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तल में लोकदल

सजायाफ्ता शीर्ष नेतृत्व और लगातार मिल रही चुनावी मात के बाद हरियाणा की राजनीति में इंडियन नेशनल लोकदल का भविष्य क्या है?
2015-01-31 , Issue 2 Volume 7
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फोटोः विजय पांडेय

किसी भी राजनीतिक दल, खासतौर पर क्षेत्रीय दल, के जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं. कई राज्यों में एक दल का आना और दूसरे का जाना बारी-बारी से चलता रहा है. केरल में कभी एलडीएफ, तो कभी यूडीएफ की सरकार आती रहती है. तमिलनाडु में कभी करुणानिधि, तो कभी जयललिता सत्ता में आते-जाते रहते हैं. लेकिन राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से सटे हरियाणा की क्षेत्रीय पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल पिछले 10 सालों से सत्ता से बाहर है और अपने सबसे कठिन दौर  से गुजर रही है.

साल 2014 के विधानसभा चुनाव में इसे 19 सीटें जरूर मिली हैं, लेकिन इसके वोटों में कमी का क्रम लगातार जारी है. यह लगातार चौथा ऐसा विधानसभा चुनाव है जिसमें पार्टी के वोटों में कमी आई है. ऐसे में राजनीतिक प्रेक्षकों का कहना है कि पार्टी इस समय अपना अस्तित्व कायम रखने के लिए संघर्ष कर रही है. पार्टी के अध्यक्ष ओम प्रकाश चौटाला तथा उनके बेटे अजय सिंह चौटाला शिक्षक भर्ती घोटाले के आरोप में दस साल की सजा काट रहे हैं. इसके अलावा उन पर आय से अधिक संपत्ति रखने के आरोप में मुकदमा भी चल रहा है.

ओम प्रकाश चौटाला और अजय चौटाला के जेल में होने की वजह से पार्टी की कमान इस समय ओम प्रकाश चौटाला के बेटे अभय चौटाला एवं अजय चौटाला के सांसद पुत्र दुष्यंत चौटाला के हाथों में है. चुनावों में पार्टी की हार के मद्देनजर पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अशोक अरोड़ा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था, लेकिन उसे पार्टी ने मंजूर नहीं किया था. अब पार्टी की उम्मीदें सीबीआई अदालत द्वारा ओम प्रकाश चौटाला तथा अजय चौटाला को शिक्षक भर्ती घोटाले में मिली दस साल की सजा के फैसले के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में की गई अपील के फैसले पर लगी हैं. सुनवाई पूरी हो चुकी है और अदालत ने फैसला सुरक्षित रखा है. चौटाला का कहना है कि उन्हें न्यायपालिका पर पूरा विश्वास है. पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आरएस चौधरी का कहना है कि अदालत के फैसले से दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा.

हालांकि ओम प्रकाश चौटाला आरोप लगा चुके हैं कि हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने सीबीआई से मिलकर साजिश करके उन्हें इस मामले में फंसाया था. अपने आरोप को सच साबित करने के लिए वह आम आदमी पार्टी के नेता प्रशांत भूषण द्वारा जारी उस डायरी का हवाला देते हैं, जिसमें हुड्डा की सीबीआई के तत्कालीन निदेशक रंजीत सिन्हा से कई बार हुई मुलाकातों का उल्लेख है.

साल 2014 के विधानसभा चुनाव में इसे 19 सीटें जरूर मिली हैं, लेकिन इसके वोटों के प्रतिशत में गिरावट का क्रम लगातार जारी है

हालांकि 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा और इनेलो के बीच तालमेल  की बात भी चली थी, लेकिन मुख्यतः चौटाला को सजा होने के चलते यह बातचीत सिरे नहीं चढ़ पाई थी. चुनाव के दौरान शुरू में इनेलो उम्मीदवारों ने नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट भी मांगे थे. चुनाव प्रचार के दौरान वे कहते रहे कि उनका वोट मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के काम आएगा. लेकिन मतदान से पहले मोदी ने अपनी जनसभा में कह दिया कि मतदाता उनके नाम पर वोट मांगनेवालों से सावधान रहें. लेकिन फिर भी सिरसा और हिसार लोकसभा सीटों से इनेलो के उम्मीदवार जीत गए.

वैसे चौटाला के समर्थकों के साथ ही साथ उनके कट्टर विरोधी भी उनकी इच्छाशक्ति की दाद जरूर देते हैं. दस साल की सजा मिलने और अस्सी साल की उम्र पार करने के बावजूद उनका मनोबल नहीं डिगा है. विधानसभा चुनाव के दौरान जेल से जमानत पर रिहा हुए चौटाला ने अपनी पार्टी के उम्मीदवारों के लिए कई जगहों पर सभाएं कीं. इस पर जब सीबीआई ने उनकी जमानत रद्द करने के लिए अदालत में याचिका डाली, तो चौटाला ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ही आरोप लगा दिया कि उन्हें सत्ता में आने से रोकने के लिए उनके इशारे पर एजेंसी ने यह कार्रवाई की है. उस दौरान उनके इस बयान पर काफी प्रतिक्रिया हुई थी, जब उन्होंने कहा था कि वह मुख्यमंत्री पद की शपथ तिहाड़ जेल से ही लेंगे.

पार्टी को उम्मीद है कि इस मामले में अदालत से बरी होने के बाद कार्यकर्ताओं में नया जोश पैदा होगा. फिलहाल तो अभय चौटाला, अशोक अरोड़ा और दुष्यंत चौटाला अलग-अलग पार्टी के कार्यकर्ताओं की बैठकें करके उनका मनोबल बनाए रखने में जुटे हुए हैं. इनेलो नेतृत्व अपनी रणनीति के तहत भाजपा द्वारा विधानसभा चुनाव के दौरान किए गए वायदे पूरे न करने को लेकर सरकार के खिलाफ बयानबाजी कर रहा है. दुष्यंत चौटाला का कहना है कि पार्टी ने स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करवाने का वायदा किया था, जो पूरा नहीं किया. पंजाब के कर्मचारियों के बराबर वेतनमान देने सहित कई अन्य मामलों पर पार्टी मनोहर सरकार को कटघरे में खड़ा कर रही है. हालांकि पार्टी अभी भाजपा के नेतृत्ववाली सरकार के खिलाफ कोई आंदोलन अभी तक नहीं चला पाई है, वैसे भी सरकार को बने अभी करीब ढाई महीने ही हुए हैं और सरकार ने ऐसा कोई जनविरोधी निर्णय भी नहीं लिया है जिसे लेकर कोई आंदोलन खड़ा किया जाता.

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उधर अभय चौटाला कह रहे हैं कि उनकी पार्टी प्रदेश में मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाएगी. डेरा सच्चा सौदा द्वारा भाजपा को समर्थन देने और कांग्रेस द्वारा उन्हें सत्ता में आने से रोकने के लिए अंदरखाने भाजपा को समर्थन देने को वह पार्टी की हार की अहम वजह मान रहे हैं. अभय चौटाला प्रदेश में खाद की कमी को लेकर भी सरकार को आड़े हाथों ले रहे हैं. अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न देने के मामले पर पहले तो अभय चौटाला ने सरकार पर इस सम्मान का भगवाकरण करने का आरोप लगाते हुए कह दिया कि वाजपेयी का देश को आजाद करवाने में कोई योगदान नहीं था, लेकिन बाद में मुख्यमंत्री मनोहर लाल से मिलने के बाद उन्होंने अपना स्टैंड बदल लिया. इस बीच अशोक अरोड़ा ने मनोहर लाल को अनुभवहीन मुख्यमंत्री बताते हुए यहां तक कह दिया कि मुख्यमंत्री को तो प्रदेश के पचास गांवों के नाम तक नहीं पता.

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(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 7 Issue 2, Dated 31 January 2015)

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