खतरनाक दौर से गुजर रहा भारतीय लोकतंत्र

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essay-1भारत आजादी के बाद के सबसे खतरनाक दौर से गुजर रहा है. या सबसे कड़े इम्तेहान से. यह कोई नाटकीय वक्तव्य नहीं है. भारत की जो कल्पना आजादी के आंदोलन के दौरान गांधी के नेतृत्व में प्रस्तावित की गई थी और जिसे भारतीय संविधान ने मूर्त करने का प्रयास किया, वह पिछले एक साल में क्षत-विक्षत कर दी गई है. यह बात अब उन लोगों की समझ में भी आने लगी है जिन्होंने भारतीय जनता पार्टी को भारत का शासन चलाने के लिए सबसे उपयुक्त पाया था और जो हाल-फिलहाल तक उसकी और उसके प्रमुख की वकालत किए जा रहे थे. अब समझ में आने लगा है कि भारत का शासन उनके हाथ में चला गया है जो पिछले सात दशकों से भारत की इस धारणा के खिलाफ जनता को तैयार कर रहे थे. फिर भी आश्चर्य की बात है कि नयनतारा सहगल को छोड़कर कोई खुलकर कहने की जरूरत महसूस नहीं करता कि भारत का शासन अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पास है. या इतना ही कि वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजनीतिक शाखा भारतीय जनता पार्टी के पास है. और यह तब भी नहीं कहा जा रहा है जब पूरा देश देख चुका है कि पूरी सरकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दफ्तर में हाजिर हुई, उसे अपना रिपोर्ट कार्ड दिया और उससे निर्देश लिए. इसके बाद भी धर्मनिरपेक्ष और उदार तवलीन सिंह, सुरजीत भल्ला या मेघनाद देसाई लगातार प्रधानमंत्री को सलाह दिए जा रहे हैं कि वे अपनी छवि बचा लें, जो कुछ भी हो रहा है, उससे खुद को अलग करके. या तो वे राजनीतिक मूढ़ हैं या खुद को धोखा दे रहे हैं.

आजादी के बाद हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या थी? अंग्रेजों के जाने के बाद अंग्रेज शासित भूभाग से इस्लाम के नाम पर एक राष्ट्र बनने के बावजूद हिंदुओं को इस बात के लिए सहमत करना कि एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र आधुनिक समय में समाज के संगठन का सबसे सभ्य और मानवीय तरीका है! और अल्पसंख्यक मुसलमानों को भरोसा दिलाना कि उनके साथ धोखा नहीं होगा, वे बहुसंख्यक हिंदुओं के साथ बराबरी और इज्जत के साथ रह सकेंगे. यह बीसवीं सदी के एक बड़े खून-खराबे के बीच मुमकिन हुआ. याद रखें, हिंदुओं को कोई इस्लामी राष्ट्र की सेना नहीं मार रही थी और न मुसलमानों को हिंदू राष्ट्र की सेना मार रही थी, साधारण हिंदू और मुस्लिम जनता ने ही एक-दूसरे का कत्ल किया था.

गुस्से, नफरत और बदले की इस आग के बीच धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में भारत के प्रस्ताव को व्यापक जन सहमति दिलाना आसान न था. न सिर्फ गांधी, नेहरू, आजाद जैसे नेता इसे लेकर ईमानदारी से प्रतिबद्ध थे बल्कि वे इसके लिए सामान्य जन से कड़ी बहस करने को और किसी भी हद तक जाने को तैयार थे. पटेल और राजेंद्र प्रसाद जैसे नेताओं ने अपनी हिचक पर काबू पा लिया था और बुनियादी मानवीयता में उनकी आस्था पर संदेह नहीं किया जा सकता था.

गांधी ने अपना जनतांत्रिक प्रशिक्षण किया था, इसलिए कट्टर शाकाहारी होते हुए भी उन्हें न सिर्फ मांसाहारियों, बल्कि गोमांसाहारियों से भी कभी नफरत नहीं हुई

धर्मनिरपेक्षता को सहकारी जीवन का सर्वोच्च सिद्धांत जीवन मूल्य मानने के लिए ये नेता कोई भी कीमत चुकाने को तैयार थे. ध्यान रहे, इनमें से अगर कोई भी खुद को हिंदू नेता के रूप में पेश करता तो भारत के सभी हिंदू उसे हाथो-हाथ लेने को तैयार थे. इस प्रलोभन को उन्होंने ठुकराया. इसमें सब शामिल थे, बावजूद पटेल और राजेंद्र प्रसाद के सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार में प्रमुख भूमिका निभाने के, उनके बारे में भी यह कहा जा सकता है. गांधी से सावरकर या हेडगेवार प्रतियोगिता नहीं कर सकते थे और न नेहरू से. पटेल, राजेंद्र प्रसाद या अन्य नेताओं की बात ही जाने दें.

आखिर मुस्लिम लीग यही तो कह रही थी कि कांग्रेस हिंदुओं की जमात है. पाकिस्तान के निर्माण के बाद इसे आरोप की जगह नियति के रूप में स्वीकार करना कांग्रेस के लिए सबसे सुविधाजनक होता. शायद तत्कालीन अंतर्राष्ट्रीय जनमत भी इसे ही अवश्यसंभावी मान लेता. आखिर एक पिछड़े समाज से और क्या उम्मीद की जा सकती थी? गांधी के नेतृत्व में अगर कांग्रेस ने यह आसान रास्ता नहीं चुना तो इसका अर्थ क्या था और है? इस पर हमने कायदे से विचार क्यों नहीं किया है?

धार्मिक राष्ट्र एक आसान और समझ में आने वाली कल्पना थी. आधुनिक जनतंत्रों ने भी खुद को धर्मनिरपेक्ष घोषित नहीं किया था. भारत के नेता बहुत मुश्किल घड़ी में यह प्रस्ताव भारत की जनता के सामने रख रहे थे.

स्वाभाविक यह था कि मुसलमानों को पाकिस्तान जाने दिया जाता. गांधी और नेहरू को यह कबूल न था. गांधी ने तो तैयारी कर रखी थी कि वे नई खींची सीमा के इस ओर भगाए गए हिंदुओं और सिखों को वापस उस तरफ ले जाने और इस तरफ से खदेड़े या भागे मुसलामानों को इधर वापस लाने का अभियान चलाएंगे. आबादियों को उनके अपने परिवेश से जबरन उखाड़ दिए जाने का विचार उनके लिए असभ्यता था.

इस प्रतिबद्धता के लिए गांधी को सजा दी गई. लेकिन उनकी हत्या ने भारत की जनता को झटका दिया. यह कहा जा सकता है कि गांधी के खून ने भारत को जोड़ने का काम किया. राष्ट्रपिता की हत्या के अपराधबोध के कारण भारत में एक आत्म-चिंतन और मंथन शुरू हुआ.

भारत के इस विचार में दूसरी कई अपूर्णताएं थीं. मसलन, जैसा शिव विश्वनाथन ने अपने दिलचस्प काल्पनिक संवाद में दिखाया है यह आदिवासियों के नजरिये को समझ नहीं पाया था. लेकिन इस तरह की कमियों के बावजूद एक बड़ा हासिल इसका यह था कि इसने दो बड़ी आबादियों, यानी हिंदू और मुसलमानों को एक-दूसरे के पड़ोस में रहने को तैयार कर लिया था.

धर्मनिरपेक्षता एक अत्यंत परिष्कृत विचार था. क्या मुख्यतया निरक्षर जनता इसका अभ्यास कर पाएगी? क्या वह एक झटके में मिले सार्वजनिक वयस्क मताधिकार का भी विचारपूर्वक प्रयोग कर पाएगी? इसे लेकर पश्चिम में गहरा शक था और आशंका जताई जा रही थी कि शुरुआती उत्साह के ठंडा पड़ते ही भारत बिखर जाएगा, लेकिन भारत जम गया, सार्वजनीन वयस्क मताधिकार का प्रयोग भी शिक्षा, संपन्नता, जाति-धर्म, लिंग से निरपेक्ष भारत की जनता ने प्रायः सफलतापूर्वक किया. उसका दायरा बढ़ता ही गया और उसमें नई जनता शामिल होकर उसपर अपना दावा पेश करती रही. इस अधिकार के अपहरण का इतिहास है लेकिन धीरे-धीरे दलित, आदिवासी, औरतों, सबने इसका अपने फैसले के मुताबिक इस्तेमाल करने की हिम्मत दिखाई. वर्चस्वशाली वर्गों से उन्हें टकराना पड़ा लेकिन उनके साथ संविधान खड़ा था. यह कितना क्रांतिकारी विचार था और कितना साहसी, यह सिर्फ दुनिया के सभी जनतंत्रों के इतिहास पर नजर डालकर समझा जा सकता है, जहां सभी तरह की आबादियों को बिना भेदभाव के एक साथ मताधिकार नहीं मिला और इसके लिए क्रमवार संघर्ष करना पड़ा.

भारतीय धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के मूल में ठीक यही बात थी. जैसा जवाहरलाल नेहरू ने उसे परिभाषित किया, धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा में सामाजिक न्याय आधारभूत था. कहा जा सकता है कि यह धर्मनिरपेक्षता दरअसल राजनीतिक और सामाजिक शक्ति-संतुलन को पूरी तरह समानता के सिद्धांत के सहारे बदल देना चाहती थी.

6 COMMENTS

  1. aap kamaal ke writter hai sahab, aapne aaj ki tulna gandhi ji ke jamane se kar dee. had hai sir, salaam hai aapko, hinduo ko gart mein daalne ki ek mandali banani chahiye aur aapko uska president. भारत को प्रतीकात्मक तरीके से भी हिंदू दिखना नहीं चाहिए. toh kya dikhna chahiye?

  2. ये अचानक आज ही नही गुजरने लगा। गुजर तो जाने कब से रहा है बस ये है जो घोषित बुद्धिजीवी थे वो
    देश को अभी तक
    भरमाए हुए थे सब सही सब ठीक बता समय खराब कर रहे थे आज केवल ये हुआ है की अब ये आंच उन
    बुद्धिजीवियो के दामन तक
    पहुच गयी है।। वैसे हकीकत बोलू तो अंदर ही अंदर इस आग से मैं बहुत ही खुश हूँ।। और अब इन्तजार
    मीडिया मीडियाकर्मी
    और मीडिया चैनल्स तक इस आग के पहुचने का कर रहा हूँ। वैसे तो
    जिस प्रकार ये सरकार, विरोध की हर आवाज़ को दबा रही है उससे एक बात तो साफ़ है की यदि इस
    सरकार के खिलाफ
    कभी जनता सड़क पर आई तो जंतर-मन्त्र या रामलीला मैदान जाने से पहले एयरपोर्ट जायेगि ये
    सुनिश्चित करने की कोई
    जहाज न उड़ने पाए.. और आंदोलन मे ज्यादा हादिक ही होंगे। जाने क्यों जब से ये सरकार अपने आस्तित्व मे
    आई तभी से ऐसा लगने लगा था की ये सरकार अपना कार्यकाल
    पूरा नही कर सकती और ये 3-4 साल से ज्यादा सत्ता नही सम्भाल पाएगी और ये जिक्र मैंने फेसबुक को
    माध्यम बना
    भी बोला और कई मित्रो की पोस्ट पर भी बोला लेकिन अभी 18 महीनो मे देश की जो हालत हो रही है
    विरोध के जो स्वर
    हावी हो रहे है +जिस प्रकार सरकार इस विरोध को हैंडल कर रही है उससे साफ़ होता है की ये सरकार
    के पास 3-4 साल
    भी नही ये जल्द गिरेगी और वो भी बहुत जल्द।।।

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