आईआरसीटीसी में शोषण का सिलसिला

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कौन

आईआरसीटीसी के कर्मचारी

कब

01 फरवरी, 2016

कहां

आईआरसीटीसी कार्यालय, नई दिल्ली

सावधान… 10 से 12 बजे के बीच शौच जाना मना है. अगर आप ऐसा करते पाई गईं तो नौकरी से हाथ भी धोना पड़ सकता है

आपने शायद ही कभी ऐसा अजीबोगरीब नियम देखा या सुना होगा. चलिए हम आपको इसके बारे में बताते हैं. बेहतर यात्री सेवाओं का दंभ भरने वाले रेल महकमे की एक शाखा के कर्मचारियों पर यह तुगलकी नियम लागू है. ये वे कर्मचारी हैं जिनके काम की बदौलत रेलवे बेहतर यात्री सुविधाओं का दावा करता है. यह फरमान इंडियन रेलवे कैटरिंग ऐंड टूरिज्म कॉरपोरेशन लिमिटेड (आईआरसीटीसी) की महिला कर्मचारियों पर लागू होता है, जिसके चलते पिछले दिनों तकरीबन सौ ठेका कर्मचारियों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है. आईआरसीटीसी के नई दिल्ली स्थित आईटी सेंटर की ई-टिकटिंग यूनिट में कस्टमर केयर सेंटर स्थापित है. यहां सुबह सात बजे से दोपहर तीन बजे तक की शिफ्ट महिला कर्मचारियों की है. इसी शिफ्ट में 10 से 12 बजे के बीच काम का सबसे अधिक दबाव रहता है क्योंकि यह तत्काल टिकट बुकिंग का समय होता है. इसी के चलते आईआरसीटीसी प्रबंधन ने एक नियम बना दिया कि इन दो घंटों के दौरान कॉलिंग पर तैनात कोई भी महिला कर्मचारी शौचालय नहीं जाएगी.

इस फरमान के चलते अपनी नौकरी गंवा चुकी अंजू साहनी बताती हैं, ‘पहले तो हम खुद ही इन स्थितियों से बचने की कोशिश करते थे, लेकिन धीरे-धीरे इसके प्रति प्रबंधन कड़ा होता गया. इमरजेंसी होने पर भी शौच नहीं जाने दिया जाता था, जिसके चलते कई लोगों को पेट से संबंधित बीमारियां भी हो गईं. इसकी शिकायत प्रबंधन से भी की गई पर कोई फायदा नहीं हुआ.’ प्रबंधन से अपनी समस्या का कोई समाधान न मिलते देख इन महिलाकर्मियों ने पिछले वर्ष सितंबर में दिल्ली महिला आयोग में शिकायत की. आयोग ने दिसंबर में प्रबंधन को नोटिस जारी किया. नोटिस में प्रबंधन से इस मामले में कार्रवाई करके रिपोर्ट आयोग को सौंपने का आदेश दिया गया. सीटू से संबद्ध दिल्ली ऑफिसेज एंड इस्टैब्लिशमेंट एम्प्लॉइज यूनियन के महासचिव व आईआरसीटीसी के इसी विभाग के पूर्व कर्मचारी सुरजीत श्यामल बताते हैं, ‘नोटिस से प्रबंधन तिलमिला उठा था. उसने शिकायत करने वाली व शिकायत को समर्थन देने वाले 92 कर्मचारियों को सेवामुक्त करने का फरमान सुना दिया.’

आईआरसीटीसी के आगे रोज धरना-प्रदर्शन करने वाले इन कर्मचारियों को 1 फरवरी से कार्यालय न आने की सूचना दी गई थी लेकिन वे प्रबंधन के इस आदेश को अनुचित मानते हुए रोज कार्यालय जाते हैं. उन्हें कार्यालय में प्रवेश नहीं करने दिया जाता. इसलिए वे सारा दिन कार्यालय के बाहर ही धरना देते हैं. एक कागज पर अपनी उपस्थिति लिखकर प्रबंधकों को भेज देते हैं. निष्कासितों में से एक प्रकाश जायसवाल बताते हैं, ‘अब तक हमें टर्मिनेशन लेटर नहीं मिला है. फिर हम कैसे मान लें कि हमारी नौकरी गई? इसलिए हम ऑफिस जाते हैं पर हमें अंदर प्रवेश करने नहीं दिया जाता. इसी कारण सभी एक कागज पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर प्रबंधन को भेज देते हैं.’ हालांकि प्रबंधन इन आरोपों से इनकार करता है. आईआरसीटीसी के जनसंपर्क अधिकारी संदीप दत्ता कहते हैं, ‘ये आरोप बेबुनियाद हैं. महिला कर्मचारियों के शौच जाने पर किसी भी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं है. यह बात सही है कि तत्काल बुकिंग के दौरान काम का दबाव अधिक होता है पर ऐसा कोई नियम हमने नहीं बनाया है. पहले भी ऐसी बातें उठती रही थीं इसलिए हमने ऑफिस में यह नोटिस चस्पा किया था कि कोई भी शौच न जाने के लिए बाध्य नहीं है.’

वहीं, नौकरी से निकाली गई महिलाकर्मियों का कहना है, ‘जब प्रबंधन के पास शिकायतें गईं तो उसने एक नया नियम बनाया. शौच जाने के लिए पुरुष सुपरवाइजर से इजाजत लेना अनिवार्य कर दिया. हमें उसे मिनटों में बताना होता था कि कितने मिनट के लिए हम शौचालय का उपयोग करेंगे. यह बहुत ही शर्मिंदगी भरा था कि हम एक पुरुष को बताएं कि क्या इमरजेंसी है जिसके चलते हम शौचालय जाना चाहते हैं और कितने मिनट के लिए जाना चाहते हैं.’  अंजू बताती हैं, ‘नोटिस चस्पा किया गया था पर वो सिर्फ खानापूरी के लिए था. जब भी हम शौचालय जाने की अनुमति मांगते तो कहा जाता कि एक समय में एक ही व्यक्ति शौच जा सकता है. अभी कोई और गया है, जब वो आ जाएगा तब आपको अनुमति मिलेगी.’

IRCTC Protest Swati Maliwal copyआईआरसीटीसी से संबंधित तीन शिकायतें हमारे पास आई थीं. इन तीनों मामलों में से पहले दो मामले मानसिक प्रताड़ना और यौन शोषण से संबंधित थे. इन दोनों पर ही हमें जितना अधिकार था वो हरसंभव कार्रवाई हमने की. आईआरसीटीसी में एक शिकायत समिति का गठन कराया. इसके बाद भी अगर उन्हें कोई समस्या थी तो उन्हें वापस हमारे पास आना चाहिए था

स्वाति मालीवाल, अध्यक्ष, दिल्ली महिला आयोग

अनामिका रंजन को जुलाई 2015 में अपनी नौकरी गंवानी पड़ी. हालांकि उन्हें निकालने के पीछे का कारण कुछ और रहा लेकिन उनके साथ पांच और कर्मचारी निकाले गए थे, जिनमें से एक सोनिका सिंह भी थीं. अनामिका बताती हैं, ‘सोनिका हमारी टीम लीडर थीं. महिलाओं के लिए कभी-कभी शौचालय जाना कितना जरूरी होता है, वे यह समझती थीं. इसलिए कभी किसी को नहीं रोका करती थीं. इसकी भनक प्रबंधन को लग गई. एक दिन ग्रुप जनरल मैनेजर (जीजीएम) सुनील कुमार ने उन्हें बुलाकर खूब फटकार लगाई. उन्हें डिमोट करके इसकी सजा भी दी गई. कुछ दिन बाद उन्हें नौकरी से बाहर कर दिया गया.’ अंजू बताती हैं, ‘हेड सुपरवाइजर ममता शर्मा थीं. एक बार मैंने उनसे कहा कि यह नियम गलत है. आपके पास काम ज्यादा है तो आप स्टाफ क्यों नहीं बढ़ाते तो उन्होंने कहा कि दो घंटे कोई भी रोक सकता है. मर तो नहीं जाओगी. जाना है तो दस बजे से पहले जाओ या फिर बारह बजे के बाद.’ एक महिला होकर भी ममता शर्मा ने जो जवाब दिया वह अंजू के लिए चौंकाने वाला था.

महिलाएं भद्दी टिप्पणियां सुनने को मजबूर

कृष्णा दास 2008 से यहां काम कर रही थीं. इस बीच उनकी शादी हुई. वे बताती हैं, ‘यह भारत सरकार का मिनी रत्न उपक्रम है. पर यहां न तो कर्मचारियों के लिए मेडिकल की सुविधा है. न महिलाओं के लिए कोई विश्राम गृह है. आप अगर गर्भवती हो तो आप थोड़ा आराम भी नहीं कर सकतीं. महिलाओं के साथ वरिष्ठ पुरुष कर्मचारी आए दिन दुर्व्यवहार करते हैं, उन्हें अपशब्द कहे जाते हैं. कोई आंतरिक महिला शिकायत निवारण समिति नहीं है, जहां इसकी शिकायत कर सकें. मजबूरन हमें जानबूझकर सब अनदेखा करना पड़ता है.’ वे आगे कहती हैं, ‘मेरा ऑफिस मेट्रो स्टेशन से लगभग आधे घंटे की दूरी पर है. जब मैं मां बनने वाली थी तो कभी-कभी ऑफिस पहुंचने में देर हो जाया करती थी. तब वे लोग मेरी समस्या सुनने के बजाय मुझे बुरा-भला कहकर घर वापस भेज देते थे और मुझे अनुपस्थित कर देते थे.’  अनामिका को भी अपनी नौकरी गंवाने से पहले यहां यौन प्रताड़ता का शिकार होना पड़ा था. इसकी शिकायत उन्होंने प्रबंधन से भी की थी. जब बात नहीं बनी तो उन्होंने दिल्ली महिला आयोग में शिकायत कर दी. वे बताती हैं, ‘समान काम, समान वेतन’ की मांग के चलते मेरे पति को नौकरी गंवानी पड़ी. वे प्रबंधन के इस फैसले के खिलाफ अदालत में गए. प्रबंधन को यह रास नहीं आया. वे मुकदमा वापस ले लें इसलिए उन पर दबाव बनाने के लिए मुझे निशाना बनाया जाने लगा. दूसरे कर्मचारियों का बचा हुआ काम भी मुझसे कराया जाता था. पुरुष सहकर्मियों से मुझे अपशब्द कहलवाए जाते थे. इसकी शिकायत की तो जीजीएम सुनील कुमार ने मुझे बुलाकर धमकाया कि मैं अपने पति पर दबाव डालूं कि वे केस वापस लें, वरना यह सब होता रहेगा. इसके बावजूद मैं वहां काम करती रही तो सिर्फ अपनी चार साल की बेटी के लिए. क्योंकि पति की नौकरी पहले ही छूट गई थी. अपनी बेटी का भविष्य बनाना अब मेरे ही हाथ था.’ आगे वे बताती हैं, ‘सात महीने तक मैंने यह प्रताड़ना सही. मुझे अपशब्द कहने वाले दो पुरुष कर्मचारी कहा करते थे कि हमारे ऊपर प्रबंधन का हाथ है. जब तक प्रबंधन साथ है, तू हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती.’ अनामिका के अनुसार उनकी यह बात सही साबित भी हुई. वे कहती हैं, ‘जब इतनी प्रताड़ना के बाद भी मैंने नौकरी नहीं छोड़ी तो उन्होंने मुझे निकाल बाहर किया. पर वे दोनों पुरुषकर्मी वहीं जमे रहे. वहां महिलाओं के लिए कोई अलग से शिकायत करने की समिति नहीं है इसलिए मैंने अपनी पीड़ा दिल्ली महिला आयोग को बताई.’

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