आत्महत्या का अनुबंध

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फोटोः विजय पांडेय

‘नरेंद्र मोदी दुर्योधन की तरह व्यवहार क्यों कर रहे हैं?’  इस साल  मार्च में उत्तर प्रदेश के मथुरा के नजदीक स्थित एक गांव के दौरे पर गए सामाजिक कार्यकर्ताओं से वहां के किसानों ने यह प्रतिक्रिया जाहिर की. मार्च में असमय हुई बारिश की वजह से गांव के किसानों की फसल खराब हो गई थी. इलाके के किसानों ने ‘अच्छे दिन’ की उम्मीद में मोदी को बढ़-चढ़कर वोट दिया था लेकिन उनके द्वारा यूपीए सरकार के भूमि अधिग्रहण विधेयक में संशोधन करने पर इनमें रोष व्याप्त हो गया. किसानों को इस डर ने घेर लिया कि नए विधेयक में किसानों की अनुमति को अप्रासंगिक बना देने से बड़ी कंपनियां आसानी से उनकी जमीन पर कब्जा जमा लेंगी. ‘भूमि अधिग्रहण न्यायपरक क्षतिपूर्ति रकम व पारदर्शिता, पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिकार अधिनियम’ में भूमि अधिग्रहण के लिए किसानों के ‘न’ कहने का अधिकार महत्वपूर्ण था. अधिनियम के इस स्वरूप को किसानों और आदिवासियों ने लंबी लड़ाई के बाद पाया था.

धलगढ़ी नाम के इस गांव में किसान और मजदूर आंदोलनों से जुड़े संगठन ‘भूमि अधिकार आंदोलन’ के कार्यकर्ता मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण बिल का पुरजोर विरोध करते रहे हैं. उनका कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी किसानों की नहीं सुन रहे हैं, ऐसे में अपनी जमीन बचाने के लिए किसानों को आज के युग के महाभारत के लिए तैयार हो जाना चाहिए.

पौराणिक महाभारत तब शुरू हुई थी, जब कौरवों ने पांडवों को सुई की नोंक के बराबर जमीन देने से भी इंकार कर दिया था. दुर्योधन का अहंकार उस समय इतना था कि उस समय वह पांडवों की मामूली मांग को मानने के लिए भी तैयार नहीं था. पांडव राज्य पर बराबर की हिस्सेदारी को त्यागने के एवज में केवल पांच गांव चाहते थे. संघर्ष कर रहे कार्यकर्ताओं का कहना है कि महाभारत से मिलता जुलता विवाद 21वीं सदी में दोहराया जा रहा है. जमीन से बेदखली के डर ने देशभर के किसानों को मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण विधेयक के विरूद्ध एक कर दिया था. जिसके बाद सरकार को अपना विधेयक रोकना पड़ा. फिर पूर्व की संप्रग सरकार के विधेयक में कुछ संशोधन करके उसे ही पारित किया गया.

भारत में इस वर्ष रबड़ उत्पादन करने वाले राज्यों में किसानों ने सबसे अधिक आत्महत्या की है. ऐसा तब है जब भारत की सबसे बड़ी टायर कंपनी एमआरएफ ने इस वर्ष अप्रैल-जून की तिमाही में अपने कुल मुनाफे में 94 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है

बहरहाल जीत की यह खुशी बहुत देर तक नहीं बनी रह सकी. जमीन से बेदखली की आशंका ने फिर से सिर उठा लिया है. अब यह खबर सामने आई है कि खेती, पौधरोपण और पशुपालन उन 15 सेक्टरों में शामिल हैं, जिनमें 100 प्रतिशत विदेशी निवेश (एफडीआई) की अनुमति दी गई है. बिहार चुनाव हारने के तुरंत बाद सरकार ने यह घोषणा की. ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम सुशासन’ की अपनी प्रतिबद्धता को रेखांकित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट किया, ‘एफडीआई संबंधी सुधारों के लिए हमारी सरकार की प्रतिबद्धता स्पष्ट और अटल है.’

सभी इलाकों के सभी तरह के विचारधारात्मक झुकावों वाले विभिन्न किसान संगठन इस बारे में चौकन्ने हो गए हैं. संघर्षरत कार्यकर्ताओं ने इसे ‘लाभ के लिए बहुराष्ट्रीय पूंजी का संस्थागत प्रवेश’ कहा है जो मुनाफे के लिए लालायित है. आरएसएस से जुड़े भारतीय किसान संघ के महासचिव प्रभाकर केलकर का कहना है, ‘अगर कृषि में प्रत्यक्ष एफडीआई को किसानों की जमीन छीनने के लिए शॉर्टकट के तौर पर इस्तेमाल किया गया तो हम इसके खिलाफ लड़ाई में एड़ी-चोटी का जोर लगा देंगे.’

लेकिन भूमि अधिग्रहण के लिए हिंसात्मक रास्ता अपनाया जाएगा, इसकी संभावना कम ही है, क्योंकि अतीत में सत्ताधारी दलों को इसकी बड़ी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ी है. ऐसे में सरकार को कुछ ऐसे रास्ते ढूंढने होंगे जो प्रत्यक्ष तौर पर उतने दमनकारी न दिखाई दें. अखिल भारतीय किसान सभा के पी. कृष्णप्रसाद का कहना है, ‘कृषि में प्रत्यक्ष एफडीआई असल जमीन पर कैसे काम करेगा अभी तक इस बारे में बहुत कम ब्यौरा दिया है. लेकिन इस सरकार का पिछला ट्रैक रिकाॅर्ड तथा तीसरी दुनिया के देशों के इस क्षेत्र के अनुभवों को अगर देखा जाए तो हम पाते हैं कि कृषि में एफडीआई ने बड़े व्यवसायियों को फायदा पहुंचाया है तथा छोटे और मझोले किसानों की जीविका को नुकसान पहुंचाया है.’

क्या ये तथ्य मोदी के इस दावे के उलट नहीं हैं कि एफडीआई दुनिया भर में रोजगार और आमदनी बढ़ाने में सहायक रहा है. न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय से पंजाब की कॉरपोरेट खेती पर शोध कर रहीं रितिका श्रीमाली का कहना है, ‘एफडीआई भारतीय कृषि के कॉरपोरेटीकरण को बहुत तेजी से बढ़ा देगा. अनुबंध आधारित खेती को तेजी से संस्थागत रूप मिलेगा. अनुबंध आधारित खेती किसानों और कॉरपोरेट कंपनियों के बीच अनुबंध से कहीं बढ़कर है. ऐसी खेती करने वाली कंपनियां ही बीज, उर्वरक और कीटनाशक जैसे खेती में काम आने वाले उत्पाद भी बेचती हैं. इसी तरह वे किसानों से अपने उत्पाद खरीदते समय भी मुनाफा कमाती हैं. प्रत्यक्ष रूप से खेती में शामिल हुए बिना उत्पादों को खरीदने और बेचने की कीमतें कंपनियां ही तय करती हैं. इस तरह बिना कोई जोखिम उठाए ये कंपनियां नियमित रूप से अपना मुनाफा कमाती हैं.’