सितारा देवी: ओझल सितारा…

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सितारा देवी (8 नवंबर, 1920 - 24 नवंबर, 2014)
सितारा देवी (8 नवंबर, 1920 – 24 नवंबर, 2014)

94 की उम्र में अपने निधन से पहले वह लंबे समय से बीमारियों से जूझ रही थीं. सितारा देवी ने हिंदी सिने जगत में कथक का न केवल प्रवेश कराया बल्कि उसे एक अलग पहचान भी दिलाई. उनको याद करने के कई बहाने हैं. दिलों पर राज करना एक ऐसा मुहावरा है जो शायद सितारा देवी के लिए ही बना होगा. यही वजह है कि न्यूयॉर्क शहर से लेकर नौगांव जैसी छोटी जगह तक उनके अनगिनत चाहने वाले हैं. इसका श्रेय उनकी वाक् कला को जाता है जिसकी मदद से वह कहीं भी दर्शकों से तत्काल रिश्ता कायम कर लेती थीं. शायद यह काबिलियत उनमें बचे बनारसीपन से आई होगी. वह बनारस के एक ऐसे परिवार से ताल्लुक रखती थीं जिसका काम ही किस्सागोई करना था.

यही वजह है कि सितारा देवी की पूरी शख्सियत में यह गुण शामिल था. कभी वह अपने नृत्य में किस्सागोई करतीं तो कभी दूसरों के अफसानों में उनके किस्से होते. उर्दू अदब की जानी पहचानी शख्सियत सआदत हसन मंटो कहते थे कि सितारा के नाच में लखनवी नजाकत नदारद है. मंटो कहते, ‘वह औरत नहीं, एक तूफान है, एक ऐसा तूफान जो सिर्फ एक मर्तबा आके नहीं टलता, बार-बार आता है.’ मंटो सच ही तो कहते थे. कोलकाता के आयोजन में सितारा देवी बिना रुके लगातार 12 घंटे तक नाचती रहीं. इतना ही नहीं मुंबई में भी वह कई बार लगातार 8-9 घंटे तक नृत्य करती रहीं. यकीनन वह ऊर्जा की खान थीं.

उनके पिता सुखदेव महाराज ने जब सितारा देवी को कथक सिखाना शुरू किया तो उनके पड़ोसियों ने सख्त आपत्ति दर्ज कराई. उनको अपने पड़ोस के घर से आ रही घुंघरुओं की खन-खन कतई नामंजूर थी. लेकिन सुखदेव महाराज नहीं माने. उनको ब्राह्मण बिरादरी से बाहर कर देने तक की बातें हुईं लेकिन वह अड़े रहे. सुखदेव महाराज खुद नेपाल के राजपरिवार में बतौर शाही नर्तक काम करते थे. अगर वह उस समय लोगों के विरोध और उनकी जिद के आगे झुक गए होते तो शायद हमें कथक में तांडव और लास्य का वह मेल देखने को न मिलता जो सितारा देवी ने खुद से ईजाद किया था.

लोगों की जिद के आगे न झुकने और उनकी परवाह न करने को सितारा ने अपने जीवन का मूल मंत्र बना लिया था. उनके लिए जीवन का एक ही सत्य था और वह था कथक नृत्य. कथक को लेकर उनका लगाव और उस नृत्य पर उनकी पकड़ ऐसी थी कि गुरु रवींद्रनाथ टैगोर ने उनको नृत्य सम्राज्ञिनी की उपाधि दी थी.

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