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अगर मैं दुष्यंत कुमार की गजलों को कंपोज करना चाहूं तो शायद ही कोई प्रोड्यूसर तैयार होगा : वरुण ग्राेवर

अगर फूट के न निकले, बिना किसी वजह के, मत लिखो. अगर बिना पूछे-बताए न बरस पड़े, तुम्हारे दिल और दिमाग और जुबां और पेट से, मत लिखो… क्योंकि जब वक्त आएगा, और तुम्हें मिला होगा वो वरदान, तुम लिखोगे और लिखते रहोगे, जब तक भस्म नहीं हो जाते… ये  

‘अगर दिल्ली में यमुना को खत्म कर देंगे तो  इस शहर को नौवीं बार बसाना पड़ेगा’

पर्यावरणविद नदी के क्षेत्र में कोई भी निर्माण कार्य नहीं करने की बात करते हैं. इसके दो-तीन कारण हैं. नदी का क्षेत्र, जिसे खादर (फ्लड लेन) कहते हैं, नदी का एक अभिन्न हिस्सा होता है. दरअसल, नदी अपने आप में एक तंत्र है. नदी सिर्फ बहता पानी नहीं है. अगर  

एक था चंदू

दुनिया में वामपंथ का सबसे मजबूत किला ढह चुका था. दुनिया तेजी से पूंजीवाद की ओर बढ़ रही थी. उदारीकरण भारत की दहलीज लांघकर अपने को स्थापित कर चुका था. तमाम धुर वामपंथी आवाजें मार्क्सवाद के खात्मे की बात कह रही थीं. उसी दौर की बात है, जब जेएनयू कैंपस  

एक और ‘नायर साहब’ की जरूरत

इस देश में सिनेमा का जादू ऐसा है कि कोई भी इससे बच नहीं सकता. फिल्में किसी को कम किसी को ज्यादा लेकिन प्रभावित जरूर करती हैं. सिनेमा का प्रभाव इतना भव्य है कि हर तरह के दर्शक के लिए यहां कुछ न कुछ मिल ही जाता है. दर्शकों पर  

‘राम आडवाणी का जाना लखनऊ देखने के आईने का बिखरना है’

चार साल पहले की बात है. लखनऊ का दिल कहे जाने वाले हजरतगंज में किताबों की एक दुकान पर एक शोधार्थी पहुंचा. उसने चार हजार रुपये से अधिक की किताबें निकालीं पर जब पैसे देने की बारी आई तो उसकी जेब से मुश्किल से दो हजार रुपये ही निकले. उसने