इंटरनेट बिन सून

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मनोचिकित्सकों की माने तो सोशल मीडिया से जुड़ाव के कारण लोग निजी और सार्वजनिक जीवन में फर्क करना भी भूल गए हैं.
मनोचिकित्सकों की माने तो सोशल मीडिया से जुड़ाव के कारण लोग निजी और सार्वजनिक जीवन में फर्क करना भी भूल गए हैं.

30 साल के रितेश दिल्ली में रहते हैं और एक निजी कंपनी में अकाउंटेंट हैं. इनके पास स्मार्ट फोन है जो कि हाई स्पीड इंटरनेट से जुड़ा हुआ है. रितेश के दिन की शुरुआत स्मार्ट फोन पर मैसेज पढ़ने से होती है फिर वह फेसबुक पर नए अपडेट देखते हैं. ट्वीटर के ट्रेंडिंग टॉपिक्स पर भी नजर मारते हैं. इसके बाद वाट्स अप या दूसरे किसी चैटिंग ऐप के जरिए अपने दोस्तों से हाय-हैलो करते हैं. इसके बाद वह जल्दी से तैयार होकर अपने दफ्तर के लिए निकल जाते हैं. रितेश अपने दफ्तर तक की दूरी अमूमन मैट्रो या ऑटो से तय करते हैं और इस दौरान भी वह अपने मोबाईल पर व्यस्त रहते हैं. दफ्तर के काम से जब भी उन्हें थोड़ी फुर्सत मिलती है तो वह फिर से एक बार अपने मोबाईल या सिस्टम की मदद से सोशल मीडिया की दुनिया में दाखिल हो जाते हैं. रात में देर रात तक ऑनलाइन रहते हैं.  सोने से पहले रितेश अपना मोबाईल अपने बगल में ही रखकर सोते हैं. अगर मोबाईल उनसे दूर रहे तो उन्हें नींद आने में दिक्कत होती है.

बंगलुरू में रहनेवाले राहुल खन्ना और उनकी पत्नी अपने 18 वर्षीय बेटे को लेकर थोेड़ा परेशान हैं. इनका बेटा आजकल इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर हद से ज्यादा समय बिता रहा है. इस वजह से वह पढ़ाई में लगातार पीछे होता जा रहा है. सुबह नाश्ते की टेबल से लेकर रात में सोने के बिस्तर तक वो अपने फोन और लैपटॉप की मदद से इंटरनेट की दुनिया में रहता है. बेटे की इस आदत को रोकने की मंशा से एक दिन खन्ना दंपति ने घर का वाईफाई बंद कर दिया और उसे बताया कि वाईफाई खराब हो गया है. इसके बाद उनका बेटा उदास हो गया और दिन भर अपने कमरे में पड़ा रहा. राहुल अपने बेटे की एक मनोचिकित्सक से कांउसलिंग करवा रहे हैं.

यह घटना पिछले साल अक्टूबर की है. महाराष्ट्र के परभानी में रहनेवाली और कॉलेज में पढ़नेवाली एक लड़की ने आत्महत्या कर ली. लड़की अपने माता-पिता के साथ रहती थी. मरने से पहले उसने एक छोटा-सा सुसाईड नोट लिखा था जिसमे उसने इस बात का जिक्र किया था कि उसके माता-पिता उसे फेसबुक के इस्तेमाल से रोकते थे और इसी वजह से वो आत्महत्या कर रही है. लड़की ने अपने सुसाईड नोट में लिखा था, ‘क्या फेसबुक इतना खराब है? मैं इस तरह की पाबंदियों के साथ घर में नहीं रह सकती क्योंकि मैं फेसबुक के बिना जिंदा नहीं रह सकती हूं.’

जून 2013 में मुंबई की लोकल ट्रेन से एक 16 वर्षीय छात्रा गिर गई जिससे उसकी मौत हो गई. बताया गया कि गेट के पास खड़े होकर वो अपने मोबाईल में व्यस्त थी.

मई 2014 गुड़गांव में 12वीं की एक छात्रा ने इस वजह से आत्महत्या कर ली क्योंकि उसकी स्कूल टीचर ने उसे क्लास में बैठकर फेसबुक इस्तेमाल करते हुए पकड़ लिया था और आगे से ऐसा न करने की हिदायत दी थी.

ये पांचो मामले लगातार बदल रहे भारत की तस्वीर हैं और एक बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व भी करते हैं. इनकी ठीक-ठीक संख्या किसी को नहीं मालूम लेकिन देश के डॉक्टर इन्हें बीमार मानते हैं. मनोचिकित्सकों के मुताबिक ऐसी समस्या से जूझ रहे लोगों को असल में इंटरनेट की लत पड़ चुकी है और यह लत इन ‘बीमारों’ के लिए उतनी ही खतरनाक है जितनी कि शराब, बीड़ी या सिगरेट की लत. मोबाईल एसोसिएशन ऑफ इंडिया और आई.एम.आर.बी इंटरनेशनल ने मिलकर ‘भारत में इंटरनेट-2014’ के नाम से एक सर्वेक्षण किया है. इस सर्वे के मुताबिक फिलहाल देश में करीब तीस करोड़ लोगों तक इंटरनेट की पहुंच है. इसी रिपोर्ट से यह जानकारी भी मिलती है कि शहरी इलाकों में इंटरनेट का इस्तेमाल करनेवालों में से 93 फीसदी लोगों के लिए इंटरनेट पर सबसे पहली जरूरत चैटिंग करना, सर्च करना और सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना है.

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