उद्योग से मरता जीवन | Tehelka Hindi

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उद्योग से मरता जीवन

जमशेदपुर में टाटा के थर्मल पावर प्लांट और टाटा स्टील से निकल रहे कचरे से इस औद्योगिक नगर के आसपास के इलाकों की खेती योग्य जमीन बंजर हो रही है

Agriculture landjjjj

फोटोः मनप्रीत सिंह

तेज आर्थिक विकास का सबसे ज्यादा नुकसान पर्यावरण को उठाना पड़ता है और प्रदूषण के रूप में इसके खतरे लोगों को झेलने पड़ते हैं. जमशेदपुर के लोगों के साथ भी ऐसा ही हो रहा है. विकास के नाम पर सालों पहले इस शहर को कल-कारखानों से पाट दिया गया और अब इनसे निकल रहा कचरा उनके स्वास्थ्य से लेकर उनकी खेती-किसानी पर बुरे असर छोड़ रहा है.

जमशेदपुर में टाटा पावर लिमिटेड के जोजोबेड़ा थर्मल पावर प्लांट और टाटा स्टील से रोजाना निकलने वाले हजारों टन राख और स्लैग (धातुमल) से शहर और आसपास की खेती योग्य जमीन बंजर होने लगी है. जल, जमीन और हवा प्रदूषण की चपेट में है. इसका सीधा असर पर्यावरण संतुलन और किसानों की कमाई पर पड़ा है. साथ ही लोगों को दमा जैसी बीमारियों से भी जूझना पड़ रहा है.

जोजोबेड़ा थर्मल पावर प्लांट से रोजाना लगभग 2,500 टन राख निकलती है, जिसे जमशेदपुर शहर के बाहरी इलाकों और इसके आसपास के गांवों में खपाया जाता है. कंपनी ठेकेदारों की मदद से राख और स्लैग से गांवों को पाट रही है. जमशेदपुर के बाहरी इलाके सुंदर नगर के हितकू गांव निवासी सोमनाथ सिंह की केडो गांव में जमीन है. इस जमीन पर हजारों टन राख गिराई गई है. इसके मुआवजे के नाम पर ठेकेदार ने कुछ रकम सोमनाथ को दी और कुछ बकाया कर दिया. इसके बाद सोमनाथ ने अपनी जमीन पर राख गिरवाना ही बंद करा दिया. उस राख को दबाने के लिए उपर से मिट्टी की परत भी डाली गई. अब इस जमीन में बड़ी-बड़ी दरारें पड़ गई हैं. बारिश के बाद यह राख पानी के साथ आसपास के खेतों में फैल गई और कुछ हिस्सा पास के पहाड़ी नाले ‘लेदाघड़ा’ में बह गया. नाले से होकर राख जहां-जहां फैली वहां के खेत अब बंजर हो गए हैं. इन खेतों में एक समय जहां भरपूर अनाज उपजता था वहीं अब सिर्फ कुछ खरपतवार उगे हुए नजर आते हैं. केडो गांव के निवासी दारा साहू बताते हैं, ‘जब से राख गिराई गई है, तब से आसपास के गांववालों का जीना हराम हो गया है. यहां के ग्रामीण परेशान हैं. वे लेदाघड़ा में स्नान करते थे, जानवरों को पानी पिलाते थे और खेतों को सींचते थे, मगर नाले में राख आने से पानी गंदा हो गया है और उसका बहाव भी कम हो गया है.’

स्लैगयुक्त पानी की चपेट में आकर फसल खराब हो रही है और मछली व अन्य जलीय जीव-जंतुओं की भी मौत हो रही है. इस वजह से दलमा के पारिस्थितिकी तंत्र पर भी खतरा मंडराने लगा है. वहीं पानी के संपर्क में आने वालों को त्वचा संबंधी रोग भी हो रहे हैं

इस तरह गर्मी के दिनों में जमीन में दबी राख हवा के साथ पूरे गांव को अपने कब्जे में लिए रहती है.  इसी तरह टाटा स्टील से निकलने वाले स्लैग को गड्ढा भरने के नाम पर जहां-तहां फेंका जा रहा है. विशेषज्ञ बताते हैं कि इस स्लैग में सल्फर की भारी मात्रा रहती है, जो बारिश के पानी में घुलकर नदी, तालाब आदि के पानी को प्रदूषित कर देती है. फिर इस पानी को न तो पिया जा सकता है और न ही यह खेती करने योग्य होता है. पूर्वी सिंहभूम के सिविल सर्जन डॉ. श्याम कुमार झा बताते हैं, ‘विभिन्न उद्योगों के कारण प्रदूषण बढ़ा है. लोग अनेकों बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं. उनमें सबसे अधिक संख्या दमा के रोगियों की है. प्रदूषण की चपेट में मनुष्य के साथ जानवर भी हैं.’ टाटा कंपनी पर्यावरण नियमों की अनदेखी कर जहरीले सल्फरयुक्त स्लैग परिष्कृत किए बगैर जमशेदपुर के लगभग 40 किलोमीटर के दायरे में गिरवा रही है. इतना ही नहीं पूर्वी एशिया में हाथियों के सबसे बड़े अभ्यारण्य दलमा के इको सेंसिटिव जोन की भी अनदेखी की जा रही है, जो इसकी चपेट में है. स्लैगयुक्त पानी की चपेट में आकर फसल खराब हो रही है और मछली व अन्य जलीय जीव-जंतुओं की भी मौत हो रही है. इस वजह से दलमा के पारिस्थितिकी तंत्र पर भी खतरा मंडराने लगा है. वहीं पानी के संपर्क में आने वालों को त्वचा संबंधी रोग भी हो रहे हैं.

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