‘किसी महिला के लिए अपने मन की बात रखना आसान नहीं होता’ | Tehelka Hindi

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‘किसी महिला के लिए अपने मन की बात रखना आसान नहीं होता’

सनी लियोन चर्चाओं में बनी रहती हैं. भले ही ये उनके पिछले करिअर की वजह से हो या फिर हाल में दिए गए टीवी इंटरव्यू के चलते. उनके पॉर्न स्टार होने के चलते उनकी छवि पर उठते सवाल कभी कम नहीं होते, न ही लोगों का उनके प्रति नजरिया बदलता है. अपनी हालिया रिलीज ‘मस्तीजादे’ के प्रमोशन के लिए दिल्ली आईं सनी ने अर्चना मिश्रा से बेबाक बातचीत की

2016-02-15 , Issue 3 Volume 8
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‘खूबसूरती आपके मन में होती है, फिर इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि आपके बाल सुंदर हैं या कपड़े-जूते या मेकअप परफेक्ट है.’

महिला हों या पुरुष, आपके बारे में सब यह बात जरूर मानते हैं कि आप बेहद खूबसूरत हैं. क्या आपको लगता है कि खूबसूरती ही आपकी सबसे बड़ी खूबी है?

खूबसूरती आपके आत्मविश्वास में होती है या कह सकते हैं आप जैसे बात करते हैं, उठते बैठते हैं, वह खूबसूरती को परिभाषित करता है. कई बार ऐसा होता है कि आप किसी खूबसूरत चेहरे वाली महिला या पुरुष से मिलते हैं, लेकिन उनका व्यक्तित्व या बात करने का ढंग खूबसूरत नहीं होता. बातचीत से आपके व्यक्तित्व के बारे में खुद पता चलता है. मेरे लिए ये बातें बहुत ही अहम हैं. आत्मविश्वासी होना और अच्छा दिखना मेरे लिए अहम है.

 क्या निजी तौर पर खूबसूरती की इसी परिभाषा के अनुसार जीती हैं?

(हंसते हुए) अरे! मैं इस तरह कभी नहीं सोचती! मुझे नहीं पता दूसरे लोग या महिलाएं इस सवाल का जवाब कैसे देते हैं. शायद मेरे पति इस सवाल का जवाब बेहतर तरीके से दे सकें. मेरे ख्याल से, ये आपके आत्मविश्वास में झलकता है, आप खुद के बारे में क्या महसूस करते हैं, उसमें दिखता है. खूबसूरती आपके मन में होती है. फिर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपके बाल सुंदर हैं, कपड़े-जूते या मेकअप परफेक्ट है! खूबसूरती का अर्थ आत्मविश्वास से है, आप स्वयं को कितनी गंभीरता से लेते हैं, ये भी आपकी सुंदरता को दिखाता है.

 आपके ढेरों प्रशंसक हैं, बावजूद इसके लोग आपको एक पोर्न स्टार के रूप में ही देखते हैं. लोगों के इस संकीर्ण नजरिये और लगातार होती टिप्पणियों से आप खुद को  कैसे अप्रभावित रख पाती हैं?

मैं खुद को ऐसे व्यक्ति के रूप में देखती हूं, जिसे नीचा नहीं दिखाया जा सकता, मजबूत होना ही उसकी जरूरत है. मैं जानती हूं करिअर के रूप में मैंने क्या विकल्प चुने थे. जो मैंने चुना, वो दूसरे लोग नहीं चुन सकते. मैं यह अच्छी तरह समझती हूं कि मेरा वह चुनाव किसी भी तरह से साधारण नहीं था. लेकिन मैं यह भी समझती हूं कि मैंने जो फैसला लिया है, मुझे उसी के अनुसार चलना चाहिए. साथ ही, कभी खुद को यह महसूस नहीं होने देना चाहिए कि मैंने कुछ गलत किया है.

‘कुछ लोगों के लिए हो सकता है कि ‘मस्तीजादे’ उनकी लिस्ट में सबसे ऊपर न हो लेकिन मेरे लिए है. यह एक फन मूवी है. वयस्क लोग मस्ती भरा वक्त बिता सकते हैं तो एडल्ट कॉमेडी क्यों नहीं हो सकती! सब कुछ इतना गंभीर क्यों होना चाहिए! चीजें गंभीर न हों इसीलिए तो कॉमेडी है’

क्या आप अपनी नारी शक्ति में विश्वास रखती हैं?

अगर इसका मतलब नारी शक्ति से है तो बता दूं कि मैंने अपने लिए यह शब्द पहले कभी भी इस्तेमाल नहीं किया है. मैं खुद को नारीवाद के उस क्षेत्र में कभी नहीं देखती. मैं जानती हूं एक महिला के लिए, विशेषकर मनोरंजन जगत या सत्ता के क्षेत्र में सक्रिय महिला के लिए अपने मन की बात रखना कभी आसान नहीं होता.

 तो खुद को दूसरों से अलग होने की आजादी कैसे दे पाती हैं?

मैं सचमुच इस बारे में ज्यादा नहीं सोचती कि मैं क्या करती हूं. बहुत से ऐसे लोग हैं जो यह सोचते हैं कि लोग क्या सोचेंगे या उन्हें कैसे देखा जाएगा, लोग उन्हें कैसे लेंगे. ऐसा होना भी सही है. यह कोई बुरी बात नहीं है. आपको यह समझना होगा कि मैं एक बिल्कुल अलग दुनिया से आई हूं, जहां मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में आऊंगी. मैं इसके आसपास भी नहीं थी. मैंने तो सोचा था कि लॉस एंजिल्स में कोई बिजनेस शुरू करूंगी और बहुत सी अलग चीजें करूंगी.

बिग बॉस ने निश्चय ही आपकी किस्मत बदल दी लेकिन बॉलीवुड को क्यों चुना,  जबकि पिछले करिअर चुनाव के साथ आप काफी सहज रही हैं?

बिग बॉस के बाद पीछे मुड़ना मुमकिन नहीं था. मुझे आगे बढ़ना ही था. मुझे यहां अपने सपने पूरे करने का मौका मिल रहा था, फिल्म इंडस्ट्री में आने का, फिल्में करने का और वो सब कुछ करने का मौका मिल रहा था, जो हमेशा से करना चाहती थी. बिग बॉस में आने के पहले ही मैंने उस इंडस्ट्री (पॉर्न) को अलविदा कह दिया था. बिग बॉस में आने के बाद जो कुछ भी हुआ वह सपने के सच होने जैसा ही था. ऐसा सिर्फ सपनों में ही होता है. जिंदगी में ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलता. जिस इंडस्ट्री से मैं आई हूं, वहां से आने वाली लड़कियों को ऐसा मौका नहीं मिलता है. जब तक हो सकेगा, मैं इस मौके को संभाले रखूंगी.

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सामाजिक मानदंडों में कैद रहने की बजाय आप स्वतंत्र निर्णय लेने में विश्वास रखती हैं. क्या लगता है कि आपका यह दृष्टिकोण आपके बॉलीवुड फिल्मों के चयन में भी दिखेगा?

मैं जो फिल्म करना चाहती हूं, मुझे उसे चुनने की आजादी मिलनी ही चाहिए. लोगों को मुझे किसी खांचे में बांधकर नहीं देखना चाहिए. लोग मेरे बारे में क्या कहते हैं, इससे मुझे जरा भी फर्क नहीं पड़ता क्योंकि ये मेरी जिंदगी है और मैं इसे वैसे ही जिऊंगी, जैसा मैं चाहती हूं. जैसा कि ज्यादातर लोग मेरे बारे में जानते हैं कि मैं किसी एक ढर्रे पर नहीं जीती, लेकिन हमेशा वो करती हूं,  जो मैं चाहती हूं. मुझे लगता है छिप-छिपाकर या हिचक के साथ ही सही पर हम वो सब करते हैं, जिसके बारे में लोग सोचते हैं कि यह नहीं करना चाहिए.

बॉलीवुड में आने के इतने समय बाद एडल्ट कॉमेडी करना क्या एक योजनाबद्ध कदम है?

पहली एडल्ट कॉमेडी का प्रस्ताव मुझे ‘मस्तीजादे’ के रूप में ही मिला था और मैंने इसे हां कह दिया. इस बारे में कोई योजना नहीं थी. जब मैंने स्क्रिप्ट सुनी तो मुझे नहीं लगा कि ओह! यह मेरे लिए कुछ ज्यादा ही है. फिल्म में वह सब है, जो बड़े होने के दौरान मैंने टीवी या फिल्मों में देखा है. कुछ लोगों के लिए हो सकता है कि ‘मस्तीजादे’ उनकी लिस्ट में सबसे ऊपर न हो लेकिन मेरे लिए है और इसकी वजह यही है कि यह एक फन मूवी है. वयस्क लोग मस्ती भरा वक्त बिता सकते हैं तो एडल्ट कॉमेडी क्यों नहीं हो सकती! सब कुछ इतना गंभीर क्यों होना चाहिए! चीजें गंभीर न हों इसीलिए तो कॉमेडी है.

जब मैं जेनिफर एनिस्टन की फिल्म ‘वी आर द मिलर्स’ के बारे में सोचती हूं तो मैं ये नहीं सोचती कि ओह! जेनिफर ने यह फिल्म की! या कि वह फिल्म में कितनी आकर्षक डांसर की तरह उभरी है या फिल्म में उन्होंने कितना पागलपन किया! मैं इस सबके बारे उतना नहीं सोचती, केवल फिल्म के बारे में सोचती हूं. मैं जेनिफर को केवल फिल्म के संदर्भ या उस पात्र विशेष के बतौर नहीं देखती. मेरे लिए ‘मस्तीजादे’ भी ऐसी ही फिल्म है.

तो क्या आपको लगता है कि वयस्क श्रेणी की फिल्में बदलाव ला सकती हैं?

आंकड़ों के आधार पर बात की जाए तो ‘ग्रैंड मस्ती’ इस बात का उदाहरण है कि एडल्ट फिल्म किस तरह अच्छी चल सकती हैं और लोग उसका मजा ले सकते हैं. अगर लोगों ने फिल्म को पसंद न किया होता तो आंकड़े इस तरह के नहीं होते. फिल्म देखकर लोग भौंचक रह गए हों या फिर वे यह कहते हुए सिनेमा हॉल से बाहर निकले हों कि कुछ हद तक फिल्म उन्हें पसंद आई, मुझे लगता है अगर इस शैली की फिल्में बनती रहीं तो धीरे-धीरे लोग सहज हो जाएंगे.

 क्या बॉलीवुड में खुद को एक  ‘चेंजमेकर’  के रूप में देखती हैं?

मैं बॉलीवुड को बदलने वाली कौन होती हूं! मैं बस वो करती हूं, जो मुझे अच्छा लगता है.

(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 8 Issue 3, Dated 15 February 2016)

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