सड़क किनारे साहित्य

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फोटो: विकास कुमार

राजधानी दिल्ली का सांस्कृतिक केंद्र है मंडी हाउस और उसके आसपास का इलाका. शाम के वक्त यह इलाका एक साथ कई अलग-अलग तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रमों से गुलजार रहता है. ऐसी ही एक शाम को मंडी हाउस के श्रीराम सेंटर के बाहर काफी चहलपहल है. स्ट्रीट लाइट की पीली रौशनी में कई अलग-अलग गुटों में खड़े लोग चाय-समोसे के साथ बातचीत में व्यस्त हैं. इसी पीली रोशनी के तले एक अधेड़ महिला तमाम साहित्यिक किताबों के साथ एक पेड़ के नीचे बैठी हंै. यह रौशनी उनके लिए काफी नहीं थी इसलिए उन्होंने चाइनीज लैंप भी जला रखा था. लैंप की रौशनी में वो किताबों को सजा रही हैं. उनके सामने कई ग्राहक खड़े हैं. कोई निर्मल वर्मा की ‘वे दिन’ मांग रहा है तो किसी को गालिब का संपूर्ण संकलन चाहिए. वो एक-एक कर सभी ग्राहकों को उनकी मांगी किताब पकड़ा रही हैं. खरीददारों की उनसे मोलभाव करने की परंपरा भी जारी है. इन सबके बीच रात हो चली है. आठ बजने को है. अब वह किताबों के बीच से निकलकर पास ही खड़ी अपनी स्कूटी पर आकर बैठ गई हैं.

मंडी हाउस के इस अति व्यस्ततम इलाके में करीब-करीब तीन हजार किताबों के साथ हर रोज बैठनेवाली इस महिला का नाम है, संजना तिवारी. 40 वर्षीय संजना अपने पति और दो बच्चों के साथ दिल्ली के करावल नगर में रहती हैं. कुछ समय पहले संजना श्रीराम सेंटर के अंदर स्थित वाणी प्रकाशन की दुकान में बतौर सेल्स इंचार्ज काम करती थीं. इसके लिए इन्हें वाणी प्रकाशन से हर महीने 4,500 रुपये मिलते थे. जिंदगी गुलजार थी, लेकिन 29 नवंबर 2008 को वाणी प्रकाशन की यह दुकान किन्हीं कारणों से बंद हो गई. इसी के साथ एक साधारण सेल्स इंचार्ज की जिंदगी में उताव-चढ़ाव और उथल-पुथल ने दस्तक दी.

इस उताव-चढ़ाव के बारे में बात करने से पहले संजना एक शर्त रखती हैं. वो कहती हैं कि शाम का वक्त है, ग्राहक आएंगे. जब आएंगे तो मैं आपको रोक दूंगी. इस शर्त के साथ हमारी बातचीत शुरू होती है. आखिर ऐसा क्या हुआ कि आप इन साहित्यिक किताबों के साथ यूं सड़क किनारे बैठी हैं. वो कहती हैं, ‘वाणी प्रकाशन की दुकान बंद हुई तो मैं 2009 के फरवरी महीने में ज्ञानपीठ प्रकाशन में काम करने लगी. वहां छह महीने काम भी किया. लेकिन एक दिन ज्ञानपीठवालों ने कहा कि मैं एक कागज पर यह लिख दूं कि इस नौकरी की मुझे जरूरत नहीं है और मैं अपनी मर्जी से यह नौकरी छोड़ रही हूं. हालांकि तब मुझे उस नौकरी की बहुत जरूरत थी लेकिन मैंने उन लोगों के मन मुताबिक काम किया और नौकरी छोड़ आई.’

साल भर के अंदर ही संजना दोबारा सड़क पर आ गई थीं. इस बार कई साल लग गए नौकरी खोजने में लेकिन नौकरी नहीं मिली. इस दौरान संजना ने कम्प्यूटर चलाने के साथ उस पर किताब का पेज बनाना भी सीख लिया. फिर भी नौकरी नहीं मिली. दिन गुजरे 2009 से 2013 आ गया. लेकिन संजना अपने लिए एक नई नौकरी नहीं खोज सकीं. इन पांच सालों के दौरान परिवार की हालत भी लगातार खराब होती गई. इस बारे में बात करते हुए संजना हल्के से मुस्कुराते हुए कहती हैं, ‘जब तक जिंदगी है तभी तक संघर्ष है. एक बार जिंदगी खत्म हो गई तो सारा का सारा संघर्ष भी खत्म हो जाएगा. सो मुझे अपने संघर्ष से कोई निराशा नहीं है. इस दुनिया में अपने परिवार को पालना सबसे मुश्किल काम है. मेरे दो बच्चे हैं और मैं उन्हें एक पल के लिए भी निराश नहीं देख सकती. शायद कोई भी मां अपने बच्चों को उदास नहीं देख सकती.’

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फोटो: विकास कुमार

वे आगे कहती हैं, ‘…लेकिन जब ज्ञानपीठ प्रकाशन से मेरी नौकरी गई और मैं बेरोजगार थी तो घर चलाने में बहुत दिक्कत होने लगी. बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने लगी. फिर मैंने फैसला किया, जो पिछले कई सालों से लेना चाह रही थी लेकिन एक अनजाने डर की वजह से बार-बार रुक जाती थी. अपना काम शुरू करने का मन था और फिर श्रीराम सेंटर के बाहर सड़क किनारे किताबों की दुकान लगाने का फैसला कर लिया’. पिछले साल 14 अगस्त को अंजना से पहली दफा कुछेक किताबों के साथ अपना काम शुरू किया.

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