‘एक आदमी जिससे मैं सिर्फ दो बार मिली और अब इस मोड़ पर खड़ी हूं’ | Tehelka Hindi

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‘एक आदमी जिससे मैं सिर्फ दो बार मिली और अब इस मोड़ पर खड़ी हूं’

सुनंदा पुष्कर की रहस्यमय तरीके से हुई मौत के मामले में नाम जुड़ने के बाद पाकिस्तान की लेखक मेहर तरार ने अपनी जिंदगी में आए बदलावों के बारे में ज्यादा बात नहीं की. बावजूद इसके वह इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि एक दिन हर कोई सच को समझ सकेगा. हालांकि वह इस बात को लेकर काफी निश्चित हैं कि इसमें वक्त लग सकता है. रिजाय वानी ने उनका एक ईमेल इंटरव्यू किया है, जिसमें उन्होंने उस अग्निपरीक्षा के बारे में बताया जिससे वह गुजरीं. इस बीच वह पाकिस्तान पर एक किताब लिख रही हैं, जिसे नई दिल्ली की अलेफ बुक कंपनी प्रकाशित करेगी.

रियाज़ वानी 2015-04-30 , Issue 8 Volume 7

mehar_tararआप पाकिस्तान पर एक किताब लिख रही हैं. यह साधारण पाकिस्तानी लोगों की कहानी है, जो समाज में बदलाव लाने की कोशिश कर रहे हैं. यह विचार दिमाग में कैसे आया?

दरअसल, यह विचार मेरे प्रकाशक की ओर से आया. भारत के बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी के साथ मलाला युसूफजई के 2014 का नोबल शांति पुरस्कार पाने के बाद पाकिस्तानी सरकार और साधारण अवाम के बीच के संबंधों में एक नया आयाम जुड़ा है. पूरे विश्व से लगातार आ रहीं नकारात्मक धारणाओं की पृष्ठभूमि में एक बहुत बड़े वर्ग के सामने पाकिस्तान की दूसरी (सकारात्मक) छवि दिखाई ही नहीं जाती. एक आम पाकिस्तानी जो एक पारंपरिक पाकिस्तानी से भिन्न है. पश्चिम और दूसरे लोगों की ओर से एक आम पाकिस्तानी की छवि प्रतिगामी, अतिवादी, धर्मांध, साफा पहननेवाले, बंदूकधारी, उदारवाद से नफरत करनेवाले मुल्ला के रूप में दर्शाई जाती है. या अगर महिला हो तो उसे सताई हुई, बुर्कानशीं और पीड़िता बताया जाता है. इसके अलावा इस क्षेत्र से आनेवाली तमाम किताबों में भी 19 करोड़ से ज्यादा की आबादीवाले पाकिस्तान की गतिशील छवि को पेश करना बंद कर दिया गया है. इनके दैनिक अस्तित्व को कुछ हजार आतंकियों की छवि से बदला जा चुका है. ये मुट्ठी-भर आतंकी नफरत के अफसाने लिखने के साथ, विभाजन को बढ़ावा देने पर तुले हुए हैं. जो भी उनकी कट्टर विचारधारा के आड़े आता है वे उन्हें तबाह कर देते हैं. इन सबके बीच अपनी कम क्षमताओं के साथ अगर मैं पाकिस्तान का नरम और सकारात्मक पक्ष पेश कर सकी तो मानूंगी कि मैंने अपने देश को एक विनम्र तोहफा दे दिया है. यह पाकिस्तान को विकृत स्वार्थों के चश्मे से देखनेवाले लोगों का मुंह बंद करने में भी सहायक होगा.

आपने कश्मीर पर किताब लिखने की योजना बनाई थी. इसके लिए आपने लाहौर से जम्मू कश्मीर की यात्रा कर तब के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का इंटरव्यू भी किया था. किन कारणों से आपकी रुचि कश्मीर के प्रति जगी थी? इसके इतर पिछले साल की शुरुआत में आपने ट्विटर पर पाकिस्तानी युवाओं से कश्मीर प्रेम की जगह अपनी देश की समस्याओं पर सोचने का आग्रह किया था.

कश्मीर पर किताब लिखने का मेरा सपना है और मैं उम्मीद करती हूं कि यह कभी न कभी जरूर पूरा होगा. मेरा इरादा सीधासा है. इस किताब का भारत-पाकिस्तान के बीच ‘क’ (कश्मीर) शब्द से उपजी जटिलताओं से कोई लेना देना नहीं. कश्मीर के अनसुलझे मुद्दे के साथ दोनों संप्रभु देशों के बीच की शत्रुता को वास्तव में मैं तूल नहीं देना चाहती. पाकिस्तान और भारत के बीच के गतिरोध ने पिछले 68 सालों से दोनों देशों के रिश्तों को रक्तरंजित कर रखा है. जहां तक मुझे

याद है कश्मीर एक खुला जख्म है. मेरी इच्छा थी कि मैं कश्मीर के लोगों से मिलूं और उनकी कहानियां सुनूं. मैं उनसे एक पाकिस्तानी के तौर पर नहीं, बल्कि एक महिला के तौर पर मिलना चाहूंगी ताकि उनकी पीड़ा को महसूस कर सकूं.

मेरा विचार था कि मैं मुस्लिम, हिन्दू, सिख और दूसरे लोगों से बात करूं और वर्तमान लड़ाई के चलते पीड़ित कश्मीरियों की कहानियों को एक साथ रख सकूं. ये कहानियां मुसलमानों की हो सकती हैं, जो नारकीय जीवन जी रहे हैं, या फिर कश्मीरी पंडितों की कहानी हो सकती है जिन्हें निशाना बनाया गया, सताने के साथ जान से मार दिया गया. उन्हें अपना ही घर छोड़ने के लिए मजबूर किया गया. यह उनकी कहानी भी हो सकती है जो आजादी चाहते हैं. उन महिला-पुरुषों की कहानी हो सकती थी जो आतंकवाद और भारतीय सेना के अत्याचार से पीड़ित हैं.

यह किताब सभी कश्मीरियों के बारे में होगी. न तो यह किसी मुस्लिम लेखक की ओर से उसके साथी मुसलमानों का दर्द साझा करेगी और न ही किसी हिन्दू के नजरिये से कश्मीरी पंडितों के विस्थापन को बताएगी. मेरी इच्छा उन सभी लोगों, जो खुद को कश्मीरी कहते हैं, के दर्द को बताना है. मैंने उमर अब्दुल्ला का इंटरव्यू किया क्योंकि मेरी इच्छा एक कश्मीरी राजनेता, जिनका परिवार कश्मीर के राजनीतिक इतिहास में असर रखता है, के विचारों को अपने पाकिस्तानी पाठकों के सामने रखने की थी. मेरे सवालों के प्रति उनके स्पष्ट और ईमानदार जवाब से मुझे कश्मीर के बारे ने उनके नए दृष्टिकोण के बारे में पता चला. इससे इस बात की उम्मीद भी बंधी कि एक ऐसा सूत्र विकसित किया जा सकता है जो सभी पक्षों के लिए स्वीकार्य साबित होगा.

पाकिस्तान के कश्मीर दिवस के अवसर पर पांच फरवरी 2014 को मैंने ट्वीट किया था. यह कुछ धार्मिक संगठनों के संदर्भ में था जो देश में कश्मीर और कश्मीरियों के प्रति अपनी अमर निष्ठा दर्शाने के लिए पाकिस्तान में बड़ी-बड़ी रैलियां और प्रदर्शनों का आयोजन करते हैं. जबकि उसी देश में तालिबान की नृशंसता पर ये चुप्पी साधे हुए हैं. जमीन के एक टुकड़े को दुखद रूप से ‘पाकिस्तान अधिकृत’ और ‘भारत अधिकृत’ कश्मीर के तौर पर जाना जाता है. जिसके चलते कई दशकों से पाकिस्तान और भारत के बीच गतिरोध बरकरार है. इस संदर्भ में मेरे इस ट्वीट का मतलब कश्मीर के लोगों की पीड़ा को कम करके आंकना नहीं था.

कांग्रेस सांसद शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर की रहस्यमय मौत के बाद आपका नाम व्यापक तौर पर भारतीय मीडिया में उछाला गया था. भारतीय मीडिया ने आप पर शशि थरूर के साथ संबंध होने का आरोप लगाया था. इस बीच आपने कश्मीर का मुद्दा उठाया ताकि भारतीयों के बीच आपकी नई छवि बन सके?

मेरे लेखों और ट्वीट में भारत के प्रति मेरा अनुराग हमेशा पारदर्शी रहा है. एक साधारण पाकिस्तानी के दृष्टिकोण और विचारों को मैंने आगे लाने की कोशिश की थी, जो भारत आधारित अपनी कथित नीतियों के आगे जाते हुए अपने देश को देखने की इच्छा रखती है. आम भारतीयों के बीच पाकिस्तान के प्रति अपर्याप्त और विकृत सूचनाएं उपलब्ध हैं, जो अपने पड़ोसी देश के बारे में मन में नफरत रखता है. कुछ ऐसी ही सोच पाकिस्तान के तमाम लोगों की भारत के प्रति है.

दशकों से पाकिस्तान-भारत के बीच गतिरोध कायम है. मेरे ट्वीट का मतलब कश्मीरियों की पीड़ा कम करके आंकना नहीं था

अगर तकरीबन 140 शब्दों के ट्वीट से बिना एक-दूसरे का विनाश सोचे तीन या चार पाकिस्तानी और भारतीयों के बीच बातचीत कायम करने में मैं कामयाब हो सकी तो इसे सही दिशा में सही कदम के रूप में देखूंगी, क्योंकि मैं काफी आशावादी हूं. अगर दस मिनट के लिए मैं किसी टीवी शो में नजर आती हूं तो यह भी मुझे पाकिस्तान का पक्ष रखने की अनुमति देता है, लेकिन इसे भारत के साथ घृणा और शत्रुता को बढ़ावा देने के लिए गलत तरीके के राष्ट्रवाद से जोड़कर देखा गया.

पिछला साल काफी अप्रत्याशित और उतार-चढ़ाव भरा रहा. ट्विटर, जहां लोग मुझसे बातचीत करते हैं. इस सोशल प्लेटफॉर्म पर कुछ धर्मांधों की ओर से मुझे लगातार फंसाने की कोशिश की गई. मुझे लगता है कि जिन भारतीयों से मैं ऑनलाइन बातचीत करती हूं उनमें से सिर्फ दो फीसदी ही ऐसा कर रहे थे. ट्विटर पर जिस तरह की गर्मजोशी मुझे कुछ अजनबियों से मिली वह काफी उत्साहजनक और सादगीपूर्ण भी हैं.

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(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 7 Issue 8, Dated 30 April 2015)

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