तथ्यों पर भारी तेजी | Tehelka Hindi

पत्रकारिता विशेषांक A- A+

तथ्यों पर भारी तेजी

मीडिया कुछ खबरों को इतनी आक्रामकता के साथ पेश करता है कि नैतिकता की सीमाएं पार हो जाती हैं. इसके चलते कई बार बेगुनाहों को दोषी बता दिया जाता है तो कई दफा किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा और कभी-कभी राष्ट्रीय सुरक्षा तक दांव पर लग जाती है

बहुत से लोगों को ये पता भी नहीं होगा कि प्रसारण पत्रकारिता के इतिहास के सबसे बड़े क्षण ने एक बड़े विवाद को जन्म दिया था. 1967 में डेविड फ्रॉस्ट अपने शो ‘फ्रॉस्ट प्रोग्राम’ में एमिल सवुंद्रा से सवाल-जवाब कर रहे थे. सवुंद्रा श्रीलंकाई काले बाजार के एक व्यापारी थे जिन पर उस वक्त एक बड़े मोटर इंश्योरेंस घोटाले का आरोप था. सवुंद्रा इस घोटाले को लेकर खबरों में थे और इस प्रोग्राम में ये सोचकर आए थे कि उन्हें अपने ऊपर लगे आरोपों के खिलाफ अपना पक्ष जनता के सामने रखने का मौका मिलेगा. पर हुआ इसके उलट. फ्रॉस्ट के आक्रामक सवालों के सामने सवुंद्रा टिक नहीं पाए. इंटरव्यू शुरू हुए दस ही मिनट हुए थे कि फ्रॉस्ट के सवालों में उलझे सवुंद्रा ये कह गए कि उनकी किसी के भी प्रति कोई कानूनी या नैतिक जिम्मेदारी नहीं है. जहां सवुंद्रा को इस बात के लिए दर्शकों का गुस्सा झेलना पड़ा वहीं फ्रॉस्ट की इस पर की गई गुस्से भरी प्रतिक्रियाओं को दर्शकों की तालियां मिलीं. जनता को न केवल ये लगा कि फ्रॉस्ट इस मामले के पारखी हैं बल्कि सवुंद्रा के जवाबों पर फ्रॉस्ट की गुस्से भरी प्रतिक्रियाओं से उन्हें लगा कि फ्रॉस्ट उनमें से ही एक हैं. इस कार्यक्रम के कुछ महीनों बाद सवुंद्रा को अपराधी घोषित कर जेल भेज दिया गया और फ्रॉस्ट अपने टीवी पत्रकारिता के कॅरिअर में सफलता की ऊंचाइयों की ओर बढ़ने लगे.

जब टीवी पत्रकारिता में हुई इस ऐतिहासिक घटना ने लोगों को प्रभावित किया, तब मीडिया और बाहरी दुनिया में टेलीविजन पर होने वाले बर्ताव और अदालती मुकदमे जैसी पूछताछ से उपजी गलतफहमियों से शो के निर्माताओं ने शो के प्रति अतिरिक्त सावधानी बरतनी शुरू कर दी. और इसी तरह पहली बार ‘ट्रायल बाय टेलीविजन’ शब्द चलन में आया.

उस समय फ्रॉस्ट को निजी सवाल पूछने के कारण, एक कठिन साक्षात्कारकर्ता का जो तमगा मिला था, आज दशकों बाद टीवी पर रोज होने वाली बहसों को देखते हुए हम उसकी जटिलताएं समझ सकते हैं. मीडिया के ऐसे व्यवहार पर चर्चा एक बार फिर शुरू हो गई है जब हाल ही में पत्रकार अविरूक सेन की किताब ‘आरुषि’ सामने आई. ये किताब देश की सबसे बड़ी ‘मर्डर मिस्ट्री’ कहे गए आरुषि तलवार हत्याकांड पर बात करती है.

2008 में 14 साल की आरुषि की संदिग्ध मौत ने देशभर का ध्यान अपनी तरफ खींचा था. इसके पीछे कौन था, ये आज तक एक पहेली बना हुआ है. बहुत-सी बातें किसी जासूसी उपन्यास के रहस्य की तरह आज भी अबूझ हैं, जैसे कि क्यों बस एक दीवार के फासले पर सोए आरुषि के माता-पिता को उसकी हत्या का पता नहीं चला, घर के नौकर हेमराज की हत्या कैसे और किसने की और कैसे उसकी लाश छत पर पहुंच गई?

ये हत्याकांड सुर्खियों में ही था जब तलवार दंपति पर ही उंगलियां उठने लगीं. फिर जल्द ही नई बहसों का जन्म हुआ और विशेषज्ञों, जिनमें नामी लेखिका शोभा डे भी शामिल थीं, ने तलवार दंपति के खिलाफ स्पष्ट निर्णय दे दिया. कुछ ने आरुषि को उच्छृंखल कहा तो कुछ का ये भी कहना था कि ये ‘ऑनर किलिंग’ का मामला है. ये भी कहा गया कि तलवार दंपति दिल्ली के एक विशिष्ट ‘वाइफ स्वैपिंग क्लब’ के सदस्य थे. एक चैनल ने तो सभी हदें पार कर दीं, बाल अधिकारों का उल्लंघन करते हुए उन्होंने एक एमएमएस क्लिपिंग दिखाई जिसमें एक किशोर लड़की कैमरे के सामने अपने कपड़े उतार रही थी. चैनल का दावा था कि ये बच्ची आरुषि है.

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जहां एक तरफ ये ‘कामुक सुर्खियां’ खबर बना रही थीं, जांच एजेंसियों की बताई कहानियां भी कुछ ऐसी ही थीं. ऐसा लग रहा था कि अपने ‘अनाम सूत्रों’ से प्राप्त ‘एक्सक्लूसिव’ खबरों  को चलाने वाले चैनल इन जांच एजेंसियों के प्रवक्ता के रूप में ही ये बात कह रहे थे. इस तरह मीडिया ने घोषित किया कि आरुषि के माता-पिता ‘दोषी’ हैं और नवंबर 2013 में अदालत ने भी उन्हें दोषी करार दिया.

हालांकि तलवार दंपत्ति के दोषी या निर्दोष होने पर कोई टिप्पणी करना अनजाने में ही पूर्वाग्रहों के हिसाब से चलना होगा, पर मीडिया द्वारा जनता में फैलाई गई राय से प्रभावित होकर अदालत के फैसला सुनाने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता. पत्रकार और ‘आरुषि’ किताब के लेखक अविरूक सेन ‘तहलका’ को बताते हैं, ‘जब तक ‘मुंबई मिरर’ ने 2012 में मुझे इस केस के ट्रायल के बारे में लिखने की जिम्मेदारी नहीं दी थी, मेरी इस मामले के बारे में कोई राय नहीं थी, सिवाय इसके कि उसके माता-पिता ने ही ये अपराध किया होगा क्योंकि पूरा मीडिया यही कह रहा था. इस बात ने जनता और मामले के प्रमुख लोगों को भी प्रभावित किया ही होगा और चाहें ये जांच एजेंसियां हों या अदालत, वे भी तो इसी जनता में ही आते हैं. ऐसे में हम इस केस में मीडिया के प्रभाव को नजरअंदाज कर ही नहीं सकते.’

मार्च 2015 में, दिसंबर 2012 में हुए निर्भया कांड पर आधारित लेस्ली उडविन की डॉक्यूमेंट्री ‘इंडिया’ज डॉटर’ ने देशभर में एक बड़ी बहस को जन्म दे दिया. इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने डॉक्यूमेंट्री के प्रसारण पर बैन लगाने को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का हनन कहने वाली एक याचिका की सुनवाई में कहा था, ‘मीडिया ट्रायल जजों को प्रभावित करने का माद्दा रखते हैं. इससे अप्रत्यक्ष रूप से एक दबाव बनता है जिससे आरोपी/अपराधी की सजा का निर्णय प्रभावित होता है.’

याचिकाकर्ता ने ये भी कहा कि किसी डॉक्यूमेंट्री पर बैन लगाने से मीडिया द्वारा विचाराधीन मामलों में झूठी रिपोर्ट आने की संभावना बढ़ जाएगी और कोर्ट ने ये माना भी कि कैसे पहले ये अलिखित कोड था कि विचाराधीन मामलों के बारे में रिपोर्ट नहीं की जाएगी, मगर अब ऐसा कुछ नहीं माना जाता.

इसी तरह 17वें विधि आयोग में अपनी 200वीं रिपोर्ट में मीडिया ट्रायल और खबरों की अधिकता के भविष्य को देखते हुए केंद्र से ये सिफारिश की थी कि किसी भी आपराधिक मामले में आरोपी के गिरफ्तार होने से लेकर फैसला आ जाने तक किसी भी तरह की रिपोर्टिंग करने से मीडिया पर रोक होनी चाहिए, ताकि आरोपी के अधिकारों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े. रिपोर्ट में इस बात पर भी जोर दिया गया कि किसी भी मीडिया माध्यम को किसी आपराधिक मामले के बारे में कोई भी प्रकाशन या प्रसारण को निर्देशित करने का अधिकार हाईकोर्ट को होना चाहिए. साथ ही मीडिया द्वारा ऐसे किसी मामले के प्रयोग को नियंत्रित करने का अधिकार भी हाईकोर्ट को होना चाहिए. आयोग ने कहा, ‘आजकल टेलीविजन और केबल के बढ़ते व्यापक प्रसार में समाचार प्रकाशन का स्वरूप बदल गया है और ऐसे कई प्रकाशन संदिग्धों, आरोपियों, गवाहों यहां तक कि जजों यानी पूरे न्याय तंत्र को भी प्रतिकूल तरीके से प्रभावित कर सकते हैं.’

जहां एक ओर तलवार दंपति के मामले को भारतीय प्रेस काउंसिल ने मीडिया द्वारा लोगों पर नकारात्मक प्रभाव बनाने के रूप में देखा, वहीं एसएआर गिलानी के विवादित राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामले और खुर्शीद अनवर पर यौन उत्पीड़न के आरोप, दो ऐसी ‘ब्रेकिंग न्यूज’ रहे जिन्होंने मीडिया के प्रति विश्वास को ‘ब्रेक’ यानी तोड़कर रख दिया. 13 दिसंबर 2001 को देश की संसद पर पांच आतंकियों द्वारा किए गए हमले के दूसरे ही दिन दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने दावा किया कि उन्होंने इस हमले में शामिल कई संदिग्धों को ढूंढ लिया है. इस मामले में उन्होंने 12 लोगों को गिरफ्तार किया, जिनमें चार कश्मीरी शामिल थे- दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एसएआर गिलानी, शौकत हुसैन गुरु और मोहम्मद अफजल गुरु व अफज़ल की पत्नी अफ्जान.

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