क्यों छोड़े कोई आतंकवाद?

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पाकिस्तान से वापस अपने घर का सफर इन लोगों के लिए बेहद डरावना, खर्चीला और परेशान करने वाला रहा. जम्मू-कश्मीर की उमर अब्दुल्ला सरकार ने केंद्र सरकार के साथ मिलकर इनकी वापसी के लिए 2010 में जो नीति बनाई उसके तहत पूर्व आतंकवादियों के भारत में वापस आने के लिए चार रास्ते चिह्नित किए गए. ये थे- वाघा बॉर्डर, इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (नई दिल्ली), उरी-मुजफ्फराबाद और पूंछ-रावलकोट. लेकिन सरकारी नीति की यह शर्त शुरुआत में ही पुनर्वास के इरादों पर बड़े सवाल खड़ा कर देती है. इससे जुड़ी सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जितने पूर्व आतंकी पाकिस्तान से वापस जम्मू कश्मीर आए हैं उनमें से मुश्किल से कोई ही इन रास्तों से वापस आया हो. वजह यह कि पाकिस्तान इन रास्तों के जरिए इन लोगों को सीमापार नहीं करने देता. यदि ये किसी तरह छुपते-छुपाते भारतीय सीमा में दाखिल हो भी जाते हैं तो भारतीय सेना इन्हें अंदर नहीं आने देती.

फारुख अहमद शाह कहते हैं कि लोग उन्हें पूर्व आतंकवादी होने की वजह से कोई काम नहीं देते.
फारुख अहमद शाह कहते हैं कि लोग उन्हें पूर्व आतंकवादी होने की वजह से कोई काम नहीं देते. फोटोः बृजेश सिंह

पूर्व आतंकी असलम खान अपना ऐसा ही एक अनुभव साझा करते हैं, ‘मैं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रात के अंधेरे में छुपते-छुपाते भारतीय सीमा पर पहुंचा था. मैंने बीएसएफ के जवानों को  बताया कि मैं एक पूर्व आतंकवादी हूं और सरकारी नीति के तहत वापस आया हूं. लेकिन मेरी हालत उस समय खराब हो गई जब बीएसएफ के अधिकारी ने मुझे चुपचाप वापस पाकिस्तान चले जाने को कहा.’  असलम के मुताबिक जवानों ने उनसे कहा कि यदि वे वापस नहीं गए तो उन्हें वहीं गोली मार दी जाएगी. उन्हें अपने परिवार सहित वापस लौटना पड़ा. वे बाद में नेपाल के रास्ते (सरकारी नीति में यह रास्ता अवैध है) जम्मू कश्मीर वापस आ पाए.

हालांकि, इक्का-दुक्का लोग ऐसे भी हैं जो किसी तरह से बचते-बचाते हुए सीमा पार करके वापस आने में सफल रहे हैं. हालांकि उनके लिए यह यात्रा कदम-कदम पर जानलेवा जोखिम से भरी रही. इन्हीं रास्तों से वापस आए सरफराज बताते हैं, ‘ हमारे पास नेपाल बॉर्डर से आने के लिए पैसा नहीं था. इस रास्ते से पहुंचाने के लिए एजेंट हमसे पांच लाख रुपये मांग रहे थे लेकिन मेरे पास पांच हजार रुपये तक नहीं थे. बॉर्डर क्रॉस करने के अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं था. हम अपने घर आने के लिए मुजफ्फराबाद से रात में निकले. रात भर लगातार चलते रहे. उसी में बारिश हो गई और हम पूरी तरह से भीग गए थे. लेकिन हम रुके नहीं चलते रहे. रास्ते में हमें कहीं कोई पाकिस्तानी सैनिक नहीं मिला और हम पाकिस्तानी सीमा पार कर आए. जब तक हम भारतीय सीमा में दाखिल हुए तब तक उजाला हो चुका था. हालांकि कहीं कोई दिखाई नहीं दे रहा था. रात भर चल कर हम लोग थक चुके थे तो सामने एक खेत में लगी फसल की आड़ में बैठ गए. अभी वहां हमें बैठे कुछ मिनट ही हुए थे कि कहीं कोई हूटर बजा और देखते-देखते हमें भारतीय सैनिकों ने घेर लिया. हमसे उन्होंने अगले तीन घंटे तक पूछताछ की. उसके बाद हमें पुलिस को सौंप दिया गया.’ सरफराज की पत्नी जाहिदा 15 दिन के बाद जमानत पर रिहा हो गईं. लेकिन सरफराज पर पुलिस ने जनसुरक्षा अधिनियम (पीएसए) लगाया था.  वह छह महीने बाद जेल से बाहर आ पाए.

सरफराज की कहानी चंद अपवादों में से एक हैं. बाकी असलम जैसी कहानी लगभग हर उस व्यक्ति की है जिसने सरकार द्वारा तय किए गए या बॉर्डर के रास्तों से वापस आने की कोशिश की. जितने भी लोगों ने उन रास्तों से वापस आने की कोशिश की उन्हें वापस लौटा दिया गया. लेकिन ऐसा हुआ क्यों?

umarपूर्व आतंकी बशीर अहमद कहते हैं, ‘हमें भी नहीं पता. पाकिस्तान का तो समझ में आता है कि वह नहीं चाहेगा कि पूर्व आतंकवादी समर्पण करने के लिए भारत की सीमा में दाखिल हो क्योंकि इससे यह साबित हो जाएगा कि पाकिस्तान में आतंकवादी मौजूद है. उसने उन्हें पनाह दे रखी है. लेकिन भारत सरकार ने जब खुद ही हम लोगों की वापसी के लिए नीति बनाई है तो फिर वह क्यों चिह्नित रास्तों से हमें आने नहीं देती यह हमारी समझ के बाहर है.’

इस पूरे मामले में पाकिस्तान स्थित भारतीय उच्चायोग की भूमिका भी अजीबोगरीब है. जैसे ही लोगों को पता चला कि सरकार ने वापस जाने के लिए चार रास्ते चिह्नित किए हैं. इन लोगों ने पाकिस्तान स्थिति भारतीय उच्चायोग से संपर्क करना शुरू किया. इन्हें सूचना मिली थी कि वीजा, बाकी जरूरी दस्तावेज और भारत लौटने की अनुमति उन्हें वहीं से मिलेगी.

खैर, जहांगीर जैसे तमाम लोग उस समय हैरान रह गए जब इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग ने उनकी किसी तरह से मदद करने से इनकार कर दिया. पूर्व आतंकी एहसान कहते हैं, ‘उच्चायोग के अधिकारियों ने हमसे कहा कि हमें सरकार द्वारा चिह्नित चार रास्तों से घर जाने के बारे में सोचना छोड़ देना चाहिए. यह संभव नहीं है. उच्चायोग के लोगों ने वापस जाने का एक चौंकाने वाला तरीका बताया. उन्होंने कहा आप लोग ऐसा करो नेपाल के रास्ते चले जाओ. जब आप अपने घर पहुंच जाएंगे तो हम कागजी कार्रवाई वहीं पूरी करा लेंगे. आपके पुनर्वास का काम उसके बाद शुरू हो जाएगा.’

भारतीय उच्चायोग द्वारा मदद से इनकार करने और नेपाल के रास्ते भारत जाने की सलाह देने के बाद ये लोग इस बात पर विचार करने लगे कि आखिर कैसे नेपाल के रास्ते से भारत जा सकते हैं.

जहांगीर बताते हैं कि उनकी मुलाकात कुछ ऐसे लोगों से हुई जो उन्हें नेपाल के रास्ते भारत पहुंचाने के लिए तैयार हो गए. लेकिन इसके लिए घर के हर सदस्य के हिसाब से एक लाख रुपये का खर्च था. पांच लोगों के लिए उन्हें पांच लाख रुपये देने पड़े. नेपाल के रास्ते से अपने घर कश्मीर आए पूर्व आतंकी हमीद पठान बताते हैं, ‘ वहां एजेंट नेपाल जाने के लिए वीजा के लिए एप्लाई करवाते हैं. हमें यह कहना होता है कि हम अपने रिश्तेदार की शादी के लिए जा रहे हैं या इलाज कराने या घूमने. इसके बाद नेपाल जाने के टिकट के साथ ही वापस पाकिस्तान आने का भी टिकट कटाते हैं ताकि उन्हें लगे कि सामने वाला जा रहा है तो वापस भी आएगा. जहांगीर जानकारी देते हैं, ‘ ये सारे काम कराने वाले एजेंट कराची में हैं. कराची एयरपोर्ट पर छोड़ने के बाद वे नेपाल में अपने एजेंट का नंबर और संपर्क आदि दे देते हैं.’ काठमांडू पहुंचने के बाद वहां एक दूसरा एजेंट मिलता है जो इन लोगों को नेपाल सीमा पार करवाकर गोरखपुर लाता है. इन एजेंटों को पहले से यह निर्देश होता है कि पाकिस्तान से आ रहे इन लोगों के पासपोर्ट वह अपने कब्जे में लेकर तुरंत नष्ट कर दे जिससे यह सबूत मिट जाए कि वे पाकिस्तान से आ रहे हैं. इसके बाद ये लोग ट्रेन से जम्मू पहुंचते हैं. पूर्व आतंकवादी वापसी और पुनर्वास की नीति के तहत आए हैं इसलिए जम्मू आते ही सीधे अपने क्षेत्र के थाने में जाकर रिपोर्ट करते हैं.

एक नई त्रासदी की शुरुआत

अभी तक वापस आए पूर्व आतंकियों के मन में इस बात की जरा भी शंका नहीं थी कि कश्मीर में एक और त्रासदी उनका इंतजार कर रही है. यूसुफ अपनी आपबीती सुनाते कि हुए कहते हैं, ‘वापस आने के बाद पुलिस ने मुझ पर पाकिस्तान से ग्रेनेड लाने का झूठा केस दर्ज कर दिया. हमें कई दिनों तक बड़गाम थाने में बंद रहना पड़ा. आप ही बताइए कोई पत्नी और चार बच्चों के साथ ग्रेनेड लेकर आएगा? पत्नी को कहा कि वह दूसरे मुल्क की लड़की है. बॉर्डर क्रॉस करके भारत आई है. जबकि हम दोनों नेपाल वाले रास्ते से बच्चों के साथ आए थे. मुझ से कहा गया मैं नेपाल से अवैध तरीके से भारत आया हूं. पत्नी का केस पिछले पांच सालों से चल रहा है. मैं कहता हूं गलती मैंने की मुझे सजा दो. उस बेचारी को क्यों परेशान कर रहे हो.’

पीओके से लौटे मोहम्मद यूसुफ को इस बात की भी चिंता है कि जब उन्हें ही  सरकार नहीं अपना रही है तो उनकी बेटियों का भविष्य में क्या होगा
पीओके से लौटे मोहम्मद यूसुफ को इस बात की भी चिंता है कि जब उन्हें ही सरकार नहीं अपना रही तो उनकी बेटियों का भविष्य में क्या होगा
फोटोः बृजेश सिंह

पुनर्वास योजना के तहत आए लगभग सभी पूर्व आतंकियों और उनके परिवार वालों के साथ कुछ इसी तरह का सलूक हुआ है. जहांगीर कहते हैं, ‘ मैं भी अपनी पत्नी और बच्चों के साथ 11 दिनों तक श्रीनगर के एक पुलिस थाने में बंद रहा. उन्होंने हमारे पास मौजूद आखिरी 850 डॉलर भी अपने पास रख लिए. हमने उनसे कहा भी कि हम तो बीवी बच्चों के साथ आए हैं. हमारे पास कोई बंदूक भी नहीं फिर हमसे ऐसा सलूक क्यों किया जा रहा है.’  ये पूर्व आतंकवादी हर लिहाज से राज्य में सबसे आसान शिकार हैं. ऐसे लोगों को कानूनी मदद मुहैया करा रहे वरिष्ठ अधिवक्ता ताज हुसैन कहते हैं, ‘पुनर्वास तो दूर की बात है. सरकार इन्हें यहां शांति से रहने भी नहीं दे रही. अवैध तरीके से बॉर्डर क्रॉस करने, पासपोर्ट कानून का उल्लंघन करने से लेकर इग्रेस एंड इंटरनल मूवमेंट कंट्रोल ऑर्डिनेंस (बिना वैध दस्तावेजों के आवाजाही), दुश्मन एजेंट अध्यादेश,  पीएसए जैसे तमाम कानूनों के तहत इन पर केस दर्ज कर दिए जाते हैं.

ऐसा ही एक मामला किश्तवाड़ के मुजम्मिल खान का है. वे जम्मू कश्मीर में हिजबुल मुजाहिद्दीन के ऑपरेशन कमांडर थे. वे बताते हैं, ‘ पुनर्वास की नीति बनने के बाद मैंने एके 47 और दो जिंदा मैग्जींस के साथ समर्पण किया था. आर्मी ने मुझे छोड़ दिया लेकिन पुलिस ने उठाकर जेल में डाल दिया. मैं तीन साल जेल में रहा. वहां से बाहर निकला तो आज तक पुनर्वास की बाट जोह रहा हूं. अभी घर चलाने के लिए मजदूरी करता हूं. हमारा भी पंजाब और उत्तर-पूर्व के पूर्व आतंकवादियों की तर्ज पर पुनर्वास किया जाना चाहिए.’

ऐसे भी कई मामले हैं जहां पूर्व आतंकवादियों के मुताबिक सेना और पुलिस के लोग खुद उनसे कहते हैं कि वे किसी बड़े हथियार के साथ सरेंडर करें ताकि उनका जल्दी और अच्छे से पुनर्वास हो. लेकिन यहां सरेंडर करने के बाद उन पर तमाम तरह के केस लाद दिए जाते हैं. ऐसा ही कुछ अब्दुल गनी के साथ हुआ. गनी के मुताबिक वे जब से आए हैं तब से पुलिस उन्हें कुछ हथियार और गोला बारूद के साथ ‘आत्मसमर्पण’ के लिए कह रही है. वे कहते हैं, ‘ मैं जानता हूं वे लोग अपनी पदोन्नति और मेडल के लिए यह सब कराना चाहते हैं. लेकिन उनकी ये इच्छा पूरी करने के लिए मैं हथियार कहां ले आऊं?’

वापस आए लोगों में तमाम लोग ऐसे हैं जो बाहर पुलिस और सरकार की उपेक्षा और उत्पीड़न के साथ ही घरवालों से अलग स्तर पर जूझ रहे हैं. साल 2010 में जब मंजूर अहमद बड़गाम जिले के नरबल स्थित अपने घर पहुंचे तो कुछ दिनों तक सबकुछ ठीक रहा. आस-पड़ोस वालों से लेकर दूर तक के सारे रिश्तेदार उनसे मिलने आए. सभी ने उन्हें भविष्य के लिए शुभकामनाएं दी. लेकिन एक महीने में सबकुछ बदल गया. भाइयों ने अपनी व्यवस्था कहीं और कर लेने की बात कहनी शुरू कर दी. बकौल मूंजूर, ‘उन्होंने दबे छुपे शब्दों में यह कहना शुरु कर दिया कि 20 साल तक तो तुम यहां थे नहीं. तुम्हारी वजह से पुलिस और एजेंसी वाले हमें पीटते थे. अब तुम आ गए हो तो अपनी और अपने परिवार की व्यवस्था देखो.’

pic2मंजूर, उनकी पत्नी और चार बच्चों को उनके भाइयों ने घर से बाहर निकाल दिया है. फिलहाल वे पूंछ जिले में एक किराए के मकान में रहते हैं. मंजूर के हिस्से की संपत्ति उनके भाइयों ने सालों पहले ही अपने नाम करा ली थी. पूर्व आतंकवादी सैफुल्ला बताते हैं, ‘ हमारी वापसी से सरकार खुश है या नाराज, यह तो पता नहीं लेकिन अधिकांश पूर्व आतंकवादियों के परिवार वाले, खासकर के उनके भाई वगैरह काफी नाराज हैं. दरअसल ये लोग इनके हिस्से की संपत्ति पहले ही अपने नाम करा चुके हैं. इन्हें विश्वास था कि पीओके गए लड़के कभी नहीं आएंगे. अब चूंकि इन लोगों की वापसी हो रही है तो इन्हें चिंता है कि कहीं वे संपत्ति में अपना हक ना मांगने लगे.’

इस बात से सरकार इनकार नहीं करती कि उसने पूर्व आतंकियों की वापसी के लिए जो नीति बनाई उसमें इनके पुनर्वास का आश्वासन है. लेकिन पिछले चार सालों में किसी एक व्यक्ति का भी सरकार ने पुनर्वास नहीं किया. पिछले साल जम्मू कश्मीर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष महबूबा मुफ्ती के एक प्रश्न के जवाब में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सदन को जानकारी दी थी कि बीते तीन सालों में 360 पूर्व आतंकी पाकिस्तान से अपने घर वापस जम्मू कश्मीर आए हैं और चूंकि सभी लोग सरकार द्वारा तय रास्ते के बजाय नेपाल के रास्ते से भारत आए हैं इसलिए इनमें से किसी का भी पुनर्वास नहीं किया गया. इन लोगों के प्रति राज्य सरकार का रुख आज तीन साल बाद भी बिल्कुल नहीं बदला है. तहलका ने इस मामले पर राज्य सरकार से कई बार संपर्क करने की कोशिश की लेकिन अभी तक हमें उनकी प्रतिक्रिया नहीं मिली. ऐसे मामलों में राज्य मानवाधिकार आयोग से भी कुछ उम्मीद की जा सकती है लेकिन जम्मू कश्मीर राज्य मानवाधिकार आयोग का रवैया बेहद हास्यास्पद है. आयोग के सदस्य रफीक फिदा सफाई देते हैं, ‘हमें तो इस मसले पर कुछ पता ही नहीं. पूर्व आतंकवादियों में से किसी ने हम से संपर्क नहीं किया.’

पूर्व आतंकवादी बताते हैं कि उनके लिए सरकार द्वारा तयशुदा रास्तों से वापसी मुमकिन ही नहीं है. सरकार के इस रवैए को सारे पूर्व आतंकवादी धोखाधड़ी करार देते हैं. एहसान उल हक सवाल उठाते हैं, ‘सरकार अपनी जिम्मेदारियों से बचना चाहती है. इनसे पूछा जाना चाहिए कि हम लोग तय रूटों से आएं इसके लिए इन्होंने क्या किया? पाकिस्तान के साथ क्या इन्होंने इस संबंध में कोई बात की? अपने इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग को हमें वीजा और जरूरी कागजात मुहैया कराने के किए कहा? क्या बॉर्डर पर खड़ी सेना को इन्होंने कहा कि जो पूर्व आतंकी आत्मसमर्पण करने आ रहे हैं उन्हें आने दो? स्थिति यह रही है कि जो लोग पाकिस्तानी एजेंसियों से किसी तरह छुपते-छुपाते बॉर्डर तक पहुंचे उन्हें सेना के लोग वापस नहीं जाने की स्थिति में गोली मारने की धमकी देते हैं. ऐसे में सरकार का यह कहना है कि ये लोग निर्धारित रुटों से नहीं आए एक बेहद अमानवीय और भद्दा मजाक है.’

यूसुफ कहते हैं, ‘इस बात का क्या मतलब कि हम किस रूट से आए. अरे आ तो गए हैं. हमारा पुनर्वास करो. जब तक मैं यहां नहीं आया था. सेना और सीआईडी के लोग मेरे अब्बू के पास रोज आते थे. उनसे कहते थे कि वे मुझे पाकिस्तान से वापस बुला लें. यहां सरकार मुझे नौकरी देगी. पैसा भी देगी. अब्बू ने मुझे उनके कहने के बाद ही वापस आने के लिए चिट्ठी लिखी. तभी मैं आया. लेकिन यहां आने के बाद वे लोग अपना वादा भूल गए. फौज तो कम से कम परेशान नहीं करती लेकिन सीआईडी वाले तो आए दिन तंग करते रहते हैं.’

 सफरोज अहमद का भाई अली मोहम्मद जेकेएलएफ का सदस्य था जिसकी हिजबुल मुजाहिद्दीन के लोगों ने 1993 में हत्या कर दी थी
सफरोज अहमद का भाई अली मोहम्मद जेकेएलएफ का सदस्य था जिसकी हिजबुल मुजाहिद्दीन के लोगों ने 1993 में हत्या कर दी थी
फोटोः बृजेश सिंह

ये लोग 20-22 साल के बाद अपने घर वापस आए हैं. चूंकि इनमें से ज्यादातर लोग अपनी किशोरावस्था में ही सरहद पार चले गए थे ऐसी स्थिति में इनके पास जम्मू-कश्मीर का निवासी होने का कोई पहचान पत्र नहीं है. यानी एक तरह से जम्मू कश्मीर की नागरिकता का काम करने वाला ‘स्टेट सबजेक्ट’ नहीं हैं. राज्य में जिसके पास यह दस्तावेज होता है वही लोग जमीन जायदाद खरीद सकते है. इन्हीं लोगों को सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा का अधिकार होता है.

सबसे ज्यादा दिक्कत इन लोगों की पत्नियों और बच्चों के साथ हैं. पूर्व आतंकियों में से लगभग सभी ने पीओके या पाकिस्तान की लड़कियों के साथ शादी की है. ऐसे में उनकी पत्नियों की पहचान का मामला अधर में लटका हुआ है. यहां आने के बाद का अपना अनुभव बताते हुए जहांगीर की पत्नी साजिया कहती हैं, ‘ मैं सिर्फ यहां इसलिए हूं क्योंकि मेरे शौहर यहां आने चाहते थे. नहीं तो मेरा यहां मन एक सेकेंड भी नही लगता. न यहां की औरतों से हमारी सोच मिलती है, न जुबान, न रहन-सहन और न पहनावा. हम किसी से अपनी बात नहीं कर सकते.’

साजिया का अनुभव कोई अपवाद नहीं है. एक पूर्व आतंकी की पत्नी सबा परवीन कहती हैं, ‘ पहली दिक्कत तो यह है कि हमारी भाषा इन लोगों से बिलकुल अलग है. हमें कश्मीरी समझ में नहीं आती. ये लोग कश्मीरी भाषा में ही बात करते हैं. हम हिंदी, पंजाबी और उर्दू जानते हैं लेकिन इस भाषा में बात करने वाले बहुत कम लोग हैं यहां.’

इन महिलाओं के मन में इस बात की भी गहरी टीस है कि वे शायद कभी अपने घर वालों से नहीं मिल पाएंगी. साजिया कहती हैं, ‘ यहां इन लोगों के परिवार के सदस्य हमें पूरी तरह से नहीं अपना रहे हैं. ऐसे में अगर कल को इन्हें कुछ हो गया तो मैं अपने बच्चों को लेकर कहां जाऊंगी. यहां की लड़कियों का तो इस देश में मायका है. हमारा तो इनके अलावा कोई नहीं है और हम अपने घर भी नहीं जा सकते. शादी के बाद ही ये हमें छोड़कर चले आते तो तकलीफ नहीं होती. आज हमारे बच्चे हैं. ये उग्रवादी रहे हैं तो होंगे. इससे मेरा और मेरे बच्चों का क्या लेना देना.’  पूर्व आतंकी मतीन की पत्नी निशत फातिमा कहती हैं, ‘ सरकार से हमें कुछ नहीं चाहिए. हम तो बस अपने पति के कारण यहां आ गए. बस हमें हमारे घरवालों से मिलने जाने की इजाजत दे दें. जो बस उरी-मुजफ्फराबाद जाती है उससे हमें अपने घरवालो से भी मिलने जानें दें. हम  पर रहम करें.’

हाल ही में यूसुफ की पत्नी शबीना के पिता का मुजफ्फराबाद में देहांत हो गया लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी वे अपने पिता को देखने नहीं जा पाईं. युसूफ कहते हैं, ‘शबीना के अब्बू के इंतकाल पर मैंने हर जगह मिन्नतें कीं. मैंने कहा कि बस एक बार मेरी पत्नी को उसके पिता को देखने जाने दो लेकिन किसी ने हमारी बात नहीं सुनी.’ सरकार को कोसते हुए युसूफ कहते हैं, ‘यह किस तरह का भेदभाव है. यासीन मलिक को आप पाकिस्तान जाने के लिए पासपोर्ट देते हैं. वह वहां जाकर शादी करता है. हाफीज सईद के साथ बैठक करता है. हमेशा आता-जाता है लेकिन हमारी पत्नियों को जाने की इजाजत नहीं है. जो लोग गन कल्चर को लेकर यहां आए उन्हें आप पासपोर्ट दे देते हो.’

pic3पूर्व आतंकवादियों की पत्नियों के साथ ही इनके बच्चों का जीवन भी यहां बेहद एकाकी और अलगाव से भरा है. पूर्व आतंकवादी जमील का 12 वर्षीय पुत्र इरफान कहता है, ‘ मेरे सभी दोस्त मुजफ्फराबाद में हैं. यहां के लड़कों की भाषा मुझे समझ नहीं आती.’  इन बच्चों की आगे की पढाई भी एक बड़ी दिक्कत है. बड़गाम के मंजूर अहमद कहते हैं, ‘ मेरा बड़ा बेटा वहां 10 वीं पास करके आया है लेकिन यहां आने के बाद उसका कहीं एडमिशन नहीं हो रहा है. पिछले दो सालों से मैं सबके सामने हाथ जोड़ रहा हूं लेकिन स्कूल वाले हमारे बच्चों को एडमिशन देने से बिना कोई कारण बताए इंकार कर रहे हैं.’ यह अनुभव यहां लौटने वाले लगभग हर व्यक्ति का है. जहां तक प्रशासन की बात है तो वह इस समस्या को स्वीकार तो करता है लेकिन सीधा हल सुझाने की दिशा में कुछ करता नहीं दिखता. डीजीपी अशोक प्रसाद के अनुसार, ‘नागरिकता और आगे की पढ़ाई के लिए डिग्रियों की वैधता जटिल मामले हैं. उनके हल होने में थोडा समय लगेगा क्योंकि ये कानूनी और संवैधानिक मसला है. बाकी उनके जीवन को बेहतर बनाने की हम लगातार कोशिश कर रहे हैं.’

जब इन पूर्व आतंकवादियों का पुनर्वास नहीं हुआ तो इन्होंने राज्य में अपने स्तर पर रोजी-रोजगार करने की ठानी लेकिन इस मामले में भी इनके साथ मुसीबतें कम नहीं हैं. 2010 में पीओके से वापस आए फारुक अहमद शाह कहते हैं, ‘हमें कोई काम नहीं देता. जहां भी काम मांगने जाते हैं लोग हमारे मिलिटेंट बैकग्राउंड के कारण काम देने से इंकार कर देते हैं. एक तरफ रोजी रोटी का कोई इंतजाम है नहीं, वहीं हर दूसरे दिन पुलिस, सीआईडी पूछताछ के नाम पर बुलाती है. घंटों बैठाए रखती है. महीने में 20 दिन तो यही निकल जाते हैं. जब से आए हैं तभी से परेशान कर रहे हैं.’ पूर्व आतंकवादी अमजद अहमद कहते हैं, ‘यहां आने के बाद हमारे पास कोई रोजगार नहीं है. हम में से हर व्यक्ति पीओके में कोई ना कोई रोजगार कर रहा था लेकिन यहां हमारे सामने रोजी-रोटी का संकट है. 20-22 सालों में हमने जो भी कमाया था वह पूरा पैसा तो यहां आने में खर्च हो गया. अब यहां हमारे पास कोई रोजगार नहीं है.’ वापस आए ज्यादातर लोगों में से कोई दिहाड़ी मजदूरी कर अपना पेट पाल रहा है तो कोई ऑटो चलाकर या अन्य तरीकों से किसी तरह से दो जून की रोटी का इंतजाम अपने परिवार के लिए कर रहा है.

ये तमाम लोग आने के बाद किस तरह की अमानवीय स्थिति में जी रहे हैं, कितने प्रताड़ित हैं इसका पता उस समय चला जब हाल ही पाकिस्तान से वापस आए एक पूर्व आंतकी सैयद बशीर अहमद शाह ने खुद को आग लगाकर आत्महत्या कर ली थी. बशीर के 15 वर्षीय पुत्र फैजान कहते हैं, ‘अब्बू बहुत परेशान थे. पिछले साल ही हम लोग मुजफ्फराबाद से यहां आए थे. अम्मी यहां आने से रोक रहीं थीं लेकिन अब्बू नहीं माने. यहां आने के हफ्ते भर बाद ही अब्बू के बड़े भाई ने हमें घर से बाहर जाने के लिए कह दिया. हमारे पास रहने के लिए कोई जगह नहीं थी. कुछ दिन के लिए हम अपने एक रिश्तेदार के पास चले गए. अब्बू के पास पैसे नहीं थे. वे घरों की रंगाई-पुताई का काम करने लगे. मजदूरी से जो पैसे मिलते थे उससे रोज का खर्च चलता था. दो महीने बाद उनसे वह दिहाड़ी मजदूरी भी छिन गई. घर खर्च के लिए लोगों से उन्होंने पैसे उधार लिए. वे लोग भी अपने पैसे मांगने लगे. आखिर में इन्हीं बातों का तनाव झेलते हुए उन्होंने एक दिन खुद पर पेट्रोल छिड़ककर आग लगा ली.’

हाल ही में वापस आए मोहम्मद अशरफ वानी उर्फ जमील की स्थिति इतनी खराब हो गई कि उन्हें अपनी बेटी की मजबूरी में शादी करनी पड़ी. जमील कहते हैं, मेरे पास यही विकल्प था कि अपनी बेटी को घर पर रखकर भूख से मार डालूं या कुछ करूं. मैंने उसकी शादी कर दी. मैं उसका गुनहगार हूं, वह 11 वीं में पढ़ती थी. मजबूरी में मैंने उसकी शादी की. न हमारे पास पहचान पत्र है, न राशन कार्ड. पता नहीं कब तक जिंदा रहेंगे हम. जमील बताते हैं उन्होंने ऑटो  चलाकर अपना गुजारा करने की बात सोची थी लेकिन सरकार कहती है कि जब वे यहां तीन साल रह लेंगे तब उन्हें ड्राइविंग लाइसेंस मिलेगा. इस समय उनके पास कोई रोजगार नहीं है और वे जैसे-तैसे गुजारा कर रहे हैं.

अपनी समस्याओं और मांगों को लेकर ये लोग श्रीनगर में कई बार प्रदर्शन कर चुके हैं लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. अब हालात ऐसे हो गए हैं कि कई परिवारों ने वापस पाकिस्तान जाने के बारे में सोचना शुरू कर दिया है. हाल ही में सेना ने बारामुला से बॉर्डर क्रॉस करके पाकिस्तान जाने का प्रयास करते हुए पांच परिवारों को गिरफ्तार किया था. पिछले दो महीने में तीन परिवारों के वापस जाने की भी खबरें आईं जिसमें दो परिवार उत्तरी कश्मीर के बंदीपुर  जिले से थे और एक श्रीनगर से.

एहसान बताते हैं, ‘ अभी लगभग 25 हजार के करीब कश्मीरी लड़के पाकिस्तान में हैं. वे सभी वहां से आना चाहते हैं लेकिन हम उनसे कहते हैं, यहां आओगे तो भूखे मारे जाओगे. इसलिए वहीं रहो.’ जहांगीर झुंझलाते हुए कहते हैं, ‘आप से नहीं संभल रहा है तो हमें किसी तीसरे मुल्क में भेज दो. लोग सऊदी और कहां-कहां नौकरी करने जा रहे हैं लेकिन हम शहर से बाहर नहीं जा सकते. हम यहां कैद हो गए हैं. अगर मान लीजिए दिल्ली वगैरह में काम की तलाश में चले गए भी तो पुलिस पकड़ के कहेगी कि उसने एक बड़ा आतंकवादी पकड़ा है. लियाकत शाह का उदाहरण हमारे सामने है.’

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hafeej‘पाकिस्तान में अब भी आतंकवादी शिविर चल रहे हैं’

पाकिस्तान में आतंक की ट्रेनिंग तो अभी-भी चल रही है. लेकिन पहले जैसी स्थिति नहीं है. जो लड़के कश्मीर से आए थे वे धीरे-धीरे सब हकीकत जान गए. इन लोगों को कहा गया था कि जेहाद में बरकत है. जेहाद में सबकुछ है. बड़े-बड़े वादे किए जाते थे कि कश्मीर आजाद होगा लेकिन हकीकत में पाकिस्तान और यहां की सेना को इससे कोई मतलब नहीं है. पाकिस्तान अपने स्वार्थ और मकसद के लिए इन्हें इस्तेमाल कर रहा है. ये खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं. जेहाद के लिए पहले जो ब्रेनवाश किया जाता था वह अब मुमकिन नहीं है. दूसरा यहां पर जेहादी गुटों के जो बड़े नेता हैं, उनके लड़के तो खुद जेहाद से बाहर हैं और वे यहां गरीब बच्चों को इस्तेमाल करते हैं. यहां जो कश्मीरी लड़के हैं वे भी देख रहे हैं कि भारतीय कश्मीर में स्थिति बेहतर हुई है. मुसलमान लड़के वहां से आईएएस बन रहे हैं,  पढ़ाई कर रहे हैं. उन्हें सरकारी नौकरियां मिल रही हैं. भारतीय कश्मीर में तो स्थिति बेहतर हो रही है. इसलिए अब ये लड़के पाकिस्तानी ट्रेनिंग कैंपों का रुख नहीं करते.

हफीज चाचड़, पाकिस्तान में बीबीसी के पूर्व संवाददाता

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इन पूर्व आतंकवादियों की राज्य में जो दुर्दशा है वह खुद ही कई खतरों को आमंत्रित कर सकती है. वरिष्ठ पत्रकार और जम्मू कश्मीर पर बने तीन सदस्यीय वार्ताकारों के समूह के सदस्य  दिलीप पड़गांवकर इस बारे में इशारा करते हैं, ‘ यह एक दुखद सच है कि इन लोगों का पुनर्वास नहीं किया जा रहा. हम इन लोगों से मिले हैं. सरकार को ये सोचना चाहिए कि अगर वह इन लोगों का पुनर्वास नहीं करेंगे तो इसका फायदा आईएसआई और कश्मीर विरोधी ताकतें ही उठाएंगी.’ कुछ इसी तरह की बात हाल ही में पाकिस्तान से लौटे पूर्व आतंकवादी फारुक अहमद भी कहते हैं, ‘सरकार खुद चाहती है कि लोग मिलिटेंट बने. आज हमारे बच्चे तिल-तिल मर रहे हैं. अब ऐसे में कोई मुझे 10 लाख रुपये किसी गलत काम के लिए देगा तो क्या मैं नहीं लूंगा.’

एक तरफ पूर्व आतंकवादी वापस कश्मीर आने और अपने पुनर्वास को लेकर संघर्ष कर रहे हैं तो इधर एजेंसियां भी उनके ‘हृदय परिवर्तन’ की सच्चाई पर नजर बनाए हुए हैं. खुफिया विभाग के एक अधिकारी कहते हैं, ‘ हमें बिलकुल चौंकन्ना रहने की जरूरत है. सभी को पता है कि अफजल गुरु भी सरेंडर्ड मिलिटेंट ही था. डबल क्रॉस की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.’ सरकार ने बेशक इन लोगों के लिए पुनर्वास की नीति बना दी हो लेकिन खुफिया विभाग का यह रवैया काफी हद तक इनके लिए मुसीबत का सबब बना हुआ है. खुफिया विभाग के अधिकारियों का यह भी कहना है कि  पूर्व आतंकवादियों में से ज्यादातर ने पाकिस्तानी महिलाओं से शादी कर ली है. इनके बच्चे भी हैं. ऐसे में इनकी नागरिकता का दर्जा एक बड़ी समस्या है. पत्नी को वापस भेजा जा सकता है, लेकिन बच्चों का क्या करेंगे? सबसे बड़ा डर यह है कि आने वाले समय में ये बच्चे एक स्पष्ट नागरिकता के अभाव की स्थिति में कश्मीर विवाद की पहचान न बन जाएं. रॉ के पूर्व प्रमुख आनंद वर्मा कहते हैं, ‘इन लोगों को सरकार का साथ देना चाहिए. कुछ ऐसा नहीं करना चाहिए जिससे यहां के अमन चैन को कोई नुकसान पहुंचे. एजेंसियों को ध्यान रखना होगा कि इनके बीच ब्लैक शीप (संदिग्ध) ना आ जाएं. इन लोगों पर कुछ समय तक नजर रखने की जरूरत है.’

घाटी में पृथकतावादी भी इनकी वापसी को लेकर खुश नहीं है. सैयद अली शाह गिलानी कहते हैं, ‘ ये लोग लालच में आ गए. इन्हें यहां नहीं आना चाहिए था. पुर्नवास नीति के नाम पर भारत सरकार ने इन्हें पकड़ने के लिए जाल बिछाया जिसमें ये लोग फंस गए.’ जहां तक पूर्व आतंकवादियों की बात है तो वे खुद इन प्रथकतावादी संगठनों और उनके नेताओं की प्रतिबद्धता पर सवाल उठाते हैं. जहांगीर कहते हैं, ‘आजादी की बात करने वाले ये लोग भारत और पाकिस्तान दोनों से पैसा लेते हैं. इनके बच्चे लंदन और अमेरिका में पढ़ रहे हैं. इन्होंने शहीदों की कब्रें बेच दीं. हम हुर्रियत के लोगों की कोठियों पर कब्जा करेंगे. इन्होंने ही हमें बंदूकें पकड़ाईं थी अब ये लोग आराम से नहीं बैठ सकते .’

चाहे राज्य सरकार हो, सुरक्षाबल, खुफिया एजेंसियां, प्रथकतावादी या अपना परिवार, हर किसी के लिए पाकिस्तान से आ रहे ये पूर्व आतंकवादी इस समय सबसे अवांछित व्यक्ति बन चुके हैं. ऐसा ही रहा तो मुमकिन है कि आने वाले समय ये भी राज्य की उन दर्जनों मानवीय त्रासदियों में शुमार हो जाएं जिनका जम्मू-कश्मीर के पास कोई स्थाई समाधान नहीं है.

2 COMMENTS

  1. इनके बचों को नागरिकता अधिकार मिलने चाहि़ेये वरना बडे होकर यह बचे फिर अपराधी बवेंगे और कशमिरमें एक नई समशा पैदा होगीकांगरेस खुद एक बिमारी हैवह कया हल करेगी? मोदी को कुछ करना चाहिये

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