहीं है. लेकिन बड़े और ठोस सवालों के बीच इस बारीक और सूक्ष्म बदलाव पर नजर कौन रखे?

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