‘मैं लेखक बनना चाहता था, लेकिन सिर्फ यह खत लिख सका’ | Tehelka Hindi

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‘मैं लेखक बनना चाहता था, लेकिन सिर्फ यह खत लिख सका’

रोहित वेमुला ने रविवार रात अपनी जिंदगी का सफर खत्म कर दिया. रोहित हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के उन पांच दलित छात्रों में से एक थे जिन्हें विश्वविद्यालय प्रबंधन ने पिछले दिनों निष्कासित कर दिया था. रोहित गुंटूर जिले के रहने वाले थे. वे विज्ञान तकनीक और सोशल स्टडीज में पिछले दो साल से पीएचडी कर रहे थे. इसके अलावा वह आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन (एएसआई) के सक्रिय कार्यकर्ता थे. आत्महत्या करने से पहले रोहित ने एक पत्र लिखा, जिसका अनुवादित अंश इस प्रकार है…

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गुड मॉर्निंग

जब आप यह खत पढ़ रहे होंगे, तब मैं आपके पास नहीं होऊंगा. मुझसे नाराज मत होइएगा. मैं जानता हूं, आप में से कई लोग मुझे दिल से चाहते हैं, प्यार करते हैं और मेरा ख्याल रखते रहे हैं. मुझे किसी से शिकायत नहीं है. मुझे हमेशा खुद से समस्याएं रही हैं. मैं अपनी आत्मा और अपने शरीर के बीच के फासले को बढ़ता हुआ महसूस कर रहा हूं. मैं एक राक्षस बन गया हूं. मैं हमेशा से एक लेखक बनना चाहता था. कार्ल सेगन जैसा विज्ञान का लेखक. हालांकि अंत में, मैं सिर्फ यह खत ही लिख पा रहा हूं.

मैंने विज्ञान से, सितारों से और प्रकृति से प्यार किया, लेकिन यह जाने बगैर कि लोग कब का प्रकृति का साथ छोड़ चुके हैं. हमारी भावनाएं दोयम दर्जे की हैं. हमारा प्यार बनावटी है. हमारी मान्यताएं झूठी हैं. हमारी मौलिकताएं कृत्रिम हैं. वास्तव में अब यह असंभव हो गया कि बिना दुख पहुंचाए‌ किसी को प्यार किया जा सके.

एक इंसान की कीमत उसकी पहचान एक वोट… एक संख्या… एक वस्तु तक सिमट कर रह गई है. कोई भी क्षेत्र हो, अध्ययन में, राजनीति में, मरने में, जीने में, कभी भी एक व्यक्‍ति को उसकी बुद्धिमत्ता से नहीं आंका गया.

इस तरह का खत मैं पहली दफा लिख रहा हूं. आखिरी खत लिखने का यह मेरा पहला अनुभव है. अगर यह कदम सार्थक न हो पाए तो मुझे माफ कीजिएगा.

हो सकता है इस दुनिया, प्यार, दर्द, जिंदगी और मौत को समझ पाने में, मैं गलत था. कोई जल्दी नहीं थी, लेकिन मैं हमेशा जल्दबाजी में रहता था. एक जिंदगी शुरू करने की हड़बड़ी में था. इसी क्षण में, कुछ लोगों के लिए जिंदगी अभिशाप है. मेरा जन्म मेरे लिए एक घातक हादसा है. अपने बचपन के अकेलेपन से मैं कभी उबर नहीं सका. अतीत का एक क्षुद्र बच्चा.

इस वक्त मैं आहत नहीं हूं… दुखी नहीं हूं, मैं बस खाली हो गया हूं. अपने लिए भी बेपरवाह. यह दुखद है और इसी वजह से मैं ऐसा कर रहा हूं. लोग मुझे कायर कह सकते हैं और जब मैं चला जाऊंगा तो स्वार्थी, या मूर्ख भी समझ सकते हैं. मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मुझे क्या कहा जा रहा है. मैं मौत के बाद की कहानियों… भूतों या आत्माओं पर विश्वास नहीं करता. अगर किसी बात पर मैं विश्वास करता हूं तो वह यह है कि मैं अब सितारों तक का सफर कर सकता हूं. और दूसरी दुनिया के बारे में जान सकता हूं.

जो भी इस खत का पढ़ रहे हैं, अगर आप मेरे लिए कुछ कर सकते हैं, तो मुझे सात महीने की फेलोशिप‌ मिलनी बाकी है जो एक लाख और 75 हजार रुपये है, कृपया ये कोशिश करें कि वह मेरे परिवार को मिल जाए. मुझे 40 हजार रुपये के करीब रामजी को देना है. उसने कभी इन पैसों को मुझसे नहीं मांगा, मगर कृपा करके ये पैसे उसे दे दिए जाएं.

मेरी अंतिम यात्रा को शांतिपूर्ण और सहज रहने दें. ऐसा व्यवहार करें कि लगे जैसे मैं आया और चला गया. मेरे लिए आंसू न बहाएं. यह समझ लें कि जिंदा रहने की बजाय मैं मरने से खुश हूं.

‘परछाइयों से सितारों तक’

उमा अन्ना, मुझे माफ कीजिएगा कि ऐसा करने के लिए मैंने आपके कमरे का इस्तेमाल कर रहा हूं.
एएसए (आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोशिएशन) परिवार के लिए, माफ करना मैं आप सबको निराश कर रहा हूं. आपने मुझे बेहद प्यार किया. मैं उज्ज्वल भविष्य के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं दे रहा हूं.

आखिर बार के लिए

जय भीम

मैं औपचारिकताएं पूरी करना भूल गया. मेरी खुदकुशी के लिए कोई जिम्मेदार नहीं है.

किसी ने ऐसा करने के लिए मुझे उकसाया नहीं किया, न तो अपने शब्दों से और न ही अपने काम से.

यह मेरा फैसला है और मैं अकेला व्यक्ति हूं, जो इस सबके लिए जिम्मेदार है.

कृपया मेरे जाने के बाद, इसके लिए मेरे मित्रों और शत्रुओं को परेशान न किया जाए.

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