स्वार्थ का संगम!

इस तरह देखें तो इस महाविलयवाली पार्टी में मिलन-विलयन के बाद नए सिरे से अतिपिछड़ों और महादलितों में आधार वोट तलाशने और उसे फिर से खड़ा करने की चुनौती बड़ी होगी. और यही समूह होगा जो आगे बिहार में चुनावी राजनीति की दिशा और दशा तय करेगा. महाविलयवाली पार्टी के पास यह चुनौती इसलिए भी बड़ी होगी, क्योंकि जीतन राम मांझी तो लगातार दलितों के बीच अभियान चला ही रहे हैं, वे भाजपा के साथ जाने के लिए बेताब से भी दिख रहे हैं. दूसरी ओर पहले से ही बिहार के एक बड़े दलित नेता रामविलास पासवान भाजपा के साथ हैं. भाजपा के एक बड़े नेता बताते हैं कि हमारी पार्टी की रणनीति साफ है कि हम अतिपिछड़ों और दलितों को सबसे ज्यादा तवज्जो देंगे. उन्हें प्रखंड कमिटी का अध्यक्ष बनाएंगे, बूथ कमिटी उनके हवाले करेंगे और आखिरी में वोट के वक्त यही कमिटियां सबसे कारगर होती हैं.

महाविलय का पहला परीक्षण बिहार विधानसभा चुनाव में होगा. यह सफल रहा तो इसका असर 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के साथ ही 2019 के लोकसभा चुनावों पर भी पड़ेगा

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इन्हें भी बढ़ें

रिपोर्ट: उत्तर के पैंतरे में दक्षिण का टोका

विचार: सांप्रदायिकता के विरोध और धर्मनिरपेक्षता की मजबूती का छद्मराग

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विचार: महाविलय में छुपे हैं महाबिखराव के सूत्र

1 COMMENT

  1. यह लोग रबड़ की गेंद जैसे है थोडी!pushमिलि और गये किस दीशा में गये छुछ पता नही

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