‘सरकारें चाहती हैं कि संसाधनों पर जनता का कोई नियंत्रण न रहे’

जनशक्ति पर हावी राज्य

सरकारें चाहती हैं कि संसाधनों पर स्थानीय निकायों और जनता का कोई नियंत्रण न रहे. यह जनतंत्र और संविधान के खिलाफ है. तभी तो कई कानूनी नीतियां और ट्रिब्यूनल के फैसले हैं, जो कहते हैं कि जब तक पुनर्वास न हो जाए किसी भी स्थिति में लोगों की संपत्ति डुबोई नहीं जा सकती है. इसके बावजूद इन पर अमल नहीं किया जा रहा. उल्टा इसमें अड़ंगा डाला जाता है. नर्मदा के मामले में विभिन्न आयोगों और अधिकारियों ने जांच में कभी भी पूरा सहयोग नहीं दिया. मोदी सरकार ने आते ही पहला निर्णय बांध की ऊंचाई बढ़ाने को लेकर दिया है. अभी भूमि अधिग्रहण कानून आ गया है. इन सब को देखकर लग रहा है कि जनशक्ति पर राज्य हावी हो गया है. इधर जो सबसे बड़ी चुनौती आई है वह यह है कि सरकार का ही कॉरपोरेटीकरण हो गया है.

जन आंदोलनों की अलग राजनीति

हम दलीय राजनीति को अछूत नहीं मानते हैं. जन आंदोलनों की राजनीति के आयाम ही अलग होते हैं. इनके मार्ग साधन और पद्धति दूसरे होते हैं. अब तो चुनावी प्रक्रिया का भी कॉरपोरेटीकरण हो गया है, फिर भी चुनावी राजनीति में अगर सुधार होते हैं तो दलीय राजनीति में आया जा सकता है, लेकिन अभी ऐसा होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है. इतने सालों से जो देखा है और अभी के जो अनुभव रहे हैं उससे हमारी समझ बनी है कि दलीय राजनीति से अलग रहना चाहिए. हमारा काम विकेंद्रीकृत है. कोई भी कार्यकर्ता समूह अपने हिसाब से निर्णय ले सकता है. हमने सरदार सरोवर के क्षेत्र में यही तय किया है कि नर्मदा बचाओ आंदोलन किसी पार्टी का हिस्सा नहीं है.

‘आप’ से जुड़ने का कोई पछतावा नहीं 

आम आदमी पार्टी से जुड़ने का एक विशेष अनुभव रहा है, लेकिन इसे लेकर हमें कोई पछतावा नहीं है. हमने अपनी नैतिकता बचाकर रखी है. इस दौरान हमारे चुनाव राजनीति की व्यवस्था और प्रचार को लेकर जो भी अनुभव रहे हैं वे चुनाव पद्धति को लेकर आज तक के हमारे विश्लेषण के अनुसार ही थे. इससे यह बात पुख्ता हो गई कि चुनावी राजनीति की रणनीति बहुत अलग होती है जिसमें जन आंदोलनों के साथियों का सामंजस्य बैठा पाना मुश्किल होता है. जिस तरह से चुनाव में प्रचार और खर्चे करने पड़ते हैं, वह सब हमें नहीं आता है. हमारी पद्धति और चुनावी राजनीति की प्रक्रिया और जरूरतें अलग है. बहुत सी विसंगतियां हैं. पार्टियों के साथ जो जनशक्ति व जनसैलाब खड़े होते हैं वे टिकाऊ नहीं होते. इसे टिकाऊ बनाने के लिए राजनीतिक दलों के अंदर जो प्रकिया होनी चाहिए वह हो नहीं पाती है, क्योंकि एक चुनाव के बाद दूसरे चुनाव पर ध्यान देना होता है. पार्टी के नेतृत्व का ध्यान भी उन रणनीतियों की तरफ होता है जो सत्ता हासिल करने और उसे टिकाये रखने के काम आती है. मैं इसे पूरी तरह गलत भी नहीं मानती हूं, लेकिन कुछ बुनियादी सिद्धांत भी होने चाहिए, बस यही सब अनुभव रहे हैं. लोहिया जी कहा करते थे कि राजनीति में जेल, फावड़ा और मतदान पेटी तीनों होने चाहिए. पहले की राजनीति में यह संभव था. समाजवादी विचारधारा के कई ऐसे लोग हुए है जिन्होंने सामाजिक कार्य, संघर्ष और निर्माण को आगे बढ़ाते हुए चुनावी राजनीति में हिस्सा लिया, लेकिन वर्तमान में यह संभव नहीं है. अब राजनीति के मानक अलग हो गए हैं जो इस दौरान स्पष्ट रूप से दिखाई दिए. अगर जनशक्ति का आधार लेकर सत्ता में आए हैं तो सत्ता में आने के बाद भी उसका आधार खत्म नहीं होना चाहिए.

अभी खत्म नहीं हुआ आंदोलन

अब तक जो कुछ भी मिला है आंदोलन की वजह से मिला है, लेकिन अभी आंदोलन खत्म नहीं हो सकता, लोग लड़ रहे हैं. अभी बांध के पानी का स्तर बड़ा मुद्दा है. ‘न्यू बैक वाटर लेवल’ की वजह से पानी का स्तर कम बताया जा रहा है, जो कि एक धोखा है. अचानक तीस साल बाद एक सब-कमेटी बनाई गई. उसने फील्ड पर न जाकर सारी जानकारी दस्तावेजों से ली है और ‘माडल’ बदल कर ‘बैक वाटर लेवल’ कम किया है. इसी के आधार पर सरकार कह रही है कि ऊंचाई बढ़ाने से एक भी इंच ज्यादा जमीन नहीं डूबेगी. लेकिन अभी सरकार ने ही जो ‘न्यू बैक वाटर लेवल’ बताया था उससे भी पानी पार हो गया है. सरकार ने खुद सुप्रीम कोर्ट में जानकारी दी है कि इससे लगभग 16 हजार परिवारों को वहां से हटाया गया है.  सुप्रीम कोर्ट में हमारी याचिका पर बीते एक अगस्त (शनिवार) को विशेष सुनवाई हुई है. ऐसा शायद पहली बार हुआ कि शनिवार के दिन कोर्ट खुला रखा गया. आधे दिन सुनवाई हुई मगर यह बांध की ऊंचाई पर केंद्रित नहीं रही. हमें उम्मीद थी कोर्ट से हमें राहत मिलेगी और पानी का स्तर कम किया जा सकेगा, लेकिन कानूनी प्रक्रिया में भी विरोधाभास है. केवल कोर्ट के जरिये हम लोगों को पूरा न्याय मिलेगा यह मानकर नहीं चल सकते हैं. यहां तो जीने-मरने का सवाल है. बड़वानी में सत्याग्रह शुरू हो गया है और यह संघर्ष आगे भी जारी रहेगा.

(जावेद अनीस से हुई बातचीत पर आधारित)

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