लखीमपुर: महिला तस्करी की नई राजधानी

शुरू में मुझे एक लड़की को ले जाने के लिए 3,000 रुपये का कमीशन मिलता था. 2010 तक बढ़कर यह 6,000 रुपया हो गया था. आज का रेट 10,000 है. लेकिन इस सबकी असली शुरुआत 2005 में हुई थी. यहां, लखीमपुर में मार्टिन टर्की नाम का एक आदमी रहता था जो मेरा दोस्त था. मार्टिन का एक और दोस्त था, सैमुएल गिडी. सैमुएल की श्रीनिवास से पहचान थी. उसने मार्टिन को श्रीनिवास के बारे में बताया और मार्टिन ने मुझे. मुझे बताया गया कि काम के लिए यहां से लड़कियां ले जाने पर कमीशन मिलता है और मैंने लड़कियां ले जाना शुरू कर दिया. उनमें से कुछ वापस आ गईं, कुछ भाग गईं, और कुछ वापस नहीं आईं. जो भाग जाती, उसका पैसा भी मुझे ही भरना पड़ता.’

सूत्रों के अनुसार सिल्वेस्टर प्लेसमेंट एजेंसियों द्वारा लड़कियों के भारत से बाहर तस्करी किए जाने की प्रक्रिया के बारे में भी जानकारी रखता था. पूछने पर वह बताता है, ‘मैंने श्रीनिवास के साथ लगभग पांच सालों तक काम किया है, इसलिए मैं उसका सबसे विश्वासपात्र आदमी था. उसने मुझे बताया था कि अगर हम लड़कियों को देश के बाहर भी भेज पाएं तो काफी पैसा कमा सकते हैं. एक लड़की को देश के बाहर भेजने के उसे दो लाख रुपये मिलते थे. मैंने खुद तो लड़की बाहर नहीं भेजी लेकिन मुझे पता है कि लोकल एजेंट को एक लड़की बाहर के लिए लाने का 50 हजार रुपया मिलते थे. लड़कियों के लिए डिमांड ज्यादातर अरब देशों से आती है, इसलिए मुझे लगता है कि लड़कियां अरब देशों में ही भेजी जाती हैं. अब दिल्ली में तो सैकड़ों प्लेसमेंट एजेंसियां मौजूद हैं.

अकेले सुकूरपुर बस्ती में ही 200 से ज्यादा प्लेसमेंट एजेंसियां हैं.’ काम छोड़ने और लखीमपुर में तस्करों के लगातार फैलते जाल के बारे में वह आगे कहता है, ‘मैं लगातार काम करता रहा, लेकिन धीरे-धीरे मुझे लगने लगा कि इस काम में बहुत सरदर्द है. श्रीनिवास पैसे नहीं देता था तो लड़कियों के घरवाले कहते कि मैंने उनकी बेटी का पैसा खाया, फिर पुलिस-वुलिस का भी झंझट रहता था. जब मैंने शुरू किया था तब यहां पर ऐसे ज्यादा एजेंट नहीं थे. लेकिन मेरे देखते ही देखते यहां एजेंट ही एजेंट फैल गए. एक साल पहले तक तो हर 15 दिन में समझ लीजिए 40 लड़कियां चली जाती थीं. अब आज डर की वजह से थोड़ा छुपा-छुपा कर चुप-चाप लड़कियों को ले जाना शुरू कर दिया है. लेकिन आज भी 15 से 20 तो चली ही जाती हैं यहां से’.

विजय टिर्की 

45 वर्षीय विजय टर्की लखीमपुर के उन सक्रिय दलालों में से एक है जिसके द्वारा भेजी गई कुछ लड़कियां आज भी दिल्ली की प्लेसमेंट एजेंसियों के मालिकों के चंगुल में फंसी हुई हैं जबकि कुछ को सालों बंधुआ मजदूरी करने के बाद खाली हाथ घर लौटना पड़ा. लखीमपुर के एक स्थानीय चर्च में हुई इस बातचीत के दौरान वह बताता है, ‘तीन साल पहले की बात है. हमारे यहां से बहुत सारे एजेंट लड़की दिल्ली ले जा रहे थे और उनको पैसा मिल रहा था. तो हमने भी सोचा कि ऐसे ही हम भी लड़की ले जाकर थोड़ा पैसा कमा लें. हमारे यहां के ही एजेंट लोगों ने मुझे कार्ड दिया था, श्रीनिवास का.

फिर उसी कार्ड के नंबर पर फोन करके मैं दिल्ली पहुंचा. उसने कहा कि लड़कियों का कागज बना के ले आओ, मां-बाप से अंगूठा लगवा कर. मैं ले जाता और वह शुरू में मुझे एक लड़की पर सात हजार रुपये देता था. अब रेट 10 हजार हो गया है. कुछ दिनों बाद मैं सुकूरपुर में उमेश राय के ऑफिस में लड़कियां देने लगा. वहां अभी भी मेरी एक लड़की है और श्रीनिवास के पास काम कर रही तीन लड़कियां अभी तक वापस नहीं आईं हैं. कुल मिलाकर मैं अभी तक 13  लड़कियों को दिल्ली ले गया हूं.’  प्लेसमेंट एजेंसियों के साथ अपना अनुभव के बारे में साझा करते हुए विजय बताता है, ‘लेकिन अब मुझे लगता है कि श्रीनिवास ठीक आदमी नहीं है. मेरी दो लड़कियों के पैसे भी नहीं दिए, बाकियों से बात नहीं हो पाती थी और एक लड़की को इन्होंने चंडीगढ़ भेज दिया था. उसे भी नहीं छोड़ रहे थे.’

अजंता

मात्र 23 साल की अजंता इन सभी तस्करों में सबसे कम उम्र की है. जनवरी 2013 में तीन लड़कियां दिल्ली भेजने वाली अजंता अभी सबसे सक्रिय तस्कर है. तहलका से बातचीत में अजंता कहती है, ‘जब मैं बहुत छोटी थी, 15-16  साल की, तब पहली बार काम करने दिल्ली गई थी.

एक स्थानीय दलाल ले गया था श्रीनिवास के यहां. मुझे एक कोठी पर काम लगवाया. वहां मुझे अच्छा नहीं लगा तो मैंने कहा कि  मुझे घर जाना है. उन्होंने कहा कि  एक साल काम करना पड़ेगा नहीं तो कोई पैसा नहीं मिलेगा. मैं हमारे यहां के मोमिन के साथ वापस आ गई गांव. वह भी दलाल था.

फिर वापस कुसमा के साथ गई दिल्ली और एक साल काम किया. इस बार थोड़े पैसे मिल गए तो मैंने लड़कियां ले जाना शुरू कर दिया. अब मैं काम नहीं करती. मुझे काम करना अच्छा नहीं लगता.

सिर्फ लड़कियां ले जाती हूं. दिल्ली के गोविंदपुरी में वह सुशांत है न, उसी के यहां देती हूं. अभी तीन महीने पहले ही तीन लड़कियां दे कर आई हूं. एक की उम्र 22-23 है, दूसरी की लगभग 15 और तीसरी की 18-19 के बीच.

सैमुएल टर्की

सन 2003 से लेकर 2012 तक लखीमपुर से लगभग 35 के आस-पास लड़कियां होंगी जिन्हें मैं दिल्ली ले गया हूं. देखिए, अगर एक एजेंट का एक महीने में एक लड़की भी लगा लो, कम से कम इतना तो हर एजेंट ले जाता ही है, तो भी हर एजेंट का एक साल में 12 लड़की हो जाती है. वैसे तो हर गांव में कई एजेंट हैं लेकिन अगर एक या दो भी पकड़ कर चलो, तो भी हर महीने पूरे लखीमपुर से 60-70 से ऊपर ही लड़कियां जाती हैं. और यह आंकड़ा लगातार बढ़ ही रहा है. मुझे यहीं के एक एजेंट ने श्रीनिवास का नंबर दिया था. तब वह हमें एक लड़की के छह हजार रुपये देता था जबकि आज 10 से 12 हजार मिल जाते हैं.

लखीमपुर के वे इलाके जहां से लड़कियां सबसे ज्यादा जाने लगी हैं और जहां बहुत एजेंट हैं उनमें दुलहत तेनाली, चौदह नंबर लाइन, दिरजू, हरमोती, बंदरदुआ शामिल हैं.’2012 तक लखीमपुर से लगभग 35 लड़कियों को दिल्ली लाने वाला सैमुएल टर्की लखीमपुर के सबसे प्रमुख और पुराने तस्करों में से एक है.तहलका से विस्तृत बातचीत में वह लखीमपुर में चल रही महिला तस्करी के उलझे हुए नेटवर्क की बारीकियां बताते हुए कहता है, ‘2003 में चाय बागान बंद होने से लेकर अब तक हर साल, हर गांव में एजेंट लगातार बढ़े हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि पिछले सात-आठ सालों से लड़कियों को खुले आम ले जाते थे और अब छिपा कर ले जाने लगे हैं. जब से पुलिस के चक्कर का डर फैला है, तब से चोरी-छिपे लड़कियों को ले जाते हैं. पुराने जितने भी एजेंट हैं, सबकी आपस में बात होती है इसलिए हमें मालूम है कि कौन कितनी लड़की कहां ले जा रहा है. लेकिन जो अब नए एजेंट बन रहे है, उनका पता नहीं होता.

कुसमा टर्की और ज्वेल खुजूर

जुलाई, 2012 में सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की एक गोपनीय रिपोर्ट बताती है कि 24 अगस्त, 2008 से लेकर 19 अप्रैल, 2010 के बीच लखीमपुर निवासी कुसमा टर्की अपने जिले से 53 बच्चों की तस्करी करके उन्हें काम के लालच में दिल्ली लाई थी. दुलहत बगान की चार नंबर लाइन स्थित अपने घर में तहलका से बात करते हुए कुसमा कहती है, ‘मैं अपने भाई ज्वेल खुजूर के साथ मिलकर इन बच्चों को दिल्ली काम के लिए ले गई थी. सबसे पहले तो मैं खुद काम करने श्रीनिवास के यहां गई थी. फिर मेरा बेटा बीमार हो गया और एक साल बाद मैंने घर जाने की बात कही. इस पर श्रीनिवास ने मुझे घर तो भेज दिया साल भर के काम के सिर्फ पांच हजार मिले. जाते वक्त उसने मुझसे कहा कि अगर मेरे गांव से कोई और आना चाहे तो मैं उसे लेकर आऊं, वह मुझे उसका कमीशन देगा. यहां लखीमपुर से बच्चे दो तरह से मंगवाए जाते हैं. एक तो जैसे मैं काम करने आई…मेरे जैसे और भी कई आते हैं, उन्हें काम का पूरा पैसा नहीं देकर उनसे कहना कि अपने गांव से बच्चे ले आओ, उसका कमीशन मिलेगा.

दूसरा तरीका यह है कि श्रीनिवास और दूसरी एजेंसी वाले एजेंटों को लखीमपुर के गांवों में भेजते हैं जो वहां से बच्चे ढ़ूंढ़कर लाते हैं. श्रीनिवास के कहने पर मैं अपने गांव से लड़कियों और लड़कों को भी लेकर जाने लगी. हर लड़की पर चार हजार रुपये मिलते थे. पहले तो सब ठीक चला लेकिन बाद में अचानक श्रीनिवास ने लड़कियों को पैसा देना बंद कर दिया.’ दिल्ली स्थित प्लेसमेंट एजेंसियों के काम करने के तरीके और लड़कियों को देश से बाहर भेजने के बारे में बताते हुए कुसुमा आगे कहती है, ‘कितने ही परिवार हैं यहां जिनकी लड़कियां लौट कर नहीं आई हैं. तीन-तीन साल हो गए और लड़कियां वापस नहीं आईं. शिवांगी और एलिमा के साथ इतनी ज्यादती भी हुई. वह वैसे ज्वेल खुजूर से बोलता था लड़कियों को बाहर भेजने के बारे में, लेकिन अब तो मुझे विश्वास हो गया है कि वह लड़कियों को देश के बाहर भेजता है, वर्ना हमारे घर के सामने की ही सोनाली बारला अभी तक घर वापस आ गई होती.’

ज्वेल खुजूर मूलतः कुसमा के साथ ही काम करता था और उसके साथ लखीमपुर से 53 बच्चों की तस्करी के मामले में दोषी है. तहलका से बातचीत में वह प्लेसमेंट एजेंसियों द्वारा लड़कियों को विदेश भेजने से जुड़े सिल्वेस्टर और कुसमा के बयानों को वजन देते हुए कहता है, ‘श्रीनिवास लड़कियों को विदेश भेजता था. उसने मेरे सामने 20-22 साल की एक लड़की को विदेश भेजा था. मैं उस समय दिल्ली में ही था. मेरे सामने टिकट-विकट सब हुआ था लड़की का और फिर शायद सिल्वेस्टर ही उसे छोड़ कर आया था. श्रीनिवास मुझसे भी कहता था कि अगर मैं विदेश ले जाने के लिए लड़की लाकर दूं तो वह मुझे 40 हजार रुपये का कमीशन देगा’.

स्टीफन

तीन दिन की कोशिश के बाद एक  स्थानीय अस्पताल के बाहर हमारी मुलाकात स्टीफन से होती है. स्टीफन शुरुआत से ही उन सभी लड़कियों के दावों को झूठा बताता है जिन्होंने उस पर उन्हें शोषण के दलदल में धकेलने के आरोप लगाए. लेकिन लड़कियों की तस्करी को स्वीकार करते हुए वह कहता है, ‘मैंने यह काम तीन साल पहले शुरू किया था. सबसे पहले मैं दिल्ली के मुनीरका में सिस्टर जोसलीन और महेंद्र नायक के यहां गया था. वहां सेक्योरिटी गार्ड के लिए लड़के देता था.

फिर धीरे-धीरे लड़कियां भी ले जाने लगा. सुकूरपुर बस्ती में प्रवीण के बबीता एंटरप्राइजेज में भी लड़कियां देने लगा. अभी तक मैं कुल 22 लड़कियां लखीमपुर से दिल्ली ला चुका हूं. मैंने तो कुछ गलत काम नहीं किया. हो सकता है कि लड़कियों ने कहा हो कि मैंने पैसे खाए हैं लेकिन मैं सब गॉड के भरोसे करता हूं.’ (खबर लिखे जाने तक स्टीफन की हरियाणा के सोनीपत में मानव तस्करी के एक मामले में गिरफ्तारी हो चुकी थी)

विश्वजीत और अनीता

विश्वजीत और अनीता भी लड़कियों को लखीमपुर से दिल्ली लाया करते थे.  2010 में विश्वजीत दुलहत बागान की बंगला लाइन में रहने वाली 17 वर्षीया सुहानी लोहार को दिल्ली ले गया और उमेश राय की प्लेसमेंट एजेंसी ने उसे काम पर लगवा दिया. अचानक हुई एक पुलिस रेड के दौरान उमेश राय के दफ्तर से सुहानी के साथ छह और लड़कियां बरामद हुईं. पूछताछ के दौरान सुहासी ने बताया कि उमेश राय ने उसका शारीरिक शोषण किया था.  पैसों के लिए सुहासी की तस्करी करने वाला विश्वजीत तीन महीने जेल में बिता चुका है . इसी तरह अपने गांव की 10 लड़कियों की तस्करी में शामिल अनीता श्रीनिवास के साथ-साथ सुकूरपुर के महेश गुप्ता की प्लेसमेंट एजेंसी पर लड़कियां पहुंचाती थी.

(रिपोर्ट में पीड़ितों के नाम बदल दिए गए हैं)

 [box]

‘अभी एजेंट लोग जो लाए थे उनमें से पांच हजार लड़कियां घर नहीं पहुंची हैं’

video grab

लखीमपुर से लड़कियों को दिल्ली लाने वाले नौ तस्करों के बयान दर्ज करने के बाद तहलका ने दिल्ली में फैली हुई प्लेसमेंट एजेंसियों की कार्य शैली और उनके नेटवर्क को टटोलने की कोशिश की. इस दौरान तहलका की टीम ने एक घरेलू सहायक की तलाश में परेशान एक सामान्य मध्यवर्गीय परिवार के सदस्यों की तरह शकूरपुर बस्ती की प्रमुख प्लेसमेंट एजेंसियों के साथ-साथ इस धंधे में शामिल प्रमुख दलालों से भी बात की. पड़ताल के दौरान हमारी मुलाकात शकूरपुर बस्ती के एम ब्लॉक में ‘उत्तरा प्लेसमेंट एजेंसी’ चलाने वाले राकेश कुमार से हुई. पांच साल से इस धंधे में सक्रिय राकेश के साथ तहलका के छिपे हुए कैमरे पर हुई इस बातचीत के ये अंश प्लेसमेंट एजेंसियों की कार्यप्रणाली और नौकरी के नाम पर असम, बंगाल, झारखंड और उड़ीसा से आई लड़कियों का शारीरिक, आर्थिक और मानसिक शोषण करने वाले आपराधिक समूहों के बारे में भी बताते हैं

तहलका: भैया, ठीक-ठीक बता दीजिए किसी ऐसे के यहां से जहां से कोई लफड़ा न हो और अच्छी लड़की मिल जाए और एक बार में मामला फिक्स हो जाए. बार-बार इतने पैसे ले लेते हैं ये प्लेसमेंट एजेंसी वाले और हम परेशान होते रहते हैं.

राकेश: हां, हां, पन्ना लाल के यहां से आपको बिल्कुल ठीक रिस्पांस मिल जाएगा. लड़की उन्नीस-बीस भी हो तो वो पैसे लौटा देता है. पैसे खाने वाले दूसरे लोग बहुत हैं शकूरपुर में. उनका काम ही यही है. लड़की लगाना, पैसे मंगाना और फिर लड़की भगा लेना. पन्नालाल के यहां ऐसा नहीं है.

तहलका: अच्छा, पन्नालाल का अड्रेस बताइए. 

राकेश: ब्रिटैनिया चौक के लेफ्ट में श्मशान घाट है. श्मशान घाट से ही आप अंदर हो जाना, बिल्कुल बरात घर के सामने वहीं है. लड़कियां उसके पास हमेशा ही रहती हैं.

तहलका: तो वो कहां से लाते हैं ? झारखंड से? 

राकेश: उनके पास आपको झारखंड की भी मिल जाएंगी, असम की भी और उड़ीसा की भी. आधे से ज्यादा प्लेसमेंट वालों से तो वो खुद ही लड़कियां लेता है. उसके पास हमेशा लड़कियां रहती हैं.

तहलका: तो वो कितने पैसे लेगा? फिर लड़की का कितना जाएगा? काम सारा करना होगा. 

राकेश: रेट इनका थोड़ा हाई है. 35-40 हजार तक लेते हैं. फिर लड़की अगर सेमी-ट्रेंड हो तो पांच हजार तक लग जाते हैं.

तहलका: इनका रेट यहां पर सबसे ज्यादा है क्या? 

राकेश: हां, और यही यहां का सबसे बड़ा सरगना भी है. आधे से ज्यादा प्लेसमेंट एजेंसी वालों से तो खुद खरीदता है लड़कियां ये.

तहलका: पहले हम चिराग दिल्ली से एक लड़की लाए थे. 30 हजार रुपए दिए थे लेकिन वो तुरंत तीन महीने में भाग गई. हम लोग बहुत परेशान हुए. 

राकेश: ऐसे भाग जाने वाले और भगाने वाले लोग अलग हैं. उनका काम सर्फ यही होता है कि लड़की लगवाते हैं, पैसे लेते हैं और फिर तीन-चार दिन काम करके लड़की गायब. कभी केबल के तार से उतर के आ जाएगी, कभी दरवाजे से भाग जाएगी. ऐसा करवाने वाले फ्रॉड-चोर दलाल भरे पड़े हैं सुकूरपुर में. जो सबसे बड़े चोर हैं, जो पैसा लेकर लड़कियां लगवाते हैं और फिर भगवाते हैं, उनमें सबसे बड़े नाम हैं- सुबोध, मोंटू मिश्रा, आलम, अनिल और उमेश राय और प्रवीण भी हैं.

तहलका: अच्छा, उस चिराग दिल्ली वाले ने हमें उमेश राय और प्रवीण के बारे में भी बताया था. इनसे ले सकते हैं क्या? 

राकेश: वो सब चोर हैं. और सुकूरपुर में सब चोर हैं.

तहलका: कहां है इनकी एजेंसी? 

राकेश: उमेश तो मेरे ही ऊपर एम 680 में था. अब बंद करके कहीं और चला गया है और प्रवीण तो वहीं रहता है. लेकिन आपको मैं बता देता हूं , अगर 20 तारीख के बाद आओगे तो मुझसे ले लेना. मेरे पास 20 के बाद आना शुरू होंगी लड़की.

तहलका: आप तो उत्तर प्रदेश, मथुरा से हैं न? इस लाइन में कैसे आ गए? 

राकेश: मैं हिमाचल में कबाड़ी का काम करता था. मेरे चाचा से पन्नालाल की पहचान थी. तो पन्नालाल मुझसे कई बार कहा कि वहां ऑफिस खोलना है वहां और कहा कि मैं उसके साथ काम कर लूं. बस मैं घुस गया.

तहलका: तो क्या हिमाचल भी जाती हैं इसकी लड़कियां? 

राकेश: कहां तक नहीं जाती हैं ये पूछो. सबसे ज्यादा तो हिमाचल और श्रीनगर. देश के बाहर भेजने वाला शंभू है. दो-दो साल के अग्रीमेंट बना के भेजता है. बाकी पन्नालाल तो पूरे देश में भेजता है.

तहलका: मेरी एक बहन है, उसका छोटा बच्चा है. बहुत परेशान करता है. उसके लिए कोई बताओ जो बाहर भेज दे लड़की. पैसे की कोई दिक्कत नहीं. 

राकेश: तुम्हें जो बताया है न वो खुदा है खुदा. पहले एक लड़की ले लो, सारे काम करवा देगा. उसकी बहुत पहुंच है. बाकी अभी देख लो. उसके सिवा बीस तारीख तक तो कहीं भी नहीं लड़कियां.

तहलका: क्यों? क्या हो गया? 

राकेश: झारखंड से पुलिस आया, बंगाल से आया , असम से आया. अभी एजेंट लोग जो लाए थे उनमें से पांच हजार लड़कियां घर नहीं पहुंची हैं अभी तक. सब खो गई हैं. आज तक अपने घर नहीं पहुंची.

तहलका: ये लड़कियां जा कहां रही हैं ?

राकेश: अरे कुछ नहीं, ये एजेंट ले आते हैं, प्लेसमेंट वाले काम पे लगवा देते हैं. तीन-तीन साल हो जाते हैं, किसी को पता ही नहीं होता कि लड़कियां कहां हैं. क्या मालूम कहां चली जाती हैं.

[/box]

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here