मायावती और सतीश चंद्र मिश्र

0
193

इससे पहले तीन बार मुख्यमंत्री बन चुकी मायावती को तीनों बार दूसरे दलों की बैसाखी से सरकार चलानी पड़ी थी. लिहाजा बसपा ने अपनी पुरानी रणनीति बदलते हुए अपने दम पर सरकार बनाने की योजना तैयार की. जानकारों के मुताबिक इसको लेकर उस दौर में पार्टी के भीतर जोरदार मंथन चला. इसी क्रम में सतीश चंद्र मिश्र ने मायावती के सामने सोशल इंजीनियरिंग का एक फार्मूला रखा, जिसके तहत बसपा के बहुजन वाले कलेवर को सर्वजन वाला रूप दिया जाना था. इस बीच मायावती को इतना तो महसूस हो ही चुका था कि जब तक सर्वसमाज के लोगों की भागीदारी उनकी पार्टी में नहीं होगी, तब तक वे अकेले दम पर पूर्ण बहुमत हासिल नहीं कर सकती हैं. ऐसे में मिश्र का विचार था कि सबसे पहले उस ब्राह्मण वर्ग का विश्वास जीतना जरूरी है जिसका उत्तर प्रदेश में वोट 11 फीसदी के करीब है. मायावती को यह राय जंच गई और उन्होंने ‘तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार’ के नारे को बदल कर ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है’ कर दिया.

सर्वजन फार्मूले को अपनाने के बाद मायावती अपनी अधिकांश रैलियों में सतीश चंद्र मिश्र को अपने साथ ही ले जाती थी़. इससे मिश्र की छवि पार्टी के दूसरे नंबर के नेता की बन गई. ऐसे में पहले कांग्रेस तथा बाद में भाजपा से नाराज चल रहे ब्राह्मण समुदाय ने सत्ता में साझेदारी के लिए बसपा का न्यौता स्वीकार कर लिया. मायावती और मिश्र की इस जोड़ी ने दलितों और सवर्ण जातियों के साथ ऐसा तालमेल बिठाया जिसने पहली बार बसपा को पूर्ण बहुमत दिला दिया. राजनीति के जानकार बताते हैं कि सतीश चंद्र मिश्र अगर मायावती के साथ नहीं होते तो माया को यह बुलंदी शायद ही मिल सकती थी. मिश्र इस बात को भी भली-भांति जानते थे कि राज्य के अधिकतर नौकरशाह सवर्ण जातियों से आते हैं, इसलिए उनके साथ तालमेल बिठाने के लिए सवर्ण नेताओं को साथ लेना जरूरी है. इसलिए उन्होंने धीरे-धीरे अगड़ी जाति के लोगों को पार्टी में प्रवेश की वकालत की. इसके बाद नीचे से लेकर ऊपर तक फेरबदल करके संगठन का स्वरूप ऐसा बनाया कि पार्टी सिर्फ दलितों की प्रतिनिधि न लगे.

इसी सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले के तहत पार्टी ने बाद में मुसलमानों को भी तरजीह देने की कोशिश की. हालांकि 2012 तक आते-आते उत्तर प्रदेश की जनता का मायावती से मोहभंग हो गया और विधानसभा चुनाव में उनकी करारी हार हो गई, लेकिन बावजूद इसके सतीश चंद्र मिश्र और उनकी जोड़ी को उत्तर प्रदेश की राजनीति की एक कामयाब जोड़ी के रूप में ही देखा जाता है, क्योंकि इस जोड़ी ने बसपा को ऐसे वक्त में शिखर पर पहुंचाया था, जब उसके शून्य पर सिमटने का खतरा मौजूद था और उसके सबसे विश्वसनीय चेहरे कांशीराम का अवसान हो चुका था. 2007 में तब कोई भी मायावती की जीत को लेकर इस कदर आशान्वित नहीं था, यहां तक कि अधिकतर मीडिया मायावती को चुनाव से पहले ही खारिज कर चुका था.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here