उत्तराखंड: अनर्थ को आमंत्रण

उच्च हिमालय पर रहने वाले इन प्राणियों की वहां उपस्थिति केवल सजावट के लिए नहीं है. वहां वृक्ष तथा वनस्पतियों, नदियों, झरनों और ग्लेशियरों का अस्तित्व उन्हीं से है. एक छोटी-सी चिड़िया अपने जीवन काल में कितने महावृक्षों को जन्म देती है, जिनके कारण नदियां अखंड सौभाग्यवती हैं, यह अपने कौतूहल में उन्मत्त धर्मध्वजियों को कौन समझाए. इसी यात्रा पथ पर, सोलह हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित रूप कुंड सरोवर के तट पर पड़े मानव कंकालों का सटीक रहस्य आज भी पता नहीं चल सका है. सच्चाई के सर्वाधिक निकट यही तथ्य प्रतीत होता है कि उत्तर मध्य युग में कभी तिब्बत की ओर विजय यात्रा पर जाने या वहां से इस ओर आने वाली कोई सैन्य वाहिनी यहां बर्फ के अंधड़ में फंसकर काल कलवित हो गई. आज हम इस यात्रा के रूप में वस्तुतः प्रकृति के विरुद्ध युद्ध छेड़ने वहां जा रहे हैं जिसमें अंतिम और निर्णायक हार हमारी ही होनी है. आठ हजार फीट से ऊपर की ऊंचाई पर नर्म घास और फूलों के ढालदार मैदान जिन्हें स्थानीय भाषा में बुग्याल और अंग्रेजी में अल्पाइन कहा जाता है, इस बार हजारों लोगों की धमाचौकड़ी के फलस्वरूप मिनटों में रेगिस्तान में तब्दील हो गए. ये बुग्याल वस्तुतः यहां धरती की त्वचा हैं, जिन्हें पुनर्जीवित होने में वर्षों लगेंगे और शायद वे अपने वास्तविक स्वरूप में कभी आ भी न पाएं. तब तक केदारनाथ और जम्मू-कश्मीर जैसी विपत्तियों को झेलने के लिए हमें प्रस्तुत रहना चाहिए.

धार्मिक यात्रा के नाम पर यह अंधाधुंध पर्यावरण नाश रोकने के लिए दृढ इच्छा शक्ति और राजनीतिक जोखिम उठाने का साहस चाहिए, जो फिलहाल यहां के राजनेताओं में नजर नहीं आता. यह यात्रा अपनी निर्धारित अवधि के अनुसार गत वर्ष होनी थी, लेकिन केदारनाथ की भीषण आपदा ने सरकार और आयोजकों, दोनों के होश फाख्ता कर दिए. वरना गत वर्ष भी राज्य सरकार ने वाह-वाही और वोट बैंक लूटने के लिए इस आयोजन के लिए अच्छी खासी रकम नियत की थी. इस बार साल बीतते न बीतते सभी पक्ष पिछली आपदा भूल गए. इस बार की यात्रा में कांग्रेस और भाजपा दोनों के प्रमुख नेता जहां-तहां यात्रा में शामिल हुए. लेकिन यह परिवर्तन अवश्य दिखा कि यात्रा में शामिल आम लोगों और राजनेताओं, सभी ने पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों पर भी चिंता जताई. मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भले ही यात्रा को समर्थन और सरकारी संरक्षण दिया, पर अंततः लोगों से अति संवेदनशील क्षेत्र में न जाने की अपील भी की. विडंबना यह है कि यात्रा में शामिल श्रद्धालु वहां अपने लिए हर तरह की सुविधा मांगने लगे हैं. अर्थात तम्बू से लेकर चूल्हा तक. जनबल से सहमी सरकार ने कुछ हद तक यह किया भी. सरकारी तौर पर भारी तादाद में जगह जगह तम्बू गाड़े गए, बगैर यह सोचे कि उन्हें गाड़ने के लिए जो जमीन खुर्ची जाएगी और उनके तले कई दिन तक वहां की संवेदनशील भूमि का जो दम घुटेगा, उसके नतीजे क्या होंगे. इस बार पर्यावरण को लेकर आई लोक चेतना का ही सबूत है कि वहां होने वाले प्रकृति विध्वंस के चित्र और विवरण वहां से लौटने वाले श्रद्धालुओं ने ही सार्वजनिक किए. उनसे ही पता चला कि यात्रा मार्ग पर यहां-वहां प्लास्टिक की बोतलों के अंबार ने नर्म घास और फूलों का कबाड़ा कर दिया है. आखिर किसी को इतनी अक्ल भी नहीं आई कि वहां कम से कम मिनरल वाटर की बोतलें ले जाने से तो लोगों को रोका जाता. उस क्षेत्र में हर झरने का पानी उच्च गुणवत्ता वाला प्राकृतिक मिनरल वाटर ही है. लेकिन बहती गंगा को छोड़ कूप में नहाने वालों का क्या इलाज?

दरअसल उत्तराखंड में बीते 13 वर्षों से लचर नेतृत्व के कारण नौकरशाही के लिए आपदा और उत्सव दोनों ही सुखद हैं. इनसे उनकी जेब हरी होती है. बड़ी उम्मीदों और वादों के हिंडोले पर बैठ कर आए नए मुख्यमंत्री हरीश रावत भी यह सब न रोक पाए तो माना जाना चाहिए कि नदियों और गाड-गदेरों (लघु-सरिताएं) की बात वह भी सिर्फ कहने भर को ही करते हैं.

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