सवालों के घेरे में एनकाउंटर

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बीते अगस्त की तीन तारीख को रात के लगभग 11 बजे मोहन कुशवाह को एक अंजान नंबर से फोन आता है. रीढ़ की हड्डी में चोट से जूझ रहे मोहन जब तक फोन उठाते तब तक वह कट चुका था. मोहन पिछले 24 घंटे से अपने छोटे बेटे धर्मेंद्र की कोई खोज-खबर न मिलने से परेशान थे. यही हाल उनकी पत्नी और बेटी का भी था. धर्मेंद्र को एक दिन पहले ही पुलिस उठाकर ले गई थी. इस बीच अंजान नंबर से आई कॉल में उन्हें एक उम्मीद की किरण नजर आई.

उन्होंने वापस कॉल की तो दूसरी तरफ से एक महिला ने अपना परिचय ग्वालियर पुलिस की क्राइम ब्रांच में पदस्थ अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (एएसपी) प्रतिमा एस. मैथ्यू के रूप में दिया. उन्होंने मोहन से परिवार की जानकारी लेकर फोन काट दिया. शंकाओं से मोहन का मन भर उठा. उन्होंने फिर वही नंबर घुमाया और बेटे के बारे में पूछा. उसके बाद उन्हें जो जवाब मिला वह सुनकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई. बताया गया कि उनका बेटा पुलिस एनकाउंटर में मारा जा चुका है. इस बात का उन्हें भरोसा न हुआ. रात चिंता और बेचैनी में गुजर गई. सुबह जब अखबार उनके हाथों में पहुंचा तो उनकी दुनिया लुट चुकी थी. उनका बेटा वास्तव में पुलिस की गोली का शिकार हो चुका था.

इस कथित एनकाउंटर के बारे में एएसपी प्रतिमा एस. मैथ्यू कहती हैं, ‘यूपी एटीएस ने ग्वालियर पुलिस को आगाह किया था कि जेल में बंद अंतर्राज्यीय शूटर हरेंद्र राणा प्रॉपर्टी डीलर बिल्लू भदौरिया हत्याकांड के गवाह पंकज भदौरिया को मारना चाहता है. ऐसा इसलिए क्योंकि बिल्लू की हत्या में उसका छोटा भाई अरुण भी नामजद है और हरेंद्र की प्रतिज्ञा है कि वह भाई को जेल नहीं होने देगा. अपने खिलाफ चल रहे लगभग हर आपराधिक प्रकरण में राजीनामा कर चुका हरेंद्र, पंकज भदौरिया को राजीनामे के लिए तैयार नहीं करा पा रहा था इसलिए उसने उसे ठिकाने लगाने की योजना बनाई और यह काम सौंपा धर्मेंद्र कुशवाह को. शिवपुरी लिंक रोड के एक खंडहर में धर्मेंद्र जब अपने साथियों के साथ इस काम को अंजाम दे रहा था तब मुखबिर की सूचना के आधार पर पुलिस ने दबिश दी और एक घंटे चली मुठभेड़ में धर्मेंद्र ढेर हो गया, जबकि उसके दो साथी भागने में सफल रहे.’ हालांकि पुलिस की ये कहानी धर्मेंद्र के पिता मोहन कुशवाह सिरे से नकार चुके हैं. उनका दावा है, ‘एनकाउंटर से एक दिन पहले पुलिस उनके बेटे को पूछताछ के नाम पर घर से उठाकर ले गई थी. लॉकअप में मारपीट के दौरान उसकी मौत हुई है. पुलिस एनकाउंटर की मनगढ़ंत कहानी रचकर अपने पापों पर पर्दा डाल रही है.’ अपनी बात के समर्थन में वह धर्मेंद्र के शव पर बने चोटों के निशान भी दिखाते हैं.

मोहन के दावों की पुष्टि धर्मेंद्र की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट भी करती है, जिसमें बताया गया है कि उनकी मौत गोली लगने से नहीं बल्कि किसी भोथरे हथियार से दी गई चोट के कारण सिर में खून जमा होने से हुई है. पोस्टमॉर्टम करने वाली डॉक्टरों की तीन सदस्यीय टीम का हिस्सा रहे सार्थक जुगलानी बताते हैं, ‘धर्मेंद्र के शरीर पर एक से दो दिन पुरानी कई चोटें थीं, जो किसी भोथरे हथियार से दी गई थीं. चोटें इतनी गंभीर थीं कि सामान्य परिस्थितियों में व्यक्ति की मौत का कारण बन सकती थीं.’ धर्मेंद्र के मुठभेड़ में मारे जाने की पुलिसिया कहानी इसलिए भी किसी के गले नहीं उतर रही क्योंकि धर्मेंद्र को लगी गोलियों के घाव से खून नाममात्र का निकला है. गोली लगने पर इतना कम खून निकलना तब ही संभव है जब गोली लगने के कई घंटों पहले व्यक्ति दम तोड़ चुका हो. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में डॉक्टरों ने इस बात की भी पुष्टि की है. धर्मेंद्र को दो गोली लगी थी. पहली छाती के नीचे बायीं बांह की साइड में और दूसरी छाती के बायीं ओर ऊपर मारी गई थी. दोनों ही गोलियां शरीर के दूसरी ओर से बाहर निकल गई थीं.

इस पर प्रतिमा मैथ्यू का कहना है, ‘धर्मेंद्र चूंकि अपराधी प्रवृति का था, इसलिए मुठभेड़ के पहले हुए किसी झगड़े में उसे चोटें आईं होंगी. रहा सवाल कम खून निकलने का तो यह चिकित्सीय शोध का विषय है. क्या पता उन चोटों के कारण उसके शरीर में कुछ ऐसी अंदरूनी रासायनिक क्रियाएं हो रही हों जिससे कम खून निकला.’ हालांकि सार्थक जुगलानी उनकी इस कहानी को हास्यास्पद ठहराते हुए बताते हैं, ‘पहली बात चिकित्सीय विज्ञान में ऐसा संभव ही नहीं कि जीवित व्यक्ति को गोली लगे और खून न निकले और दूसरा यह कि धर्मेंद्र शारीरिक रूप से एकदम स्वस्थ था.’  मध्य प्रदेश पुलिस के सेवानिवृत उप पुलिस अधीक्षक एमपी सिंह चौहान कहते हैं, ‘पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट देखने के बाद मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि धर्मेंद्र की मौत पुलिस मुठभेड़ में नहीं हुई, उनकी हत्या की गई है.’

वहीं, मुठभेड़ के दौरान दो अपराधियों के भाग जाने की प्रतिमा मैथ्यू की कहानी भी गले नहीं उतरती. विशेषज्ञों का कहना है कि एफआईआर रिपोर्ट में उन्होंने मुठभेड़ स्थल को जिस तरह से घेरा जाना बताया है, उसके बाद किसी के भाग जाने की गुंजाइश ही नहीं बचती, फिर दो बदमाश कैसे भाग गए. वहीं पोस्टमॉर्टम के पहले डॉक्टरों की टीम ने भी मुठभेड़ स्थल का निरीक्षण किया था. वह भी ऐसे ही कई साक्ष्य मिलने का दावा करते हैं जो पुलिस की कहानी पर सवालिया निशान लगाते हैं. अगर धर्मेंद्र का आपराधिक रिकॉर्ड खंगाला जाए तो उस पर शहर के किसी भी थाने में कोई प्रकरण तक दर्ज नहीं है. वह दिन में ऑटो चलाता था और रात को ऑटो स्टैंड पर चौकीदारी करता था.

धर्मेंद्र के बारे में उसके पड़ोसियों का कहना है, ‘वह बस अपने काम से काम रखता था. ज्यादा बोलता भी नहीं था.’

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मृतक धर्मेंद्र कुशवाह

बहरहाल पुलिस की दहशत का क्षेत्र में कुछ ऐसा आलम है कि लोग अपना नाम तक बताना नहीं चाहते. नाम न छापने की शर्त पर एक शख्स बताते हैं, ‘धर्मेंद्र जब 4-5 साल का था, मैंने तब से उसे देखा है. वह बीड़ी, सिगरेट, पान तक नहीं छूता था, किसी की हत्या क्या करेगा. उसके साथ अन्याय हुआ है. दोषियों को सजा मिलनी ही चाहिए.’ वहीं स्थानीय निवासी भगवानदास रत्नाकर का कहना है, ‘पिता के कहने पर पहले वह दोने-पत्तल की दुकान पर बैठा करता था, फिर मोबाइल की दुकान खोली लेकिन वह चली नहीं. उसके बाद वह ऑटो चलाने लगा और पिता के साथ चौकीदारी. पुलिस ने उस मासूम को क्यों मार दिया, समझ नहीं आता.’

यह पहला मौका नहीं है जब ग्वालियर पुलिस की क्राइम ब्रांच की कार्यप्रणाली पर उंगुली उठी हो. पिछले वर्ष हुए मुकेश राठौर एनकाउंटर मामले में उनके खिलाफ हाई कोर्ट का फैसला 21 अगस्त को ही आया है, जिसमें कोर्ट ने एनकाउंटर को फर्जी बताते हुए क्राइम ब्रांच की टीम पर उचित कानूनी कार्रवाई करने के आदेश दिए हैं. इसी क्राइम ब्रांच ने पिछले वर्ष 21 अक्टूबर को चेन स्नैचिंग की वारदात को अंजाम देकर भागने के दौरान मुकेश राठौर को मार गिराने का दावा किया था. लेकिन मुकेश के परिजनों ने इस पर हंगामा कर दिया. शहर के हजीरा चौराहे पर शव रखकर जाम लगा दिया था और मामले की सीबीआई जांच की मांग की. धर्मेंद्र की तरह ही मुकेश के परिजनों का दावा था कि पुलिस ने मुकेश को महाराजपुरा क्षेत्र के कुंवरपुरा गांव से 20 अक्टूबर को उठाया था तो वह अगले दिन चोरी की घटना को अंजाम देते हुए कैसे पुलिस की गोली का शिकार हो गया? इसके समर्थन में जब गांव के कुछ प्रत्यक्षदर्शी भी सामने आए तो एनकाउंटर की यह कहानी क्राइम ब्रांच ही नहीं प्रशासन के भी गले की हड्डी बन गई. पुलिस जिस समय थाने में मुकेश को थर्ड डिग्री टॉर्चर दे रही थी उसी समय रामेश्वर यादव वहां मौजूद थे. दूसरे दिन जब उन्होंने मुकेश के एनकाउंटर की खबर अखबार में पढ़ी तो मीडिया के सामने आकर पुलिस के झूठ से पर्दा उठा दिया. रामेश्वर यादव के बयान और मुकेश के शरीर पर कई गंभीर चोटों के निशान से प्रशासन बैकफुट पर आ गया और मामले की सीआईडी जांच के आदेश दे दिए.

दूसरी ओर प्रशासन और पुलिस मामले को दबाने की जी तोड़ कोशिश में लग गए. मुकेश के भाई सुनील राठौर बताते हैं, ‘जब रामेश्वर मीडिया के सामने आए तो वहां मौजूद एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने उन्हें मामले से दूर रहने की समझाइश दी ताकि हमारा केस कमजोर पड़ जाए. पर वह अपने बयान पर डटे रहे. उनकी गवाही ही पुलिस के खिलाफ आए फैसले में निर्णायक साबित हुई.’ सुनील बताते हैं, ‘मेरे भाई पर पुलिस ने भले ही चोरी-चकारी के कई प्रकरण दर्ज किए हों पर वह बार-बार उन आरोपों से बरी कर दिए गए. फिर भी क्राइम ब्रांच ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. नए सिरे से जिंदगी शुरू करने का बार-बार प्रयास किया लेकिन क्राइम ब्रांच के दो सिपाही जिनमें से एक हत्या के आरोप में जेल तक काट आया है और आज पुलिस से बर्खास्त है, उनके पीछे पड़े रहे. भैया जहां जाते वे वहीं से उन्हें उठा लाते और मामला दर्ज कर लेते. आप खुद ही देखिए क्राइम ब्रांच में ऐसे लोग भी काम कर रहे हैं जो हत्यारे भी हो सकते हैं.’ इस मामले में मुकेश पक्ष की पैरवी करने वाले वकील अवधेश भदौरिया का कहना है, ‘पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मुकेश के शरीर पर पंद्रह से अठारह गंभीर चोटों की पुष्टि हुई थी. मुकेश को तीन हिस्सों में पीटा गया था. कुछ चोटें छह तो कुछ दस से बारह घंटे पुरानी थीं. शरीर पर लगीं इन गंभीर चोटों के कारण ही उनकी मौत हो चुकी थी. पुलिस हिरासत में हुई मौत को छिपाने के लिए पुलिस ने एनकाउंटर की झूठी कहानी रची और कुछ किरदारों को इसमें शामिल कर चेन स्नैचिंग का सीन फिल्मा सबकी आंखों में धूल झोंकने का प्रयास किया.’

बहरहाल, धर्मेंद्र कुशवाह को क्राइम ब्रांच ने कब उठाया? यह साफ नहीं हो पा रहा है. धर्मेंद्र के पिता का कहना है, ‘दो अगस्त की रात 11 बजे पांच–छह पुलिसवाले घर आए और पूछताछ के नाम पर उसे घर से उठा ले गए थे.’ वहीं दूसरी ओर ये बात भी सामने आ रही है कि मोहन कुशवाह किसी दबाव के चलते सच छिपा रहे हैं. धर्मेंद्र को उसके घर से नहीं बल्कि घर से कुछ सौ मीटर की दूरी पर सुनसान जगह से क्राइम ब्रांच वालों ने तब उठाया जब वह खाना खाकर टहलने निकला था. पुलिस द्वारा महिंद्रा बोलेरो में धर्मेंद्र को ले जाते समय दो स्थानीय निवासियों ने भी देखा था. तीन दिन पहले घर में हुई अनबन के चलते धर्मेंद्र एक रात गायब रहा था. इसलिए जब उस रात धर्मेंद्र घर नहीं पहुंचा तो पिता ने सोचा कि शायद वह फिर से उसी तरह कहीं गया हो लेकिन जब उसका सुबह होने पर भी पता नहीं चला तो वह चिंतित हो उठे. तभी उन्हें धर्मेंद्र के अपहरण के दोनों प्रत्यक्षदर्शियों ने रात का घटनाक्रम कह सुनाया जिसके बाद वह बेटे की खोज-खबर के लिए आसपास के थानों में भी गए.

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