केशव के हाथ कमल

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कहते हैं कि राजनीति में टोटके खूब चलते हैं. ऐसा ही एक टोटका सत्तारूढ़ भाजपा में चल रहा है. यह टोटका हिंदुत्व, पिछड़ा और चायवाला कंबिनेशन का है. लोकसभा चुनाव में ऐसे ही उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने बड़ी जीत दर्ज की तो अब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ऐसे ही कंबिनेशन के सहारे जीत हासिल की जाने की तैयारी हो रही है. उप्र भाजपा के नवनिर्वाचित अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य इस कंबिनेशन पर सटीक बैठ रहे हैं. अपेक्षाकृत कम अनुभवी और दागदार छवि वाले केशव कोइरी जाति से आते हैं. वे बजरंग दल से जुड़े रहे हैं. विश्व हिंदू परिषद के संगठन में रहे हैं और एक जमाने में चाय भी बेचते रहे हैं.

गत आठ अप्रैल को जब भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष के रूप में उनके नाम की घोषणा की तो पार्टी कार्यकर्ता, विरोधी और राजनीतिक विश्लेषक सभी भौचक रह गए. पार्टी में अध्यक्ष पद के लिए धर्मपाल सिंह, स्वतंत्रदेव सिंह, मनोज सिन्हा, दिनेश शर्मा, विनय कटियार और ओम प्रकाश सिंह जैसे दूसरे नेताओं के नाम की चर्चा चल रही थी, लेकिन इसके बजाय शीर्ष नेतृत्व ने केशव को उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को अगले आम चुनावों के पहले का सेमीफाइनल माना जा रहा है. इस बार भी नरेंद्र मोदी की सरकार बनाने में उत्तर प्रदेश का बड़ा हाथ रहा है. पार्टी ने यहां से 73 सीटों पर जीत दर्ज की है. हालांकि उसके बाद से होने वाले पंचायत चुनावों, विधान परिषद चुनावों समेत अन्य मुकाबलों में पार्टी की बुरी गत हुई है. ऐसे में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव बहुत रोचक होने जा रहा है. हालांकि विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा के खेवनहार केशव की जिंदगी भी काफी उठापटक भरी रही है.

केशव प्रसाद मौर्य इलाहाबाद से सटे कौशांबी के सिराथू के कसया गांव के रहने वाले हैं. जानकार बताते हैं कि किसी जमाने में उनके पिता श्याम लाल वहां चाय की दुकान चलाते थे. केशव की प्राथमिक शिक्षा-दीक्षा भी वहीं हुई थी. उन्होंने पिता की चाय की दुकान में मदद करने से लेकर अखबार बेचने का काम किया. इसी दौरान एक दिन उनकी मुलाकात विहिप नेता दिवंगत अशोक सिंहल से हुई. इसके बाद से केशव का रुझान संघ की तरफ हो गया और बहुत कम उम्र में ही उन्होंने संघ की शाखाओं में जाना शुरू कर दिया. सिंहल से करीबी और अपने जुनून से वे बहुत जल्द संगठन में जिला स्तर तक पहुंचने में सफल हो गए. विहिप कार्यकर्ता के रूप में केशव 18 साल तक गंगापार और यमुनापार में प्रचारक रहे.

साल 2002 में इलाहाबाद शहर पश्चिमी विधानसभा सीट से उन्होंने भाजपा प्रत्याशी के रूप में राजनीतिक सफर शुरू किया. उन्हें बसपा प्रत्याशी राजू पाल ने हराया था. इसके बाद साल 2007 के चुनाव में भी उन्होंने इसी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा. पर इस बार भी उन्हें जीत तो हासिल नहीं हुई. 2012 के चुनाव में उन्हें सिराथू विधानसभा से जीत मिली. यह सीट पहली बार भाजपा के खाते में आई थी. दो साल तक विधायक रहने के बाद केशव ने फूलपुर लोकसभा सीट पर भी पहली बार भाजपा का झंडा फहराया. भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के संसदीय क्षेत्र फूलपुर में इससे पहले भाजपा को कभी जीत नहीं मिली थी.

‘केशव प्रसाद मौर्य आपराधिक नहीं जुझारू प्रवृत्ति के नेता हैं. वे हमेशा अत्याचार के विरोध में आवाज उठाते रहे हैं. आप देख सकते हैं कि उन पर ज्यादातर मुकदमे कार्यकर्ताओं का साथ देने के चलते दायर हुए हैं. इसमें कोई निजी स्वार्थ नहीं है’ 

इन सबसे अलग मौर्य का एक पहलू और भी है. लोकसभा चुनाव के लिए उन्होंने मई 2014 में जो हलफनामा चुनाव आयोग में जमा किया था, उसके अनुसार केशव के खिलाफ 10 आपराधिक मामले हैं. इनमें धारा 302 (हत्या), धारा 153 (दंगा भड़काना) और धारा 420 (धोखाधड़ी) के तहत लगाए गए आरोप शामिल थे. इसके अलावा हलफनामे में यह भी बताया गया है कि कभी चाय बेचने वाले केशव और उनकी पत्नी करोड़ों के मालिक हैं. केशव दंपति पेट्रोल पंप, एग्रो ट्रेडिंग कंपनी, लॉजिस्टिक कंपनी आदि के मालिक हैं. साथ ही वे इलाहाबाद के जीवन ज्योति अस्पताल में पार्टनर भी हैं.

सामाजिक कार्यकर्ता डॉक्टर प्रदीप सिंह कहते हैं, ‘उत्तर प्रदेश जातीय राजनीति की प्रयोगशाला है. यहां सपा ने पिछड़ों के सहारे जातीय समीकरण साधकर इस बार सत्ता का सफर तय किया है तो इससे पहले बसपा ने ब्राह्मण और दलितों को एकजुट कर सत्ता हासिल की थी. कुछ ऐसा ही भाजपा केशव प्रसाद मौर्य को अध्यक्ष बनाकर करना चाह रही है. दरअसल उत्तर प्रदेश में भाजपा 2003 से सत्ता से बाहर है. इसके बाद से हर विधानसभा चुनाव में भाजपा की सीटों में तेजी से गिरावट आई है. 2002 के विधानसभा चुनाव में जहां भाजपा ने 88 सीटों पर जीत दर्ज की थी वहीं 2007 में यह संख्या 51 रही तो 2012 में यह घटकर 47 हो गई. ऐसे में 12 सालों बाद प्रदेश में किसी पिछड़े की ताजपोशी कर भाजपा सत्ता हथियाना चाहती है. केशव को अध्यक्ष बनाए जाने का यह सबसे प्रबल कारण रहा.’

सियासी मुलाकात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह समेत पार्टी के दूसरे वरिष्ठ नेताओं के साथ केशव प्रसाद मौर्य
सियासी मुलाकात : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह समेत पार्टी के दूसरे वरिष्ठ नेताओं के साथ केशव प्रसाद मौर्य

हालांकि उत्तर प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी इस बात से इत्तफाक नहीं रखते हैं. वे कहते हैं, ‘केशव प्रसाद मौर्या का चुनाव किसी जाति विशेष से आने के कारण नहीं हुआ है. उनके चुनाव का कारण सिर्फ उनका हिंदू होना है. वे एक कुशल राजनेता हैं.’

कुछ ऐसी ही राय वहीं कौशांबी के सरसवां ब्लॉक के पूर्व प्रमुख और भाजपा नेता लाल बहादुर भी रखते हैं. वे कहते हैं, ‘केशव प्रसाद का चुनाव जाति के आधार पर नहीं हुआ है. उनकी ताकत संगठन को मजबूत करने और सबको साथ लेकर चलने की क्षमता है. संघ और विहिप में रहने के दौरान ही केशव प्रसाद ने अपनी इस प्रतिभा को दिखा दिया था. संघ का विश्वास उनके ऊपर है. वे अपने काम को लेकर जुनूनी हैं. उनमें बहुत उत्साह है. जिस दौर में इलाहाबाद में भाजपा से लोग दूर जा रहे थे उस दौर में कार्यकर्ताओं को एकजुट करने का काम उन्होंने किया था. इसी के बलबूते वे ऐसी जगहों पर जीतने में भी सफल रहे जहां भाजपा ने कभी जीत हासिल नहीं की थी. सिराथू विधानसभा सीट और फूलपुर लोकसभा सीट दोनों पर पहली बार भाजपा ने उन्हें ही प्रत्याशी बनाकर जीत हासिल की. पार्टी में उनकी स्वीकार्यता खूब है. वे किसी गुट विशेष से जुड़े हुए नहीं माने जाते हैं. अध्यक्ष बनने के बाद वे जहां भी गए उनका जोरदार स्वागत किया गया है. लखनऊ में कार्यकर्ताओं ने नारा लगाया- केशव मौर्या संत है, सपा-बसपा का अंत है.’

लेकिन वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक अभय कुमार दुबे कहते हैं, ‘उत्तर प्रदेश में भाजपा हमेशा यह कोशिश करती है कि अगड़ी और यादव के अलावा बाकी पिछड़ी जातियों का गठजोड़ बनाया जाए. यह दीनदयाल उपाध्याय के जमाने से भाजपा की सामाजिक रणनीति रही है. जब भाजपा इसमें कामयाब हो जाती है मतलब जब उसे अगड़ी जातियों के साथ लोधी, कोइरी, कुर्मी, पटेल आदि गैर-यादव पिछड़ी जातियों का वोट मिल जाता है तो उसकी सीटों में भारी इजाफा हो जाता है. इसी को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने अब अध्यक्ष ऐसे व्यक्ति को बनाया है जो कोइरी जाति का है. अब वहां कुर्मी और कोइरी को जोड़कर लव-कुश कंबिनेशन बनाया जा रहा है. अपना दल वगैरह के साथ गठबंधन करके भाजपा पहले से ही कुर्मियों को अपने साथ करने में सफल रही है. ऐसे में भाजपा यह दांव खेलकर कितनी कामयाब होगी यह कहना जल्दबाजी होगा क्योंकि सिर्फ अध्यक्ष बदलने से आप विधानसभा चुनाव जीत नहीं सकते हैं. इसके लिए आपको टिकट वितरण को ध्यान में रखना होगा. इसके अलावा विपक्षी पार्टियां अपनी रणनीति कैसी बनाती हैं यह भी देखना होगा.’

वहीं वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान कहते हैं, ‘उत्तर प्रदेश के भाजपा अध्यक्ष के रूप में केशव प्रसाद मौर्य का चुनाव नहीं किया गया है. दरअसल इस पद पर उनकी नियुक्ति अमित शाह द्वारा की गई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विकास की कितनी भी बात करें लेकिन जब-जब अमित शाह को निर्णय लेने का मौका मिलता है तो वह सिर्फ राम मंदिर और हिंदुत्व का ही मुद्दा चलाने की कोशिश करते हैं. हालांकि वह इसमें फेल भी होते हैं, लेकिन अभी इस मुद्दे से उनका मोह गया नहीं है. अब इस फैसले में भी यह साफ नजर आता है. केशव का इतिहास देखें तो हिंदुत्व और अशोक सिंहल के करीबी होने के अलावा उन्होंने कुछ खास नहीं किया है. उन्होंने गोहत्या पर रोक लगाने के लिए एक संगठन बनाया लेकिन कौशांबी के रहने वाले लोगों का कहना है कि वह गोहत्या करने वाले लोगों को बचाने में भी खूब लगे रहे.’ 

हालांकि ऐसा नहीं रहा कि केशव प्रसाद मौर्य का विरोध नहीं हुआ. इलाहाबाद में ही भाजपा नेत्री राजेश्वरी पटेल ने उन्हें अध्यक्ष बनाए जाने के विरोध में पार्टी से इस्तीफा दे दिया. लेकिन ज्यादातर भाजपा नेताओं ने इस घटना को ज्यादा तवज्जो नहीं दी और इस इस्तीफे को निजी रंजिश का परिणाम बताया. हालांकि इलाके में यह उनकी इकलौती रंजिश नहीं है. इसकी फेहरिस्त काफी लंबी है. जिले में जैसे-जैसे उनका कद और पद बढ़ा, उन पर मुकदमे भी बढ़ते गए. इनमें साजिश, लूट, दंगा भड़काने, धार्मिक स्थल तोड़ने, धोखाधड़ी समेत तमाम संगीन धाराओं में उन पर मुकदमे दर्ज हैं. इनमें सबसे अधिक मुकदमे दंगा भड़काने के हैं. उनके खिलाफ इलाहाबाद और कौशांबी के विभिन्न थानों में कुल दस एफआईआर दर्ज हैं.